दयालुता और वचनबद्धता से इंसान भगवान को भी वश में कर सकता है ।।

दयालुता और वचनबद्धता से इंसान भगवान को भी वश में कर सकता है ।।

एक शिक्षाप्रद कहानी-दयालुता और वचनबद्धता से इंसान भगवान को भी वश में कर सकता है, कबूतर के बदले अपना शरीर दान करके शिवि ने इंद्र और अग्नि को जीत लिया।

* सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥

जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आए हुए का त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) हैं, पापमय हैं, उन्हें देखने में भी हानि है (पाप लगता है)॥

शिवि की धर्मपरायणता, उदराता, दयालुता एवं परोपकार की ख्याति स्वर्गलोक में भी पहुंच गई थी। इन्द्र और अग्निदेव शिवि की प्रशंसा सुनने के बाद उनकी परीक्षा की योजना बनायी राजा शिवि के गुणों को परखने के लिए अग्निदेव कबूतर बने और इन्द्र बाज।

एक दिन राजा अपने दरबार में बैठे थे तभी एक कबूतर उड़ता हुआ उनकी गोद में आ गिरा और अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगा कबूतर ने कहा… महाराज आपकी उदारता और शरणागत पर दया की चर्चा पशु-पक्षियों तक में होती है मैं भी आपके राज्य में निवास करने के कारण आपकी प्रजा और अभी आपका शरणागत हूं। मेरी रक्षा करें।

शिवि ने कबूतर को निश्चिंत रहने का वचन दिया और कहा कि वह उसकी रक्षा हर हाल में करेंगे। राजा ने जैसे ही वचन दिया तभी वहाँ एक बाज आ पहुंचा और शिवि से कबूतर को वापस करने की मांग करने लगा। बाज ने कहा… महाराज यह कबूतर मेरा आहार है मैं अपने आहार का पीछा कर रहा था मैंने इस पर प्रहार भी किए है, आप मुझे मेरा आहार वापस करें। आपकी बड़ी कृपा होगी।

राजा शिवि ने कहा… बाज यह तुम्हारा आहार रहा होगा किंतु अभी यह मेरा शरणागत है और मैंने इसको प्राण रक्षा का वचन दिया है। इसलिए मैं अपना वचन भंग नही कर सकता।

बाज ने कहा… महाराज मैं भी आपके राज्य का रहने वाला पक्षी हूं। विधाता ने मुझे शिकार करके अपना पेट भरने की व्यवस्था दी है अगर आप कबूतर वापस नहीं करेंगे तो आपको मुझे भूखा रखने का पाप लगेगा। जो राजा अपनी प्रजा को किसी कारण कष्ट देता है या उसके आहार का हरण करता है उस राजा पर से देवों की कृपा समाप्त हो जाती है उसकी प्रजा को इसका दंड भोगना पड़ता है आप यह पाप न करें।

शिवि ने कहा… तुम्हारी बातें सत्य है किंतु मैं वचनबद्ध हूँ। शरणागत का अतीत मुझे ज्ञात नहीं था इसलिए मैंने इसकी रक्षा का भार लिया है इसके बदले मैं तुम्हें अन्य मास का प्रबंध करा सकता हूँ। बाज बोला… आप न्यायप्रिय है मैं आहार प्राप्ति में स्वय समर्थ हूँ इसका प्रमाण आपकी गोद में बैठा कबूतर है ।

जो राजा अपनी प्रजा को आलसी और राजकीय पर आधारित बनाता है वह राजा न्यायप्रिय नहीं। राजकोष आपकी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं प्रजा का अधिकार है बाज की तर्कपूर्ण बातों से शिवि निरूत्तर होने लगे उन्होंने कहा… बाज राजकोष मेरी संपत्ति नहीं किंतु प्रजा कल्याण में प्रयोग का अधिकार है कबूतर मेरी प्रजा है उसके कल्याण के लिए प्रयोग का अधिकार है बाज और शिवि में तर्क-वित्तक चलता रहा शिवि बाज के तर्कों के आगे झुक गए और उन्होंने बाज से ही रास्ता बताने का अनुरोध किया।

बाज ने कहा… आप राजा है मैं प्रजा, प्रजा को संतोषजनक पारितोषिक दीजिए। शिवि ने कहा… हर व्यक्ति को सबसे प्रिय उसके अपने शरीर का मांस होता है मैं कबूतर के बदले अपने शरीर से मांस काटकर दे सकता हूँ , बाज इस पर सहमत हो गया।

एक बड़े से तराजू एक पलड़े पर कबूतर को रखा गया और दूसरे पर राजा शिवि ने अपनी जंघा से काटकर मांस का एक बड़ा टुकड़ा रखा लेकिन पलड़ा हिला भी नहीं, शिवि अपने शरीर से मांस काटकर रखते गए लेकिन पलड़ा नहीं हिला।

अंत में खून से लथपथ शिवि स्वयं उस तराजू पर बैठ गए। उनके बैठते ही पलड़ा झुक गया आकाश से फुलों की वर्षा होने लगी इंद्र और अग्नि अपने वास्तिवक रूप में आ गए। इंद्र ने शिवि का शरीर पहले जैसा कर दिया।

इंद्र ने कहा… राजा शिवि आपकी दानशीलता अद्भुत है एक शरणागत पक्षी को दिए अभयदान के बदले में आपने अपना शरीर समर्पित कर दिया आपकी कीर्ति संसार में तब तक बनी रहेगी जब तक यह पृथ्वी और आकाश अपने स्थान पर है अग्नि ने वर दिया… मेरी प्रचण्डता न आपको विचलित करेगी और न आपका अहित करेगी।

देवता शिवि को वरदान देकर स्वर्गलोक चले गए। अपने वचन पर अडिग रहने और दूसरों के प्रति दया प्रदर्शित करने की भावना से इंसान देवताओं को भी वश में कर सकता है।

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Smt Neelam Sharma Jan 20, 2021

*⚛️ सुख - दुःख का रहस्य ⚛️* ------------------------------- एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा की प्रभु मैंने पृथ्वी पर देखा है कि जो व्यक्ति पहले से ही दुःखी है आप उसे और ज्यादा दुःख प्रदान करते हैं और जो सुख में है आप उसे दुःख नहीं देते है। भगवान ने इस बात को समझाने के लिए माता पार्वती को धरती पर चलने के लिए कहा और दोनों ने इंसानी रूप में पति-पत्नी का रूप लिया और एक गांव के पास डेरा जमाया। शाम के समय भगवान ने माता पार्वती से कहा की हम मनुष्य रूप में यहां आए है इसलिए यहां के नियमों का पालन करते हुए हमें यहां भोजन करना होगा। इसलिए मैं भोजन कि सामग्री की व्यवस्था करता हूं, तब तक तुम भोजन बनाओ। भगवान के जाते ही माता पार्वती रसोई में चूल्हे को बनाने के लिए बाहर से ईंटें लेने गईं और गांव में कुछ जर्जर हो चुके मकानों से ईंटें लाकर, चूल्हा तैयार कर दिया। चूल्हा तैयार होते ही भगवान वहां पर बिना कुछ लाए ही प्रकट हो गए। माता पार्वती ने उनसे कहा आप तो कुछ लेकर नहीं आए, भोजन कैसे बनेगा। भगवान बोले - पार्वती अब तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। भगवान ने माता पार्वती से पूछा की तुम चूल्हा बनाने के लिए इन ईटों को कहां से लेकर आई तो माता पार्वती ने कहा - प्रभु इस गावं में बहुत से ऐसे घर भी हैं जिनका रख रखाव सही ढंग से नहीं हो रहा है। उनकी जर्जर हो चुकी दीवारों से मैं ईंटें निकाल कर ले आई। भगवान ने फिर कहा - जो घर पहले से ख़राब थे तुमने उन्हें और खराब कर दिया। तुम ईंटें उन सही घरों की दीवार से भी तो ला सकती थीं। माता पार्वती बोली - प्रभु उन घरों में रहने वाले लोगों ने उनका रख रखाव बहुत सही तरीके से किया है और वो घर सुंदर भी लग रहे हैं ऐसे में उनकी सुंदरता को बिगाड़ना उचित नहीं होता। भगवान बोले - पार्वती यही तुम्हारे द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर है। जिन राधे जी #लोगो ने अपने घर का रख रखाव अच्छी तरह से किया है यानि सही कर्मों से अपने जीवन को सुंदर बना रखा है उन लोगों को दुःख कैसे हो सकता है। मनुष्य के जीवन में जो भी सुखी है वो अपने कर्मों के द्वारा सुखी है, और जो दुखी है वो अपने कर्मों के द्वारा दुखी है। इसलिए हर एक मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे ही कर्म करने चाहिए की, जिससे इतनी मजबूत व खूबसूरत इमारत खड़ी हो कि कभी भी कोई भी उसकी एक ईंट भी निकालने न पड़े ./. *🌹🌺हर हर महादेव जी 🌺🌹जय भोले नाथ की* 🌻🌺🌹

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Gopal Jalan Jan 20, 2021

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ghanshyamlalsrivastv Jan 20, 2021

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MUNNA KUMAR UP52 Jan 20, 2021

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