((🦚श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा🦚)) 🌹********************************🌹 🦚🌹🌻सुप्रभात🌻🌹🦚 🦚🎂🌹जय श्री कृष्ण🌹🎂🦚 🔱🌿🛕ॐ नमः शिवाय🛕🌿🔱 🦚🎂🏵️शुभ कृष्ण जन्माष्टमी🏵️🎂🦚 🦚🌺🥗 शुभ सोमवार🥗🎂🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका दिन शुभ और मंगलमय हो🌹 🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂 ((🦚श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा🦚) 🌹********************************🌹 🎎भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- 'हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।' यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- 'मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?' कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ 'माया' थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- 'अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।' उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।' यह है कृष्ण जन्म की कथा। 🦚🌹जय श्री कृष्ण 🌹🦚

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🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@ranveersoni 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@shreeshukla 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@kantakamra 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@pinudhiman 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

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@pinudhiman 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@amishraji 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

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@seemavalluvar1 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

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@anupkumar38 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@sanjayparashar7 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@kamalamaheshwar 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@madhubenpatel1 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

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@manojm 🦚शुभरात्रि वंदन भाई🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@muneshtyagi1 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@sanju229 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

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@sanjay.aggarwal.11 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@sanjayawasthi7 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@brajeshsharma1 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@radhekrishna14 🦚शुभरात्रि वंदन दीदी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

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श्रीमद्देवीभागवत (छठा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 30 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ भगवान् विष्णु के द्वारा महामाया का महत्त्व वर्णन, व्यासजी के द्वारा जनमेजय के प्रति भगवती की महिमा का कथन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ नारदजी कहते हैं-मुझ ब्राह्मण नारद को देखकर राजा तालध्वज अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गये। सोचा, मेरी पत्नी कहाँ चली गयी और वे मुनिवर नारद कहाँ से आ गये। उन्होंने बारम्बार विलाप करना आरम्भ किया। कहा 'हा प्रिये! मैं तेरे वियोग में पड़कर विलाप कर रहा हूँ। मुझे छोड़कर तू कहाँ चली गयी। शुचिस्मिते! तेरे नेत्र कमलपत्र के समान विशाल हैं। विपुलश्रोणी! मैं अब क्या करूँ तेरे बिना मेरा जीवन, गृह और राज्य-सब-के-सब व्यर्थ हैं। तेरे विरह से अब मेरे प्राण क्यों नहीं निकल रहे हैं? तू न रही तो जीवन-धारण करने से भी मुझे कोई प्रयोजन नहीं रहा। विशालाक्षी! मैं रो रहा हूँ। तू प्रिय उत्तर देने की कृपा कर तूने प्रथम मिलन में मेरे प्रति जो प्रेम दिखलाया था, वह अब कहाँ चला गया ? सुभु! क्या तू जल में डूब गयी अथवा तुझे मछली एवं कछुए खा गये? या मेरे दुर्भाग्यवश तू वरुण के हाथ लग गयी। अमृत के समान मधुर भाषण करने वाली प्रिये! तेरे सभी अंग बड़े मनोहर थे। तुझे धन्यवाद है, जो पुत्रों के प्रति तूने सच्चा प्रेम दिखलाया। मैं तेरा पति होकर दीनभाव से विलाप कर रहा हूँ। पुत्रस्नेह के पाश से तू बँधी भी है। ऐसी स्थिति में मुझे छोड़कर तेरा स्वर्ग सिधारना शोभा नहीं देता। कान्ते! मेरे दोनों ही सर्वस्व छिन गये। पुत्र मर ही चुके थे और तू प्राणप्यारी भी मेरे साथ न रह सकी। प्रिये! मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। फिर भी मेरे प्राण शरीर से अलग नहीं हो रहे हैं। मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ ? जगत् में प्रतिकूल घटना उपस्थित करने वाले ब्रह्मा अवश्य ही बड़े निष्ठुर हैं, जो समान चित्तवाले स्त्री-पुरुष का मरण सर्वथा विभिन्न समय में क्यों किया करते हैं। मुनियों ने स्त्रियों के लिये अवश्य ही बड़ा उपकार किया है कि जो उन्होंने स्पष्ट कह दिया है, 'पति के मर जाने पर स्त्री उसके साथ चिता में जल जाय।' इस प्रकार राजा तालध्वज विलाप कर रहे थे। तब भगवान् श्रीहरि ने अनेक प्रकार के युक्तिपूर्ण वचन कहकर उन्हें चुप कराया। जय माता जी की क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ अष्टमः स्कन्धः, अथ सप्तमोऽध्यायः समुद्रमन्थन का आरम्भ और भगवान् शङ्कर का विषपान...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ तदुग्र्वेगं दिशि दिश्युपर्यधो विसर्पदुत्सर्पदसह्यमप्रति भीताः प्रजा दुद्रुवुरङ्ग सेश्वरा अरक्ष्यमाणाः शरणं सदाशिवम् ॥ १९ विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या भवाय देव्याभिमतं मुनीनाम् । आसीनमद्रावपवर्गहेतो स्तपो जुषाणं स्तुतिभिः प्रणेमुः ॥ २० प्रजापतय ऊचुः देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नांस्त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः । तं त्वामर्चन्ति कुशलाः प्रपन्नार्तिहरं गुरुम् ॥ २२ गुणमय्या स्वशक्त्यास्य सर्गस्थित्यप्ययान्विभो । धत्से यदा स्वदृग् भूमन्ब्रह्मविष्णुशिवाभिधाम् ॥ २३ त्वं ब्रह्म परमं गुह्यं सदसद्भावभावनः । नानाशक्तिभिराभातस्त्वमात्मा' जगदीश्वरः ॥ २४ त्वं शब्दयोनिर्जगदादिरात्मा प्राणेन्द्रियद्रव्यगुणस्वभावः कालः क्रतुः सत्यमृतं च धर्म स्त्वय्यक्षरं यत् त्रिवृदामनन्ति ।। २५ अग्निर्मुखं तेऽखिलदेवतात्मा क्षितिं विदुर्लोकभवाङ्घ्रिपङ्कजम् । कालं गतिं तेऽखिलदेवतात्मनो दिशश्च कर्णो रसनं जलेशम् ॥ २६ नाभिर्नभस्ते श्वसनं नभस्वान् सूर्यश्च चक्षूंषि जलं स्म रेतः । परावरात्माश्रयणं तवात्मा सोमो मनो द्यौर्भगवञ्छिरस्ते ॥ २७ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ वह अत्यन्त उग्र विष दिशा-विदिशा में, ऊपर-नीचे सर्वत्र उड़ने और फैलने लगा। इस असह्य विष से बचने का कोई उपाय भी तो न था। भयभीत होकर सम्पूर्ण प्रजा और प्रजापति किसी के द्वारा त्राण न मिलने पर भगवान् सदाशिव की शरण में गये ॥ १९ ॥ भगवान् शङ्कर सतीजी के साथ कैलास पर्वत पर विराजमान थे। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उनकी सेवा कर रहे थे। वे वहाँ तीनों लोकों के अभ्युदय और मोक्ष के लिये तपस्या कर रहे थे। प्रजापतियों ने उनका दर्शन करके उनकी स्तुति करते हुए उन्हें प्रणाम किया ॥ २० ॥ प्रजापतियों ने भगवान् शङ्कर की स्तुति की देवताओं के आराध्यदेव महादेव ! आप समस्त प्राणियों के आत्मा और उनके जीवनदाता हैं। हमलोग आपकी शरण में आये हैं। त्रिलोकी को भस्म करने वाले इस उम्र विष से आप हमारी रक्षा कीजिये ॥ २१ ॥ सारे जगत्‌ को बाँधने और मुक्त करने में एकमात्र आप ही समर्थ हैं। इसलिये विवेकी पुरुष आपकी ही आराधना करते हैं। क्योंकि आप शरणागत की पीड़ा नष्ट करने वाले एवं जगद्गुरु हैं ॥ २२ ॥ प्रभो ! अपनी गुणमयी शक्ति से इस जगत्‌ की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने के लिये आप अनन्त, एकरस होने पर भी ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि नाम धारण कर लेते हैं ॥ २३ ॥ आप स्वयंप्रकाश हैं। इसका कारण यह है कि आप परम रहस्यमय ब्रह्मतत्त्व हैं। जितने भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सत् अथवा असत् चराचर प्राणी हैं— उनको जीवनदान देनेवाले आप ही हैं। आपके अतिरिक्त सृष्टि भी और कुछ नहीं है। क्योंकि आप आत्मा हैं। अनेक शक्तियों के द्वारा आप ही जगत्रूप में भी प्रतीत हो रहे हैं। क्योंकि आप ईश्वर हैं, सर्वसमर्थ हैं ॥ २४ ॥ समस्त वेद आपसे ही प्रकट हुए हैं। इसलिये आप समस्त ज्ञानों के मूल स्रोत स्वतःसिद्ध ज्ञान हैं। आप ही जगत् के आदिकारण महत्तत्त्व और त्रिविध अहङ्कार हैं एवं आप ही प्राण, इन्द्रिय, पञ्चमहाभूत तथा शब्दादि विषयों के भिन्न-भिन्न स्वभाव और उनके मूल कारण हैं। आप स्वयं ही प्राणियों की वृद्धि और ह्रास करने वाले काल हैं, उनका कल्याण कर नेवाले यज्ञ हैं एवं सत्य और मधुर वाणी हैं। धर्म भी आपका ही स्वरूप है। आप ही 'अ, उ, म्' इन तीनों अक्षरों से युक्त प्रणव हैं अथवा त्रिगुणात्मिका प्रकृति हैं— ऐसा वेदवादी महात्मा कहते हैं ॥ २५ ॥ सर्वदेवस्वरूप अग्नि आपका मुख है। तीनों लोकों के अभ्युदय करने वाले शङ्कर! यह पृथ्वी आपका चरणकमल है। आप अखिल देवस्वरूप हैं। यह काल आपकी गति है, दिशाएँ कान हैं और वरुण रसनेन्द्रिय है ॥ २६ ॥ आकाश नाभि है, वायु श्वास है, सूर्य नेत्र हैं और जल वीर्य है। आपका अहङ्कार नीचे-ऊँचे सभी जीवों का आश्रय है। चन्द्रमा मन है और प्रभो ! स्वर्ग आपका सिर है ॥ २७ ॥ क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध) (दो सौ तेहत्तर वाँ दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः श्रीवसिष्ठजी का विद्याधरी के साथ लोकालोक पर्वत पर पापाणशिला के पास पहुँचना, उस शिला में उन्हें विद्याधरी की बतायी हुई सृष्टि का दर्शन न होना, विद्याधरी का इसमें उनके अभ्यासाभाव को कारण बताकर अभ्यास की महिमा का वर्णन करना...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! ब्रह्माण्ड के पूर्ववर्णित ऊर्ध्व आकाश में संकल्प द्वारा कल्पित आसन पर बैठे हुए मैंने, उसी आकाश में कल्पित आसन पर स्थित हुई वह नारी जब मेरे पूछने पर उपर्युक्त बातें कह चुकी, तब पुनः उससे प्रश्न किया— 'बाले ! शिला के पेट में तुम जैसे देहधारियों की स्थिति कैसे हो सकती है ? उसमें हिलना-डुलना कैसे होता होगा? तथा तुमने वहाँ किस ? लिये घर बनाया ?” विद्याधरी बोली मुने ! जैसे आप लोगों का यह संसार बहुत ही विस्तृत रूप से प्रकाशित हो रहा है, उसी प्रकार उस शिला के उदर में सृष्टि और संसार से युक्त हम लोगों का जगत् भी स्थित है। वहाँ भी यहाँ की भाँति ही देवता, असुर, गन्धर्व, पृथ्वी, पर्वत, पाताल, समुद्र, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब वस्तुएँ हैं। मुने ! यदि आप मेरी बात को असम्भव समझते हों तो आइये, उस सृष्टि को अच्छी तरह देख लीजिये, मेरे साथ चलने के लिये कृपा कीजिये; क्योंकि बड़े लोगों को आश्चर्ययुक्त वस्तुएँ देखने के लिये बड़ा कौतूहल होता है। रघुनन्दन ! तब मैंने 'बहुत अच्छा' कहकर उसकी बात मान ली और शून्य (आकाश )-रूप हो, शून्यरूपधारिणी उस नारी के साथ शून्य आकाश में उसी तरह उड़ना आरम्भ किया, जैसे आँधी या बवंडर के साथ फूलों की सुगन्ध उड़ती है। तदनन्तर दूर तक का रास्ता तै करने के बाद आकाश की शून्यता को लाँधकर मैं उस नारी के साथ आकाशवर्ती भूतसमुदाय के पास जा पहुँचा। चिरकाल के बाद आकाश में प्राणियों के संचारमार्ग को पारकर मैं लोका लोक पर्वत के शिखर के ऊपर आकाश भाग में पहुँच गया, उस शिखर के पूर्वोत्तर भाग में स्थित चन्द्रतुल्य उज्ज्वल बादल के पीठ भाग से नीचे उतरकर वह नारी मुझे उस ऊँची शिला के पास ले गयी, जो तपाये हुए सुवर्ण की बनी जान पड़ती थी। मैंने उस शुभ्र शिला को जब अच्छी तरह देखना आरम्भ किया, तब उसमें वह जगत् मुझे नहीं दिखायी दिया । केवल वह सुवर्गमयी शिला ही अग्निलोक ( सुमेरु ) के उच्चतम तट की भाँति दृष्टिगोचर हुई। तब मैंने उस कान्तिमती नारी से पूछा – 'तुम्हारी वह सृष्टिभूमि कहाँ है ? उस लोक के रुद्र, सूर्य, अग्नि और तारे आदि कहाँ हैं तथा भूर्भुव: आदि सातों भिन्न-भिन्न लोक कहाँ हैं ? समुद्र, आकाश और दिशाएँ कहाँ हैं ? प्राणियों के जन्म और नाश कहाँ हो रहे हैं? बड़े-बड़े मेघों की घटाएँ कहाँ घिरी हुई हैं ? ताराओं की तड़क-भड़क से युक्त आकाश यहाँ कहाँ दिखायी देता है ? कहाँ हैं शैलशिखरों की वे श्रेणियाँ ? कहाँ हैं महासागरों की पड्डियाँ कहाँ हैं मण्डलाकार सातों द्वीप और कहाँ हैं तपाये हुए सुवर्ण के सदृश वह भूमि ? कार्य और कारण की कल्पनाएँ कहाँ हैं : भूतों और उनके भवनों का भ्रम कहाँ हो रहा है ? कहाँ हैं विद्याधर और गन्धर्व ? कहाँ हैं मनुष्य, देवता और दानव तथा कहाँ हैं ऋषि, राजा और मुनि ! नीति-अनीति की रीतियाँ कहाँ चलती हैं ! हेमन्त ऋतु की पाँच पहर वाली रातें यहाँ कहाँ हो रही हैं ? स्वर्ग और नरक के भ्रम कहाँ हैं ? पुण्य और पाप की गणना कहाँ हो रही है ? कला और काल की क्रीडाएँ कहाँ होती हैं ? देवताओं और असुरों में कहाँ वैर देखे जाते हैं तथा द्वेष और स्नेह की रीतियाँ कहाँ उपलब्ध होती हैं ?? मेरे इस प्रकार पूछने पर निर्मल नेत्रवाली उस सुन्दरी ने आश्चर्यचकित दृष्टि से मेरी ओर देखकर इस प्रकार कहा । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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माघमास महात्म्य सातवां अध्याय 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ चित्रगुप्त ने उन दोनों के कर्मों की आलोचना करके दूतों से कहा कि बड़े भाई कुंडल को घोर नरक में डालो और दूसरे भाई विकुंडल को स्वर्ग में ले जाओ जहां उत्तम भोग हैं तब एक दूत तो कुंडल को नरक में फेंकने के लिए ले गया और दूसरा दूत बड़ी नम्रता से कहने लगा कि हे विकुंडल! चलो तुम अच्छे कर्मों से स्वर्ग को प्राप्त होकर अनेक प्रकार के भोगों को भोगों तब विकुंडल बड़े विस्मय के साथ मन में संशय धारकर दूत से कहने लगा कि हे यमदूत! मेरे मन में बड़ी भारी शंका उत्पन्न हो गई है अतएव मैं तुमसे कुछ पूछता हूँ कृपा कर के मेरे प्रश्नों का उत्तर दो. हम दोनों भाई एक ही कुल में उत्पन्न हुए, एक जैसे ही कर्म करते रहे, दोनों भाइयों ने कभी कोई शुभ कार्य नहीं किया फिर एक को नरक क्यों और दूसरे को स्वर्ग किस कारण प्राप्त हुआ? मैं अपने स्वर्ग में आने का कोई कारण नहीं देखता तब यमदूत कहने लगा कि हे विकुंडल! माता-पिता, पुत्र, पत्नी, भाई, बहन से सब संबंध जन्म के कारण होते हैं और जन्म, कर्म को भोगने के लिए ही प्राप्त होता है. जिस प्रकार एक वृक्ष पर अनेक पक्षियों का आगमन होता है उसी तरह इस संसार में पुत्र, भाई, माता, पिता का भी संगम होता है. इनमें से जो जैसे-जैसे कर्म करता है वैसे ही फल भोगता है. तुम्हारा भाई अपने पाप कर्मों से नरक में गया तुम अपने पुण्य कर्म के कारण स्वर्ग में जा रहे हो तब विकुंडल ने आश्चर्य से पूछा कि मैंने तो आजन्म कोई धर्म का कार्य नहीं किया सदैव पापों में ही लगा रहा. मैं अपने पुण्य के कर्म को नहीं जानता, यदि तुम मेरे पुण्य के कर्म को जानते हो तो कृपा कर के बताइए तब देवदूत कहने लगा कि मैं सब प्राणियों को भली-भाँति जानता हूँ, तुम नहीं जानते. सुनो, हरिमित्र का पुत्र सुमित्र नाम का ब्राह्मण था जिसका आश्रम यमुना नदी के दक्षिणोत्तर दिशा में था. उसके साथ जंगल में ही तुम्हारी मित्रता हो गई और उसके साथ तुमने दो बार माघ मास में श्री यमुना जी में स्नान किया था. पहली बार स्नान करने से तुम्हारे सब पाप नष्ट हो गए और दूसरी बार स्नान करने से तुमको स्वर्ग प्राप्त हुआ. सो हे वैश्यवर! तुमने दो बार माघ मास में स्नान किया इसी के पुण्य के फल से तुमको स्वर्ग प्राप्त हुआ और तुम्हारा भाई नरक को प्राप्त हुआ. दत्तात्रेय जी कहने लगे कि इस प्रकार वह भाई के दुखों से अति दुखित होकर नम्रतापूर्वक मीठे वचनों से दूतों से कहने लगा कि हे दूतों! सज्जन पुरुषों के साथ सात पग चलने से मित्रता हो जाती है और यह कल्याणकारी होती है. मित्र प्रेम की चिंता न करते हुए तुम मुझको इतना बताने की कृपा करो कि कौन-से कर्म से मनुष्य यमलोक को प्राप्त नहीं होता क्योंकि तुम सर्वज्ञ हो। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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sn vyas Jan 24, 2022

कहानी राजा भरथरी (भर्तृहरि) की ========================= उज्जैन में भरथरी की गुफा स्थित है। इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है। गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है। गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है। यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था। यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा। यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है। गौर से देखने पर आपको गुफा के अंत में एक गुप्त रास्ता दिखाई देगा जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ से चारो धामों को रास्ता जाता है। पत्नी के धोखे से आहत राजा भरथरी के साधू बनने कि कहानी :- उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से भी जाना जाता था। उज्जयिनी शहर के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भरथरी विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से। पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भरथरी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गए थे। कथाओं के अनुसार भरथरी अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर काफी मोहित थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ। गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भरथरी ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी। यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए। राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी। राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी। भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है। उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन इस दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे। एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘ शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’ शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए। गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भरथरी े काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है। शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’ भरथरी अपने निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए। सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो। ‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया? छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।’ गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’ गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की। भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’। अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी। एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए। भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’ गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’ गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।’ 🙏🙏 आदरणीया शोभना राष्ट्रवादी जी के पटल से

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ अष्टमः स्कन्धः, अथ सप्तमोऽध्यायः समुद्रमन्थन का आरम्भ और भगवान् शङ्कर का विषपान...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ सुरासुरेन्द्रैर्भुजवीर्यवेपितं परिभ्रमन्तं गिरिमङ्ग पृष्ठतः । बिभ्रत् मतदावर्तनमादिकच्छपो मेनेऽङ्गकण्डूयनमप्रमेयः ॥ १० तथासुरानाविशदासुरेण रूपेण तेषां बलवीर्यमीरयन् । उद्दीपयन् देवगणांश्च विष्णु दैवेन नागेन्द्रमबोधरूपः ॥ ११ उपर्यगेन्द्रं गिरिराडिवान्य आक्रम्य हस्तेन सहस्रबाहुः । तस्थौ दिवि ब्रह्मभवेन्द्रमुख्यै रभिष्टुवद्धिः सुमनोऽभिवृष्टः ॥ १२ उपर्यधश्चात्मनि गोत्रनेत्रयोः परेण ते प्राविशता समेधिताः । ममन्थुरन्धिं तरसा मदोत्कटा महाद्रिणा क्षोभितनक्रचक्रम् ॥ १३ अहीन्द्रसाहस्त्रकठोरदृङ्मुख श्वासाग्निधूमाहतवर्चसोऽसुराः पौलोमकालेयबलील्वलादयो दावाग्निदग्धाः सरला इवाभवन् । १४ देवांश्च तच्छ्रासशिखाहतप्रभान् धूम्राम्बरस्त्रग्वरकञ्चकाननान् I समभ्यवर्षन्भगवद्वशा घना ववुः समुद्रोर्म्युपगूढवायवः ॥ १५ मथ्यमानात् तथा सिन्धोर्देवासुरवरूथपैः । यदा सुधा न जायेत निर्ममन्थाजितः स्वयम् ॥ १६ मेघश्यामः कनकपरिधिः कर्णविद्योतविद्यु न्यूर्ध्नि भ्राजद्विलुलितकचः स्रग्धरो रक्तनेत्रः । जैत्रैर्दोर्भिर्जगदभयदैर्दन्दशूकं गृहीत्वा मश्नन् मश्ना प्रतिगिरिरिवाशोभताथोद्घृताद्रिः ॥ १७ निर्मथ्यमानादुदधेरभूद्विषं महोल्बणं हालहलाह्वमग्रतः । सम्भ्रान्तमीनोन्मकराहिकच्छपात् तिमिद्विपग्राहतिमिङ्गिलाकुलात् ।। १८ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ परीक्षित् ! जब बड़े-बड़े देवता और असुरों ने अपने बाहुबल से मन्दराचल को प्रेरित किया, तब वह भगवान्‌ की पीठ पर घूमने लगा। अनन्त शक्तिशाली आदिकच्छप भगवान्‌ को उस पर्वत का चक्कर लगाना ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई उनकी पीठ खुजला रहा हो ॥ १० ॥ साथ ही समुद्र मन्थन सम्पन्न करने के लिये भगवान ने असुरों में उनकी शक्ति और बल को बढ़ाते हुए असुररूप से प्रवेश किया। वैसे ही उन्होंने देवताओं को उत्साहित करते हुए उनमें देवरूप से प्रवेश किया और वासुकिनाग में निद्रा के रूप से ॥ ११ ॥ इधर पर्वत के ऊपर दूसरे पर्वत के समान बनकर सहस्रबाहु भगवान् अपने हाथों से उसे दबाकर स्थित हो गये। उस समय आकाश में ब्रह्मा, शङ्कर, इन्द्र आदि उनकी स्तुति और उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा करने लगे ॥ १२ ॥ इस प्रकार भगवान ने पर्वत के ऊपर उसको दबा रखने वाले के रूप में, नीचे उसके आधार कच्छप के रूप में, देवता और असुरों के शरीर में उनकी शक्ति के रूप में, पर्वत में दृढ़ता के रूप में और नेती बने हुए वासुकिनाग में निद्रा के रूप में– जिससे उसे कष्ट न हो— प्रवेश करके सब ओर से सबको शक्तिसम्पन्न कर दिया। अब वे अपने बल के मद से उन्मत्त होकर मन्दराचल के द्वारा बड़े वेग से समुद्रमन्थन करने लगे। उस समय समुद्र और उसमें रहने वाले मगर, मछली आदि जीव क्षुब्ध हो गये ॥ १३ ॥ नागराज वासुकि के हजारों कठोर नेत्र, मुख और श्वासों से विष की आग निकलने लगी। उनके धूएँ से पौलोम, कालेय, बलि, इल्वल आदि असुर निस्तेज हो गये। उस समय वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो दावानल से झुलसे हुए साखू के पेड़ खड़े हों ॥ १४ ॥ देवता भी उससे न बच सके। वासुकि के श्वास की लपटों से उनका भी तेज फीका पड़ गया। वस्त्र, माला, कवच एवं मुख धूमिल हो गये। उनकी यह दशा देखकर भगवान् की प्रेरणा से बादल देवताओं के ऊपर वर्षा करने लगे एवं वायु समुद्र की तरङ्गों का स्पर्श करके शीतलता और सुगन्धि का सञ्चार करने लगी ॥ १५ ॥ इस प्रकार देवता और असुरों के समुद्र मन्थन करने पर भी जब अमृत न निकला, तब स्वयं अजित भगवान् समुद्र-मन्थन करने लगे ॥ १६ ॥ मेघ के समान साँवले शरीर पर सुनहला पीताम्बर, कानों में बिजली के समान चमकते हुए कुण्डल, सिर पर लहराते हुए घुँघराले बाल, नेत्रों में लाल-लाल रेखाएँ और गले में वनमाला सुशोभित हो रही थी। सम्पूर्ण जगत् को अभयदान करने वाले अपने विश्व-विजयी भुजदण्डों से वासुकिनाग को पकड़कर तथा कूर्मरूप से पर्वत को धारणकर जब भगवान् मन्दराचल की मथानी से समुद्रमन्थन करने लगे, उस समय वे दूसरे पर्वतराज के समान बड़े ही सुन्दर लग रहे थे ॥ १७ ॥ जब अजित भगवान् ने इस प्रकार समुद्र मन्थन किया, तब समुद्र में बड़ी खलबली मच गयी। मछली, मगर, साँप और कछुए भयभीत होकर ऊपर आ गये और इधर-उधर भागने लगे। तिमि-तिमिङ्गिल आदि मच्छ, समुद्री हाथी और ग्राह व्याकुल हो गये। उसी समय पहले-पहल हालाहल नाम का अत्यन्त उग्र विष निकला ॥ १८ ॥ क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (छठा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 29 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारद जी का राजा तालध्वज से विवाह, अनेकों पुत्र -पौत्रों की प्राप्ति, सबका मरण और शोक, भगवत्कृपा से नारदजी को पुनः स्वरूप प्राप्ति... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मानद! इसके बाद दूर देशवासी कोई एक प्रसिद्ध नरेश मेरे स्वामी के साथ शत्रुता ठानकर नगर पर चढ़ आया। उसने हाथियों और रथों के द्वारा अपनी सेना सजा ली थी। वह मन में युद्ध करने की बात सोच रहा था। अपनी सेना से उसने मेरा नगर घेर लिया। तब मेरे लड़के और पोते भी नगर से बाहर निकल पड़े। अब उस शत्रु नरेश से भयंकर संग्राम छिड़ गया। विकराल काल के प्रभाव से मेरे सभी पुत्र संग्राम में शत्रु के द्वारा मार दिये गये। राजा हतोत्साह होकर युद्ध-स्थल से घर लौट आये। मैंने सुना, अत्यन्त भयावह संग्राम में मेरे सब लड़के-पोते मर मिटे । शत्रु राजा बड़ा बलवान् था। पुत्रों और पौत्रों को मारकर वह निकल गया। अब मेरी आँखों से आँसुओं की अजस्त्र धारा गिरने लगी। मैं युद्धभूमि में पहुँचा। जमीन पर पड़े हुए पुत्रों और पौत्रों को देखकर मेरे दुःख की सीमा न रही। आयुष्मन्! शोकरूपी सागर में डूबकर मैं जोर-जोर से रोने लगा। 'हा मेरे पुत्रो! तुम कहाँ चले गये ? इस दुष्ट नरेश ने तेरी निर्मम हत्या कर डाली। हाय! दैव अत्यन्त दुर्दान्त है। उसे कोई भी टाल नहीं सकता।' मैं इस प्रकार विलाप कर रहा था- इतने में भगवान् विष्णु एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पधारे। देखने में वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे। वेदज्ञ! उन प्रभु का विग्रह सुन्दर वस्त्र से सुशोभित था। उन्होंने स्वयं मेरे सामने आने की कृपा की। मैं अत्यन्त कातर होकर रो रहा था। वे मुझसे कहने लगे। ब्राह्मणरूपी भगवान ने कहा- 'कोयल के समान मधुर बोलने वाली सुन्दरी! तुम क्यों रो रही हो? यह एकमात्र भ्रम है। पति पुत्रादियुक्त गृह में मोहवश ऐसी स्थिति आ जाती है; तुम अपने परम आत्मस्वरूप के ऊपर तो विचार करो। सोचो, कौन तुम हो, ये किसके पुत्र हैं और ये हैं कौन ? सुलोचने! उठो और रोना-धोना छोड़कर स्वस्थ हो जाओ। कामिनी! मर्यादा की रक्षा के लिये स्नान करके परलोकवासी पुत्रों को तिलांजलि देनी चाहिये। धर्मशास्त्र का निर्णय है कि मृत बान्धवों के निमित्त सर्वथा तीर्थ में स्नान करके तर्पण करे। यह कार्य घर पर कभी नहीं किया जा सकता।' नारदजी कहते हैं-वृद्ध ब्राह्मण के रूप में पधारे हुए भगवान् विष्णु ने यों कहकर मुझे समझाया। तब मैं राजा को साथ लेकर चल पड़ा। बहुत-से बान्धव भी हमारे साथ हो लिये। विप्र-वेषधारी भूतभावन भगवान् आगे आगे चले। तत्पश्चात् मैं तुरंत परम पावन तीर्थ के लिये चल पड़ा। द्विजरूपी भगवान् विष्णु कृपापूर्वक मुझे पुंतीर्थ में ले गये। वहाँ एक पवित्र सरोवर था। भगवान् श्रीहरि ने मुझसे कहा- 'गजगामिनी! कार्य करने का समय उपस्थित है। तुम इस पवित्र तीर्थ में स्नान करके पुत्र सम्बन्धी निरर्थक शोक से रहित हो जाओ। जन्म-जन्मान्तर में तुम्हारे करोड़ों पुत्र, पिता, पति, भ्राता और जामाता मर चुके हैं। उनमें तुम किसका शोक मनाती हो? यह सब मनका भ्रम है। स्वप्न की तुलना करने वाला यह व्यर्थ चिन्तन प्राणियों के लिये केवल कष्ट ही देने वाला है।' नारदजी कहते हैं- भगवान् विष्णु के मुख से निकली हुई इस बात को सुनकर उनकी प्रेरणा के अनुसार मैं पुरुषसंज्ञक तीर्थ में स्नान करने के लिये प्रविष्ट हुआ। उस तीर्थ में डुबकी लगाते ही मेरी आकृति तुरंत पुरुषाकार बन गयी। भगवान् विष्णु वीणा लेकर तटपर विराजमान थे। द्विजवर! स्नान करने के पश्चात् मुझे कमललोचन भगवान् विष्णु के साक्षात् दर्शन प्राप्त हुए। फिर तो मेरे मन की विस्मृति दूर हो गयी। सोचने लगा, भगवान्‌ के साथ मैं नारद यहाँ उपस्थित हूँ। माया के प्रभाव से स्त्री- जैसी मेरी आकृति हो गयी थी। मैं इस प्रकार की बातें सोच ही रहा था कि भगवान् श्रीहरि ने मुझसे कहा-'नारद! यहाँ आओ, जल में खड़े होकर क्या कर रहे हो ?' मैंने सोचा, मैं अभी अत्यन्त दारुण स्त्री के वेष में था; फिर कैसे पुरुष हो गया? मेरे आश्चर्य की सीमा न रही। जय माता जी की क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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माघमास महात्म्य छठा अध्याय 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ पूर्व समय में सतयुग के उत्तम निषेध नामक नगर में हेमकुंडल नाम वाला कुबेर के सदृश धनी वैश्य रहता था. जो कुलीन, अच्छे काम करने वाला, देवता, अग्नि और ब्राह्मण की पूजा करने वाला, खेती का काम करता था. वह गौ, घोड़े, भैंस आदि का पालन करता था. दूध, दही, छाछ, गोबर, घास, गुड़, चीनी आदि अनेक वस्तु बेचा करता था जिससे उसने बहुत सा धन इकठ्ठा कर लिया था. जब वह बूढ़ा हो गया तो मृत्यु को निकट समझकर उसने धर्म के कार्य करने प्रारंभ कर दिए. भगवान विष्णु का मंदिर बनवाया. कुंआ, तालाब, बावड़ी, आम, पीपल आदि वृक्ष के तथा सुंदर बाग-बगीचे लगवाए. सूर्योदय से सूर्यास्त तक वह दान करता, गाँव के चारों तरफ जल की प्याऊ लगवाई. उसने सारे जन्म भर जितने भी पाप किए थे उनका प्रायश्चित करता था. इस प्रकार उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए जिनका नाम उसने कुंडल और विकुंडल रखा। जब दोनों लड़के युवावस्था के हुए तो हेमकुंडल वैश्य गृहस्थी का सब कार्य सौंपकर तपस्या के निमित्त वन में चला गया और वहाँ विष्णु की आराधना में शरीर को सुखाकर अंत में विष्णु लोक को प्राप्त हुआ. उसके दोनों पुत्र लक्ष्मी के मद को प्राप्त होकर बुरे कर्मों में लग गए. वेश्यागामी वीणा और बाजे लेकर वेश्याओं के साथ गाते-फिरते थे. अच्छे सुंदर वस्त्र पहनकर सुगंधित तेल आदि लगाकर, भांड और खुशामदियों से घिरे हुए हाथी की सवारी और सुंदर घरों में रहते थे. इस प्रकार ऊपर बोए बीज के सदृश वह अपने धन को बुरे कामों में नष्ट करते थे. कभी किसी सत पात्र को दान आदि नहीं करते थे न ही कभी हवन, देवता या ब्रह्माजी की सेवा तथा विष्णु का पूजन ही करते थे । थोड़े दिनों में उनका सब धन नष्ट हो गया और वह दरिद्रता को प्राप्त होकर अत्यंत दुखी हो गए. भाई, जन, सेवक, उपजीवी सब इनको छोड़कर चले गए तब इन्होंने चोरी आदि करना आरंभ कर दिया और राजा के भय से नगर को छोड़कर डाकुओं के साथ वन में रहने लगे और वहाँ अपने तीक्ष्ण बाणों से वन के पक्षी, हिरण आदि पशु तथा हिंसक जीवों को मारकर खाने लगे. एक समय इनमें से एक पर्वत पर गाय जिसको सिंह मारकर खा गया और दूसरा वन को गया जो काले सर्प के डसने से मर गया तब यमराज के दूत उन दोनों को बाँधकर यम के पास लाए और कहने लगे कि महाराज इन दोनों पापियों के लिए क्या आज्ञा है? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध) (दो सौ बहत्तर वाँ दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः विद्याधरी का वैराग्य और अपने तथा पति के लिये तत्त्वज्ञान का उपदेश देने के हेतु उसकी वसिष्ठ मुनि से प्रार्थना...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ मैं संसार की वासना के आवेश से शून्य हूँ, इसलिये आकाश में विचरने की शक्तिरूप सिद्धि प्रदान करने वाली खेचरी मुद्रानामक तीव्र एवं अभीष्ट धारणा को बाँधकर सुस्थिरचित्त हो गयी हूँ। उक्त धारणा के द्वारा आकाश में विचरने की शक्ति पाकर मैंने पुनः दूसरी धारणा का अभ्यास किया, जो सिद्ध पुरुषों का सङ्ग एवं उनके साथ सम्भाषणरूप फल देने वाली है । ( इसीलिये आज यहाँ आकर आपके साथ वार्तालाप करने का सौभाग्य प्राप्त कर सकी। ) तत्पश्चात् मैं अपने निवासभूत ब्रह्माण्ड के पूर्वापर भागघटित (नीचे-ऊपर के सम्पूर्ण) आकार को भलीभाँति देखने की इच्छा से तदाकार भावनामयी धारणा बाँधकर स्थित हुई। वह धारणा भी मेरे लिये सिद्ध हो गयी । फिर मैं अपने उस ब्रह्माण्ड के अंदर की सभी वस्तुओं को देखकर जब बाहर निकली, तब वह लोकालोक पर्वत की स्थूल शिला मुझे दिखायी दी। मेरे पतिदेव केवल शुद्ध वेदार्थ के एकान्तचिन्तन में ही लगे रहते हैं। उनकी सारी एषणाएँ दूर हो चुकी हैं । वे न तो किसी का आना जानते हैं न जाना—उन्हें न तो भूतकाल का पता रहता है, न वर्तमान और भविष्य का ही । अहो ! उनकी कैसी अद्भुत स्थिति है ? परन्तु वे मेरे पति विद्वान् होते हुए भी अब तक परमपद को प्राप्त न कर सके। अब वे और मैं दोनों ही परमपद को पाने की इच्छा रखते हैं। ब्रह्मन् ! आपको हमारी यह प्रार्थना सफल करनी चाहिये; क्योंकि महापुरुषों के पास आये हुए कोई भी याचक कभी विफलमनोरथ नहीं होते । दूसरों को मान देने वाले महर्षे ! मैं आकाशमण्डल में सिद्ध समूहों के बीच सदा घूमती रहती हूँ; परंतु यहाँ आपके सिवा दूसरे किसी ऐसे महात्मा को नहीं देखती जो अज्ञान के गहन वन को दग्ध करने के लिये दावानल के तुल्य हो । ब्रह्मन् ! करुणासागर ! संत-महात्मा अकारण ही प्रार्थी जनों की मनोवाञ्छा पूर्ण किया करते हैं, इसलिये आपकी शरण में आयी हुई मुझ अबला का आप तिरस्कार न करें । तत्त्वज्ञान का उपदेश देकर मुझे और मेरे पति को कृतार्थ करें । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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