AARYAM
AARYAM Sep 12, 2017

ENVIRONMENT PROTECTION FROM HINDU'S PHILOSOPHY EXPLAINED BY AARYAM

*"आर्यम-सूत्र"*

*"Environment Protection From Hindi's Philosophy!"*

*"संरक्षण; हिन्दू दर्शन का आधार!
आज पूरा विश्व!यू एन ओ! और दुनियां की तमाम संस्थाएं प्रकृति-पर्यावरण-प्रकृति संरक्षण के बारे में बात करती हैं लेकिन हमारे उपनिषदों में, हमारे वेदों में, हमारे धार्मिक ग्रंथों में सदियों पहले प्रकृति के संरक्षण का तत्व, प्रकृति संरक्षण का उद्देश्य व उसकी देशना समाहित है। हमारा संबुद्ध समाज सदैव इस बात को मानता रहा है कि- यदि प्रकृति संतुलित होगी तो सबकुछ संतुलित होगा, यही तो शांति मंत्र उल्लेखित भी है-
*"ओउम द्ध्यो शान्तिः अंतरिक्षगम शान्तिः पृथ्वी शान्तिः रापः शान्तिः औषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः।
वनस्पति, औषधि प्रकृति के इन सभी अवलंबन की बात हो रही है, अंतरिक्ष गम शान्तिः यानि सर्वत्र पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु,आकाश इन सभी में शांति होगी तो हमारे जीवन में भी संतुलन उत्पन्न होता है। मानव शरीर की संरचना ही प्रकृति से हुई है इसलिए प्रकृति का हमारे जीवन में अहम योगदान है। हम सभी प्रकृति का ही प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि हमारा शरीर जिन पंच-तत्वों से बना है वह सभी प्रकृति के मूल तत्व हैं- जल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश, वायु के मिलन से ही हम बने हैं और मृत्युउपरांत हमारा शरीर पुनः इन्ही पंच तत्त्वों में समाहित हो जाता है। हमें प्रकृति का संरक्षण करना चाहिए। जो प्रकृति हमारे भौगोलिक वातावरण में हमारे जीवन के साथ जुड़ी हुई है उस प्रकृति का हमें पालन करना चाहिए साथ ही उस प्रकृति का भी जो हमारे व्यवहार में अंतर्निहित है, हमारी स्वभावगत प्रकृति ही हमारे जीवन की ऊर्जा का संतुलन रखती है। हम जिस प्रकृति से बने हैं! हमारी जो आत्मदृष्टि है!हमारा जो आत्मावलोकन है! हमारी जो आंतरिक यात्रा है अर्थात हम अपने जीवन के बारे में क्या सोचते-विचारते हैं, कैसी हमारी प्रकृति है? जैसे कभी हम कहते हैं ना- कि यह बात आपको शोभा नही देती!ये विचार उस पर अच्छा नही लगता! ये बात तुम्हारे मुंह से अच्छी नही लगती! आदि सभी मनुष्य की प्रकृति से जुड़ी बात ही है जो मनुष्य का स्वभाव, गुण, अभिवृतियाँ हैं वह मानव की आंतरिक प्रकृति का द्योतक है।
मनुष्य के जीवन में बहुत बार ऐसे अवसर आते हैं जब प्रलोभन के चलते, भय के चलते, लाभ के चलते, लोभ के चलते, किसी प्रलाप व विलाप के चलते, किसी संताप के चलते मनुष्य की प्रकृति की परीक्षा होती है तब उसे ऐसे समय में भी अपनी प्रकृति संतुलित रखनी चाहिए। जब हम अपने आप में स्थिर हो कर स्वभाव में रहते हैं तो जीवन के सुखद परिणाम प्राप्त करते हैं। ना किसी के प्रभाव में जियो न ही किसी प्रकार के आभाव में जियो! जीना है तो स्वयं के स्वभाव में जियो। जब मनुष्य अपने स्वभाव में प्रकृति के साथ लयबद्ध हो कर जीता है तो उसके जीवन से रोग, राग, ऋण और सभी प्रकार की आग-अग्नि सब तिरोहित हो जाती हैं। तत्पश्चात जब उस मनुष्य के कदम जहां पड़ते हैं वहाँ सुख-समृद्धि-शांति-आनंद-प्रेम सभी सद्गुणों का अम्बार होता है और तब मनुष्य कहलाता है- अमृतस्य पुत्रः! अमृत के पुत्र! परमात्मा के वंशज!परमात्मा के पुत्र...और यही हमारे जीवन का अंतिम पायदान है अंतिम निष्पत्ति है वही हमारी यात्रा का अंतिम गंतव्य भी है।

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Aryan Phulwani Aug 5, 2020

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Aryan Phulwani Aug 4, 2020

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🪔🪔🪔🪔🪔 *दीप प्रज्वलन मंत्र...* दीपज्योति: परब्रह्म: दीपज्योति: जनार्दन:। दीपोहरतिमे पापं संध्यादीपं नामोस्तुते।। शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखं सम्पदां। शत्रुवृद्धि विनाशं च दीपज्योति: नमोस्तुति।। *मंत्र का अर्थ :* दीपक की ज्योति ही ब्रह्मा व परमेश्वर है। पाप का नाश करने वाली दीपक की ज्योति को मेरा नमस्कार। कल्याण करने वाले शत्रु के भय को खत्म करने और घर में सुख समृद्धि का वास करने वाली ज्योति को मेरा प्रणाम। 🔥🔥🔥🔥🔥 *मंत्रोच्चारण कर दीपक जलाने के लाभ :* मंत्रोच्चारण कर दीपक जलाने के कई लाभ है जिसमें से कुछ हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं जो इस प्रकार हैं - 👉दीपक से अंधकार का नाश होता ही है, साथ ही घर में उपस्थित नकारात्मक शक्ति का भी अंत होता है 👉घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार 👉घर में रहने वाले लोगों की बुद्धि में अच्छे विचार जन्म लेते हैं 👉घर में सुख समृद्धि का वास होता है *देश के प्रधानमंत्री ने जनता से की अपील...* *आओ मिल के दीप जलाएँ...* 👉 बुधवार 👉 5 अगस्त 2020 👉 संध्याकालीन 7बजे 👉 आओ मिल के दीप जलाएँ... 🌹🌷🚩 जय श्री राम जय हनुमान🌹🌷🚩 जय हिंद जय भारत वंदे मातरम🌹🌷🚩🌹 मैं दीप अवश्य जलाऊँगा एक दीप आशा का एक विश्वास का एक ज्ञान का एक प्रकाश का एक तम में उजाले का एक भूखे के निवाले का , एक बेसहारे के सहारे का एक डूबते के किनारे का | एक जन-जन की वाणी का , एक मानव की नादानी का | स्नेह मानवता का लाऊँगा, हाँ ! मैं दीया अवश्य जलाऊँगा| 🌹🌷🚩 जय श्री राम जय हनुमान🌹🌷🚩 जय हिंद जय भारत वंदे मातरम्🌹🌷🚩🌹 दीप जलाकर दें सखे,राष्ट्र भक्ति संदेश। जीवन का उजियार ये,जीवन का उपदेश।। 🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔 👉सामान्य दूरी बनाए रखें.... ************************************************* *जानिए क्‍यों खास है पांच अगस्‍त को अयोध्‍या में शिलान्‍यास* 🌾🍁🏯👏👏👏👏👏🏯🍁🌾 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 *अयोध्‍या में भगवान श्रीराम मंदिर के शिलान्यास की तिथि निश्चित हो चुकी है। यह स्वर्णिम दिवस है भाद्रपद कृष्ण द्वितीया संवत 2077, तदनुसार पांच अगस्त सन 2020। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कर कमलों द्वारा यह ऐतिहासिक शिलान्यास मध्यान्ह 12:15 बजे अभिजित मुहूर्त में होगा। *लेकिन पूरे देश के मन में एक ही सवाल उठ रहा है कि पांच अगस्‍त को ही मुहूर्त क्‍यों हो रहा है। इसके पीछे क्‍या कारण है और यदि इस दिन मुहूर्त होता है तो देश को इसका क्‍या लाभ मिलने वाला है ? *इसका विश्‍लेषण किया है। जानिए पांच अगस्‍त को शिलान्‍यास क्‍यों खास है और इसका क्‍या लाभ मिलने जा रहा है। ज्‍योतिषीय दृष्‍टिकोण से यह मुहूर्त बहुत ही शुभ है। -चर संज्ञक लग्न तुला है जो पर्यटन की दृष्‍टि से अति उत्‍तम है। -दशम भाव में बुधादित्य योग बन रहा है जो प्रशासनिक एवं इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर की दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। -इस दिन चतुर्थ भाव में स्वराशि के शनि हैं जो पंचमहापुरुष योग बना रहे हैं। यह पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्धता प्रदान करने वाला है। -इस दिन तृतीय भाव में धनु राशि में स्वराशि के गुरु एवं केतु हैं जो विश्व में आध्यात्मिक क्षेत्र में परम प्रसिद्धि योग बना रहे हैं। -बुधवार को शतभिषा नक्षत्र रहेगा जो मित्र एवं मानस योग निर्मित कर रहा है। -इस दिन अभिजित मुहुर्त है जिसे ज्‍योतिष में मौजूद समस्‍त मुहूर्तों में सर्वश्रेष्‍ठ मुहूर्त माना जाता है। -इस दिन मुहूर्त के समय सभी ग्रह स्वराशि या मित्र राशि में दृश्यमान रहेंगे। *ऐसे शुभ एवं उत्तम योगों में रखी गई नींव (शिलान्यास) हजारों वर्षों तक भारतीय संस्कृति एवं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्शों को विश्व में जीवित रखेंगी। *ऐसा शुभ मुहूर्त केवल श्रीराम मंदिर के लिए ही शुभ नहीं है बल्कि जन सामान्य लोगों के लिए भी गृह निर्माण, गृह प्रवेश एवं अन्य शुभ कार्यों के लिए अति उत्तम मुहुर्त है। 'राम राज्य बैठे त्रिलोका। हर्षित भयऊ गयऊ सब सोका।' *रामचरितमानस की इस चौपाई की प्रामाणिकता के आधार पर जब भी भगवान राम से संबंधित जो भी अनुष्ठान एवं निर्माण आरंभ होता है तो राष्ट्र की प्रगति, समृद्धि एवं विकास को गति मिलती है। वैसे भी ऐसे शुभ योग में मन्दिर निर्माण होने से देश की प्रगति से विश्व में यशोगान के योग बन रहे हैं। भारत विश्व का नेतृत्व करने में सक्षम होगा। 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀ *जय श्री सियाराम*🙏🚩🚩 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃 🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾 *अयोध्या मे किसका मंदिर बन रहा है ?* क्या भगवान राम का ? नही, क्यूँकि वे अजन्मा हैं, शाश्वत हैं, परमात्म स्वरूप हैं, ब्रह्म हैं, सारा जगत ही उनका मंदिर है, वे सब जगह विराजमान हैं, चन्द्र तारों में सूर्य में पृथ्वी जल आकाश अंतरिक्ष मनुष्य पशु प्राणियों फूल पत्तियों और जगत के कण कण में हैं, सम्पूर्ण अयोध्या और वहाँ के अन्य मंदिरों में तो वे हैं हीं, इसलिए उन्हें मंदिर की जरूरत नही है। क्या राजा रामचन्द्र जी का ? नही राजा राम चन्द्र जी का नहीं क्यूँकि पृथ्वी पर कई राजा आये और गए, बड़े बड़े सम्राट आये और गए, सब अपने आलीशान आलीशान महलों किलों इमारतों को यहीं छोड़के चले गए जिनके कुछ अवशेष अभी भी खंडहरों के रूप में मौजूद हैं या फिर जमीनों के अंदर दफन हैं। अब उन पर सरकारों का कब्जा है और वे पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं हैं। क्या भाजपा के जय श्री राम का ? नही क्यूँकि इस मंदिर के लिए पिछले 500 सालों से अब तक लाखों लोगों ने लड़ाइयां लड़ी हैं और अपनी जानें गंवाई है, आज भी विश्वभर में करोड़ों करोड़ों गैर राजनीतिक हिंदू भी इस मंदिर को बनाने के लिए अपना अपना योगदान दे रहे हैं। और इसका बन जाने का पूर्ण हृदय से इंतजार कर रहे हैं जिसका सपना वो कई वर्षों से देखते आ रहे हैं। तो फिर ये मंदिर बन किसका रहा है ? यह मंदिर बन रहा है हिंदू अस्मिता का जिसे सैकड़ो वर्षों से रौंदा जा रहा था, हिंदू आत्म सम्मान का जिसे लगातार ठेस पहुंचाई जा रही थी, उदार हिंदुओं की गरिमा और गौरव का जिसे आतताइयों ने बेरहमी से कुचला था कभी। *यह मंदिर हिंदू पुनर्जागरण का प्रतीक है, हिंदू पुनरुत्थान की उद्घोषणा है।* हिंदू आत्म विश्वास के पुनः उठ खड़े होने का सूचक है । प्राचीन अस्त हिंदू सभ्यता के उदय होने का शंखनाद है । लाखों हिंदू -सिक्ख -जैन - बौद्ध बलिदानियों के लिए श्रद्धांजलि है ये मंदिर। ये मंदिर उन परमपिता परमेश्वर श्री राम का मंदिर है जो प्रत्येक हिंदू के हृदय में इस श्रद्धा विश्वास के रूप में विधमान थे कि एक दिन उनका भी दिन आएगा और वे पुनः अपनी खोई हुई शक्ति दर्प और स्वाभिमान को वापस प्राप्त कर लेंगे। सभी श्री राम भक्त हिंदुओं से अपील है कि वे भूमि पूजन के दिन अपने अपने घरों में रामायण का पाठ करें, धूप अगरबत्ती व दिए जलाएं, शंखनाद करें, घंटियाँ बजाएं, कीर्तन भजन करें ढोलक मृदंग चिमटा खड़ताल डमरू इत्यादि जो कुछ भी जिसके पास हो वह बजाएं। पूरी दुनियां को संदेश जाना चाहिए कि हिंदू जाग गए हैं, हिंदुओं के एक नए युग का श्री गणेश हुआ है भारत में। *राम राज बैठे त्रैलोका,* *हर्षित भये गए सब शोका* *बयरु न कर काहू सम कोई,* *राम प्रताप विषमता खोई।* *जय जय श्री सीताराम* 🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩 "!!अत्यंत ज्ञानवर्धक!!" 🌾🍁🏯👏👏👏👏👏🏯🍁🌾 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 तुलसी दास जी ने जब राम चरित मानस की रचना की,तब उनसे किसी ने पूंछा कि बाबा! आप ने इसका नाम रामायण क्यों नहीं रखा? क्योकि इसका नाम रामायण ही है.बस आगे पीछे नाम लगा देते है, वाल्मीकि रामायण,आध्यात्मिक रामायण.आपने राम चरित मानस ही क्यों नाम रखा? बाबा ने कहा - क्योकि रामायण और राम चरित मानस में एक बहुत बड़ा अंतर है.रामायण का अर्थ है राम का मंदिर, राम का घर,जब हम मंदिर जाते है तो एक समय पर जाना होता है, मंदिर जाने के लिए नहाना पडता है,जब मंदिर जाते है तो खाली हाथ नहीं जाते कुछ फूल,फल साथ लेकर जाना होता है.मंदिर जाने कि शर्त होती है,मंदिर साफ सुथरा होकर जाया जाता है. और मानस अर्थात सरोवर, सरोवर में ऐसी कोई शर्त नहीं होती,समय की पाबंधी नहीं होती,जाती का भेद नहीं होता कि केवल हिंदू ही सरोवर में स्नान कर सकता है,कोई भी हो ,कैसा भी हो? और व्यक्ति जब मैला होता है, गन्दा होता है तभी सरोवर में स्नान करने जाता है.माँ की गोद में कभी भी कैसे भी बैठा जा सकता है. रामचरितमानस की चौपाइयों में ऐसी क्षमता है कि इन चौपाइयों के जप से ही मनुष्य बड़े-से-बड़े संकट में भी मुक्त हो जाता है। इन मंत्रो का जीवन में प्रयोग अवश्य करे प्रभु श्रीराम आप के जीवन को सुखमय बना देगे। 1. *रक्षा के लिए* मामभिरक्षक रघुकुल नायक | घृत वर चाप रुचिर कर सायक || 2. *विपत्ति दूर करने के लिए* राजिव नयन धरे धनु सायक | भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक || 3. *सहायता के लिए* मोरे हित हरि सम नहि कोऊ | एहि अवसर सहाय सोई होऊ || 4. *सब काम बनाने के लिए* वंदौ बाल रुप सोई रामू | सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू || 5. *वश मे करने के लिए* सुमिर पवन सुत पावन नामू | अपने वश कर राखे राम || 6. *संकट से बचने के लिए* दीन दयालु विरद संभारी | हरहु नाथ मम संकट भारी || 7. *विघ्न विनाश के लिए* सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही | राम सुकृपा बिलोकहि जेहि || 8. *रोग विनाश के लिए* राम कृपा नाशहि सव रोगा | जो यहि भाँति बनहि संयोगा || 9. *ज्वार ताप दूर करने के लिए* दैहिक दैविक भोतिक तापा | राम राज्य नहि काहुहि व्यापा || 10. *दुःख नाश के लिए* राम भक्ति मणि उस बस जाके | दुःख लवलेस न सपनेहु ताके || 11. *खोई चीज पाने के लिए* गई बहोरि गरीब नेवाजू | सरल सबल साहिब रघुराजू || 12. *अनुराग बढाने के लिए* सीता राम चरण रत मोरे | अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे || 13. *घर मे सुख लाने के लिए* जै सकाम नर सुनहि जे गावहि | सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं || 14. *सुधार करने के लिए* मोहि सुधारहि सोई सब भाँती | जासु कृपा नहि कृपा अघाती || 15. *विद्या पाने के लिए* गुरू गृह पढन गए रघुराई | अल्प काल विधा सब आई || 16. *सरस्वती निवास के लिए* जेहि पर कृपा करहि जन जानी | कवि उर अजिर नचावहि बानी || 17. *निर्मल बुद्धि के लिए* ताके युग पदं कमल मनाऊँ | जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ || 18. *मोह नाश के लिए* होय विवेक मोह भ्रम भागा | तब रघुनाथ चरण अनुरागा || 19. *प्रेम बढाने के लिए* सब नर करहिं परस्पर प्रीती | चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती || 20. *प्रीति बढाने के लिए* बैर न कर काह सन कोई | जासन बैर प्रीति कर सोई || 21. *सुख प्रप्ति के लिए* अनुजन संयुत भोजन करही | देखि सकल जननी सुख भरहीं || 22. *भाई का प्रेम पाने के लिए* सेवाहि सानुकूल सब भाई | राम चरण रति अति अधिकाई || 23. *बैर दूर करने के लिए* बैर न कर काहू सन कोई | राम प्रताप विषमता खोई || 24. *मेल कराने के लिए* गरल सुधा रिपु करही मिलाई | गोपद सिंधु अनल सितलाई || 25. *शत्रु नाश के लिए* जाके सुमिरन ते रिपु नासा | नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा || 26. *रोजगार पाने के लिए* विश्व भरण पोषण करि जोई | ताकर नाम भरत अस होई || 27. *इच्छा पूरी करने के लिए* राम सदा सेवक रूचि राखी | वेद पुराण साधु सुर साखी || 28. *पाप विनाश के लिए* पापी जाकर नाम सुमिरहीं | अति अपार भव भवसागर तरहीं || 29. *अल्प मृत्यु न होने के लिए* अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा | सब सुन्दर सब निरूज शरीरा || 30. *दरिद्रता दूर के लिए* नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना | नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना || 31. *प्रभु दर्शन पाने के लिए* अतिशय प्रीति देख रघुवीरा | प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा || 32. *शोक दूर करने के लिए* नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी | आए जन्म फल होहिं विशोकी || 33. *क्षमा माँगने के लिए* अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता | क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता || इसलिए जो शुद्ध हो चुके है वे रामायण में चले जाए और जो शुद्ध होना चाहते है वे राम चरित मानस में आ जाए.राम कथा जीवन के दोष मिटाती है *"रामचरित मानस एहिनामा, सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा"* राम चरित मानस तुलसीदास जी ने जब किताब पर ये शब्द लिखे तो आड़े (horizontal) में रामचरितमानस ऐसा नहीं लिखा, खड़े में लिखा (vertical) रामचरित मानस। किसी ने गोस्वामी जी से पूंछा आपने खड़े में क्यों लिखा तो गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस राम दर्शन की ,राम मिलन की सीढी है ,जिस प्रकार हम घर में कलर कराते है तो एक लकड़ी की सीढी लगाते है, जिसे हमारे यहाँ नसेनी कहते है,जिसमे डंडे लगे होते है,गोस्वामी जी कहते है रामचरित मानस भी राम मिलन की सीढी है जिसके प्रथम डंडे पर पैर रखते ही श्रीराम चन्द्र जी के दर्शन होने लगते है,अर्थात यदि कोई बाल काण्ड ही पढ़ ले, तो उसे राम जी का दर्शन हो जायेगा। *सत्य है शिव है सुन्दर है* 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀ 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃 🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾

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Shakti Aug 5, 2020

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मंत्र जाप में अशुद्ध उच्चारण का प्रभाव 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 कई बार मानव अपने जीवन में आ रहे दुःख ओर संकटो से मुक्ति पाने के लिये किसी विशेष मन्त्र का जाप करता है.. लेकिन मन्त्र का बिल्कुल शुद्ध उच्चारण करना एक आम व्यक्ति के लिये संभव नहीं है । कई लोग कहा करते है.. कि देवता भक्त का भाव देखते है . वो शुद्धि अशुद्धि पर ध्यान नही देते है.. उनका कहना भी सही है, इस संबंध में एक प्रमाण भी है... "" मूर्खो वदति विष्णाय, ज्ञानी वदति विष्णवे । द्वयोरेव संमं पुण्यं, भावग्राही जनार्दनः ।। भावार्थ:-- मूर्ख व्यक्ति "" ऊँ विष्णाय नमः"" बोलेगा... ज्ञानी व्यक्ति "" ऊँ विष्णवे नमः"" बोलेगा.. फिर भी इन दोनों का पुण्य समान है.. क्यों कि भगवान केवल भावों को ग्रहण करने वाले है... जब कोइ भक्त भगवान को निष्काम भाव से, बिना किसी स्वार्थ के याद करता है.. तब भगवान भक्त कि क्रिया ओर मन्त्र कि शुद्धि अशुद्धि के ऊपर ध्यान नही देते है.. वो केवल भक्त का भाव देखते है... लेकिन जब कोइ व्यक्ति किसी विशेष मनोरथ को पूर्ण करने के लिये किसी मन्त्र का जाप या स्तोत्र का पाठ करता है.. तब संबंधित देवता उस व्यक्ति कि छोटी से छोटी क्रिया ओर अशुद्ध उच्चारण पर ध्यान देते है... जेसा वो जाप या पाठ करता है वेसा ही उसको फल प्राप्त होता है...। एक बार एक व्यक्ति कि पत्नी बीमार थी । वो व्यक्ति पंडित जी के पास गया ओर पत्नी कि बीमारी कि समस्या बताई । पंडित जी ने उस व्यक्ति को एक मन्त्र जप करने के लिये दिया । मन्त्र:- ""भार्यां रक्षतु भैरवी"" अर्थात हे भैरवी माँ मेरी पत्नी कि रक्षा करो । वो व्यक्ति मन्त्र लेकर घर आ गया । ओर पंडित जी के बताये मुहुर्त में जाप करने बेठ गया.. जब वो जाप करने लगा तो "" रक्षतु"" कि जगह "" भक्षतु"" जाप करने लगा । वो सही मन्त्र को भूल गया । "" भार्यां भक्षतु भैरवी"" अर्थात हे भैरवी माँ मेरी पत्नी को खा जाओ । "" भक्षण"" का अर्थ खा जाना है । अभी उसे जाप करते हुये कुछ ही समय बीता था कि बच्चो ने आकर रोते हुये बताया.. पिताजी माँ मर गई है । उस व्यक्ति को दुःख हुआ.. साथ ही पण्डित जी पर क्रोध भी आया.. कि ये केसा मन्त्र दिया है... कुछ दिन बाद वो व्यक्ति पण्डित जी से जाकर मिला ओर कहा आपके दिये हुये मन्त्र को में जप ही रहा था कि थोडी देर बाद मेरी पत्नी मर गई... पण्डित जी ने कहा.. आप मन्त्र बोलकर बताओ.. केसे जाप किया आपने... वो व्यक्ति बोला:-- "" भार्यां भक्षतु भैरवी"" पण्डित जी बोले:-- तुम्हारी पत्नी मरेगी नही तो ओर क्या होगा.. एक तो पहले ही वह मरणासन्न स्थिति में थी.. ओर रही सही कसर तुमने " रक्षतु" कि जगह "" भक्षतु!" जप करके पूरी कर दी.. भक्षतु का अर्थ है !" खा जाओ... "" ओर दोष मुझे दे रहे हो... उस व्यक्ति को अपनी गलति का अहसास हुआ.. तथा उसने पण्डित जी से क्षमा माँगी । इस लेख का सार यही है कि जब भी आप किसी मन्त्र का विशेष मनोरथ पूर्ण करने के लिये जप करे तब क्रिया ओर मन्त्र शुद्धि पर अवश्य ध्यान दे.. अशुद्ध पढने पर मन्त्र का अनर्थ हो जायेगा.. ओर मन्त्र का अनर्थ होने पर आपके जीवन में भी अनर्थ होने कि संभावना बन जायेगी । अगर किसी मन्त्र का शुद्ध उच्चारण आपसे नहीं हो रहा है.. तो बेहतर यही रहेगा.. कि आप उस मन्त्र से छेडछाड नहीं करे । और यदि किसी विशेष मंत्र का क्या कर रहे हैं तो योग्य और समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में ही करें और मंत्र के अर्थ को अच्छी तरह से समझ लेना के बाद ही उसका प्रयोग भाव विभोर होकर करें। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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*क्या आप भी कल दिपक प्रज्वलित करेंगे....?? *अगर हां तो जय श्री राम का उदघोष हो जाये...🚩🙏 *जय श्री राम जी...मेरी तैयारी तो हो गई...🙏🙏 👇👇👇👇🙏🙏🙏🚩🚩🚩👇👇👇👇 *जय श्री राम जी...🙏🚩🙏 *5-08-2020 को अयोध्या मैं प्रभु श्री राम का *घर बनने जा रहा है ईट लगाने नहीं जा सकते *लेकिन पाँच घी के दिपक तो अपने घर मैं *प्रज्वलित कर सकते है जय श्री राम जी..🙏🚩 🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩 *भगवान राम के संबंध में 12 रोचक तथ्‍य, आप भी जानिए इस रहस्य को.... 'राम' यह शब्द दिखने में जितना सुंदर है उससे कहीं महत्वपूर्ण है इसका उच्चारण। राम कहने मात्र से शरीर और मन में अलग ही तरह की प्रतिक्रिया होती है जो हमें आत्मिक शांति देती है। हिन्दू धर्म के चार आधार स्तंभों में से एक है प्रभु श्रीराम। भगवान श्री राम ने एक आदर्श चरित्र प्रस्तुत कर समाज को एक सूत्र में बांधा था। भारत की आत्मा है प्रभु श्रीराम। आओ जानते हैं उनके बारे में 12 रोचक तथ्‍य। 1.राम का जन्म- भगवान राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। शोधानुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। चैत्र मास की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। उपरोक्त जन्म का समय राम की वंशपरंपरा और उनकी पीढ़ियों से भी सिद्ध होता है। अयोध्या के इतिहास और अयोध्या की वंशावली से भी यह सिद्ध होता है। 2.राम पर लिखे ग्रंथ- प्रभु श्रीराम पर वैसे को कई ग्रंथ लिखे गए लेकिन वाल्मीकि कृत रामायण ही प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है। यह मूल संस्कृत में लिखा गया ग्रंथ है। तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण आदि भारतीय भाषाओं में प्राचीनकाल में ही रामायण लिखी गई। मुगलकाल में गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधि भाषा में रामचरित मानस लिखी जो की हिन्दीभाषा और उससे जुड़े राज्यों में प्रचलित है। विदेशी में कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), मलयेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रचलीत है। इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहां की भाषा में रामायण लिखी गई है। 3.गौतम बुद्ध के पूर्वज राम- वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे। उनमें से एक इक्ष्वाकु के कुल में रघु हुए। रघु के कल में राम हुए। राम के पुत्र कुश हुए कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए जो महाभारत के काल में कौरवों की ओर से लड़े थे। शल्य की 25वीं पीढ़ी में सिद्धार्थ हुए जो शाक्य पुत्र शुद्धोधन के बेटे थे। इन्हीं का नाम आगे चलकर गौतम बुद्ध हुआ। यह नेपाल के लुम्बिनी में रहते थे। सिद्धार्थ के बाद राहुल, प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। जयपूर राजघरा की महारानी पद्मिनी और उनके परिवार के लोग की राम के पुत्र कुश के वंशज है। महारानी पद्मिनी ने एक अंग्रेजी चैनल को दिए में कहा था कि उनके पति भवानी सिंह कुश के 309वें वंशज थे। 4.वनवासी और आदिवासियों के पूज्जनीय प्रभु श्रीराम- भगवान राम को 14 वर्ष को वनवास हुए था। उनमें से 12 वर्ष उन्होंने जंगल में रहकर ही काटे। 12वें वर्ष की समाप्त के दौरान सीता का हरण हो गया तो बाद के 2 वर्ष उन्होंने सीता को ढूंढने, वानर सेना का गठन करने और रावण से युद्ध करने में गुजारे। 14 वर्ष के दौरान उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किए जिसके चलते आज भी हमारे देश और देश के बाहर राम संस्कृति और धर्म को देखा जा सकता है। प्रभु श्रीराम ने वन में बहुत ही सादगीभरा तपस्वी का जीवन जिया। वे जहां भी जाते थे तो 3 लोगों के रहने के लिए एक झोपड़ी बनाते थे। वहीं भूमि पर सोते, रोज कंद-मूल लाकर खाते और प्रतिदिन साधना करते थे। उनके तन पर खुद के ही बनाए हुए वस्त्र होते थे। धनुष और बाण से वे जंगलों में राक्षसों और हिंसक पशुओं से सभी की रक्षा करते थे। इस दौरान उन्होंने देश के सभी संतों के आश्रमों को बर्बर लोगों के आतंक से बचाया। अत्रि को राक्षसों से मुक्ति दिलाने के बाद प्रभु श्रीराम दंडकारण्य क्षेत्र में चले गए, जहां आदिवासियों की बहुलता थी। यहां के आदिवासियों को बाणासुर के अत्याचार से मुक्त कराने के बाद प्रभु श्रीराम 10 वर्षों तक आदिवासियों के बीच ही रहे। उन्होंने वनवासी और आदिवासियों के अलावा निषाद, वानर, मतंग और रीछ समाज के लोगों को भी धर्म, कर्म और वेदों की शिक्षा दी। वन में रहकर उन्होंने वनवासी और आदिवासियों को धनुष एवं बाण बनाना सिखाया, तन पर कपड़े पहनना सिखाया, गुफाओं का उपयोग रहने के लिए कैसे करें, ये बताया और धर्म के मार्ग पर चलकर अपने री‍ति-रिवाज कैसे संपन्न करें, यह भी बताया। उन्होंने आदिवासियों के बीच परिवार की धारणा का भी विकास किया और एक-दूसरे का सम्मान करना भी सिखाया। उन्हीं के कारण हमारे देश में आदिवासियों के कबीले नहीं, समुदाय होते हैं। उन्हीं के कारण ही देशभर के आदिवासियों के रीति-रिवाजों में समानता पाई जाती है। भगवान श्रीराम ने ही सर्वप्रथम भारत की सभी जातियों और संप्रदायों को एक सूत्र में बांधने का कार्य अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान किया था। एक भारत का निर्माण कर उन्होंने सभी भारतीयों के साथ मिलकर अखंड भारत की स्थापना की थी। भारतीय राज्य तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, केरल, कर्नाटक सहित नेपाल, लाओस, कंपूचिया, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमात्रा और थाईलैंड आदि देशों की लोक-संस्कृति व ग्रंथों में आज भी राम इसीलिए जिंदा हैं। 5.शिवलिंग और सेतु बनवाया- 14 वर्ष के वनवास में से अंतिम 2 वर्ष प्रभु श्रीराम दंडकारण्य के वन से निकलकर सीता माता की खोज में देश के अन्य जंगलों में भ्रमण करने लगे और वहां उनका सामना देश की अन्य कई जातियों और वनवासियों से हुआ। उन्होंने कई जातियों को इकट्ठा करके एक सेना का गठन किया और वे लंकी ओर चल पड़े। श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया। महाकाव्‍य 'रामायण' के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है। इसके बाद प्रभु श्रीराम ने नल और नील के माध्यम से विश्व का पहला सेतु बनवाया था और वह भी समुद्र के ऊपर। आज उसे रामसेतु कहते हैं ज‍बकि राम ने इस सेतु का नाम नल सेतु रखा था। 6.रामायण के सबूत- जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। इन स्थानों में से प्रमुख के नाम है- सरयू और तमसा नदी के पास के स्थान, प्रयागराज के पास श्रृंगवेरपुर तीर्थ, सिंगरौर में गंगा पार कुरई गांव, प्रायागराज, चित्रकूट (मप्र), सतना (मप्र), दंडकारण्य के कई स्थान, पंचवटी नासिक, सर्वतीर्थ, पर्णशाला, तुंगभद्रा, शबरी का आश्रम, ऋष्यमूक पर्वत, कोडीकरई, रामेश्‍वरम, धनुषकोडी, रामसेतु और नुवारा एलिया पर्वत श्रृंखला। 7.रामायण के प्रमाण- श्रीवाल्मीकि ने रामायण की संरचना श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद वर्ष 5075 ईपू के आसपास की होगी (1/4/1- 2)। श्रुति-स्मृति की प्रथा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिचलित रहने के बाद वर्ष 1000 ईपू के आसपास इसको लिखित रूप दिया गया होगा। इस निष्कर्ष के बहुत से प्रमाण मिलते हैं। रामायण की कहानी के संदर्भ निम्नलिखित रूप में उपलब्ध हैं- कौटिल्य का अर्थशास्त्र (चौथी शताब्दी ईपू), बौ‍द्ध साहित्य में दशरथ जातक (तीसरी शताब्दी ईपू), कौशाम्बी में खुदाई में मिलीं टेराकोटा (पक्की मिट्‍टी) की मूर्तियां (दूसरी शताब्दी ईपू), नागार्जुनकोंडा (आंध्रप्रदेश) में खुदाई में मिले स्टोन पैनल (तीसरी शताब्दी), नचार खेड़ा (हरियाणा) में मिले टेराकोटा पैनल (चौथी शताब्दी), श्रीलंका के प्रसिद्ध कवि कुमार दास की काव्य रचना 'जानकी हरण' (सातवीं शताब्दी), आदि। 8.ऐसा था राम का काल- राम के काल में नदी में नाव और पोत चलते थे। इसी काल में कुछ लोगों के पास विमान भी होते थे जिसमें 4 से 6 लोग बैठकर यात्रा कर सकते थे। रामायण के अनुसार रावण के पास वायुयानों के साथ ही कई समुद्र जलपोत भी थे। रामायण काल में शतरंज खेला जाता था। इस खेल का आविष्कार लंका के राजा रावण की रानी मंदोदरी ने किया था। तब इसे चतुरंग कहा जाता था। यह भी कहा जाता है कि राम के काल में पतंग भी उड़ाई जाती थी। राम-रावण युद्ध केवल धनुष-बाण और गदा-भाला जैसे अस्‍त्रों तक सीमित नहीं था। कहते हैं कि युद्ध के दौरान राम सेना पर सद्धासुर ने ऐसा विकट अस्‍त्र छोड़ा जिससे सुवेल पर्वत की चोटी को सागर में गिराते हुए सीधे दक्षिण भारत के गिरि को भी समुद्र में गिरा दिया था। सद्धासुर का अंत करने के लिए बिजली के आविष्कारक मुनि अगस्‍त्‍य ने सद्धासुर के ऊपर ब्रह्मास्‍त्र छुड़वाया था जिससे सद्धासुर और अनेक सैनिक तो मारे ही गए, लंका के शिव मंदिर भी विस्‍फोट के साथ ढहकर समुद्र में गिर गए थे। इसी तरह उस काल में दूरबीन भी होता था। राम को अग्‍निवेश ने एक विशिष्‍ट कांच दिया था, जो संभवत: दूरबीन था। इसी दूरबीन से राम ने लंका के द्वार पर लगे 'दारूपंच अस्‍त्र' को देखा और प्रक्षेपास्‍त्र छोड़कर नष्‍ट कर दिया था। राम और रावण की सेनाओं के पास भुशुंडियां (बंदूकें) थीं। कुछ सैनिकों के पास स्‍वचालित भुशुंडियां भी थीं। गस्‍त्‍य ने राम के हितार्थ शंकर से 'अजगव धनुष' मांगा था। इस धनुष की व्‍याख्‍या करते हुए श्री शाही 'लंकेश्‍वर' में लिखते हैं- 'चाप' अभी बंदूक के घोड़े (ट्रिगर) के लिए उपयोग में लाया जाता है। चाप ट्रिगर का ही पर्यायवाची होकर अजगव धनुष है। पिनाक धनुष में ये सब अनेक पहियों वाली गाड़ी पर रखे रहते थे। तब चाप चढ़ाने अथवा घोड़ा (ट्रिगर) दबाने से भंयकर विस्‍फोट करते हुए शत्रुओं का विनाश करते थे। इसके अलावा दूरभाष की तरह उस युग में 'दूर नियंत्रण यंत्र' था जिसे 'मधुमक्‍खी' कहा जाता था। वि‍भीषण को लंका से निष्काषित कर दिया था, तब वह लंका से प्रयाण करते समय मधुमक्‍खी और दर्पण यंत्रों के अलावा अपने 4 विश्‍वसनीय मंत्री अनल, पनस, संपाती और प्रभाती को भी राम की शरण में ले गया था। राम के काल में सभी लोग बहुत ही नैतिक और सभ्य थे। सभी मर्यादा में रहकर जीवन यापन करते थे। अधिकतर लोगों को वेद का ज्ञान था। 9.रामायण काल के ये लोग आज भी जिंदा हैं- आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रामायण काल के तीन लोग आज भी जिंदा है। इका नाम है हनुमान, जामवंत और विभिषण। इनके काल के पूर्व के दो लोग भी आज तक जिंदा है। उनके नाम हैं- विरोचन पुत्र महाबली और जमदग्नि के पुत्र परशुराम। 10. श्रीराम की बहन- श्रीराम की दो बहनें भी थी एक शांता और दूसरी कुकबी। हम यहां आपको शांता के बारे में बताएंगे। दक्षिण भारत की रामायण के अनुसार श्रीराम की बहन का नाम शांता था, जो चारों भाइयों से बड़ी थीं। शांता राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों बाद कुछ कारणों से राजा दशरथ ने शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को दे दिया था। भगवान श्रीराम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात श्रीराम की मौसी थीं। 11.नहीं किया था राम ने सीता का परित्याग- पहले रामायण 6 कांडों की होती थी, उसमें उत्तरकांड नहीं होता था। फिर बौद्धकाल में उसमें राम और सीता के बारे में सच-झूठ लिखकर उत्तरकांड जोड़ दिया गया। उस काल से ही इस कांड पर विद्वानों ने घोर विरोध जताया था, लेकिन इस उत्तरकांड के चलते ही साहित्यकारों, कवियों और उपन्यासकारों को लिखने के लिए एक नया मसाला मिल गया और इस तरह प्रभु राम का इतिहास धीरे-धीरे मिश्रित होते गए। विपिन किशोर सिन्हा ने एक छोटी शोध पुस्तिका लिखी है जिसका नाम है- 'राम ने सीता-परित्याग कभी किया ही नहीं।' यह किताब संस्कृति शोध एवं प्रकाशन वाराणसी ने प्रकाशित की है। इस किताब में वे सारे तथ्‍य मौजूद हैं, जो यह बताते हैं कि राम ने कभी सीता का परित्याग नहीं किया। रामकथा पर सबसे प्रामाणिक शोध करने वाले फादर कामिल बुल्के का स्पष्ट मत है कि 'वाल्मीकि रामायण का 'उत्तरकांड' मूल रामायण के बहुत बाद की पूर्णत: प्रक्षिप्त रचना है।' (रामकथा उत्पत्ति विकास- हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग प्रयाग विश्वविद्यालय, प्रथम संस्करण 1950) 12.राम की जल समाधि- श्रीराम द्वारा जल समाधि लेने की घटना को हिन्दू दलितों का धर्मान्तरण करने वाले आलोचकों ने आत्महत्या करना बताया। मध्यकाल में ऐसे बहुत से साधु हुए हैं जिन्होंने जिंदा रहते हुए सभी के सामने धीरे-धीरे देह छोड़ दी और फिर उनकी समाधि बनाई गई। राजस्थान के महान संत बाबा रामदेव (रामापीर) ने जिंदा समाधि ले ली थी, तो क्या हम यह कहें कि उन्होंने आत्महत्या कर ली? दरअसल, अयोध्या आगमन के बाद राम ने कई वर्षों तक अयोध्या का राजपाट संभाला और इसके बाद गुरु वशिष्ठ व ब्रह्मा ने उनको संसार से मुक्त हो जाने का आदेश दिया। एक घटना के बाद उन्होंने जल समाधि ले ली थी। सरयू नदी में श्रीराम ने जल समाधि ले ली थी। अश्विन पूर्णिमा के दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अयोध्या से सटे फैजाबाद शहर के सरयू किनारे जल समाधि लेकर महाप्रयाण किया। श्रीराम ने सभी की उपस्थिति में ब्रह्म मुहूर्त में सरयू नदी की ओर प्रयाण किया उनके पीछे थे उनके परिवार के सदस्य भरत, शत्रुघ्न, उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति। ॐ का उच्चारण करते हुए वे सरयू के जल में एक एक पग आगे बढ़ते गए और जल उनके हृदय और अधरों को छूता हुआ सिर के उपर चढ़ गया। 🚩🙏*जय श्री सियाराम*🙏🚩

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नोट...यह पोस्ट गलती से delete हो गई है, कृपया इसे like & Comment न करें। धन्यवाद🙏🙏 अनंत कोटि,अखिल ब्रम्हांडनायक के आशीष एवं समस्त सनातनियों के अथक प्रयास से आज भारतवर्ष गौरवान्वित है .....!!! यह जानकर आप चकित होंगे कि अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान जब हिंदू पक्ष की ओर से विवादित स्थल ही भगवान राम की जन्म स्थली होने के पक्ष में वेदों-पुराणों,रामायण आदि पूज्य धर्मग्रंथों के आधार पर एक के बाद एक प्रमाण प्रस्तुत किए जा रहे थे,तब ५ जजों की संविधान पीठ में शामिल एक जज जस्टिस एसए नजीर ने खिन्न होकर हिंदू पक्ष के वकील से पूछा कि .... आप लोग हर बात में वेदों से ही प्रमाण मांगते हैं,तो क्या वेदों से ही प्रमाण दे सकते हैं कि राम का जन्म अयोध्या में उसी स्थल पर हुआ था ...? इस पर अदालत में उपस्थित प्रज्ञाचक्षु जगद्गुरु रामभद्राचार्यजी ने एक क्षण भी न गंवाते हुए कहा कि जी दें सकता हूँ महोदय ..... इसके बाद उन्होंने वेदों की जैमिनीय संहिता से उद्धरण देना शुरू किया, जिसमें सरयू नदी के स्थान विशेष से दिशा और दूरी का सटीक ब्योरा देते हुए उन्होंने राम जन्मभूमि की स्थिति बताई ........ इसके बाद अदालत के आदेश से जैमिनीय संहिता मंगाई गई और उसमें जगद्गुरु की ओर से निर्दिष्ट पृष्ठ संख्या को खोलकर देखा गया तो उनका दिया गया संपूर्ण विवरण सही पाया गया ... नक्शे का मिलान करने पर जिस स्थान पर राम जन्मभूमि की स्थिति बताई गई, विवादित भूमि उसी स्थान पर पाई गई ...... जगदगुरु के वक्तव्य ने फैसले का रुख हिंदुओं की तरफ मोड़ दिया ....! इस पर प्रश्न पूछने वाले जज ने भी स्वीकार किया कि आज मैंने भारतीय प्रज्ञा का चमत्कार देखा .... एक व्यक्ति जो भौतिक आंखों से रहित है ... कैसे वेदों और शास्त्रों के विशाल वाङ्मय से उद्धरण दिए जा रहा था .... यह ईश्वरीय शक्ति नहीं तो और क्या है .....? एक बात कहूं ....? अब अयोध्या और सरयू युगों का फर्क भूलकर भाव विह्वल हैं ....! क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके पुत्र राम वनवास पूरा करके पांच अगस्त को वापस आ रहे हैं .... राम अपने संसारी अस्तित्व से भी प्राचीन अयोध्या और सरयू को मां ही मानते थे .... दोनों उनकी लौकिक अलौकिक लीला के हर पल की साक्षी हैं ....... उन्होंने त्रेता में राम को वन जाते देखा तो फूट-फूटकर रोईं ...! राम चौदह वर्ष वनवास के बाद लौटे तो दोनों खुशी में रो पड़ीं। आज राम की दोनों माताओं की आंखें फिर खुशी से झर रही हैं। करीब ५०० वर्ष के निर्वासन के बाद अयोध्या में वनवास से लौटे राम के राजतिलक जैसा उल्लास है ...! अयोध्या और सरयू ही क्यों, रामनगरी का कण-कण आनंदमग्न है ...! अयोध्या त्रेता की ही तरह रंगों-चित्रों से सजाई जा रही है। दीवारों पर राम और उनकी लीला के चित्र उकेरे जा रहे हैं। राम संपूर्ण ब्रह्मांड के नियंता हैं। अखिल सृष्टि से स्वामी हैं ...! हर सनातनधर्मी के आराध्य हैं, पर अयोध्या और सरयू का गर्व सबसे अलग है ...! राम उनके पुत्र हैं ...! अयोध्या उनके रामलला स्वरूप की साक्षी हैं तो सरयू अपने घाट पर उनकी जलसमाधि की ....! राम अपने भव्य प्रासाद में करीब ५०० वर्ष बाद फिर विराजेंगे ....! पूरी दुनिया के सनातनर्धिमयों की कई पीढ़ियों के संघर्ष का सुफल साकार होने की घड़ी आ गई तो इंतजार का हर पल सबको उतावला कर रहा है ...! कैसा सुखद संयोग है कि .... रामलला के भव्य मंदिर का सदियों पुराना सपना साकार होने की घड़ी में उत्तर प्रदेश की सियासी कमान भगवाधारी संत योगी आदित्यनाथ के हाथ में है जो खुद राम मंदिर अनुष्ठान के साधक रहे हैं। वह जिस गोरक्ष पीठ के महंत हैं, वह शुरू से राम जन्मभूमि आंदोलन की ध्वजवाहक रही। तत्कालीन गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ राम जन्मभूमि न्यास के संस्थापक अध्यक्ष थे। ऐसे में राम जन्मभूमि से गोरक्षपीठ और योगी आदित्यनाथ का भावनात्मक रिश्ता समझा जा सकता है। मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद से ही योगी को अयोध्या और सरयू की फिक्र रही, पर राम मंदिर निर्माण का मार्ग निष्कंटक होने के बाद अयोध्या में विश्व का भव्यतम मंदिर बनाने का उनका सपना बार-बार व्यक्त हो रहा है। वह मौका मिलते ही अयोध्या पहुंचते हैं और तैयारी को परखते हैं। राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन करने खुद प्रभानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या आ रहे हैं। यह सोने में सुहागा जैसा संयोग है ...! राम मंदिर के लिए भूमि पूजन का उत्सव रामनगरी के मठ-मंदिरों में शुरू हो चुका है। संतों-धर्माचार्यों के मुखमंडल पर प्रिय उपहार पाने जैसी बालसुलभ प्रसन्नता बिखर रही है। रामनगरी ठीक उसी तरह तैयारी कर रही है, जैसे त्रेता में अपने राम के वनवास से लौटने पर की होगी। गृहस्थ अपने घर-दुकानें और साधु-संत अपने मठ-मंदिर चमका रहे हैं। सभी गलियां, चौक स्वच्छ किए जा रहे हैं। धर्मस्थलों की रंगाई-पोताई चल रही है। अयोध्या की दीवारों का रंग-रोगन करके राम की लीला के चित्र उकेरे जा रहे हैं। भूमि पूजन पांच अगस्त को होगा, पर इसका उत्सव कई दिन पहले से। हर कोई अपनी सामर्थ और सुविधा के हिसाब से इस अनुष्ठान में योगदान करने को आतुर है। कोरोना संक्रमण को लेकर बरते जा रहे एहतियात के कारण लोगों को अयोध्या जाने से रोका गया है, पर केंद्र और राज्य सरकार ऐसे इंतजाम करवा रही है ताकि सजीव प्रसारण के जरिये लोग घर बैठे इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बन सकें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो दशकों से राम जन्मभूमि आंदोलन का रणनीतिकार रहा, आर्थिक सहयोग के बहाने दस करोड़ परिवारों को भावनात्मक रूप से राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया से जोड़ने का अभियान चलाएगा। राम मंदिर निर्माण के लिए धन और सोना-चांदी दान करने के संकल्प देश-विदेश में व्यक्त होने लगे हैं। कोई मंदिर के लिए स्वर्ण-शिखर तो कोई इसके हिस्सों को सोने-चांदी से मंडित कराने का इच्छुक है। राम मंदिर निर्माण शुरू होने की घटना सनातन धर्म के वैभवशाली इतिहास का पूज्य-पावन पल है ...! याद आ रहे तपस्वी बलिदानी--राम मंदिर निर्माण शुरू होने की घड़ी में विहिप नेता अशोक सिंहल और रामचंद्रदास परमहंस की कमी सबको खल रही है जिन्होंने दशकों तक राम जन्मभूमि आंदोलन का नेतृत्व किया पर भव्य राम मंदिर का सपना आंखों में बसा,गोलोकधाम चले गए। ये दोनों महारथी राम मंदिर के लिए अपनी निष्ठा,नेतृत्व और तपस्या की वजह से इस आंदोलन का चेहरा बन चुके थे पर उनके जीवनकाल में यह विवाद तमाम प्रयास के बावजूद नहीं निपट सका ....! #जयश्रीराम*🙏🚩

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