Jay Shree Krishna
Jay Shree Krishna Apr 19, 2019

_*🙏🏻🙏🏻🌹आज संध्या के श्रृंगार दर्शन श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के सौराष्ट्र प्रान्त गुजरात से🌹🙏🏻🙏🏻*_

_*🙏🏻🙏🏻🌹आज संध्या के श्रृंगार दर्शन श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के सौराष्ट्र प्रान्त गुजरात से🌹🙏🏻🙏🏻*_

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R.K.Soni(गणेश मंदिर) Apr 19, 2019
🌹शुभ रात्री वंदन जी🌹 🙏जय गणेश देवा जी🙏 🙏जय वीर हनुमान जी🙏आप व आपके परिवार को हनुमान जयंती की हार्दिक शुभ कामनाए जी🍁🙏🍁🙏🍁🙏🍁🙏🍁🙏🍁🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹

vijay sharma May 18, 2019

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Bindu singh May 18, 2019

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sarita May 18, 2019

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Shiva Gaur May 18, 2019

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माता सती योगाग्नि..🌅🌅 भगवान #ब्रह्मा के पुत्र #दक्ष प्रजापति की सभी पुत्रियाँ गुणवती थीं। फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो सर्व शक्ति-संपन्न हो एवं सर्वविजयिनी हो। अत: दक्ष एक ऐसी ही पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती #आद्या ने प्रकट होकर कहा, 'मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। तुम किस कारण तप कर रहे हो? दक्ष ने तप करने का कारण बताया तो मां बोली मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी और मेरा नाम '#सती' होगा। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी। फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थीं। सती ने बाल्यावस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य चकित करने वाले कार्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मय होता था । जब सती विवाह योग्य हो गई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, सती आद्या की अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए #शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती #कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। भगवान शिव के दक्ष के दामाद थे, किंतु किसी वजह से दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध भाव पैदा हो गया। एक बार देवलोक में ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े-बड़े देवता सभा में एकत्र हुुए। भगवान शिव भी इस सभा में बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल की ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, 'प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं? भगवान शकंर ने उत्तर दिया आपके पिता ने बडे यज्ञ का आयोजन किया हैं। समस्त देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।' इस पर सती ने दूसरा प्रश्न किया, "क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?" भगवान शंकर ने उत्तर दिया, "आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे?" सती मन ही मन सोचने लगीं फिर बोलीं- "यज्ञ के इस अवसर पर अवश्य मेरी सभी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।" भगवान शिव ने उत्तर दिया, "इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे बैर रखते हैं हो सकता हैं वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता हैं।" इस पर सती ने प्रश्न किया "ऐसा क्यों?" भगवान शिव ने उत्तर दिया "विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति की हो जाती हैं। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता हैं।" लेकिन सती अपने मायके जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार-बात दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी साथ में भेज दिया उस गण का नाम 'वीरभद्र' था। सती #वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं। घर में सती से किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा तुम क्या यहाँ मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघांबर हैं। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक हैं। वह तुम्हें बाघांबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं। दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता हैं? अब तो आ ही गई हूं। पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषि-मुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धू-धू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं "पितृश्रेष्ठ! यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं किंतु कैलाशपति का भाग नहीं हैं। आपने उनका भाग क्यों नहीं रखा?" दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया "मैं तुम्हारे पति शिव को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला हैं। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा?" सती के नेत्र लाल हो उठे। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोदिप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा "ओह! मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं मुझे धिक्कार हैं। देवताओ तुम्हें भी धिक्कार हैं! तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता हैं। जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती हैं उसे नरक में जाना पड़ता हैं। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया हैं। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती।" सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। सती अग्निदाह योग के बारे में सुनने के बाद भगवान शिव उग्र हो उठे। अपने गुस्से को नियंत्रित करने में असमर्थ, उन्होंने आगे बढ़कर श्रेष्ठ भैरव गणों में वीरभद्र और #भद्रकाली, #दक्षिणा को आगे बढ़ाया। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र क्रोध से कांप उठे। वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। हालांकि कई देवताओं ने दक्षिणा, वीरभद्र और भद्रकाली की मदद करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने दक्ष प्रजापति की सेना को नष्ट कर दिया और वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष प्रजापति का मस्तक काटकर फेंक दिया। भगवान शिव प्रचंड आंधी की भांति #कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए। भगवान ब्रह्मा ने अपने बेटे दक्ष प्रजापति के जीवन के लिए भगवान शिव से पुनः अनुरोध किया और उसे अपने व्यवहार के लिए माफ करने के लिए कहा। भगवान ब्रह्मा के अनुरोध पे भगवान शिव शांत तो हो गए, लेकिन दक्ष प्रजापति के सिर को एक #बकरी के सिर के साथ स्थानांतरित करके उसे पुनर्जीवित किया। उन्होंने अपने कंधे पर देवी सती के शरीर को रखा और अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करते हुए, ब्रह्मांड के मध्य से चलना शुरू कर दिया। भगवान शिव ने उन्मत की भांति सती के जले हुए शरीर को कंधे पर रख सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसेंं। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे' त्राहिमाम! त्राहिमाम! जगत के बढते इस असंतुलन को देख देवताओं को बहुत चिंता होने लगी और ब्रह्मांड में संतुलन बहाल करने में मदद करने के लिए उन्होंने भगवान विष्णु से संपर्क किया। सती वियोग में भगवान शंकर के दुख को हरने भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान #विष्णु आगे बढ़े। वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काट-काट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल सती के शरीर को टुकड़ों को काटने के लिए किया था, जो पृथ्वी के भिन्न जगहों पे जाकर गिरे। शरीर के टुकड़े की कुल संख्या ५१ थी, और वे ५१ विभिन्न स्थानों पर गिर गई। इन सभी जगहों को हिंदू धर्म में पवित्र #शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है, और उनमें से प्रत्येक में काली या देवी सती शक्ति मंदिर है। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती हैं। धन्य था शिव और सती का प्रेम। शिव और सती के प्रेम ने उन्हें अमर और वंदनीय बना दिया। भगवान शिव अपनी पत्नी के वियोग में ध्यान और शोक करने के लिए कैलाश पर्वत लौट आऐ। देवी सती अंततः #पार्वती के रूप में दुबारा जन्म लेकर भगवान शिव के पास लौट आयी। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

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