रमाशंकर
रमाशंकर Aug 9, 2017

माता शबरी की कथा ओर नवधाभक्ति का उपदेश रामचरितमानस से।

माता शबरी की कथा ओर नवधाभक्ति का उपदेश रामचरितमानस से।

माता शबरी की कथा ओर नवधाभक्ति का उपदेश रामचरितमानस से।

भगवान #श्रीराम के अनन्य भक्तों में एक भील जाति की कन्या भी थी श्रमणा। जिसे बाद में शबरी के नाम से जाना गयाl उसे जब भी समय मिलता, वह भगवान की पूजा- अर्चना करती। बड़ी होने पर जब उसका विवाह होने वाला था तो अगले दिन भोजन के लिए काफी बकरियों की बलि दी जानी थी।

यह पता लगते ही उसने अपनी माता से इस जीव हत्या का विरोध किया पर उसकी माता ने बताया कि वे भील हैं और यह उनके यहां का नियम है कि बारात का स्वागत इसी भोजन से होता है! वह यह बात सह नहीं कर सकी और चुप चाप रात के समय घर छोड़ कर जंगलों की और निकल पड़ी!

जंगल में वह ऋषि-मुनियों की कुटिया पर गयी पर भील जाति की होने के कारण सबने उसे दुत्कार दिया! आखिर में मतंग ऋषि ने उसे अपने आश्रम में रहने के लिए आश्रय दिया। शबरी अपने व्यवहार और कार्य−कुशलता से शीघ्र ही आश्रमवासियों की प्रिय बन गई।

मतंग ऋषि ने अपनी देह त्याग के समय उसे बताया कि भगवान राम एक दिन उसकी कुटिया में आएंगे! वह उनकी प्रतिक्षा करे ! वही तुम्हारा उद्धार करेंगे l दिन बीतते रहे। शबरी रोज सारे मार्ग की और कुटिया की सफाई करती और प्रभु राम की प्रतीक्षा करती! ऐसे करते वह बूढी हो चली, पर प्रतिक्षा नही छोडी क्यूंकि गुरु के वचन जो थे !

अंत मे शबरी की प्रतिक्षा की खत्म हुई और भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ माता सीता की खोज करते हु्ए मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुंचे। शबरी ने उन्हें पहचान लिया। उन्होंने दोनों भाईयों का यथायोग्य सत्कार किया। शबरी भागकर कंद−मूल लेने गई। कुछ क्षण बाद वह लौटी।

कंद−मूलों के साथ वह कुछ जंगली बेर भी लाई थी। कंद−मूलों को उसने भगवान को अर्पण कर दिया। पर बेरों को देने का साहस नहीं कर पा रही थी। कहीं बेर ख़राब और खट्टे न निकलें, इस बात का उसे भय था। उसने बेरों को चखना आरंभ कर दिया। अच्छे और मीठे बेर वह बिना किसी संकोच के श्रीराम को देने लगी। श्रीराम उसकी सरलता पर मुग्ध थे। उन्होंने बड़े प्रेम से जूठे बेर खाए। श्रीराम की कृपा से शबरी का उसी समय उद्धार हो गया।

शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश।

* नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥

भावार्थ:- मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम॥

* गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

भावार्थ:- तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें॥

* मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

भावार्थ:- मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना॥

* सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥

भावार्थ:- सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना॥

* नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥

भावार्थ:- नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो-॥

* सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥

भावार्थ:- हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है॥

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कामेंट्स

Ashwani kumar Pandit ji Aug 9, 2017
जय श्री राम लक्ष्मण सीता जी की जय हो

Boharidas Daiya Aug 9, 2017
नवधा भक्ति का बहुत ही सुन्दर विवेचन।रामचरितमानस वास्तव में गीता का आचरण है।

रमाशंकर Aug 10, 2017
जय महाकालेश्वर जय महाकाल हर हर महादेव जय श्रीराम जय सियाराम जय रघुनंदन सीताराम ऊँ भगवतेय वासुदेवाय नमः शुभ वृहस्पतिवार आप सभी बंधुओ का आज का समय मंगलमय हो

Sanjeev Kumar Aug 10, 2017
श्री रामदरबार की जय

Vishnu mishra Dec 12, 2018

जबसे श्रीरामचन्द्र जी विवाह करके घर आये तबसे अयोध्या में नित्य मंडल हो रहैं है और आनन्दके बधावे बज रहे हैं चोदहो लोकरूपी बड़े भारी पव्रतोपर पुण्यरूपी मेघ सुखरूपी जल बरसा रहे हैं 🚩🚩🌷🌷🌱🌱🌷🌷🌴🌴🌷🌷🚩🚩

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Madan singh Dec 12, 2018

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Jay Shree Krishna Dec 12, 2018

श्रीरामचरितमानस सप्तम सोपान
(उत्तरकाण्ड) चतुर्थ दिवस
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चौपाई :

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे।
दुसह बिरह संभव दुख मेटे॥
सीता चरन भरत सिरु नावा।
अनुज समेत परम सुख पावा॥

अर्थ:-फिर लक्ष्मणजी शत्रुघ्नजी से गले लगकर मिले ...

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shashikant shriwas Dec 12, 2018

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Renu Sharma Dec 11, 2018

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कल सोमवार था आज मंगलवार है महावीर का वार है जो भी सच्चे मन से ध्यावे उसका बेड़ा पार है आज मंगलवार है भगवान हनुमान जी का वार है जो भी सच्चे मन से ध्यावे उसका बेड़ा पार है आज मंगलवार है बजरंग बली का वार है जो भी सच्चे मन से ध्यावे उसका बेड़ा पार है ...

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हमारे मदन गोपाल हें राम।।
धनुष्यबाण वर विमल बेनुकर,
पीत वसन और तन धनश्याम।।१।।
अपनी भूजा जिन जलनिधि बांध्यो,
रस रच्यो जिन कोटिक काम।।
दश शिर हत जिन असुर संहारे,
गोवर्दन धार्यो कर काम।।२।।
वे रधुवर यह जदुवर मोहन,
लीला ललित विमल बहु निम।।
परमानंद प्...

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