AARYAM
AARYAM Sep 12, 2017

ENVIRONMENT PROTECTION FROM HINDU'S PHILOSOPHY EXPLAINED BY AARYAM

*"आर्यम-सूत्र"*

*"Environment Protection From Hindi's Philosophy!"*

*"संरक्षण; हिन्दू दर्शन का आधार!
आज पूरा विश्व!यू एन ओ! और दुनियां की तमाम संस्थाएं प्रकृति-पर्यावरण-प्रकृति संरक्षण के बारे में बात करती हैं लेकिन हमारे उपनिषदों में, हमारे वेदों में, हमारे धार्मिक ग्रंथों में सदियों पहले प्रकृति के संरक्षण का तत्व, प्रकृति संरक्षण का उद्देश्य व उसकी देशना समाहित है। हमारा संबुद्ध समाज सदैव इस बात को मानता रहा है कि- यदि प्रकृति संतुलित होगी तो सबकुछ संतुलित होगा, यही तो शांति मंत्र उल्लेखित भी है-
*"ओउम द्ध्यो शान्तिः अंतरिक्षगम शान्तिः पृथ्वी शान्तिः रापः शान्तिः औषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः।
वनस्पति, औषधि प्रकृति के इन सभी अवलंबन की बात हो रही है, अंतरिक्ष गम शान्तिः यानि सर्वत्र पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु,आकाश इन सभी में शांति होगी तो हमारे जीवन में भी संतुलन उत्पन्न होता है। मानव शरीर की संरचना ही प्रकृति से हुई है इसलिए प्रकृति का हमारे जीवन में अहम योगदान है। हम सभी प्रकृति का ही प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि हमारा शरीर जिन पंच-तत्वों से बना है वह सभी प्रकृति के मूल तत्व हैं- जल, पृथ्वी, अग्नि, आकाश, वायु के मिलन से ही हम बने हैं और मृत्युउपरांत हमारा शरीर पुनः इन्ही पंच तत्त्वों में समाहित हो जाता है। हमें प्रकृति का संरक्षण करना चाहिए। जो प्रकृति हमारे भौगोलिक वातावरण में हमारे जीवन के साथ जुड़ी हुई है उस प्रकृति का हमें पालन करना चाहिए साथ ही उस प्रकृति का भी जो हमारे व्यवहार में अंतर्निहित है, हमारी स्वभावगत प्रकृति ही हमारे जीवन की ऊर्जा का संतुलन रखती है। हम जिस प्रकृति से बने हैं! हमारी जो आत्मदृष्टि है!हमारा जो आत्मावलोकन है! हमारी जो आंतरिक यात्रा है अर्थात हम अपने जीवन के बारे में क्या सोचते-विचारते हैं, कैसी हमारी प्रकृति है? जैसे कभी हम कहते हैं ना- कि यह बात आपको शोभा नही देती!ये विचार उस पर अच्छा नही लगता! ये बात तुम्हारे मुंह से अच्छी नही लगती! आदि सभी मनुष्य की प्रकृति से जुड़ी बात ही है जो मनुष्य का स्वभाव, गुण, अभिवृतियाँ हैं वह मानव की आंतरिक प्रकृति का द्योतक है।
मनुष्य के जीवन में बहुत बार ऐसे अवसर आते हैं जब प्रलोभन के चलते, भय के चलते, लाभ के चलते, लोभ के चलते, किसी प्रलाप व विलाप के चलते, किसी संताप के चलते मनुष्य की प्रकृति की परीक्षा होती है तब उसे ऐसे समय में भी अपनी प्रकृति संतुलित रखनी चाहिए। जब हम अपने आप में स्थिर हो कर स्वभाव में रहते हैं तो जीवन के सुखद परिणाम प्राप्त करते हैं। ना किसी के प्रभाव में जियो न ही किसी प्रकार के आभाव में जियो! जीना है तो स्वयं के स्वभाव में जियो। जब मनुष्य अपने स्वभाव में प्रकृति के साथ लयबद्ध हो कर जीता है तो उसके जीवन से रोग, राग, ऋण और सभी प्रकार की आग-अग्नि सब तिरोहित हो जाती हैं। तत्पश्चात जब उस मनुष्य के कदम जहां पड़ते हैं वहाँ सुख-समृद्धि-शांति-आनंद-प्रेम सभी सद्गुणों का अम्बार होता है और तब मनुष्य कहलाता है- अमृतस्य पुत्रः! अमृत के पुत्र! परमात्मा के वंशज!परमात्मा के पुत्र...और यही हमारे जीवन का अंतिम पायदान है अंतिम निष्पत्ति है वही हमारी यात्रा का अंतिम गंतव्य भी है।

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अगर व्‍यक्ति कई बीमार‍ियों से ग्रसित हो तो उसे सोमवार के दिन भगवान शिव के मंत्रों का श्रद्धानुसार 11, 21, 51 या 108 बार जाप करना चाहिए। ऐसा करना उस व्यक्ति के लिए अत्‍यंत शुभ होगा और सभी प्रक्रार के बंधनों से मुक्त भी कराएगा। कई बार जाने-अनजाने में हम से बहुत सी गलतियां हो जाती है जिसकी सजा हमें किसी ना किसी रूप में भुगतनी पड़ती हैं। ऐसे में सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करके उन कष्टों को कम किया जा सकता है। साथ ही साथ भोलेनाथ की कृपा से सभी रोगों का नाश होता है और सोमवार के दिन भगवान शिव के ‘दारिद्रदहन शिव स्‍तोत्र’ का पाठ करने से आर्थिक लाभ की प्राप्ति होती है। तो चलिए बताते है 5 शिव महामंत्र - भगवान शिव के संकटहारी मंत्र- 1. " ॐ नमः शिवाय " 2. " नमो नीलकण्ठाय " 3. " ॐ पार्वतीपतये नमः " 4. " ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवाय " 5. " ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्त्तये मह्यं मेधा प्रयच्छ स्वाहा " जय श्री भोलेनाथ जय श्री पार्वती माता की 🌹 नमस्कार 🙏 🚩 हर हर महादेव जय श्री महाकाली जय श्री महाकाल जी ॐ नमः शिवाय आपको भगवान श्री भोलेनाथ और पार्वती माता की असिम कृपा सदैव बनी रहे नमस्कार 🙏 शुभ रात्री वंदन 👣 🌹 👏 जय हो 🌹 👏 🚩🎪🌙💜💞🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃

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Anita Sharma May 17, 2021

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Ravindra Singh May 17, 2021

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Ravi Art May 16, 2021

*अपनी मृत्यु...अपनों की मृत्यु डरावनी लगती है। बाकी तो मौत का उत्सव मनाता है मनुष्य, मौत के स्वाद के चटखारे लेता है मनुष्य।* थोड़ा कड़वा लिखा है पर मन का लिखा है...... *मौत से प्यार नहीं, मौत तो हमारा स्वाद है।* बकरे का, पाए का, तीतर का, मुर्गे का, हलाल का, बिना हलाल का, ताजा बच्चे का, भुना हुआ, छोटी मछली, बड़ी मछली, हल्की आंच पर सिका हुआ। न जाने कितने बल्कि अनगिनत स्वाद हैं मौत के। क्योंकि मौत किसी और की, ओर स्वाद हमारा। स्वाद से कारोबार बन गई मौत। मुर्गी पालन, मछली पालन, बकरी पालन, पोल्ट्री फार्म्स। नाम "पालन" और मक़सद "हत्या"। स्लाटर हाउस तक खोल दिये, वो भी ऑफिशियल। गली गली में खुले नाॅन वेज रेस्टॉरेंट मौत का कारोबार नहीं तो और क्या हैं? *मौत से प्यार और उसका कारोबार इसलिए क्योंकि मौत हमारी नहीं है।* जो हमारी तरह बोल नहीं सकते, अभिव्यक्त नही कर सकते, अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ नहीं हैं, उनकी असहायता को हमने अपना बल कैसे मान लिया ? कैसे मान लिया कि उनमें भावनाएं नहीं होतीं ? या उनकी आहें नहीं निकलतीं ? *डाइनिंग टेबल पर हड्डियां नोचते बाप बच्चों को सीख देते है, बेटा कभी किसी का दिल नहीं दुखाना ! किसी की आहें मत लेना ! किसी की आंख में तुम्हारी वजह से आंसू नहीं आना चाहिए !* बच्चों में झुठे संस्कार डालते बाप को, अपने हाथ में वो हड्डी दिखाई नहीं देती, जो इससे पहले एक शरीर थी, जिसके अंदर इससे पहले एक आत्मा थी, उसकी भी एक मां थी ...?? जिसे काटा गया होगा ? जो कराहा होगा ? जो तड़पा होगा ? जिसकी आहें निकली होंगी ? जिसने बद्दुआ भी दी होगी ? कैसे मान लिया कि जब जब धरती पर अत्याचार बढ़ेंगे तो *भगवान सिर्फ तुम इंसानों की रक्षा के लिए अवतार लेंगे ?* क्या मूक जानवर उस परमपिता परमेश्वर की संतान नहीं हैं ? क्या उस इश्वर को उनकी रक्षा की चिंता नहीं है ? आज कोरोना वायरस उन जानवरों के लिए, ईश्वर के अवतार से कम नहीं है। *जब से इस वायरस का कहर बरपा है, जानवर स्वच्छंद घूम रहे है। पक्षी चहचहा रहे हैं।* *उन्हें पहली बार इस धरती पर अपना भी कुछ अधिकार सा नज़र आया है। पेड़ पौधे ऐसे लहलहा रहे हैं, जैसे उन्हें नई जिंदगी मिली हो। धरती को भी जैसे सांस लेना आसान हो गया हो।* सृष्टि के निर्माता द्वारा रचित करोड़ों-करोड़ योनियों में से एक कोरोना ने हमें हमारी ओकात बता दी। घर में घुस के मारा है और मार रहा है। ओर उसका हम सब कुछ नहीं बिगाड़ सकते। अब घंटियां बजा रहे हो, इबादत कर रहे हो, प्रेयर कर रहे हो और भीख मांग रहे हो उससे कि हमें बचा ले। धर्म की आड़ में उस परमपिता के नाम पर अपने स्वाद के लिए कभी ईद पर बकरे काटते हो, कभी दुर्गा मां या भैरव बाबा के सामने बकरे की बली चढ़ाते हो। कहीं तुम अपने स्वाद के लिए मछली का भोग लगाते हो। कभी सोचा.....!!! क्या ईश्वर का स्वाद होता है ? ....क्या है उनका भोजन ? किसे ठग रहे हो ? भगवान को या खुद को ? मंगलवार को नाॅनवेज नहीं खाता ...!!! आज शनिवार है इसलिए नहीं...!!! अभी रोज़े चल रहे हैं ....!!! नवरात्रि में तो सवाल ही नहीं उठता....!!! झूठ पर झूठ.... झूठ पर झूठ.... झूठ पर झूठ...!! फिर कुतर्क सुनो.... फल सब्जियों में भी तो जान होती है !! .....तो सुनो फल सब्जियाँ संसर्ग नहीं करतीं, ना ही वो किसी प्राण को जन्मती हैं। इसीलिए उनका भोजन उचित है। *ईश्वर ने बुद्धि सिर्फ तुम्हें दी। ताकि तमाम योनियों में भटकने के बाद मानव योनि में तुम जन्म-मृत्यु के चक्र से निकलने का रास्ता ढूँढ सको। लेकिन तुमने इस मानव योनि को पाते ही स्वयं को भगवान समझ लिया।* आज कोरोना के रूप में मौत हमारे सामने खड़ी है। *तुम्ही कहते थे कि हम जो प्रकृति को देंगे, वही प्रकृति हमे लौटायेगी। मौते दीं हैं प्रकृति को तो मौतें ही लौट रही हैं।* *बढ़ो...!! आलिंगन करो मौत का....!!!* यह संकेत है ईश्वर का। प्रकृति के साथ रहो। प्रकृति के होकर रहो।* वर्ना..... ईश्वर अपनी ही बनाई कई योनियों को धरती से हमेशा के लिए विलुप्त कर चुके हैं। उन्हें एक क्षण भी नही लगेगा। 🙏 *प्रकृति की ओर चलो* 🙏 🌳🌲🎄jai johar🎄🌲🌳

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G.SHARMA May 16, 2021

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Garima Gahlot Rajput May 17, 2021

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Garima Gahlot Rajput May 15, 2021

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