Ramesh purohit ने बद्रीनाथ मंदिर में यह पोस्ट की।

#प्रवचन

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Jai Mata Di May 10, 2021

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.129 : पारमार्थिक सत्ता की विशेषता* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 129)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में लिखा है - *राम स्वरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर। अविगत अकथ अपार, नेति नेति नित निगम कह।। चिदानन्दमय देह तुम्हारी। विगत विकार जान अधिकारी।। नर तनु धरेहु संत सुर काजा, कहहु करहु जस प्राकृत राजा।।* राम का स्वरूप अर्थात्‌ आत्मभावरूप (पारमार्थिक सत्ता), उनका चिदानन्दमय रूप (व्यावहारिक सत्ता), और उनका नर रूप (प्रातिभासिक सत्ता); इन तीन प्रकारों में राम को जानना चाहिए। मेरे बोध में स्वरूप वा आत्मभाव में वह अनादि, अनंत, असीम, अपरिमित, ध्रुव और अव्यक्त है। उनका चिदानन्दरूप वा सच्चिदानंद रूप, कथित आत्मभाव से भरा हुआ, गतिशील, इन्द्रियातीत वा अव्यक्त विकारहीन तथा उसके दर्शन की योग्यता रखनेवाले अधिकारी भक्त से जाननेयोग्य है। तथा उसका नररूप उस आत्मभाव से पूर्ण चिदानन्दमय रूप से व्याप्त इन्द्रिय-गोचर वा व्यक्त है। सच्चिदानंद रूप परा प्रकृतिमय है और नररूप अपरा प्रकृतिमय है। ये दोनों रूप अप्राकृत नहीं हैं। अवश्य ही परा प्रकृतिमय रूप का पद अपरा प्रकृतिमय रूप से उच्च है और आत्मभाव में ही राम अप्राकृत भाव में है। चिदानन्दमय देह कभी नर शरीर नहीं हो सकता। लोहा अग्नि में तपते-तपते अग्नि रूप हो जाय, उसका काम भी आग का हो, कितु कुछ देर के बाद ठण्ढा होने पर लोहा ही कहा जाएगा। इसी प्रकार चिदानन्दरूप नररूप में होने के कारण वह जो कुछ भी हो किंतु फिर नररूप ही है - जैसे लोहा लोहा ही है। त्रिशूल और फाल के लोहे को अग्नि में देने से दोनों के दो आकार होते हैं, दोनों लाल हो जाते हैं, अग्नि के समान हो जाते हैं, किंतु वे लोहा हैं। परंतु अग्नि (गर्मी) का उस प्रकार का कोई रूप नहीं। इसी तरह *नररूप में चिदानन्दरूप नराकृतिवत्‌ परंतु उसका भी निराकार-सा आकार नहीं।* लोग कहते हैं - सूर्य अग्नि का गोला है और वह ठण्ढा होते-होते ठण्ढा हो जाएगा। हवा और अग्नि जिस-जिस रूप में होती हैं, वह उस-उस रूप में कहलाती हैं और उनसे बाहर भी हैं। उसी तरह *परमात्मा का चिदानन्दमय रूप सब के बाहर और सब के भीतर भी है।* *वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।। - कठोपनिषद्‌* परमात्मा के इसी चिदानन्दमय रूप के दर्शन से उपनिषद्‌ के इस वाक्य में कथित फल भक्त को होता है - *भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्समिन्दृष्टे परावरे।। - महोपनिषद्‌* अर्थात्‌ उस परे-से-परे (ब्रह्म) को देख लेने पर हृदय की ग्रन्थि टूट जाती है, सभी संशय छिन्‍न हो जाते हैं और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। कितना ही कोई चमत्कार दिखावे, कितना ही कोई वाक्य-जाल रच दे, किंतु मैं नहीं मान सकता कि कोई भी इन्द्रियगम्य रूप चिदानन्दमय हो सकता है। सुग्रीव और श्रीरामजी ने अग्नि की साक्षी देकर आपस में मित्रता की - श्रीसीताजी की खोज करने के लिए। सुग्रीव राजमद में डूब गया और लक्ष्मणजी जब वहाँ डराने-धमकाने के लिए गए तो सुग्रीव आकर कहने लगा – *माया बस सुर नर मुनि स्वामी। मैं पामर पशु कपि अति कामी।।* गोस्वामी तुलसीदासजी ने इतना ही लिखा और बालमीकि रामायण के शब्दों में इसका चित्र खींचा हुआ है। चिदानन्द-रूप का दर्शन हो गया और अतिकामी बना ही रहा! यदि कहो कि उसका हृदय दुरुस्त नहीं था, तो दर्शन कैसे हुआ? यदि हृदय दुरुस्त नहीं था तो चिदानन्दमय-रूप के दर्शन से ठीक हो जाना चाहिए था। कबीर साहब की ही भाँति सत्य कहना पसन्द करता हूँ, जिस सत्य के लिए कबीर साहब ने कहा कि – *साँच कहूँ तो कोई न मानै झूठ कहा नहिं जाई हो।* परमात्म-स्वरूप को लोग तीन सत्ताओं में विभक्त करके वर्णन करते हैं - पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक। पारमार्थिक सत्ता सबसे उच्च है। यह न जड़ है, न चेतन है; जड़-चेतन से परे है। यह सच्चिदानन्द से भी परे है। व्यावहारिक सत्ता सच्चिदानन्द पद है, उसको सत्तलोक कहते हैं। प्रातिभासिक सत्ता को भ्रम कहा गया है। यथा – *रजत सीप महँ भास जिमि, यथा भानु कर वारि। यदि मृषा तिहु काल सो, भ्रम न सकइ कोउ टारि।। ऐसेहि जग हरि आश्रित रहई। यदपि असत्य देत दुख अहई।।* पारमार्थिक सत्ता का संतवाणी में ऐसा भी वर्णन किया गया है - *तापर अकह लोक है भाई। पुरुष अनामी तहाँ रहाई।।* *जो पहुँचे जानेगा वाही। कहन सुनन से न्यारा है।। - कबीर साहब* यहाँ तक आपको पहुँचना चाहिए। यहाँ तक आपको कैसे पहुँचना चाहिए, इसी का पता कबीर साहब के इस पद्य में कहा गया है - *गगन की ओट निशाना है। दहिने सूर चंद्रमा बायें, तिनके बीच छिपाना है।। तन की कमान सुरत का रोदा, शब्द बान ले ताना है। मारत बान बिंधा तन ही तन, सतगुरु का परवाना है।। मारयो बान घाव नहिं तन में, जिन लागा तिन जाना है। कहै कबीर सुनो भाई साधो, जिन जाना तिन माना है।।* चन्द्र और सूर्य के बीच में, चन्द्र बायें, सूर्य दायें को, इड़ा बायाँ, पिंगला दाहिना, दोनों के बीच निशाना आकाश की ओट में छिपा है। अंधकारमय आकाश पर्दा है। धूम धूलि से आच्छादित आकाश परदामय है। आकाश स्वच्छ हो और दृष्टि-शक्ति अच्छी हो तो दूर तक देख सकते हैं। आप किसी मैदान में खड़े हो जाइए तो आकाश पृथ्वी से मिला हुआ देखते हैं, जिसको क्षितिज कहते हैं। एक परिधि जैसा मालूम होता है, इससे विशेष आपकी दृष्टि नहीं जाती है। यदि उस परिधि के नजदीक जाकर देखिए तो फिर दूसरी परिधि दिखाई देगी। हाँ, तो आपका निशाना गगन की ओट में छिपा है। यह बाहर में निशाना नहीं हो सकता, अंदर में निशाना करना है। महर्षि रमण की वैष्णवी मुद्रा थी। शिवजी की शाम्भवी मुद्रा और भगवान विष्णु की वैष्णवी मुद्रा। इस क्रिया को कैसे किया जाय? तो कहा गया है कि *तन की कमान सुरत का रोदा, शब्द बान ले ताना है।* याद रहे कि तीर तो लिया और निशाना ठीक नहीं है, तब वह छिद नहीं सकता। *शब्दवेधी बाणवाले को बुद्धि-रूपी दृष्टि होती है।* यह किसी-किसी को होती है। पृथ्वीराज को यह बुद्धि-रूपी दृष्टि थी। वह शब्दवेधी बाण चलाना जानते थे। शरीर का धनुष और सुरत की डोरी बनाइए। धनुष के ऊपर बराबर डोरी चढ़ी नहीं रहती है। आवश्यकता होने पर धनुष पर डोरी चढ़ाई जाती है। धनुष के एक छोर पर सुरत की डोरी लगी है। इसके दूसरे छोर पर भी डोरी चढ़ानी है। धनुष पर से डोरी उतरी हुई है तो उससे क्या लाभ? भगवान बुद्ध को छह वर्षों की तपस्या करने पर उनको यह ज्ञात हुआ कि जिस सत्य ज्ञान की खोज में में चला था, वह नहीं मिला। भगवान बुद्ध सोच रहे थे कि जिसके लिए राजपाट छोड़कर चला वह नहीं मिला और अब वहाँ जाने पर राजपाट चला भी नहीं सकूँगा। करूँ तो मैं क्या करूँ? इसी विचार में वे बैठे थे। बैठे-बैठे उनको नींद आई और देखा कि इन्द्र एकतारा लिए आए हैं। उसमें तीन तार थे। एक तार बहुत ढीला रहने के कारण उससे जो आवाज निकलती थी, वह अच्छी नहीं लगती थी। दूसरा तार जो बहुत कसा था, उससे ठस यानी कड़ी और कठोर आवाज निकलती थी और जो मध्य का तीसरा तार था, वह यथोचित कसा था, उसकी आवाज बहुत मीठी थी। इतने में उनकी नींद टूट गई और उन्होंने समझा कि मैंने तार को बहुत कसा। *संसारी लोगों का तार बहुत ढीला होता है।* इसलिए उन्होंने मध्य का मार्ग अपनाया। *ढीले तार से कुछ होने का नहीं। यह विषयों की ओर जाता है।* विषयों की ओर विशेष वेग होना धनुष की डोरी ढीली होनी है। यह बुढ़ापा में भी ढीला रहता है। महात्मा गाँधीजी ने कहा है - *उपवासी होने से विषय मंद पड़ता है किंतु विषय-रस की स्मृति रह जाती है। वह तो परमात्म-साक्षात्कार करने पर छूट सकती है।* इसलिए अमा, प्रतिपदा या पूर्णिमा किसी दृष्टि से धनुष पर डोरी चढ़ाने का या तार कसने का अभ्यास करो। अमादृष्टि सबसे सरल है। यह तो इतना सरल और सुखद है कि ध्यान करते हुए लोग नींद में पड़ जाते हैं। तब जो कोई कहे कि आँख बंदकर ध्यान करने से नींद आती है, इसलिए आँख खोलकर करना चाहिए। तो मैं कहूँगा उनको मालूम नहीं है। *आँख खोलकर ध्यान करने से भी औंघी आती है।* संतों ने आँख बंदकर ध्यान करने कहा है - *आँख कान मुख बंद कराओ, अनहद झींगा शबद सुनाओ। दोनों तिल एक तार मिलाओ, तब देखो गुलजारा है।।* *औंघी लगती है तो सम्हल-सम्हलकर ध्यान करो।* खाने-पीने का संयम करो। विशेष खाने से नींद आएगी, भजन नहीं बनेगा। ‘नाक तरूक पूरन करे, कौन कहै परसाद।’ संयम से खाना चाहिए इससे भजन ही नहीं होता, शरीर भी स्वस्थ रहता है। शब्द अभ्यास करे और शरीर के अन्दर-ही-अन्दर बिन्ध जाय। यह सतगुरु का परमाना है। *मारयो बान घाव नहिं तन में, जिन लागा तिन जाना है। कहै कबीर सुनो भाई साधो, जिन जाना तिन माना है।।* *चुम्बक सत्त शब्द है भाई, चुम्बक शब्द लोक ले जाई। लेइ निकारि होखै नहिं पीरा, सत्त शब्द जो बसे शरीरा।। - संत दरिया साहब, बिहारी* दूसरे शब्दों में आपलोगों ने सुना - *जब से अनहद घोर सुनी। इन्द्री थकित गलित मन हुआ, आशा सकल भुनी।। घूमत नैन शिथिल भई काया, अमल जो सुरत सनी। रोम रोम आनंद उपज करि, आलस सहज भनी।। मतवारे ज्यों शब्द समाये, अंतर भींज कनी। करम भरम के बंधन छूटे, दुविधा विपति हनी।। आपा बिसरि जक्त कूँ बिसरो, कित रहि पाँच जनी। लोक भोग सुधि रही न कोई, भूले ज्ञानि गुनी।। हो तहँ लीन चरण ही दासा, कहैं सुकदेव मुनी। ऐसा ध्यान भाग सूँ पैये, चढ़ि रहै शिखर अनी।।* मन नादानुसंधान के अभ्यास से काबू में आ जाता है। इसके लिए नादविन्दूपनिषद्‌ में बहुत उपमाएँ हैं। ‘घूमत नैन' - अंधकार से प्रकाश में, बाहर से भीतर में। ‘भूले ज्ञानि गुनी’ - मौलाना रूम, शम्स तबरेज के यहाँ गए और उनका हाथ चूमा। इस पर शम्स तबरेज ने उसे एक थप्पड़ लगाया। मौलाना रूम ने पूछा - हजरत! मुझसे क्‍या खता हुई? उन्होंने कहा - तेरे से बदबू आती है। मौलाना ने पूछा - वह कैसी बदबू है? उन्होंने कहा - *इल्मियत (विद्वता) की बदबू है।* पुनः मौलाना ने पूछा - क्या करूँ? उन्होंने कहा - कुँए में डाल। *ज्ञान का तर्क-वितर्क सभी छोड़कर भजन करो।* मुँह बन्द करो, मन बन्द करो, तब भजन ठीक-ठीक बनेगा। भजन करने का है, कहने-सुनने का नहीं। *बहिर्मुख से मुड़ना है, अन्तर्मुख होने से स्थूल इन्द्रियों का संग छूटता है।* जाग्रत से स्वप्न में जाने पर सभी बाहर की इन्द्रियाँ निश्चेष्ट हो जाती हैं। जगने पर कहते हैं कि अच्छी तरह सोया। यह अनुभव करनेवाला कौन है? कितना भी कोई नींद में हो, शरीर को कोई किसी तरह डुला दे, जग जाएगा। कुम्भकर्ण तक की नींद टूट जाती है। जब कुम्भकर्ण साधारण तरह से जगाने पर नहीं जगा, तब जैसे बैल से धान बगैरह दौनी करते हैं, वैसे ही कुम्भकर्ण की नाक में खूँट गाड़कर हाथी को चलाया गया, तब उसकी नींद टूटी। इसी तरह *दृष्टि की खूँटी गड़ जाय तो नींद नहीं आएगी।* इस संसार में जाग्रत अवस्था में रहने पर दूर-दूर तक देखते हैं। अच्छी जगह भी है और बुरी जगह भी है। उसी तरह तुरीयावस्था का मैदान दूर तक है और इसमें ऊँचे-ऊँचे स्थान भी हैं, बुरी जगहें भी हैं। *बुरी जगह वह है, जिसमें ऋद्धि-सिद्धि प्रेरित करके माया में गिराती है।* जो इसमें फँस गया, वह ऊपर नहीं उठ सकता। इसी को कबीर साहब ने कहा - *गंग जमुन के रेत पर, माली बाग लगाया हो। कच्ची कली इक तोड़िकै, मलिया पछिताया हो।।* गंग-जमुन = इंगला-पिंगला है, बाग लगाना = सुरत जमाना है और कच्ची कली तोड़नी = कुछ अभ्यास करके जो अपरिपक्व बल हुआ उसको खर्च कर देना है। तुरीयावस्था के आरंभ से ही कच्ची कली है। *ध्यान से ऊर्ध्वगति होती है।* किसी भी पदार्थ को चाहे वह कठिन हो, तरल हो, वाष्पीय हो, उसको समेटने से ऊर्ध्वगति होती है। मन ईथर से भी सूक्ष्म है। जो जितना सूक्ष्म होता है, सिमटाव होने पर उसकी उतनी ही विशेष ऊर्ध्वगति होती है। तुरीयावस्था में आधा मंजिल कोई पार कर जाय यानी त्रिकुटी में पहुँच जाय, त्रिकुटी उसको कहते हैं, जहाँ से प्रकृति के तीनों गुणों का कार्य आरंभ होता है। यह अन्दर की है, बाहर के भौओं के बीच की त्रिकुटी नहीं। यहाँ जो पहुँचता है, वह बहुत पवित्र होता है। जब साम्यावस्था-धारिणी मूल प्रकृति को पार करता है, वह बिल्कुल पवित्र हो जाता है। यहाँ ‘अहं ब्रह्मास्मि' रहता है। यह तुरीयावस्था है। पहले ही मंजिल में यदि कोई कुछ करके दिखलाने लगे, कुछ लेने लगे तो उसकी ऊर्ध्वगति कहाँ से हो सकती है। इसलिए भगवान बुद्ध ने अपने शिष्य को फटकारा था। कहानी है कि किसी आदमी को सोने का एक कटोरा मिला। उसने उस कटोरे को, एक बाँस गाड़कर उसकी फुनगी पर बाँध दिया और कहा कि जो कोई अपना हाथ बढ़ाकर उस कटोरे को ले लेगा, वह कटोरा उसी का हो जाएगा। उस रास्ते से भगवान बुद्ध के एक शिष्य जा रहे थे, उनको यह बात मालूम हुई। उन्होंने अपने योगबल से हाथ बढ़ाकर उस कटोरे को ले लिया। जब यह बात भगवान बुद्ध को मालूम हुई तो उन्होंने अपने शिष्य को बहुत फटकारा और उस कटोरे को चूर-चूर कर फेंक दिया। ऐसी ही बातें तुलसी साहब के लिए भी है कि उनके शिष्य गिरधारी साहब ने किसी कारणवश लोगों पर अपनी सिद्धि-शक्ति का प्रयोग किया था और जब तुलसी साहब को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने अपने शिष्य गिरधारी साहब को बहुत फटकारा और कहा – *साधु-संत दूसरों की रक्षा करने के लिए होते हैं कि सिर फोड़ने के लिए! आज से तुम कभी मेरे सामने मत आओ।* तब से वे जीवन-पर्यन्त उनके सामने नहीं गए। यह इसलिए कि तुम अहंकार में नहीं फँसो। बाहर-बाहर चलने में, जो पदार्थ मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता। इसलिए अपने अंदर चलो। अंदर में चलने से सिमटाव होगा, सिमटाव से ऊर्ध्वगति होगी। किंतु बिना विचारे तो संसार ही महारमणीय मालूम होता है। *अनविचार रमणीय महा संसार भयंकर भारी।* ध्यानाभ्यास में साधक तुरीयावस्था के आरंभ में ऋद्धि-सिद्धि में फँसता है। संत लोग इससे हटाते हैं। उसको अंदर में मदद मिलती है। दृष्टि स्थिर होने पर ब्रह्मज्योति देखने में आती है। 'देखे आँखी कोनो मते फिरे ना।' वह परमात्मा के तरह-तरह के प्रकाशों को पाता है-देखता है। गीता में है कि भगवान ने अर्जुन को विराट रूप दिखलाया, उसमें इतना प्रकाश था कि करोड़ों सूर्य का प्रकाश उसका मुकाबला नहीं कर सकता था। उस प्रकाश को उस रूप से हटा दीजिए तो क्या सुन्दरता रह जाती है? बिना तेज के रूप सुन्दर नहीं दिखता। *जिमि बिनु तेज न रूप गोसाईं।* असल तेज ही वह पदार्थ है जो अपनी ओर वा रूप की ओर आकर्षित करता है। सभी जीवित चेहरे में प्रकाश रहता है, मृतक शरीर के चेहरे में वह सौन्दर्य नहीं रहता। ब्रह्मतेज ही तेज है, किंतु बहुत लुभानेवाला है, यह अवलम्ब मिलता है। जिसको यह अवलम्ब मिलता है, वह उधर ही टन (खींच) जाता है, इधर नहीं आता है। दूसरा अवलम्ब शब्द का होता है। सृष्टि का स्थल या सूक्ष्म कोई भी मण्डल हो, बिना शब्द के नहीं है। वहाँ के शब्द को सुननेवाला वही होता है, जिसकी दृष्टि प्रकाश में पहुँच गई है, जहाँ जाओ कि सुन सको। वहाँ तक पहुँचने के लिए दृष्टियोग चाहिए। शब्द का सहारा इतना उत्तम है कि कहा नहीं जाता। शोक से मुरझाया हुआ आदमी है तो उसको ऐसे-ऐसे शब्द सुनाए जाये, जिससे वह मुरझाया हुआ नहीं रहे, वह प्रसन्‍न हो जाय। *शब्द में चार गुण हैं। ऊपर का शब्द नीचे दूर तक जाता है, नीचे का शब्द ऊपर दूर तक नहीं जाता है, अपने उद्गम स्थान पर खींचता है और अपने स्थान के गुण को लिए रहता है - उस शब्द को जो कोई सुनता है, वह गुण उसमें हो जाता है।* सिनेमा-नाटक आदि देखते हैं तो उसमें शोक का दृश्य देखने से शोकित और हर्ष के दृश्य को देखकर हर्षित होते हैं। आप जिस शब्द को पकड़ना चाहें, उसे पकड़िए, उसके केन्द्र पर पहुँचिएगा। जिस-जिस शब्द को पकड़ा जाएगा, वह-वह शब्द अपने केन्द्र में केन्द्रित करावेगा। *सच्चिदानन्द पद मण्डल के केन्द्र से जो शब्द आता है, वही रामनाम, ओम, आदिनाम है। उस शब्द से जो खींचा जाएगा, वह परधाम में पहुँचेगा। जिस विषय को विशेष सुनिए उस ओर आकर्षण होगा।* कौरव लोगों ने चाहा कि पांचो भाई पाण्डवों को किसी तरह अपने राज्य से बाहर करना चाहिए। कौरवों ने विचारा कि उनलोगों को काशी भजा जाय। किंतु स्पष्ट रूप में उनलोगों से यह बात करने में सभी सकुचाते थे। अंत में कौरवों ने अपने में यह परामर्श किया कि पाण्डव जब सभा में आवें, तब उनके सामने काशी की विशेषताओं का वर्णन करना चाहिए। सुनते-सुनते उन लोगों की इच्छा उस ओर झुकेगी और तब वे लोग स्वयं काशी चले जाएँगे। बात ऐसी ही हुई। वे पाँचो भाई जब-जब सभा में आते, कौरव गण तब-तब काशी की ही चर्चा करने लगते। फलतः काशी की विशेष चर्चा सुनते-सुनते अंत में युधिष्ठिर का मन उस ओर झुका ओर वे पाँचो भाई काशी चले गए। *जिस विषय को आप बहुत सुनिए, उधर मन फिर जाएगा। इसलिए हमारे बाबा साहब सत्संग करने के लिए बहुत प्रेरणा देते थे। भजन करते समय सब भूल जाइए। पवित्र मन रखकर ध्यान कीजिए। विषयी इस ओर बढ़ नहीं सकता।* उपनिषद्‌ में भी कहा है, जो पाप कर्मों से निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त असमाहित या अशांत है, वह इसे आत्मज्ञान द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता है। *ना विरतो दुश्चरितान्नाशान्तो ना समाहितः। ना शान्त मानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्‌।। - कठोपनिषद्‌* गुरु नानकदेवजी ने कहा है - *सूचै भाड़ै साँचु समावै विरले सूचाचारी। तंतै कउ परम तंतु मिलाइआ नानक सरणि तुमारी।। ऐसी सेवकु सेवा करै, जिसका जिउ तिसु आगे धरै।।* यह भागवत की नवधा भक्ति में का ‘आत्मनिवेदनम्‌’ है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण आदि शरीरों से अपने को टपाकर रखो तभी आत्मनिवेदनम्‌ होगा। *शरीर से किसी के सामने साष्टांग गिरना यथार्थ में आत्मनिवेदनम्‌ नहीं है। जिसको सत्संग से भी प्रेम है, वह पशु योनि में नहीं जाएगा।* दृश्य-सृष्टि का आरंभ विन्दु से होता है। पहले विन्दु, फिर सब दृश्यों की रचना। दृश्य-जगत के शिखर पर तब चढ़ोगे, जब विन्दु ध्यान करोगे। यह विन्दु दृश्य जगत का बीज है और नाद अरूप-अदृश्य जगत का मूल बीज है। कम्पन और शब्द दोनों संग-संग रहते हैं। कम्पन से या शब्द से जिससे कहिए उससे सृष्टि हुई। यह शब्द ईश्वर का है। इसलिए बाइबिल में लिखा है कि *आदि में शब्द था और शब्द ईश्वर के संग था ...।* संतलोग भी शब्द से सृष्टि का होना मानते हैं। नाद ध्यान से अदृश्य सृष्टि के शिखर पर पहुँचते हैं और परमात्मा को प्राप्त करते हैं। यही विन्दु और नाद ध्यान की महिमा है। यह प्रवचन पूर्णियाँ जिला के श्रीसंतमत सत्संग मंदिर सिकलीगढ़ धरहरा में दिनांक 27.11.1955 ई० को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.128 : साम्यावस्थाधारिणी मूल प्रकृति* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 128)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! मैं चाहता हूँ कि *ईश्वर-स्वरूप का ठीक-ठीक निर्णय संतों की वाणी के अनुसार हो जाय।* फिर आपके बोध में आवे कि उसकी भक्ति कैसे की जाय? जबतक स्वरूप समझ में नहीं आवे, तबतक उसकी भक्ति कैसी की जाय, बोध में नहीं आता। फिर *उसके लिए संयम करना चाहिए।* जिससे उस भक्ति मार्ग पर ठीक-ठीक चला जाय। *इन्हीं सब आवश्यक बातों का बोध करने और कराने के लिए सत्संग है।* आपको रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द का प्रत्यक्ष ज्ञान है। इन बाहर के पदार्थों के अतिरिक्त और कोई कुछ प्रत्यक्ष रूप में जानते हैं, ऐसा नहीं। लोग इन्हीं को जानते हैं और इन्हें जानने के लिए सबको पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। *आँख से रूप, कान से शब्द, जिभ्या से रस, नासिका से गंध और त्वचा से स्पर्श जानते हैं।* ये सब कैसे हैं, सो सोचिए। जो कुछ भी आप देखते हैं, सभी एक तरह से रह जाय, हो नहीं सकता। रूप एक तरह रहे, शब्द एक तरह रहे, हो नहीं सकता। शब्द के लिए लोग कहते हैं कि यह अनाश है। सुनने के समय शब्द सुनते हैं, उसके बाद उस शब्द को नहीं सुन सकते। लोग विचार में ही जानते कि पहले के भी शब्द आकाश के गर्भ में हैं। परंतु इसका प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है। जब इसको प्रत्यक्ष कर ले तब उसको नित्य समझेंगे। प्रत्यक्ष नहीं रहने पर भी विचार में ऐसा ज्ञान है तो यह आज के ख्याल में अयोग्य नहीं है। *शब्द ऐसा नहीं है कि वह पानी में सड़ जाय या आग में जल जाय।* जब आप कहते हैं कि शब्द आकाश का गुण है, तो जहाँ गुणी है वहाँ गुण रहे, यह असंभव नहीं है। आप स्थूल इन्द्रियों के द्वारा स्थूल यंत्रों से स्थूल आकाश के शब्द सुनते हैं। जल, बर्फ और वाष्प स्थूल है। बर्फ कठिन होने से कठिन, उसका जल होने से तरल और फिर वाष्प होने से वाष्परूप होता है। किंतु फिर भी स्थूल है। क्योंकि स्थूल इन्द्रियों से इसका ज्ञान होता है। सृष्टि का विकास एक ही बार में ऐसा हो गया, सो नहीं। इसका पूर्व रूप सूक्ष्म था और है। उसके बाद स्थूल है। पहले सूक्ष्म मण्डल है, जिससे स्थूल मण्डल बना। इस तरह *जो बना सो कभी-न-कभी बिगड़ेगा, यह असंभव बात नहीं।* ऐसी चीज को देखते हैं, जो थोड़े समय में बदल जाती है। कोई ऐसी चीज भी है जो जल्दी नहीं बिगड़ती। तो इसके लिए भी आप विचारते हैं कि यह कभी-न-कभी बदल जाएगा। स्थूलाकाश का विकास सूक्ष्माकाश से हुआ है। यह स्थूलाकाश बदलकर सूक्ष्माकाश में रहेगा और यह भी नहीं रहेगा। सांख्य ज्ञान और संतों के विचार के अनुकूल जानने में आता है कि सृष्टि बनने के लिए एक महान तत्त्व है, जिसको प्रकृति कहते हैं। *सृष्टि में उपज, ठहराव और विनाश है।* जिसके परिवर्तित-विकृत स्थूल में इन तीनों के काम होते देखे जाते हैं, उसके मूल में ये तीनों नहीं हों, सम्भव नहीं। *उत्पन्न करने की शक्ति को रजोगुण, पालन करने की शक्ति को सतोगुण और विनाश करने की शक्ति को तमोगुण कहते हैं।* ये तीनों गुण सृष्टि के मूल मशाले - प्रकृति में ही हैं। अथवा यों भी कह सकते हैं कि ये तीनों गुण ही साम्य रूप में प्रकृति कहलाते हैं अथवा यों भी कह सकते हैं कि *त्रैगुण के सम्मिश्रण रूप को साम्यावस्थाधारिणी मूल प्रकृति कहते हैं।* किसी गुण का उत्कर्ष और किसी का अपकर्ष होता है, तब सृष्टि होती है। *उस प्रकृति से बुद्धि, बुद्धि से अहंकार, अहंकार से सेन्द्रिय, और निरेन्द्रिय दो प्रकार की सृष्टि हुई है। सेन्द्रिय में पहले मन बना ओर निरेन्द्रिय में पहले आकाश बना है।* अब जानिए कि आकाश कितना नीचे है। पहले विचार द्वारा किसी वस्तु का सिद्धान्त स्थिर होता है, फिर प्रयोग द्वारा उसको प्रत्यक्ष किया जाता है। बिना दार्शनिक विचार के बोध नहीं हो सकता कि जिस स्थूलाकाश में हम हैं, यह आकाश का अपर रूप है, पूर्व रूप नहीं है। यह स्थूलाकाश सूक्ष्माकाश में लय हो जाएगा। इस प्रकार *जब स्थूलाकाश का नाश होगा, तब उसका शब्द भी नहीं रहेगा। इसलिए इस स्थूलाकाश का शब्द सत्य नहीं हो सकता।* मुँह से शब्द निकलता है, वचनवर्द्धक यंत्र उस शब्द को दूर तक फेला देता है। यंत्र नहीं रहे तो दूर-दूर तक उस शब्द को नहीं सुन पाते। इसलिए शब्द नहीं है, यह कोई बात नहीं। इस तरह वह कायल कर देते हैं कि तब शब्द नित्य कैसे नहीं हो सकता? मैं कहता हूँ कि *जिस स्थूलाकाश का गुण शब्द है, उस स्थूलाकाश के लय होने पर स्थूल शब्द कैसे रह सकता है? इसलिए यह शब्द नाशवान है।* विनाश दो प्रकार के हैं। एक केवल बदल जाय, परंतु अत्यन्ताभाव नहीं हो। जैसे आपका शरीर बदलता है। बचपन से अभी तक है, बदला है, किंतु अत्यन्ताभाव इसका नहीं हुआ है। शरीर के मरने और जलाए जाने पर भी इसका अत्यन्ताभाव नहीं होता, किसी-न-किसी रूप में इसके भौतिक तत्त्व रहते ही हैं इसलिए उसका रहना हुआ। *बदलते रहने के कारण असत्‌ कहा गया।* जैसे लोकमान्य बालगंगाधर तिलकजी ने कहा है कि – ‘कोई झूठ बोलता है, दूसरा कहता है कि वह झूठा है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह आदमी है ही नहीं। है, किंतु वह अपना वचन बदलता रहता है, इसलिए वह झूठा है।‘ समर्थ रामदास की दासबोध नाम्नी पुस्तक में है कि सौ वर्ष केवल धूप-ही-धूप होगी। यह भूमण्डल जलकर चूना हो जाएगा। सौ वर्ष तक मूसलाधार जल की वर्षा होगी। जैसे इन्द्र ने ब्रज पर जल वर्षा की थी, उससे भी विशेष मूसलाधार वर्षा होगी। इस प्रकार वह चूना गलकर पानी हो जाएगा। तब सौ वर्ष तक केवल प्रचण्ड हवा चलेगी, तब सब पानी कण-कण होकर पवन स्थिर अग्नि में लय हो जाएगा। अग्नि हवा में लय हो जाएगी, हवा आकाश में लय हो जाएगी, आकाश अहंकार में, अहंकार महतत्त्व में अर्थात्‌ बुद्धि में, बुद्धि प्रकृति में लय हो जाएगी और प्रकृति ईश्वर में लय हो जाएगी। क्या अन्तिम के लय-स्थान के बाद अतिरिक्त और पदार्थों को आप ईश्वर मानते हैं? ये सभी नाशवान पदार्थ हैं। परमात्मा भी यदि नाशवान हो तो उसकी भक्ति करके क्‍या लाभ? *सभी धर्म के लोग परमात्मा को अनाश मानते हैं।* गुरु नानक का वचन है - *अलख अपार अगम अगोचरि, ना तिसु काल न करमा।।* जो काल की मर्यादा से बाहर है, उसका नाश कैसे हो सकता है? केनोपनिषद्‌ में लिखा है कि - *यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनोमतम्‌। तदेव ब्रह्मत्वं विद्धिनेदं यदिदमुपासते।।* अर्थात्‌ जो मन से मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है, उसी को तू ब्रह्म जान। जिस इस (देशकालाविच्छिन्न वस्तु) की लोग उपासना करता है, वह ब्रह्म नहीं है। यहाँ ‘इस’ शब्द बहुत महत्त्व का है। 'इस' नजदीक की चीज को कहते हैं और 'उस‘ दूर की चीज को कहते हैं। ‘इस' इन्द्रिय-गोचर पदार्थ को कहा गया है। जहाँ आप सशरीर हों, वहाँ इन्द्रिय-गोचर पदार्थ नहीं हो कैसे संभव है? *इन्द्रिय-गोचर पदार्थ परमात्मा नहीं हो सकता।* इन्द्रियों के ज्ञान में वह आ नहीं सकता। श्वेतकेतु एक मुनि-पुत्र था। उन्होंने उपने पिता से ब्रह्म-स्वरूप की जिज्ञासा की। मुनि ने श्वेतकेतु से कहा कि तुम वट वृक्ष से एक फल ले आओ। आज्ञा पाकर मुनि पुत्र ने तुरंत एक फल ले आया। पिता ने कहा कि फल को टुकड़ा करो। श्वेतकेतु ने उसका टुकड़ा किया। पिता ने पूछा - इसमें क्‍या है? पुत्र ने कहा - इसमें छोटे-छोटे कई दाने हैं। पिता ने कहा - एक दाने को लेकर उसे भी तोड़ डालो और देखो कि क्‍या है? श्वेतकेतु ने उसे तोड़ा और कहा कि इसमें दो दालें हैं। पिता ने पुनः पूछा उन दोनों दालों के बीच में क्‍या है? पुत्र ने कहा - दोनों दालों के बीच में कुछ नहीं है। पिता ने कहा - यदि दोनों दालों के बीच में कुछ नहीं है तो वृक्ष कैसे हुआ? बीच में कुछ अवश्य है, वह अव्यक्त है। जिससे वृक्ष हुआ वह इन्द्रियों के ज्ञान में नहीं है। *इन्द्रियों का राजा मन है। मन पर बुद्धि का शासन है। इसलिए बुद्धि तक इन्द्रियाँ मानते हैं। मन संकल्प-विकल्प करता है। बुद्धि उसको कहते है जिसमें विवेचना-शक्ति है। अहंकार उसको कहते हैं, जिसमें अपनेपन का ज्ञान हो। चित्त उसको कहते हैं, जिसमें हिलाने-डुलाने की शक्ति हो।* इसके हिलाए बिना मन संकल्प-विकल्प नहीं कर सकता है, बुद्धि विचार नहीं कर सकती और अहंकार का ‘मैं हूँ’ ज्ञान नहीं हो सकता। *चित्त इन तीनों को हिलाता है। इन इन्द्रियों से परमात्मा को नहीं पहचान सकते।* इन्द्रियों के बाद कुछ और भी इस शरीर में है कि नहीं? तुम तो इसी शरीर में हो तुम क्‍या लूले-लगड़े हो? तुम इन्द्रियों से परतत्त्व हो। मन, बिना इन्द्रियों के कुछ काम नहीं कर सकता है। बिना कान के मन बाहर में कुछ सुन नहीं सकता। बिना आँख के मन बाहर में कुछ देख नहीं सकता। किंतु तुम अपने को अपने से देख सकते हो और अपने से ही परमात्मा को भी देख सकते हो, जैसे समूचे शरीर को आँख से और आँख को फिर आँख से देखते हो। दादू दयाल जी का शब्द है - *दादू जानै न कोई, संतन की गति गोई।।टेक।। अविगत अंत अंत अंतर पट, अगम अगाध अगोई। सुन्नी सुन्न सुन्न के पारा, अगुन सगुन नहिं दोई।। अंड न पिंड खंड ब्रह्मण्डा, सूरत सिंध समोई। निराकार आकार न जोति, पूरन ब्रह्म न होई।। इनके पार सार सोइ पइहैं, तन मन गति पति खोई। दादू दीन लीन चरणन चित, मैं उनकी सरणोई।।* संतों की चाल छिपी हुई होती है। वह कहाँ तक जाते हैं, किस होकर जाते हैं? *वह अविगत तक जाते हैं। उसतक जाने का मार्ग अपने अंदर में है। उसपर चलते हुए सभी पर्दों को पार करते हैं।* गोस्वामी तुलसीदासजी के वचन में है। *मायाबस मति मन्द अभागी। हृदय जवनिका बहु विधि लागी।। ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अज्ञान राम पर धरहीं।। काम क्रोध मद लोभरत, गृहासक्त दुख रूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहिं, मूढ़ पड़े तम कूप।।* उपर्युक्त दादू दयालजी के शब्द में तीन शून्य बताए गए है – *सुन्नी सुन्न सुन्न के पारा।* इसी को हमारे गुरु महाराज बाबा देवी साहब कहते थे - *अंधकार का शून्य, प्रकाश का शून्य और केवल शब्द का शून्य। स्थूल अंधकारमय शून्य, सूक्ष्म प्रकाशमय शून्य और कारण-महाकारण केवल शब्दमय शून्य।* कतिपय विद्वान कारण और महाकारण नहीं कहकर केवल कारण वा प्रकृति कहते हैं। प्रकृति कोई छोटी चीज नहीं है। इसका मण्डल बहुत बड़ा है। किंतु बहुत बड़ा मण्डल होने पर भी इसको अनन्त नहीं कह सकते। कुम्भकार पृथ्वी को कोड़ते (खोदते) हैं,फिर भी पृथ्वी मौजूद है। जहाँ-जहाँ पृथ्वी कोड़ते हैं, वहाँ-वहाँ पृथ्वी कँपती है। जितनी मिट्टी से बर्तन बनाते हैं, उतनी मिट्टी उस बर्तन का कारण है। सभी कारणों को मिला दीजिए तो महाकारण है। *जहाँ से सृष्टि होती है, वह प्रकृति का विकृति अंश है। ऐसी विकृतियाँ प्रकृति में अनेक हैं।* अन्धकार, प्रकाश और शब्द इन तीनों शून्यों के पार में जो है, उसको निर्गुण वा सगुण कुछ भी नहीं कह सकते। यहाँ गुण का अर्थ त्रैगुण से है और गुण का अर्थ विशेषता और प्रशंसा भी होता है। गुण सहित नहीं, तो त्रैगुण नहीं - निर्गुण। परंतु जब निर्गुण भी नहीं, तब वह क्या है? यह बोध में आना बहुत कठिन होता है। परा प्रकृति चेतन और अपरा प्रकृति जड़ हैं ये ही श्रीमद्भगवद्गीता के अक्षर पुरुष और क्षर पुरुष हैं। परंतु *पुरुषोत्तम को इन दोनों से श्रेष्ठ बतलाया गया है।* विचारने पर गीतोक्त ज्ञानानुकूल ही संतों की वाणियों में भी सगुण-निर्गुण, क्षर-अक्षर के परे परमात्म-स्वरूप का ज्ञान जानने में आता है। ऐसे भी विद्वान हैं, जो कहते हैं कि परमात्मा त्रैगुण रहित, पर दिव्यगुण सहित हैं। तो निस्त्रैगुण्य होने के गुण से उसे युक्त करने पर वह दिव्य गुणधारी सगुण होता है, किंतु केवल त्रैगुण-रहित होने के कारण वह निर्गुण भी है। गोस्वामी तुलसीदासजी की विनय-पत्रिका का शब्द है - *अचर चर रूप हरि सर्वगत सर्वदा, वसत इति वासना धूप दीजै।* और संत कबीर साहब के वचन में है - *है सबमें सब ही तें न्यारा। जीव जन्तु जल थल सबहीं में शब्द वियापत बोलनहारा।।* वह सब चर-अचर रूपों में अंश रूप है जैसे महदाकाश और मठाकाश। *उमा राम विषयक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा।। जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहेहु कुविचारी।। - गोस्वामी तुलसीदास* सूर्य इतना बड़ा है कि वह धरती से कई हजार गुना बड़ा है। आकाश में जो बादल है, उसने सूर्य को ढक लिया, ऐसा कहना अज्ञानता है। उस बादल ने आपकी दृष्टि को ढक लिया है न कि सूर्य को ढक लिया है। जिस तरह बादल सम्पूर्ण सूर्य को नहीं ढक सकता, वैसे ही *माया परमात्मा को ढक नहीं सकती। परमात्मा सब जगह है, सबमें है, जिसको आप पवित्र-से-पवित्र और घृणित-से-घृणित मानते हैं।* आकाश में कहीं धुआँ, कहीं धूली उड़ रही है और कहीं अंधकार-ही-अंधकार है। किंतु सबमें होते हुए आकाश धुआँ, धुल और अंधकार से परे भी है। आकाश का वह रूप, जो उसका निज रूप है; अंधकार, धुआँ और स्थूल को पार करो, फिर देखोगे। आकाश पर अंधकार, धुआँ और धूल कुछ सट (चिपक) नहीं सकती। तीनों रहने पर भी वह निर्मल-ही-निर्मल रहता है। इसी तरह *परमात्मा सबमें रहने पर भी पवित्र और निर्लेप रहता है।* सबमें रहते हुए एक मण्डल में अंश रूप से रहता है। अंश का अर्थ टुकड़ा नहीं, अभिन्न अंश। इस तरह से ईश्वर सबमें रहता हुआ सबसे न्यारा, सबसे निर्लेप है। आत्मगम्य है, इन्द्रियगम्य नहीं। इन्द्रियगम्य में व्यापक है। इन्द्रियगम्य पदार्थ के भीतर वह छिपा है जिसे आप इन्द्रियों से नहीं जान सकते। जबतक उस पदार्थ के भीतर की पहचान नहीं हो तबतक परमात्मा का दर्शन कैसे हुआ? *सगुण में हम कितनाहु प्रेम करें, किंतु वह स्थिर नहीं रह सकता। कभी-न-कभी नाश होगा ही।* जो अजर, अमर, अविनाशी है, वह ध्रुव है, निश्चल है, वह कहीं से टसमस नहीं हो सकता। जो अनादि-अनंत है, वह अपरिमित शक्तियुक्त है, उसमें क्‍या गुण है, मेरी परिमित बुद्धि उसका गुण वर्णन नहीं कर सकती। *निरुपम न उपमा आन राम समान राम निगम कहै। जिमि कोटि सत खद्योत सम रवि कहत अति लघुता लहै।। एहि भाँति निज निज मति विलास मुनीस हरिहिं बखानहीं। प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सचु पावहीं।। - गोस्वामी तुलसीदासजी* इसका पूरा-पूरा वर्णन कौन कर सकता है, वह अवर्णनीय है। यह प्रवचन पुर्णियाँ जिला के श्रीसंतमत सत्संग मंदिर सिकलीगढ़ धरहरा में दिनांक 26.11.1955 ई० को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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