#इंटरनेट_युक्त_स्मार्टफोन_के_विषय_मे...(भाग 3) ---------------------------------------------------------- हमारे प्रभु सर्व अन्तर्यामी है तुम्हे देख रहे है यदि ईमानदारी से भजन करोगे ! तो तुम्हारे हृदय में शीतलता होगी... ये जो जलन है, जरूरी है! जरूरी है! बिना जलन हुए बिना तपे आपका मन निर्मल नही होगा।आप थोड़ा सा जलिये,यह मन आपको जला रहा है तो आपको नही जला रहा, वह खुद जल रहा है, क्योकि उसने अपराध किये है। उसको थोड़ा पवित्र होने दीजिए आप समझते है मन की जलन मिटाने के लिये मुझे वह चेष्टा करनी चाहिये जिससे मन शांत हो जाए... नही ! मन की मलिनता तभी मिटेगी जब ये जलेगा, मलिनता मिटे बिना आपको पूर्ण आनंद की अनुभूति नही हो सकती। वृति लगे न लगे जीभ से नाम जपते रहो, पाप आचरण से बचते रहो, जो सन्त महात्मा जन आदेश करते है... वो कभी न देखो। बिल्कुल सच्ची मानिए हम कई बार मोबाइल वाली बात कहते है,बार बार कहते है सावधान रहिये ये आप ही अपने दुश्मन है, यदि आप साधक है और ऐसी कुछ बाते है तो हटा दीजिये बिल्कुल इन यंत्रो से... भैया ! हमारी साधना अंतर्मुखता की है, माना सत्संग सुना रहा है मोबाइल, और ऐसे रखा हुआ है.. थोड़ी देर सुन लीजिये, बंद कर दीजिये, समाज मे सुन लीजिये ईमानदारी में रहिये। अगर वो हर समय आप ठाकुर जी की तरह छाती से लगाया रखोगे तो रात्रि के 9 बजे से लेकर के सुबह 3 बजे तक साधक को पवित्र रहना बहुत कठिन बात है। 9बजे तक तो खान पान मिलना जुलना..और जहाँ पहुँचे अपने कमरे में..एकांत में..तब जितनी साधना दिन में तुम किये हो उतनी बढ़कर साधना मन करवाएगा तुमसे तुमको अपनी अधीनता में लाएगा उस समय कोई बलवान साधक एकांत में पवित्र रह सकता है। यह उसी धारा से चले हुए हम है इसीलिये बता रहे है, यह कोई किसी की सुनी बात नही,जीवन की बात है। ऐसे सब ठीक ... जहा एकांत बैठा जहाँ लाइट ऑफ हुई तहा मन ऑन हुआ, वो ऑन हुआ तहा अपना शुरू किया। साधक वही जो उसको ऑन ही न होने दे। बिल्कुल जब बेहोश हो गया तो हो गया नही तो चढ़ा बैठा रहे हर समय। अंतर्मुखता साधना है बहिर्मुखता नही,यह यंत्रो में जो हर समय हम लगे रहते है इसीलिये हमे आनंद की अनुभूति.... जीवन भर यंत्र में लगे रहो आपको आनंद की अनुभूति नही होगी आनंद की अनुभूति होती है अंतर् में लगने से, अंतर्मुखता से... सब साधन बहिर्मुखता का जो हम त्याग करने के लिय कर रहे है, हम बहिर्मुख में ही फँसे रहे, हर समय घुन्न घुन्न कान में बोल रहा है जरूरी है वो विषयी पुरुषों के लिये बोल रहा है की भाई राधे कृष्णा राधे कृष्णा... वो लगा है.. बोले 24 घण्टे भजन हो रहा है तो उसको भगवतानंद की अनुभूति होगी क्या? भगवतानंद की अनुभूति तुम्हे होनी है थोड़ी देर बाद ठीक है कि जहाँ मन नही लग पा रहा तो सुनाई... इसके बाद बंद करो ! मनीराम से बुलवाओ ! बोलो राधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे.. वो अंदर से सुनो, अंतर्मुख होइए तब आपको भगवतानंद की अनुभूति होगी। हर समय अगर मोबाइलो में फँसे रहे हर समय यंत्रो में फंसे रहे... थोड़ा तो सुलझिये..थोड़ा तो सुलझिये अंतर्मुखता होना साधना है बहिर्मुख.... ठीक है बाहर सब कुछ हो रहा है पर हर समय बहिर्मुख नही... थोड़ी देर के लिये ठीक फिर उसके बाद अंतर्मुख आइए अगर अंतर्मुख का अभ्यास नही है तो आपको अनुभूति कहाँ होगी?? आत्मस्वरूप का अनुभव कैसे होगा सहचरी भाव मे? कैसे आप जानोगे? कितने गन्दे हो ? बैठो एकांत में... बाहर साधक शून्य बनिये फिर देखिए आप, फिर आपको पता चलेगा आप हो क्या? ऐसे तो हमें सब महात्मा कहते है आप ईमानदारी से बैठके देखिये एकांत में बंद कीजिये दरवाजा ! कोई बाहर अंतर्मुख होने के लिये बाहर बाधा है उनको छोड़िए यंत्र आदि से नही, आप बैठिए और नाम जप कीजिये असलियत आपको उस समय समझ मे आएगी जो मन दिखायेगा। ऐसा लगता है खोलो दरवाजा और बाहर कोई तो मिले, कोई तो बात करे यह मन इतना बदमाश है। इसलिय सावधानी पूर्वक बार बार प्रार्थना है कलियुग की यह बहुत सूक्ष्म चाल है की जो हमे परमार्थ से भ्रष्ट करने के लिये इतना बड़ा सहयोग दे दिया माया का.... बहुत बड़ा सहयोग..बहुत ही...अब हम कैसे हृदय से बताये कुछ लोग बचाव पक्ष में कहते है कि भाई इससे सत्संग सुनते है इससे रासलीला देखते है इससे नामकीर्तन सुनते है.. प्रणाम है चलो ठीक है ऐसा है तो एक मोबाइल रखो और 10 साधक मिलके उसे ऑन करो.. जहाँ मानलो दूर है ...अकेले आप अपने कमरे में लेकर इंटरनेट वाला मोबाइल,स्क्रीन वाला मोबाइल...तो भगवान ही बचावे मुश्किल ही समझो की वह पवित्र आचरण कर पाएगा मुश्किल बात है । क्योकि मन बहुत बलवान है बड़े बड़े महात्माओं पर शासन कर लेता है कोई बिरला ही ऐसा है जो भगवत् तत्व को प्राप्त हो चुका है उसकी बात अलग है।नही तो बहुत विचित्र है बहुत विचित्र है बस इसके आगे शब्द नही है.. यह बहुत विचित्र है सावधान! https://youtu.be/Tg4dhjzujFQ ( इंटरनेट युक्त मोबाइल के विषय मे 46.00 से सुनें) #पूज्य_गुरुदेव_श्री_प्रेमानन्द_गोविंद_शरण_जी_के_सत्संग_से.....

#इंटरनेट_युक्त_स्मार्टफोन_के_विषय_मे...(भाग 3)
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हमारे प्रभु सर्व अन्तर्यामी है तुम्हे देख रहे है यदि ईमानदारी से भजन करोगे ! तो तुम्हारे हृदय में शीतलता होगी...
ये जो जलन है, जरूरी है! जरूरी है! बिना जलन हुए बिना तपे आपका मन निर्मल नही होगा।आप थोड़ा सा जलिये,यह मन आपको जला रहा है तो आपको नही जला रहा, वह खुद जल रहा है, क्योकि उसने अपराध किये है। उसको थोड़ा पवित्र होने दीजिए आप समझते है मन की जलन मिटाने के लिये मुझे वह चेष्टा करनी चाहिये जिससे मन शांत हो जाए...
नही !
मन की मलिनता तभी मिटेगी जब ये जलेगा, मलिनता मिटे बिना आपको पूर्ण आनंद की अनुभूति नही हो सकती। वृति लगे न लगे जीभ से नाम जपते रहो, पाप आचरण से बचते रहो, जो सन्त महात्मा जन आदेश करते है... वो कभी न देखो। बिल्कुल सच्ची मानिए हम कई बार मोबाइल वाली बात कहते है,बार बार कहते है सावधान रहिये ये आप ही अपने दुश्मन है, यदि आप साधक है और ऐसी कुछ बाते है तो हटा दीजिये बिल्कुल इन यंत्रो से...
भैया ! हमारी साधना अंतर्मुखता की है, माना सत्संग सुना रहा है मोबाइल, और ऐसे रखा हुआ है.. थोड़ी देर सुन लीजिये, बंद कर दीजिये, समाज मे सुन लीजिये ईमानदारी में रहिये। अगर वो हर समय आप ठाकुर जी की तरह छाती से लगाया रखोगे तो रात्रि के 9 बजे से लेकर के सुबह 3 बजे तक साधक को पवित्र रहना बहुत कठिन बात है। 9बजे तक तो खान पान मिलना जुलना..और जहाँ पहुँचे अपने कमरे में..एकांत में..तब जितनी साधना दिन में तुम किये हो उतनी बढ़कर साधना मन करवाएगा तुमसे तुमको अपनी अधीनता में लाएगा उस समय कोई बलवान साधक एकांत में पवित्र रह सकता है। यह उसी धारा से चले हुए हम है इसीलिये बता रहे है, यह कोई किसी की सुनी बात नही,जीवन की बात है। ऐसे सब ठीक ... जहा एकांत बैठा जहाँ लाइट ऑफ हुई तहा मन ऑन हुआ, वो ऑन हुआ तहा अपना शुरू किया।  साधक वही जो उसको ऑन ही न होने दे।
बिल्कुल जब बेहोश हो गया तो हो गया नही तो चढ़ा बैठा रहे हर समय।
अंतर्मुखता साधना है बहिर्मुखता नही,यह यंत्रो में जो हर समय हम लगे रहते है इसीलिये हमे आनंद की अनुभूति....
जीवन भर यंत्र में लगे रहो आपको आनंद की अनुभूति नही होगी आनंद की अनुभूति होती है अंतर् में लगने से, अंतर्मुखता से... सब साधन बहिर्मुखता का जो हम त्याग करने के लिय कर रहे है, हम बहिर्मुख में ही फँसे रहे, हर समय घुन्न घुन्न कान में बोल रहा है जरूरी है वो विषयी पुरुषों के लिये बोल रहा है की भाई राधे कृष्णा राधे कृष्णा... वो लगा है.. बोले 24 घण्टे भजन हो रहा है तो उसको भगवतानंद की अनुभूति होगी क्या? भगवतानंद की अनुभूति तुम्हे होनी है थोड़ी देर बाद ठीक है कि जहाँ मन नही लग पा रहा तो सुनाई...
इसके बाद बंद करो ! मनीराम से बुलवाओ ! बोलो राधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे.. वो अंदर से सुनो, अंतर्मुख होइए तब आपको भगवतानंद की अनुभूति होगी। हर समय अगर मोबाइलो में फँसे रहे हर समय यंत्रो में फंसे रहे...
थोड़ा तो सुलझिये..थोड़ा तो सुलझिये अंतर्मुखता होना साधना है बहिर्मुख....
ठीक है बाहर सब कुछ हो रहा है पर हर समय बहिर्मुख नही...
थोड़ी देर के लिये ठीक फिर उसके बाद अंतर्मुख आइए अगर अंतर्मुख का अभ्यास नही है तो आपको अनुभूति कहाँ होगी??
आत्मस्वरूप का अनुभव कैसे होगा सहचरी भाव मे? कैसे आप जानोगे?  कितने गन्दे हो ? बैठो एकांत में... बाहर साधक शून्य बनिये फिर देखिए आप, फिर आपको पता चलेगा आप हो क्या? ऐसे तो हमें सब महात्मा कहते है आप ईमानदारी से बैठके देखिये एकांत में बंद कीजिये दरवाजा !  कोई बाहर अंतर्मुख होने के लिये बाहर बाधा है उनको छोड़िए यंत्र आदि से नही, आप बैठिए और नाम जप कीजिये असलियत आपको उस समय समझ मे आएगी जो मन दिखायेगा। ऐसा लगता है खोलो दरवाजा और बाहर कोई तो मिले, कोई तो बात करे यह मन इतना बदमाश है। इसलिय सावधानी पूर्वक बार बार प्रार्थना है कलियुग की यह बहुत सूक्ष्म चाल है की जो हमे परमार्थ से भ्रष्ट करने के लिये इतना बड़ा सहयोग दे दिया माया का....
बहुत बड़ा सहयोग..बहुत ही...अब हम कैसे हृदय से बताये कुछ लोग बचाव पक्ष में कहते है कि भाई इससे सत्संग सुनते है इससे रासलीला देखते है इससे नामकीर्तन सुनते है.. प्रणाम है चलो ठीक है ऐसा है तो एक मोबाइल रखो और 10 साधक मिलके उसे ऑन करो..
जहाँ मानलो दूर है ...अकेले आप अपने कमरे में लेकर इंटरनेट वाला मोबाइल,स्क्रीन वाला मोबाइल...तो भगवान ही बचावे मुश्किल ही समझो की वह पवित्र आचरण कर पाएगा मुश्किल बात है । क्योकि मन बहुत बलवान है बड़े बड़े महात्माओं पर शासन कर लेता है कोई बिरला ही ऐसा है जो भगवत् तत्व को प्राप्त हो चुका है उसकी बात अलग है।नही तो बहुत विचित्र है बहुत विचित्र है बस इसके आगे शब्द नही है.. यह बहुत विचित्र है सावधान!

https://youtu.be/Tg4dhjzujFQ
 
( इंटरनेट युक्त मोबाइल के विषय मे 46.00 से सुनें)

#पूज्य_गुरुदेव_श्री_प्रेमानन्द_गोविंद_शरण_जी_के_सत्संग_से.....

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Anjali yadu Mar 24, 2019
v.nice post Radhe-Radhe ji 🌹🌹🍫🍫🍫🙏🙏🙏

।।श्रीहरिः।। श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज ----------------------------------------- प्रश्न‒घरमें कुत्ता पालना चाहिये या नहीं ? उत्तर‒घरमें कुत्ता नहीं रखना चाहिये । कुत्तेका पालन करनेवाला नरकोंमें जाता है । महाभारतमें आया है कि जब पाँचों पाण्डव और द्रौपदी वीरसंन्यास लेकर उत्तरकी ओर चले तो चलते-चलते भीमसेन आदि सभी गिर गये । अन्तमें जब युधिष्ठिर भी लड़खड़ा गये, तब इन्द्रकी आज्ञासे मातलि रथ लेकर वहाँ आया और युधिष्ठिरसे कहा कि आप इसी शरीरसे स्वर्ग पधारी । युधिष्ठिरने देखा कि एक कुत्ता उनके पास खड़ा है । उन्होंने कहा कि यह कुत्ता मेरी शरणमें आया है; अतः यह भी मेरे साथ स्वर्गमें चलेगा । इन्द्रने युधिष्ठिरसे कहा‒ स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्यमिष्टापूर्तं क्रोधवशा हरन्ति । ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति ॥ (महाभारत, महाप्र॰ ३ । १०) ‘धर्मराज ! कुत्ता रखनेवालोंके लिये स्वर्गलोकमें स्थान नहीं है । उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवानेका जो पुण्य होता है, उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं । इसलिये सोच-विचारकर काम करो और इस कुत्तेको छोड़ दो । ऐसा करनेमें कोई निर्दयता नहीं है ।’ युधिष्ठिरने कहा कि मैंने इसका पालन नहीं किया है, यह तो मेरी शरणमें आया है । मैं इसको अपना आधा पुण्य देता हूँ, इसीसे यह मेरे साथ चलेगा । युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उस कुत्तेमेंसे धर्मराज प्रकट हो गये और बोले कि मैंने तेरी परीक्षा ली थी । तुमने मेरेपर विजय कर ली, अब चलो स्वर्ग ! तात्पर्य है कि गृहस्थको घरमें कुत्ता नहीं रखना चाहिये । महाभारतमें आया है‒ भिन्नभाण्डं च खट्‌वां च कुक्कुटं शुनकं तथा । अप्रशस्तानि सर्वाणि यश्च वृक्षो गृहेरुहः ॥ भिन्नभाण्डे कलिं प्राहुः खट्वायां तु धनक्षयः । कुक्कुटे शुनके चैव हविर्नाश्नन्ति देवताः । वृक्षमूले ध्रुवं सत्त्वं तस्माद् वृक्ष न रोपयेत् ॥ (महाभारत, अनु॰ १२७ । १५-१६) ‘घरमें फूटे बर्तन, टूटी खाट, मुर्गा, कुत्ता और अश्वत्थादि वृक्षका होना अच्छा नहीं माना गया है । फूटे बर्तनमें कलियुगका वास कहा गया है । टूटी खाट रहनेसे धनकी हानि होती है । मुर्गे और कुत्तेके रहनेपर देवता उस घरमें हविष्य ग्रहण नहीं करते तथा मकानके अन्दर कोई बड़ा वृक्ष होनेपर उसकी जड़के भीतर साँप, बिच्छू आदि जन्तुओंका रहना अनिवार्य हो जाता है, इसलिये घरके भीतर पेड़ न लगाये ।’ कुत्ता महान् अशुद्ध, अपवित्र होता है । उसके खान-पानसे, स्पर्शसे, उसके जगह-जगह बैठनेसे गृहस्थके खान-पानमें, रहन-सहनमें अशुद्धि, अपवित्रता आती है और अपवित्रताका फल भी अपवित्र (नरक आदि) ही होता है । ‘गृहस्थमें कैसे रहें ?’ पुस्तकसे​ ​−श्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराज

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