Radha krishna
Radha krishna Aug 27, 2017

जब गणेश जी ने गोरों को दिखाया रौद्र रूप।

जब गणेश जी ने गोरों को दिखाया रौद्र रूप।

#गणेशजी
वृंदावन: यहां के एक मंदिर में ऐसे गजानन भी हैं, जो अप्रवासी भारतीय (एनआरआइ) गणेशजी के नाम से विख्यात हैं। गणेशजी की इस प्रतिमा को एक अंग्रेज व्यापारी की पत्नी इंग्लैंड ले गई थी। मजाक उड़ाने के बाद यह प्रतिमा एक माह बाद फिर से भारत लाई गई, मगर छोटे से प्रवास में ही गणेशजी ने चमत्कार से अंग्रेजों को अचंभित कर दिया।

राधाबाग स्थित कात्यायनी मंदिर में विराजमान गणपति के विग्रह का इतिहास विचित्र है। अंग्रेज व्यापारी डब्ल्यूआर यूल की पत्नी ने वर्ष 1912 में जयपुर से गणेशजी की प्रतिमा खरीदी और इंग्लैंड ले गईं। उन्होंने अपने कमरे में गणेशजी को सजाकर रखा। एक दिन घर में पार्टी के दौरान अंग्रेजों ने उनका उपहास उड़ाया, तो विग्रह ने भी रौद्र रूप दिखाया। उसी रात अंग्रेज व्यापारी की पुत्री बीमार पड़ गई और चिल्लाने लगी कि सूंड़ वाला खिलौना उसे निगलने आ रहा है। कहा जाता है कि उसका कई जगह इलाज कराया, लेकिन कोई लाभ न हुआ। एक महीना बाद एक रात व्यापारी की पत्नी को भी स्वप्न में गणेशजी ने चेतावनी दी कि मूर्ति भारत भेज दो। दूसरे दिन सुबह ही व्यापारी की पत्नी ने गणेशजी का विग्रह डाक से भारत में प्रवास कर रहे पति के पास कोलकाता भेज दिया। गार्डन हेंडरसन के कार्यालय में गणेशजी तीन दिन तक विराजे। यूल ने इसे अपने एजेंट केदार बाबू को दे दिया।

इधर, वृंदावन में विद्यानंद महाराज के गुरु स्वामी केशवानंद महाराज कात्यायनी देवी की पंचायतन पूजन विधि से प्रतिष्ठा के लिए सनातन धर्म की पांच मूर्तियों का प्रबंध कर रहे थे। अष्टधातु की मूर्तियां कोलकाता में तैयार हो रही थीं। गणेशजी की प्रतिमा पर विचार हो रहा था। उन्हें पता चला कि एक सिद्ध गणेश कोलकाता में केदार बाबू के घर में हैं। इसी प्रतिमा को कोलकाता से वृंदावन लाया गया और कात्यायनी मंदिर में प्रतिष्ठित कराया गया। इस विग्रह की आज भी विधि-विधान से पूजा होती है।

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