ambrish agarwal
ambrish agarwal Aug 4, 2020

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माँ गंगा से जुडी भविष्यवाणी ~~~~~~~~~~~~~~~~~ हिन्दू धर्म और प्रकृत्ति के बीच एक ऐसा संबंध है जिसे किसी भी रूप में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रकृत्ति की हर चीज चाहे वो मेघ हो या बारिश, चन्द्रमा-सूर्य हो या नदियां… मनुष्य ने सभी के साथ एक रिश्ता बांधा हुआ है जो अत्यंत अलौकिक है। हमारे पुराणों में भी प्रकृत्ति के संबंध में हर चीज को देवी-देवताओं के साथ जोड़ा गया है। नदियों की बात करें तो गंगा जिसे भागीरथी भी कहा जाता है, के विषय में यह मान्यता है कि उसे भागीरथ नामक राजा स्वर्ग से सीधा धरती पर लाए थे। गंगा का वेग बहुत तेज था, जिससे समस्त धरती का विनाश हो सकता था, इसलिए भगवान शंकर ने स्वयं उसे अपनी जटाओं से बांध लिया था। यह तो हुई गंगा के धरती पर अवतरण की कहानी, अगर हम सामान्य मनुष्य जीवन में इसके महत्व की बात करें तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि गंगा की पावन धाराओं के बिना हमारा जीवन और मृत्यु दोनों ही अधूरे हैं। मनुष्य के जीवन का कोई भी संस्कार गंगा के जल के बिना अधूरा है, दुनिया में अगर सबसे पवित्र कुछ है तो वो भी गंगाजल ही है। मृत्यु शैया पर अपनी अंतिम सांसें गिन रहे व्यक्ति के लिए गंगा का जल मोक्ष का द्वार खोल देता है, उसका एक घूंट मनुष्य को उसके पाप कर्मों से मुक्ति दिलवा सकता है। यह भी माना जाता है कि मृत्यु के बाद मनुष्य की चिता की राख को गंगा में प्रवाहित ना किया जाए तो उसकी आत्मा इस भूलोक पर तड़पती रह जाती है। लेकिन क्या हो अगर यह गंगा पूरी तरह सूख जाए, धरती को छोड़कर वापस स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर जाए? अगर ऐसा हुआ तो क्या वो तीर्थस्थल जो गंगा के तट पर बसे हैं उनका कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा? ऐसा संभव है क्योंकि जिस गति से प्रदूषण बढ़ रहा है वह गंगा के जल को दिन-प्रतिदिन बहुत बड़ी मात्रा में अपवित्र करता जा रहा है और पुराणों के अनुसार गंगा स्वर्ग की नदी है उसे अपवित्र करने या उसके साथ जरा भी छेड़छाड़ करने से धरती से रुष्ट होकर वापस स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर जाएगी। केदारनाथ और बद्रीनाथ हिन्दू धर्म से संबंधित दो बड़े तीर्थस्थल हैं। जहां केदारनाथ को भगवान शंकर के विश्राम करने का स्थान माना गया है वहीं बद्रीनाथ को सृष्टि का आठवां वैकुंठ माना गया है जहां भगवान विष्णु 6 महीने जागृत और 6 महीने निद्रा अवस्था में निवास करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब गंगा नदी धरती पर पहुंची तो वह अपनी 12 धाराओं में विभाजित थी। लेकिन अब इसकी केवल 2 धाराएं जिन्हें अलकनंदा और मंदाकिनी के नाम से जाना जाता है, ही शेष रह गई हैं। उसकी एक धारा अलकनंदा नाम से प्रचलित हुई और यहीं बद्रीनाथ धाम स्थापित हुआ। बद्रीनाथ को भगवान विष्णु का धाम माना जाता है। वहीं गंगा की दूसरी धारा, जिसे मंदाकिनी कहा जाता है के किनारे केदार घाटी है जहां सबसे प्रमुख तीर्थ धाम, केदारनाथ स्थापित है। यह पूरा स्थान रुद्रप्रयाग के नाम से जाना जाता है, ऐसी मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान रुद्र ने अवतार लिया था। केदार घाटी को विष्णु के अवतार नर-नारायण की तपो भूमि माना गया है, उनके कठोर तप से प्रसन्न होकर ही भगवान शिव इस घाटी में स्वयं प्रकट हुए थे। यहां नर-नारायण के ही नाम के दो पहाड़ भी हैं। पुराणों में ऐसा कहा गया है कि जिस दिन ये दो पर्वत आपस में मिल जाएंगे धरती पर से बद्रीनाथ धाम का रास्ता बंद हो जाएगा, भक्त इस धाम के दर्शन नहीं कर पाएंगे। पुराणों में बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम से जुड़ी जो भविष्यवाणी की गई है उसे जानकर कोई भी सकते में पड़ सकता है। हिन्दू धर्म से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार कलियुग में केदारनाथ और बद्रीनाथ, दोनों ही धाम लुप्त हो जाएंगे और भविष्यबद्री नाम के तीर्थ स्थल का उद्गम होगा। बद्रीनाथ से संबंधित एक कथा के अनुसार सतयुग वो समय था, जब धरती पर पाप और दुष्कर्मों का नाम भी नहीं था। इस समय सामान्य मनुष्यों को भी ईश्वर के साक्षात दर्शन प्राप्त होते थे। इसके बाद आया त्रेता युग जब केवल ऋषि-मुनियों, देवताओं और कठोर तपस्वियों को ही भगवान के दर्शन मिलते थे। फिर आया द्वापर युग जिसमें पाप पूरी तरह घुल चुका था। पाप के बढ़ते स्तर के कारण, किसी के लिए भी भगवान के दर्शन कर पाना असंभव हो गया। और अब है कलियुग…. पाप जिसका पर्यावाची बन गया है। पुराणों के अनुसार कलियुग के पांच हजार वर्ष बीत जाने के बाद पृथ्वी पर केवल पाप ही रह जाएगा। जब यह युग अपने चरम पर पहुंच जाएगा तब मनुष्यों के आस्था और भक्ति की जगह लोभ-लालच और वासना बस जाएंगे। शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि जब कलियुग में तपस्वियों की जगह ढोंगी-साधु ले लेंगे और भक्ति के नाम पर पाखंड और पाप का बोलबाला होगा, तब गंगा नदी, जिसका काम मनुष्य के पाप धोना है, वह रूठकर पुन: स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर जाएगी। गंगा यदि लौट गई तो मनुष्य अपने ही पाप के बोझ के तले दबते चले जाएंगे, ना उन्हें मुक्ति मिलेगी ना मोक्ष, इस तरह वे खुद अपना ही अंत कर बैठेंगे। कुछ समय पहले उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा कहीं पुराणों में लिखी इस बात की ओर संकेत तो नहीं करती कि अब धरती से भगवान रूठकर जाने वाले हैं? अगर वास्तव में ऐसा है तो इसका परिणाम संपूर्ण मनुष्य जाति को भुगतना पड़ सकता है। लेकिन इस समस्या से बचने का एक उपाय भी है, अपने कर्मों को सुधार लें। पर क्या वो हमारे लिए संभव है?

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Malti Bansal Sep 22, 2020

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kriti Sep 22, 2020

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Babita Sharma Sep 22, 2020

✍🏻 *दुनियाँ वालों पर किया भरोसा भले ही टूट जाए मगर दुनियां के मालिक पर किया भरोसा नहीं टूटना चाहिए।। सावधानी बरतें स्वस्थ रहें ख़तरा पहले से ज्यादा है।।* 🙏🏻 *सुप्रभात* 🙏🏻 🌹🙏जय श्री राम 🙏🌹 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम जन्मभूमि पूजने के पूर्व हनुमानगढ़ी क्षेत्र में पारिजात के पौधे का रोपण किया । जानिए इस पेड़ का महत्व और इसके चमत्कारिक फायदे। पारिजात के पेड़ को हरसिंगार का पेड़ भी कहा जाता है। इसमें बहुत ही सुंदर और सुगंधित फूल उगते हैं। यह सारे भारत में पैदा होता है। इसे संस्कृत में पारिजात, शेफालिका। हिन्दी में हरसिंगार, परजा, पारिजात। मराठी में पारिजातक। गुजराती में हरशणगार। बंगाली में शेफालिका, शिउली। तेलुगू में पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल में पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम में पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़ में पारिजात। उर्दू में गुलजाफरी। इंग्लिश में नाइट जेस्मिन। लैटिन में निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस कहते हैं। उत्तर प्रदेश में दुर्लभ प्रजाति के पारिजात के चार वृक्षों में से हजारों साल पुराने वृक्ष दो वन विभाग इटावा के परिसर में हैं जो पर्यटकों को 'देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन' के बारे में बताते हैं। 1. कहते हैं कि पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी जिसे इंद्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। हरिवंशपुराण में इस वृक्ष और फूलों का विस्तार से वर्णन मिलता है। 2. पौराणिक मान्यता अनुसार पारिजात के वृक्ष को स्वर्ग से लाकर धरती पर लगाया गया था। नरकासुर के वध के पश्चात एक बार श्रीकृष्ण स्वर्ग गए और वहां इन्द्र ने उन्हें पारिजात का पुष्प भेंट किया। वह पुष्प श्रीकृष्ण ने देवी रुक्मिणी को दे दिया। देवी सत्यभामा को देवलोक से देवमाता अदिति ने चिरयौवन का आशीर्वाद दिया था। तभी नारदजी आए और सत्यभामा को पारिजात पुष्प के बारे में बताया कि उस पुष्प के प्रभाव से देवी रुक्मिणी भी चिरयौवन हो गई हैं। यह जान सत्यभामा क्रोधित हो गईं और श्रीकृष्ण से पारिजात वृक्ष लेने की जिद्द करने लगी। 3. पारिजात के फूलों को खासतौर पर लक्ष्मी पूजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन केवल उन्हीं फूलों को इस्तेमाल किया जाता है, जो अपने आप पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाते हैं। 4. पारिजात के फूलों की सुगंध आपके जीवन से तनाव हटाकर खुशियां ही खुशियां भर सकने की ताकत रखते हैं। इसकी सुगंध आपके मस्तिष्क को शांत कर देती है। 5. पारिजात के ये अद्भुत फूल सिर्फ रात में ही खिलते हैं और सुबह होते-होते वे सब मुरझा जाते हैं। यह फूल जिसके भी घर-आंगन में खिलते हैं, वहां हमेशा शांति और समृद्धि का निवास होता है। 6. पारिजात के यह अद्भुत फूल सिर्फ रात में ही खिलते हैं और सुबह होते होते वे सब मुरझा जाते हैं। यह माना जाता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है। 7. हृदय रोगों के लिए हरसिंगार का प्रयोग बेहद लाभकारी है। इस के 15 से 20 फूलों या इसके रस का सेवन करना हृदय रोग से बचाने का असरकारक उपाय है, लेकिन यह उपाय किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह पर ही किया जा सकता है। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। जय बजरंग बली 🙏🙏

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