🚩🙏 यह विचार उचित है , और ये सत्य घटनाक्रम है *( यह लेख किसी को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं है आप अपना विचार एवं मार्गदर्शन दे सकते हैं )* एक काल में देवराज इन्द्र ने देवगुरु बृहस्पति से असहमति जताई और देवकार्य सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने विश्वरूप जी को पुरोहित पद पर नियुक्ति किया। लेकिन विश्वरूप जी जब भी देवताओं को बल देने वाले हवि का भाग आहुतियां प्रदान करते तो उसका कुछ भाग देवताओं को न मिल कर दैत्यों को मिलने लगा क्योंकि विश्वरूप जी दैत्यों के हितैषी थे , जब ये बात देवराज इन्द्र को पता चली तो उन्होंने उसी क्षण विश्वरूप जी का सिर काट डाला जिसके कारण उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगा । जिसे बाद में बृक्षों , जल , स्त्रियों और पृथ्वी में बांट दिया गया । वृक्ष पर जो गोंद निकलता है वह उसी का भाग है , पानी में जो झाग बनता और काई है ये उनका ही भाग है , स्त्रियों को जो ऋतु धर्म होता है ये उसी ब्रह्म हत्या का भाग है , और भूमि पर जो बरसात में कुकुरमुत्ते होते हैं और बंजर भूमि है ये उसी का भाग है । इसके पीछे का भाव यह है कि पुरोहित को अपने यजमान के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए । जैसा कि पुरोहित होने पर विश्वरूप जी ने किया है । आप सबको को जानकर आश्चर्य होगा कि दिव्य नारायण कवच को धारण करने की विद्या देवराज इन्द्र को विश्वरूप जी से ही प्राप्त हुई । इसलिए ऐसे कृत्य करने वाले पुरोहितों की वेद , पुराण, स्मृति निन्दा करते हैं ।। शेष आदरणीय विद्वतजनों से मार्गदर्शन की अपेक्षा है। सभी प्रभु प्रेमियों को जय माता दी ।। 🚩👏🌺🌷💐🙏🌺🌷💐

🚩🙏 यह विचार उचित है , और ये सत्य घटनाक्रम है 

*( यह लेख किसी को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं है आप अपना विचार एवं मार्गदर्शन दे सकते हैं )*

एक काल में देवराज इन्द्र ने देवगुरु बृहस्पति से असहमति जताई और देवकार्य सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने विश्वरूप जी को पुरोहित पद पर नियुक्ति किया। 

लेकिन विश्वरूप जी जब भी देवताओं को बल देने वाले हवि का भाग आहुतियां प्रदान करते तो उसका कुछ भाग देवताओं को न मिल कर दैत्यों को मिलने लगा क्योंकि विश्वरूप जी दैत्यों के हितैषी थे , 

जब ये बात देवराज इन्द्र को पता चली तो उन्होंने उसी क्षण विश्वरूप जी का सिर काट डाला जिसके कारण उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगा । 

जिसे बाद में बृक्षों , जल , स्त्रियों और पृथ्वी में बांट दिया गया । वृक्ष पर जो गोंद निकलता है वह उसी का भाग है , पानी में जो झाग बनता और काई है ये उनका ही भाग है , स्त्रियों को जो ऋतु धर्म होता है ये उसी ब्रह्म हत्या का भाग है , और भूमि पर जो बरसात में कुकुरमुत्ते होते हैं और बंजर भूमि है ये उसी का भाग है । 

इसके पीछे का भाव यह है कि पुरोहित को अपने यजमान के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए । जैसा कि पुरोहित होने पर विश्वरूप जी ने किया है । आप सबको को जानकर आश्चर्य होगा कि दिव्य नारायण कवच को धारण करने की विद्या देवराज इन्द्र को विश्वरूप जी से ही प्राप्त हुई । इसलिए ऐसे कृत्य करने वाले पुरोहितों की वेद , पुराण, स्मृति निन्दा करते हैं ।।

शेष आदरणीय विद्वतजनों से मार्गदर्शन की अपेक्षा है।
सभी प्रभु प्रेमियों को जय माता दी ।।
🚩👏🌺🌷💐🙏🌺🌷💐

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Aryan Phulwani Oct 24, 2020

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Sarvagya Shukla Oct 23, 2020

"ब्रज रज" : ब्रज मिट्टी को रज क्यों बोला गया है ?? . . . सम्पूर्ण कामनाओं और श्री कृष्ण भक्ति प्राप्त करने के लिए "ब्रज" है । भगवान ने बाल्यकाल में यहाँ अनेको लीलाएं की ! उन सभी लीलाओं का प्रतक्ष द्रष्टा है श्री गोवर्धन पर्वत, श्री यमुना जी एवं यहाँ की "रज" । यहाँ की मिट्टी को रज बोला गया है इसके पीछे जो कारण है वह यह कि भगवान ने इसको खाया और माता यशोदा के डाँटने पर इस मिट्टी को उगल दिया । इसके पीछे बहुत कारण हैं जिनमें सबसे मुख्य इसको अपना प्रसादी करना था क्योंकि ऐसा कोई प्रसाद नहीं जो जन्म जन्मांतर यथावत बना रहे इसीलिए भगवान ने ब्रजवासियों को ऐसा प्रसाद दिया जो न तो कभी दूषित होगा और न ही इसका अंत । भगवान श्री कृष्ण ने अपने "ब्रज" यानि अपने निज गोलोक धाम में समस्त तीर्थों को स्थापित कर दिया चूँकि जहाँ परिपूर्णतम ब्रह्म स्वयं वास करे वहां समस्त तीर्थ स्वतः ही आने की इच्छा रखते हैं, लेकिन बृजवासियों को किसी प्रकार का भ्रम न हो इसके लिए भगवान ने उनके सामने ही समस्त तीर्थ स्थानो को सूक्ष्म रूप से यहाँ स्थापित किया । श्री कृष्ण का मानना था कि केवल ब्रज वासियों को ही ये उत्तम रस प्राप्त है क्योंकि इनके रूप में मैं स्वयं विद्यमान हूँ ये मेरी अपनी निजी प्रकृति से ही प्रगट हैं, अन्य जीव मात्र में मैं आत्मा रूप में विराजित हूँ लेकिन ब्रजजनों का और मेरा स्वरुप तो एक ही है, इनका हर एक कर्म मेरी ही लीला है, इसमें कोई संशय नहीं समझना चाहिए । माता यशोदा को तीर्थाटन की जब इच्छा हुई तो भगवान ने चारों धाम यहाँ संकल्प मात्र से ही प्रगट कर दिए । यहाँ रहकर जन्म और मृत्यु मात्र लीला है मेरा पार्षद मेरे ही निज धाम को प्राप्त होता है इसलिए संस्कार का भी यहाँ महत्त्व नहीं ऐसा प्रभु वाणी है ! संस्कार तो यहाँ से जन्मते हैं ब्रह्मवैवर्त पुराण के अंतर्गत कृष्ण के वाम पार्ष से समस्त गोप और श्री राधा रानी से समस्त गोपियों का प्रादुर्भाव हुआ है इसको सत्य जानो । यहाँ जन्म और मृत्यु दोनों मेरी कृपा के द्वारा ही जीव को प्राप्त होती है एवं प्रत्येक जीव मात्र जो यहाँ निवास करता है वह नित्य मुक्त है । उसकी मुक्ति के उपाय के लिए किये गए कर्मो का महत्त्व कुछ नहीं है। मेरे इस परम धाम को प्राप्त करने के लिए समस्त ब्रह्मांड में अनेकों ऋषि, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, प्रजापति, देवतागण, नागलोक के समस्त प्राणी निरंतर मुझे भजते हैं लेकिन फिर भी उनको इसकी प्राप्ति इतनी सहज नहीं है । मेरी चरण रज ही इस ब्रज (गोलोक धाम ) की रज है जिसमें मेरी लीलाओं का दर्शन है । जय जय ब्रज रज जय जय श्री राधे ।।

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Sarvagya Shukla Oct 23, 2020

👌अनमोल👌 💥 “ये बिल क्या होता है माँ ?” 8 साल के बेटे ने माँ से पूछा। 💥 माँ ने समझाया -- “जब हम किसी से कोई सामान लेते हैं या काम कराते हैं, तो वह उस सामान या काम के बदले हम से पैसे लेता है, और हमें उस काम या सामान की एक सूची बना कर देता है, इसी को हम बिल कहते हैं।” 💥 लड़के को बात अच्छी तरह समझ में आ गयी। रात को सोने से पहले, उसने माँ के तकिये के नीचे एक कागज़ रखा, जिस में उस दिन का हिसाब लिखा था। 💥 पास की दूकान से सामान लाया 5रु पापा की bike पोंछकर बाहर निकाली। 5 रु दादाजी का सर दबाया 10 रु माँ की चाभी ढूंढी 10 रु कुल योग 30 रु 💥 यह सिर्फ आज का बिल है , इसे आज ही चुकता कर दे तो अच्छा है। 💥 सुबह जब वह उठा तो उसके तकिये के नीचे 30 रु. रखे थे। यह देख कर वह बहुत खुश हुआ कि ये बढ़िया काम मिल गया। 💥 तभी उस ने एक और कागज़ वहीं रखा देखा। जल्दी से उठा कर, उसने कागज़ को पढ़ा। माँ ने लिखा था -- 😘 जन्म से अब तक पालना पोसना -- रु 00 💥बीमार होने पर रात रात भर छाती से लगाये घूमना -- रु 00 😘 स्कूल भेजना और घर पर होम वर्क कराना -- रु 00 💥 सुबह से रात तक खिलाना, पिलाना, कपड़े सिलाना, प्रेस करना -- रु 00 💥 अधिक तर मांगे पूरी करना -- रु 00 कुल योग रु 00 💥 ये अभी तक का पूरा बिल है, इसे जब चुकता करना चाहो कर देना। 💥 लड़के की आँखे भर आईं सीधा जा कर माँ के पैरों में झुक गया और मुश्किल से बोल पाया -- “तेरे बिल में मोल तो लिखा ही नहीं है माँ, ये तो अनमोल है," इसे चुकता करने लायक धन तो मेरे पास कभी भी नहीं होगा। मुझे माफ़ कर देना , माँ।“ 👌माँ ने," हँसते हुए" उसे गले से लगा लिया । 💥 बच्चों को ज़रूर पढ़ायें यह मेरा निवेदन है ...... भले ही आपके बच्चे माँ बाप बन गए हो ।🚩👍

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Neha Sharma, Haryana Oct 24, 2020

.*राम से रामचन्द्र ( श्री कदम्ब रामायण ) ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ *जब भगवान का प्राकट्य अयोध्या जी में हुआ तो सूर्य नारायण भगवान बड़े प्रसन्न हुए, कि मेरे वंश में भगवान का प्राकट्य हो गया, और आनंद में भर कर एक क्षण के लिए रुक गए। *सूर्य कि गति कभी नहीं रुकती परन्तु एक क्षण को रुकी गई, जब देखा राजभवन में अति कोमल वाणी से वेद ध्वनि हो रही है, अबीर गुलाल उड़ रहा है, अयोध्या में उत्सव को देखकर सूर्य भगवान अपना रथ हाँकना ही भूल गए। *मास दिवस कर दिवस भा मरम ना जनाइ कोइ *रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन विधि होइ *अर्थात् – महीने भर का दिन हो गया, इस रहस्य को कोई नहीं जानता, सूर्य अपने रथ सहित वही रुक गए फिर रात किस तरह होती। *सब जगह आनंद ही आनंद छाया था परन्तु चंद्रमा रो रहे थे। *भगवान ने पूछा – चन्द्रमा ! सब ओर आनंद छाया है, क्या मेरे प्राकट्य पर तुम्हे प्रसन्नता नहीं हुई..? *चन्द्रमा बोला – प्रभु ! सब तो आपके दर्शन कर रहे है इसलिए प्रसन्न है परन्तु मै कैसे दर्शन करूँ ? *प्रभु बोले- क्यों, क्या बात है ? *चंद्रमा बोले – आज तो सूर्य नारायण हटने का नाम ही नहीं ले रहे और जब तक वे हटेगे नहीं मै कैसे आ सकता हूँ, *प्रभु बोले थोडा इंतजार कर ! अभी सूर्य की बारी है उनके ही वंश में जनम लिया है न इसलिए आनंद समाता नहीं है उनका, अगली बार चन्द्र वंश में आऊंगा, अभी दिन के बारह बजे आया फिर रात के बारह बजे आऊंगा तब जी भर के दर्शन करना, तब तक आप इंतजार करो ? *चंद्र बोले – प्रभु ! द्वापर के लिए बहुत समय है, तब तक मेरा क्या होगा, में तो इंतजार करते-करते मर ही जाऊँगा ? *भगवान बोले – कोई बात नहीं में अपने नाम के साथ तुम्हारा नाम जोड़ लेता हूँ, रामचंद्र, सभी मुझे रामचंद्र कहेगे, *सूर्य वंश में जन्म लिया है, फिर भी कोई मुझे रामसिह तो नहीं कहेगा, और जिसके नाम के आगे मै हूँ, वह कैसे मर सकता है, *वह तो अमर हो जाता है, इसलिए तुम भी अब कैसे मरोगे, इतना सुनते ही चंद्रमा बड़ा प्रसन्न हुआ। ।। जय जय सियाराम ।। ~~~~~~~~~~~~ "रावण"...... ०१. रावण के दादाजी का नाम प्रजापति पुलत्स्य था जो ब्रह्मा जी के दस पुत्रों में से एक थे। इस तरह देखा जाए तो रावण ब्रह्मा जी का पडपौत्र हुआ जबकि उसने अपने पिताजी और दादाजी से हटकर धर्म का साथ न देकर अधर्म का साथ दिया था। ०२. हिन्दू ज्योतिषशास्त्र में रावण संहिता को एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक माना जाता है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि रावण संहिता की रचना खुद रावण ने की थी। ०३. रामायण में एक जगह यह भी बताया गया है कि रावण में भगवान राम के लिए यज्ञ किया था। वो यज्ञ करना रावण के लिए बहुत जरुरी था, क्योंकि लंका तक पहुँचने के लिए जब राम जी की सेना ने पुल बनाना शुरू किया था, तब शिवजी का आशीर्वाद पाने से पहले उसको राम जी का आराधना करनी पड़ी थी। ०४. रावण तीनो लोको का स्वामी था और उसने न केवल इंद्र लोक पर नही बल्कि भूलोक के भी एक बड़े हिस्से को अपने असुरो की ताकत बढाने के लिए कब्जा किया था। ०५. रावण अपने समय का सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है और रामायण में बताया गया है कि जब रावण मृत्यु शय्या पर लेटा हुआ था तब राम जी ने लक्ष्मण को उसके पास बैठने को कहा था ताकि वो मरने से पहले उनको राजपाट चलाने और नियन्त्रण करने के गुर सीखा सके। ०६. रावण के कुछ चित्रों में आपने उनको वीणा बजाते हुए देखा होगा। एक पौराणिक कथा के अनुसार रावण को संगीत का बहुत शौक था। उअर और वीणा बजाने में बहुत माहिर था। ऐसा कहा जाता है कि रावण वीणा इतनी मधुर बजाता था कि देवता भी उसका संगीत सुनने के लिए धरती पर आ जाते थे। ०७. ऐसा माना जाता है कि रावण इतना शक्तिशाली था कि उसने नवग्रहों को अपने अधिकार में ले लिया था। कथाओं में बताया जाता है कि जब मेघनाथ का जन्म हुआ था तब रावण ने ग्रहों को 11वें स्थान पर रहने को कहा था, ताकि उसे अमरता मिल सके। लेकिन शनिदेव ने ऐसा करने से मना कर दिया और 12वें स्थान पर विराजमान हो गये। रावण इससे इतना नाराज हुआ कि उसें शनिदेव पर आक्रमण कर दिया था और यहाँ तक कि कुछ समय के लिए बंदी भी बना लिया था। ०८. रावण ये जनता था कि उसकी मौत विष्णु के अवतार के हाथों लिखी हुयी है, और ये भी जानता था कि विष्णु के हाथों मरने से उसको मोक्ष की प्राप्ति होगी, और उसका असुर रूप का विनाश होगा। ०९. हमने रावण के 10 सिरों से जुड़ी कहानी कि जब रावण शिवजी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप कर रहा था तब रावण ने खुद अपने सिर को धड से अलग कर दिया था। जब शिवजी ने उसकी भक्ति देखी तो उससे प्रसन्न होकर हर टुकड़े से एक सिर बना दिया था जो उसके दस सर थे। १०. शिवजी ने ही रावण को रावण नाम दिया था। ऐसा कथाओं में बताया जाता है कि रावण शिवजी को कैलाश से लंका ले जाना चाहता था। लेकिन शिवजी राजी नही थे तो उसने पर्वत को ही उठाने का प्रयास किया। इसलिए शिवजी ने अपना एक पैर कैलाश पर्वत पर रख दिया। जिससे रावण की हाथ दब गया था। दर्द के मारे रावण जोर से चिल्लाया, लेकिन शिवजी की ताकत को देखते हुए उसने शिव तांडव किया था। शिवजी को ये बहुत अजीब लगा कि दर्द में होते हुए भी उसने शिव तांडव किया तो उसका नाम रावण रख दिया जिसका अर्थ था जो तेज आवाज में दहाड़ता हो। ११. जब रावण युद्ध में हार रहा था और अपनी से तरफ से अंतिम शेष प्राणी जब वही बचा था। तब रावण ने यज्ञ करने का निश्चय किया जिससे तूफ़ान आ सकता था। लेकिन यज्ञ के लिए उसको पूरे यज्ञ के दौरान एक जगह बैठना जरुरी था। जब राम जी को इस बारे में पता चल तो राम जी ने बाली पुत्र अंगद को रावण का यज्ञ में बाधा डालने के लिए भेजा। कई प्रयासों के बाद भी अंगद यज्ञ में बाधा डालने में सफल नही हुआ। तब अंगद इस विश्वास से रावण की पत्नी मन्दोदरी को घसीटने लगा कि रावण ये देखकर अपना स्थान छोड़ देगा लेकिन वो नही हिला। तब मन्दोदरी रावण के सामने चिल्लायी और उसका तिरस्कार किया, और राम जी का उदाहरण देते हुए कहा कि “एक राम है जिसने अपनी पत्नी के युद्ध किया और दुसरी तरह आप है जो अपनी पत्नी को बचाने के लिए अपनी जगह से नही हिल सकते।" यह सुनकर अंत में रावण उस यज्ञ को पूरा किये बिना वहाँ से उठ गया था। १२. रावण और कुंभकर्ण वास्तव में विष्णु भगवान के द्वारपाल जय और विजय थे। जिनको एक ऋषि से मिले श्राप के कारण राक्षस कुल में जन्म लेना पड़ा था, और अपने ही आराध्य से उनको लड़ना पड़ा था। १३. राम-रावण के बातचीत में एक बार राम जी ने रावण को महा-ब्राह्मण कहकर पुकारा था। क्योंकि रावण 64 कलाओं में निपुण था जिसके कारण उसे असुरो में सबसे बुद्धिमान व्यक्ति बनाया था। १४. ऐसा कहा जाता है कि एक बार रावण महिलाओं के प्रति बहुत जल्द आसक्त होता था। अपनी इसी कमजोरी के कारण जब वो नालाकुरा की पत्नी को अपने वश में करने की कोशिश करता है वो स्त्री उनको श्राप देती है कि रावण अपने जीवन किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के बिना स्पर्श नही कर सकता वरना उसका विनाश हो जाएगा। यही कारण था कि रावण ने सीता को नही छुआ था। १५. रावण को अपने दस सिरों की वजह से दशग्रीव कहा जाता है जो उसकी अद्भुत बुद्धिमता को दर्शाता है। १६. रावण अपने समय का विज्ञान का बहुत बड़ा विद्वान भी था जिसका उदाहरण पुष्पक विमान था जिससे पता चलता है कि उसे विज्ञान की काफी परख थी। १७. भारत का क्लासिकल वाद्य यंत्र रूद्र वीणा की खोज रावण ने ही की थी। रावण शिवजी का बहुत बड़ा भक्त था और दिन रात उनकी आराधना करता रहता था। रावण के बहुत से नाम थे जिसमे दशानन सबसे लोकप्रिय नाम था। भारत और श्रीलंका में ऐसी कई जगह है जहाँ पर रावण की पूजा होती है। १८. कुछ लोग ऐसा मानते है कि लाल किताब का असली लेखक रावण ही था। ऐसा कहा जाता है कि रावण अपने अहंकार की वजह से अपनी शक्तियों को खो बैठा था। और उसने लाल किताब का प्रभाव खो दिया था, जो बाद में अरब में पायी गये थी जिसे बाद में उर्दू और पारसी में अनुवाद किया गया था। १९. रावण बाली से एक बार पराजित हो चुका था। कहानी इस प्रकार है कि बाली को सूर्यदेव का आशीर्वाद प्राप्त था, और रावण शिवजी से मिले वरदान के अहंकार से बाली को चुनौती दे बैठा। बाली ने शुरुआत ने ध्यान नही दिया, लेकिन रावण ने जब उसको ज्यादा परेशान किया तो बाली ने रावण के सिर को अपनी भुजाओं में दबा लिया और उड़ने लगा। उसने रावण को 6 महीने बाद ही छोड़ा ताकि वो सबक सीख सके। २०. लंका का निर्माण विश्वकर्मा जी ने किया था और जब उस पर रावण के सौतेले भाई कुबेर का कब्जा था। जब रावण तपस्या से लौटा था तब उसने कुबेर से पूरी लंका छीन ली थी। ऐसा कहा जाता है उसके राज में गरीब से गरीब का घर भी उसने सोने का कर दिया था। जिसके कारण उसकी लंका नगरी में खूब ख्याति थी। २१. दक्षिणी भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया के कई हिस्सों में रावण की पूजा की जाती है। और अनेको संख्या में उसके भक्त है। कानपुर में कैलाश मन्दिर में साल में एक बार दशहरे के दिन खुलता है। जहाँ पर रावण की पूजा होती है। इसके अलावा रावण को आंध्रप्रदेश और राजस्थान के भी कुछ हिस्सों में पूजा जाता था। ----------:::×:::---------- "जय श्री राम" *******************************************

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🚩 *श्री गणेशाय नम:🚩* 📜 *दैनिक पंचांग* 📜 🟦 *25 - 10 - 2020* 🟪 *श्रीमाधोपुर-पंचांग* 🟨 *तिथि नवमी 07:44:04* 🟨 *नक्षत्र धनिष्ठा 28:23:32* 🟨 *करण :* *कौलव 07:44:04* *तैतिल 20:19:10* 🟨 *पक्ष शुक्ल* 🟨 *योग गण्ड 24:27:21* 🟨 *वार रविवार* 🟪 *सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणना* 🟨 सूर्योदय 06:33:45 🟨 चन्द्रोदय 14:39:59 🟨 चन्द्र राशि मकर-15:27:02 तक 🟨 सूर्यास्त 17:49:09 🟨 चन्द्रास्त 25:47:00 🟨 ऋतु हेमंत 🟪 हिन्दू मास एवं वर्ष 🟨 शक सम्वत 1942 शार्वरी 🟨 कलि सम्वत 5122 🟨 दिन काल 11:15:23 🟨 विक्रम सम्वत 2077 🟨 मास अमांत आश्विन 🟨 मास पूर्णिमांत आश्विन 🟪 शुभ और अशुभ समय 🟪 शुभ समय 🟨 अभिजित 11:48:57 - 12:33:58 🟪 अशुभ समय 🟨 दुष्टमुहूर्त 16:19:06 - 17:04:08 🟨 कंटक 10:18:53 - 11:03:55 🟨 यमघण्ट 13:19:00 - 14:04:01 🟨 राहु काल 16:24:44 - 17:49:09 🟨 कुलिक 16:19:06 - 17:04:08 🟨 कालवेला या अर्द्धयाम 11:48:57 - 12:33:58 🟨 यमगण्ड 12:11:27 - 13:35:53 🟨 गुलिक काल 15:00:18 - 16:24:44 🟨 दिशा शूल पश्चिम 🟫 चन्द्रबल और ताराबल 🟪 ताराबल 🟨 भरणी, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, आश्लेषा, पूर्वा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, रेवती 🟪 चन्द्रबल 🟨 मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, मकर, मीन 📜 *चौघडिया-मुहूर्त* 📜 🔅उद्वेग 06:33:45 - 07:58:11 🔅चल 07:58:11 - 09:22:36 🔅लाभ 09:22:36 - 10:47:02 🔅अमृत 10:47:02 - 12:11:27 🔅काल 12:11:27 - 13:35:53 🔅शुभ 13:35:53 - 15:00:18 🔅रोग 15:00:18 - 16:24:44 🔅उद्वेग 16:24:44 - 17:49:09 🔅शुभ 17:49:09 - 19:24:49 🔅अमृत 19:24:49 - 21:00:28 🔅चल 21:00:28 - 22:36:08 🔅रोग 22:36:08 - 24:11:47 🔅काल 24:11:47 - 25:47:26 🔅लाभ 25:47:26 - 27:23:06 🔅उद्वेग 27:23:06 - 28:58:45 🔅शुभ 28:58:45 - 30:34:24 *🟪🥎लग्न-तालिका🥎🟪* सूर्योदय का समय: 06:33:45 सूर्योदय के समय लग्न तुला चर 187°19′04″ 🔅 तुला चर शुरू: 06:00 AM समाप्त: 08:19 AM 🔅 वृश्चिक स्थिर शुरू: 08:19 AM समाप्त: 10:37 AM 🔅 धनु द्विस्वाभाव शुरू: 10:37 AM समाप्त: 12:42 PM 🔅 मकर चर शुरू: 12:42 PM समाप्त: 02:25 PM 🔅 कुम्भ स्थिर शुरू: 02:25 PM समाप्त: 03:54 PM 🔅 मीन द्विस्वाभाव शुरू: 03:54 PM समाप्त: 05:20 PM 🔅 मेष चर शुरू: 05:20 PM समाप्त: 06:57 PM 🔅 वृषभ स्थिर शुरू: 06:57 PM समाप्त: 08:53 PM 🔅 मिथुन द्विस्वाभाव शुरू: 08:53 PM समाप्त: 11:08 PM 🔅 कर्क चर शुरू: 11:08 PM समाप्त: अगले दिन 01:28 AM 🔅 सिंह स्थिर शुरू: अगले दिन 01:28 AM समाप्त: अगले दिन 03:44 AM 🔅 कन्या द्विस्वाभाव शुरू: अगले दिन 03:44 AM समाप्त: अगले दिन 06:00 AM 2️⃣5️⃣🌺1️⃣0️⃣🌺2️⃣0️⃣ *🟪🙏 जयमातादी🙏🟪* *ज्योतिषशास्त्री:-सुरेन्द्र कुमार चेजारा, व्याख्याता राउमावि होल्याकाबास, निवास:- श्रीमाधोपुर* 🟪🟦🟨🟫🟪🟦🟨🟫

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Pankaj Khandelwal Oct 25, 2020

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Basanta Kumar Sahu Oct 24, 2020

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