savan  paresh bhai
savan paresh bhai Jun 9, 2018

💚💛💜pyara sa sathi kismat valo ko milta he💚💛💜👫

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Sunita Pawar Aug 13, 2020

🌲🌹बीमार पड़ने के पहले , ये काम केवल आयुर्वेद ही कर सकता है।🌹🌲 1--केंसर होने का भय लगता हो तो रोज़ाना कढ़ीपत्ते का रस पीते रहें,,, 2-- हार्टअटेक का भय लगता हो तो रोज़ना अर्जुनासव या अर्जुनारिष्ट पीते रहिए,, 3-- बबासीर होने की सम्भावना लगती हो तो पथरचटे के हरे पत्ते रोजाना सबेरे चबा कर खाएँ,,,, 4-- किडनी फेल होने का डर हो तो हरे धनिये का रस प्रात: खाली पेट पिएँ,,, 5-- पित्त की शिकायत का भय हो तो रोज़ाना सुबह शाम आंवले का रस पिएँ,,, 6-- सर्दी - जुकाम की सम्भावना हो तो नियमित कुछ दिन गुनगुने पानी में थोड़ा सा हल्दी चूर्ण डालकर पिएँ,,,, 7-- गंजा होने का भय हो तो बड़ की जटाएँ कुचल कर नारियल के तेल में उबाल कर छान कर,रोज़ाना स्नान के पहले उस तेल की मालिश करें,,, 8-- दाँत गिरने से बचाने हों तो फ्रिज और कूलर का पानी पीना बंद कर दें,,,, 9-- डायबिटीज से बचाव के लिए तनावमुक्त रहें, व्यायाम करें, रात को जल्दी सो जाएँ, चीनी नहीं खाएँ , गुड़ खाएँ,,, 10--किसी चिन्ता या डर के कारण नींद नहीं आती हो तो रोज़ाना भोजन के दो घन्टे पूर्व 20 या 25 मि. ली. अश्वगन्धारिष्ट ,200 मि. ली. पानी में मिला कर पिएँ,,,, किसी बीमारी का भय नहीं हो तो भी -- 15 मिनिट अनुलोम - विलोम, 15 मिनिट कपालभाती, 12 बार सूर्य नमस्कार करें,,,, स्वयं के स्वास्थ्य के लिए इतना तो करें,,🌲 🌲स्वस्थ रहने के लिए धन नहीं लगता, थोड़ी स्फूर्ति, थोड़ी जागरूकता व थोड़ा परिश्रम लगता है🌲

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Vijay Shukla Aug 13, 2020

एक कहानी *एक सन्त जो एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहा था, रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काटते ले जाते देखता था ???* *एक दिन उससे कहा कि "सुन भाई, दिन- भर लकड़ी काटता है, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती। तू जरा आगे क्यों नहीं जाता। वहां आगे चंदन का जंगल है। एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा !!!!!!!!* गरीब लकड़हारे को भरोसा तो नहीं आया, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है ??? जंगल में ही तो जिंदगी बीती। लकड़ियां काटते ही तो जिंदगी बीती। यह बाबा यहां बैठा रहता है वृक्ष के नीचे, इसको क्या खाक पता होगा??? मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो! फिर झूठ कहेगा भी क्यों??? शांत आदमी मालूम पड़ता है, मस्त आदमी मालूम पड़ता है?कभी बोला भी नहीं इसके पहले एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है ??? *तो गया। लौटा संत के चरणों में सिर रखा और कहा कि "मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है। मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी। मेरा बाप भी लकड़हारा था, उसका बाप भी लकड़हारा था। हम यही काटने की, जलाऊ-लकड़ियां काटते-काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या! हमें तो चंदन मिल भी जाता तो भी हम काटकर बेच आते उसे बाजार में ऐसे ही। तुमने पहचान बताई, तुमने गंध जतलाई, तुमने परख दी। जरुर जंगल है। मैं भी कैसा अभागा! काश, पहले पता चल जाता ????* सन्त ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है। जब घर आ गए तभी सबेरा है?? दिन बड़े मजे में कटने लगे। एक दिन काट लेता, सात-आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती ??? एक दिन सन्त ने कहा; *"मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी। जिंदगी भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है?"* उसने कहा; *"यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है?"* उस सन्त ने कहा : *"चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है। लकड़िया-वकडिया काटना छोड़ो। एक दिन ले आओगे, दो-चार छ: महीने के लिए हो गया।"* अब तो भरोसा आया था। भागा। संदेह भी न उठाया। चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या! चांदी ही चांदी थी! चार-छ: महीने नदारद हो जाता। एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता। लेकिन आदमी का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे खयाल न आया कि और आगे कुछ हो सकता है। सन्त ने फिर एक दिन कहा कि *"तुम कभी जागोगे कि नहीं! कि मुझी को तुम्हें जगाना पड़ेगा। आगे सोने की खदान है मूर्ख! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत है। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता?"* उसने कहा कि *"मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा?"* गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। सन्त ने कहा : *"थोड़ा और आगे सोने की खदान है।"* और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। और एक दिन सन्त ने कहा कि नासमझ, *"अब तू हीरों पर ही रुक गया?"* अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा *"अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशान न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है?"* उस बाबा ने कहा. *हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह आदमी मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा?* रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि *"मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह सवाल ही नहीं आता। तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों-जन्मों में नहीं आ सकता था खयाल कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है।* सन्त ने कहा : *उसी धन का नाम परमात्मा का ध्यान है।* अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं। अब जरा अपने भीतर की खदान खोद, जो सबसे कीमती है।..... 🦚🌷विजय शुक्ल🌷🦚 सम्पर्क सूत्र - 📱-8574763197

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Swami Lokeshanand Aug 12, 2020

कर्म तीन से होता है, इच्छा, अनिच्छा और हरि इच्छा। इच्छा से कर्म हो तो नया प्रारब्ध निर्मित होता है, अनिच्छा से कर्म करना पड़े तो प्रारब्ध कटता है, हरि इच्छा से कर्म होने लगे तो कर्मबंधन से मुक्ति मिलती है। आएँ विचार करें- हनुमानजी को अभी तक तीन संकेत मिले हैं, जामवंतजी ने कहा- *एतना* करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥" सुरसा ने कहा- "राम काजु *सब* करिहहु" लंकिनी बोली- "प्रबिसि नगर किजे *सब* काजा" तो संशय है कि कितना करें? सीमित या संपूर्ण? यहाँ रावण की प्रताड़ना से त्रस्त सीता माँ आग माँगने लगीं। हनुमानजी को बड़ा रोष आया। विचार करने लगे, कि माँ! तूं आग माँग रही है, मैं ऐसी आग लाकर दूंगा कि लंका ही जल कर राख हो जाएगी। "अपनी जठर आग, बड़ आग सागर की, बन की दावाग्नि को, आग में मिलाई दूँ। यहरउँ से आग रहे, वहरउँ से आग रहे, आग बन अग्नि में, अग्नि लगाई दूँ। कहत पवनसुत आग जो मिली ना तो, सूरज को तोड़फोड़ लंका पे गिराई दूँ॥" सोचा "राम" में तीन अक्षर हैं, र-अ-म। र सूर्य है, अ अग्नि है, म चन्द्र है। माँ विरह में जल रही हैं, मैं चन्द्रमा माँ को दे दूंगा, उसकी शीतलता से उनके विरह की जलन मिट जाएगी। सूर्य भी माँ को दे दूंगा, निराशा का अंधेरा मिट जाएगा। अग्नि मैं रख लूंगा, लंका जलाने के काम आएगी। इस प्रकार रामनाम का संपूर्ण उपयोग हो जाएगा। विचार तो आ गया, पर जामवंतजी की आज्ञा नहीं है, तब क्या करें? प्रतीक्षा करें। सुबह त्रिजटा आई, कहती है- "सपनें वानर लंका जारी" हनुमानजी को लगा मानो अंतर्यामी रामजी ने, उनके मन का विचार जानकर, त्रिजटा के स्वप्न के माध्यम से, उन्हें संदेश दे दिया, कि हनुमानजी बहुत सुंदर विचार है, लगे हाथ यह कार्य भी करते ही आना। पर यह प्रसंग अभी अधूरा है, आगे सविस्तार इस पर चर्चा करेंगे, क्योंकि किसी भी इच्छित कार्य को, अपने मन की इच्छा को, हरि इच्छा के नाम पर लादकर नहीं करना चाहिए। कारण कि यह नियम है कि यदि हरि की ही इच्छा होती है, तो कार्य भी हरि ही कराते हैं। विडियो- हनुमानजी ने लंका नहीं जलाई https://youtu.be/mMri4UzHt-8

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ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भर छाछ पे नाच नचावै,, कृष्ण जन्मोत्सव की अनेकानेक शुभकामनाएं.... अद्भुत है श्रीकृष्ण-चरित्र...... जिनको मुनियों के मनन में नहिं आते देखा। गोकुल में उन्हें गाय चराते देखा। हद नहीं पाते हैं अनहद में भी योगी जिनकी। तीर यमुना के उन्हें वंशी बजाते देखा। जिनकी माया ने चराचर को नचा रखा है गोपियों में उन्हें खुद नाचते गाते देखा। जो रमा के हैं रमण, विश्व के पति ‘राधेश्याम’। ब्रज में आके उन्हैं माखन को चुराते देखा। श्रीकृष्ण चरित्र में अद्भुत विरोधाभास:- भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला में विलक्षणता दिखाई देती है। वह अजन्मा होकर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं, सर्वशक्तिमान होने पर भी कंस के कारागार में जन्म लेते हैं। माता पिता हैं देवकी और वसुदेव; किन्तु नन्दबाबा और यशोदा द्वारा पालन किए जाने के कारण उनके पुत्र ‘नंदनन्दन’ और ‘यशोदानन्दन’ कहलाते हैं। राक्षसी पूतना ने अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से स्तनपान कराया किन्तु दयामय कृष्ण ने मातावेष धारण करने वाली पूतना को माता के समान सद्गति दे दी, ऐसा अद्भुत और दयालु चरित्र किसी और देवता का नहीं है। योगमाया के स्वामी होने से श्रीकृष्ण समस्त सृष्टि को बंधन में रखने की क्षमता रखते हैं, फिर भी स्वयं माता के द्वारा ऊखल से बांधे जाते हैं और ‘दामोदर’ कहलाते हैं। तीन पग भूमि मांग कर जिसने राजा बलि को छला वे नन्दभवन की चौखट नहीं लांघ पाते:- तीन पैंड़ भूमि मांगि बलि लियौ छलि, चौखट न लांघी जाय रहयौ सो मचलि। नन्दरायजी नौ लाख गायों के स्वामी और व्रजराज हैं, फिर भी श्रीकृष्ण स्वयं गाय चराने जाते हैं। श्रीकृष्ण माता यशोदा से कहते हैं:- मैया री! मैं गाय चरावन जैहों। तूं कहि, महरि! नंदबाबा सौं, बड़ौ भयौ, न डरैहों॥ जो ‘सहस्त्राक्ष’ हैं, सारे संसार पर जिनकी नजर रहती है, उन श्रीकृष्ण को यशोदामाता डिठौना लगाकर नजर उतारती हैं। आसुरीमाया से श्रीकृष्ण की रक्षा के लिए रक्षामन्त्रों से जल अभिमन्त्रित कर उन्हें पिलाती हैं; इतना ही नहीं:- देखौ री जसुमति बौरानी, घर-घर हाथ दिखावति डोलति, गोद लियें गोपाल बिनानी।। जगत के पालनहार व पोषणकर्ता होने पर भी श्रीकृष्ण व्रजगोपिकाओं के यहां दधि-माखन की चोरी करते हैं। स्वयं के घर में दूध, दही माखन का भंडार होने पर भी गोपियों से एक छोटा पात्र छाछ की याचना करते हैं और उसके लिए गोपिकाओं के सामने नाचने को तैयार हो जाते हैं:- ब्रज में नाचत आज कन्हैया मैया तनक दही के कारण। तनक दही के कारण कान्हां नाचत नाच हजारन।। नन्दराय की गौशाला में बंधी हैं गैया लाखन। तुम्हें पराई मटुकी को ही लागत है प्रिय माखन।। गोपी टेरत कृष्ण ललाकूँ इतै आओ मेरे लालन। तनक नाच दे लाला मेरे, मैं तोय दऊँगी माखन।। (रसिया) प्रेम की झिड़कियाँ भी मीठी होती हैं–मार भी मीठी लगती है। सलोना श्यामसुन्दर व्रजमण्डल के प्रेमसाम्राज्य में छाछ की ओट से इसी रस के पीछे अहीर की छोकरियों के इशारों पर तरह-तरह के नाच नाचता-फिरता है–‘ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभरि छाछपै नाच नचावैं’ (रसखान) और श्रीकृष्ण एक होकर ही असंख्य गोपियों के साथ असंख्य रूपों में रासक्रीडा करते हैं। परब्रह्म श्रीकृष्ण की लीला से दुर्वासा ऋषि भी हुए भ्रमित:- दुर्वासा ऋषि गोकुल में परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के दर्शनों की अभिलाषा से आते हैं, किन्तु उन्होंने परब्रह्म को किस रूप में देखा–सारे अंग धूलधूसरित हो रहे हैं, केश बिखरे हुए, श्रीअंग पर कोई वस्त्र नहीं, दिगम्बर वेष है, और सखाओं के साथ दौड़े जा रहे हैं। मुनि ने सोचा–’क्या ये ईश्वर हैं? अगर भगवान हैं तो फिर बालकों की भांति पृथ्वी पर क्यों लोट रहे हैं? दुर्वासा ऋषि भगवान की योगमाया से भ्रमित होकर कहने लगे ’नहीं, ये ईश्वर नहीं ये तो नन्द का पुत्रमात्र है।’ प्रकृति की पाठशाला से पढ़ा जीवन का पाठ:- यह एक विलक्षण बात थी कि राज-परिवार के स्नेह-सत्कार को छोड़कर गोपों के बीच जन्म से ही संघर्ष का पाठ पढ़ने के लिए भगवान कृष्ण मथुरा से गोकुल आ गए। जिस व्यक्ति को आगे चलकर राजनीति की दृढ़ स्थापना और एक उच्च जीवनदर्शन स्थापित करना था; उन्होंने अपना आरम्भिक जीवन बिताने के लिए गो-पालकों का नैसर्गिक जीवन और प्रकृति का सुन्दर वातावरण चुना क्योंकि उन्हें पहले पृथ्वी से सहज रस लेना था। अत: वन उनकी पहली पाठशाला थी और उनके शिक्षक मुक्त और निर्भीक गो-पालक थे। सांदीपनि ऋषि की पाठशाला में दाखिल होने से पहले ही वे जीवन की पाठशाला से स्नातक हो चुके थे। वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।। मुरली का माधुर्य और पांचजन्य-शंख का घोर निनाद:- श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में हृदय को विमुग्ध करने वाली बांसुरी और शौर्य के प्रतीक सुदर्शन चक्र का अद्भुत समन्वय हुआ है। कहां तो यमुनातट और निकुंज में मुरली के मधुरनाद से व्रजबालाओं को आकुल करना और कहां पांचजन्य-शंख के भीषण निनाद से युद्धक्षेत्र को प्रकम्पित करना। अपने मुरलीनाद से जहां उन्होंने धरती के सोये हुए भाव जगाये; वहीं पांचजन्य के शंखनाद से, कौमोदकी गदा के भीषण प्रहार से, शांर्गधनुष के बाणों के आघात से, धूमकेतु के समान कृपाण से और अनन्त शक्तिशाली सुदर्शन चक्र से भारतभूमि को अत्याचारी, अधर्मी व लोलुप राजाओं से विहीन कर दिया। अतुल नेतृत्व-शक्ति रखते हुए भी दूत और सारथि का काम किया और युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में अग्रपूजा के योग्य माने जाने पर भी जूठी पत्तलें उठाने का कार्य किया। चरित्र की ऐसी विलक्षणता और कहीं देखने को नहीं मिलती। श्रीकृष्ण का अद्भुत अनासक्ति योग:- श्रीकृष्ण की जीवन को तटस्थ (सम) भाव से देखने की प्रवृति की शुरुआत तो जन्मकाल से ही हो गयी थी। जन्म से ही माता-पिता की ममता छोड़ नन्द-यशोदा के घर रहे। सहज स्नेह रखने वाली गोपियों से नाता जोड़ा और उन्हें तड़पता छोड़ मथुरा चले गए। फिर मथुरा को छोड़ द्वारका चले आए परन्तु यदुकुल में कभी आसक्त नहीं रहे। कोई भी स्नेह उन्हें बांध न सका। पाण्डवों का साथ हुआ पर पाण्डवों को महाभारत का युद्ध जिताकर उन्हें छोड़कर चले गए। पृथ्वी का उद्धार किया और पृथ्वी पर प्रेमयोग व गीता द्वारा ज्ञानयोग की स्थापना की; पर पृथ्वी को भी चुपचाप, निर्मोही होकर छोड़कर चले गये। ममता के जितने भी प्रतीक हैं, उन सबको उन्होंने तोड़ा। गोरस (दूध, दही, माखन) की मटकी को फोड़ने से शुरु हुआ यह खेल, कौरवों की अठारह अक्षौहिणी सेना के विनाश से लेकर यदुकुल के सर्वनाश पर जाकर खत्म हुआ। द्वारकालीला में सोलह हजार एक सौ आठ रानियां, उनके एक-एक के दस-दस बेटे, असंख्य पुत्र-पौत्र और यदुवंशियों का लीला में एक ही दिन में संहार करवा दिया, हंसते रहे और यह सोचकर संतोष की सांस ली कि पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतर गया। क्या किसी ने ऐसा आज तक किया है? वही श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा उद्धवजी को व्रज में भेजते समय कहते हैं–’उद्धव! तुम व्रज में जाओ, मेरे विरह में गोपिकाएं मृतवत् पड़ी हुईं हैं, मेरी बात सुनाकर उन्हें सांन्त्वना दो।’ भगवान की सारी लीला में एक बात दिखती है कि उनकी कहीं पर भी आसक्ति नहीं है। इसीलिए महर्षि व्यास ने उन्हें प्रकृतिरूपी नटी को नचाने वाला सूत्रधार और ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ कहा है। यही कारण है कि प्रत्येक भारतीय माता अपनी गोद श्रीकृष्ण के बालरूप (गोपालजी) से ही भरना चाहती है और प्रत्येक स्त्री अपने प्रेम में उसी निर्मोही के मोहनरूप की कामना करती है। रम रहे विश्व में, फिर भी रहते हो न्यारे-न्यारे। पर सुना प्रेम के पीछे फिरते हो मारे-मारे,, जय श्री कृष्ण राधे राधे ( प्रेषक अज्ञात )

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Swami Lokeshanand Aug 11, 2020

एक नियम है, जहाँ आपका मन लगा है वहीं आपकी भक्ति है। आपका मन स्त्री में लगा हुआ है तो आप स्त्री भक्त हैं, धन में लगा हुआ है तो धन के भक्त हैं। यहाँ सीताजी की स्थिति देखें, हिरन पर आँख गई तो भगवान दूर चले गए, रावण पर गई तो हरण ही हो गया। पर अब- "निजपद नयन, दिए मन राम पदकमल लीन" दृष्टि अपने चरणों पर, मन रामजी के चरणों में। आँख उठाती ही नहीं, माने बहिर्मुखता रही ही नहीं, और- "कृस तन, शीश जटा एक बेनी। जपति हृदँय रघुपति गुण श्रेणी॥" तन कृशकाय है, माने देह में मैं-पन का भाव अति क्षीण है। जटा एक पतली सी चोटी मात्र रह गई है, माने एक ही विचार रहता है, भगवान और उनके गुणों का निरंतर चिंतन करती हैं। "नाम पहारू दिवस निसि" जिव्हा पर दिन रात भगवान का नाम है। बस यही साधक की रहनी है। तन संसार में, मन परमात्मा में। नियम से, अन्तर्मुख होकर, नामजप करते हुए, एकमात्र भगवान के चरणों और गुणों का ध्यान। इधर हनुमानजी पहुँचे ही हैं, कि उधर से रावण आ गया, सीताजी ने विचार किया कि पहले जब यह आया था, तब मैं अकेली थी, आज भी अकेली हूँ, ऐसा करूं किसी को साथ ले लूं। सीताजी ने एक तिनका उठा लिया- "तृन धरि ओट कहति बैदेही" भाव यह है कि देखने की इच्छा हो तो बंद आँख से भी जगत देखा जा सकता है, और देखने की इच्छा न हो तो तिनके की ओट भी बहुत है। तिनका दिखा कर रावण को संकेत दे दिया, कि मैं उनकी पुत्रवधु हूँ जिन्होंने भगवान के वियोग में जीवन तिनके की तरह त्याग दिया, उनकी पत्नी हूँ जिन्होंने राजपद तिनके की त्याग दिया। यदि तूं बल-वैभव की बात करता है तो तेरा बल-वैभव भगवान के सामने तिनके के समान है। तेरे पाप के लिए एक दिन तुझे तिनका तिनका धिक्कारेगा। भगवान के रोष की आँधी तुझे ऐसे उड़ा ले जाएगी जैसे किसी तिनके को उड़ा ले जाती है। तिनका दिखाकर मानो रावण को उस तिनके का ध्यान दिलाना चाहती हैं, जो भगवान ने जयन्त के पीछे लगाया था। फिर यह तिनका भी सीताजी की ही तरह धरती का पुत्र है, सीताजी को यह अपना भाई सा लगता है। या तिन-का, माने उनका, रामजी का, मुझे अकेली मत समझना। "मत समझ अकेली सीता को, उसका राघव है साथ सदा। इस रोम रोम में नस नस में, बस रहा राम रघुनाथ सदा॥" राम रूपी सूर्य के सामने तूं, तेरा बल और तेरा वैभव, जुगनू के समान है। लोकेशानन्द के विचार से, ऐसी रहनी, ऐसा विचार, ऐसा विश्वास और ऐसा साहस, सच्चे साधक की पहचान है।

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sanjay Awasthi Aug 13, 2020

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NEha sharma 💞💕 Aug 13, 2020

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