🌹🙏ॐ लक्ष्मीपतये नमः🙏🌹 श्री हरि विष्णु की कृपा सदैव सपरिवार आप सब पर बनी रहे 🙏प्रातः कालीन स्नेहिल वंदन 🙏

🌹🙏ॐ लक्ष्मीपतये नमः🙏🌹
श्री हरि विष्णु की कृपा सदैव सपरिवार
           आप सब पर बनी रहे
  🙏प्रातः कालीन स्नेहिल वंदन 🙏
🌹🙏ॐ लक्ष्मीपतये नमः🙏🌹
श्री हरि विष्णु की कृपा सदैव सपरिवार
           आप सब पर बनी रहे
  🙏प्रातः कालीन स्नेहिल वंदन 🙏

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कामेंट्स

Ravi Kumar Taneja Jan 22, 2021
🌹🌹🌹माता रानी आपकी समस्त कामनाओं की पूर्ति करें, आपका सदा कल्याण करें...🦚🦢🙏🌿🙏🦢🦚 माता महालक्ष्मी की जय🙏🌸🙏 जय मां अम्बे जय जय माँ जगदम्बे 🙏🌷🙏 आपका दिन मंगलमय हो ।🙏🌿🙏🌿🙏🌿🙏

s.r.pareek rajasthan Jan 22, 2021
@श्रीराधेराधे धन्यवाद जी प्यारी बहना जी सदा खुश रहें जी सुखी रहें जी स्वास्थय का ख्याल रखें जी जय श्री कृष्णा जी सुमधुर सुप्रभात स्नेह नमन् वंदन जी 🙏🏻🙏🏻🍒🍒🌠🍒🍒🌠🍒🍒🍒🌠

saumya sharma Jan 22, 2021
जय माता दी 🙏🙏🙏 सुप्रभात मेरी प्यारी बहन🌞🌹🙏 आपका हर पल मंगलमय हो🙏🙏🙏

shohana sing Jan 22, 2021
जय श्री कृष्ण राधे राधे जी सुप्रभात वंदन जय श्री लक्ष्मी नारायण आपका दिन शुभ हो जय माता दी धैर्य समानुपाती कर्मफल क्रोध व्युत्क्रमानुपाती बल आशीष द्विगुणित मनोबल मातपिता वर्ग हुए सुखपल ओम माधवाय नमः

Manoj Gupta AGRA Jan 22, 2021
jai shree radhe krishna ji 🙏🙏🌷🌸💐🌀 shubh prabhat vandan ji 🙏🙏🌷

GOVIND CHOUHAN Jan 22, 2021
JAI SHREE RADHEY RADHEY JIII 🌺 JAI SHREE RADHEY KRISHNA JII 🌺 SUPRABHAT VANDAN 🌹🌹🙏🙏

🇮🇳Purav🇮🇳 Jan 22, 2021
Nice very nice post Good Morning Redhy Redhy God bless you and your family Have nice Day 🙏

🌻🌹 Preeti Jain 🌹🌻 Jan 22, 2021
jai mata di my lovely sister ji mata rani ka Kirpa sada aap aur aap ke family pe bani rahe aap ka har pal Shubh aur mangalmay Ho shubh dopahar ji 👌👌👌🙏🙏💐🌹🌹🙋‍♀️🙋‍♀️🙋‍♀️🍫🍫

ds.khede Jan 22, 2021
बहुत सही बात ॐ नमो भगवते वाशुदेवाय नमः शुभ दोपहर वन्दन

s.r.pareek rajasthan Jan 22, 2021
@श्रीराधेराधे tnx for beautifull reply good afternoon ji have a great beautifull day my dear sweet sister shree sada khush rahe ji sada muskrati rahe mast rahe ji jay shri krishna ji kese ho ji 🙏🏻🙏🏻🍁🍇🌺🥀🌿💤🍒👌🌻🍎🍎🌸⚘🌲💤💤🌲🌷🌷🌹🌾🌿💤💤💤💤

yogi Mar 1, 2021

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 137 स्कन्ध - 06 अध्याय - 12 इस अध्याय में:- वृत्रासुर का वध श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! वृत्रासुर रणभूमि में अपना शरीर छोड़ना चाहता था, क्योंकि उसके विचार से इन्द्र पर विजय प्राप्त करके स्वर्ग पाने की अपेक्षा मरकर भगवान् को प्राप्त करना श्रेष्ठ था। इसलिये जैसे प्रलयकालीन जल में कैटभासुर भगवान् विष्णु पर चोट करने के लिये दौड़ा था, वैसे ही वह भी त्रिशूल उठाकर इन्द्र पर टूट पड़ा। वीर वृत्रासुर ने प्रलयकालीन अग्नि की लपटों के समान तीखी नोकों वाले त्रिशूल को घुमाकर बड़े वेग से इन्द्र पर चलाया और अत्यन्त क्रोध से सिंहनाद करके बोला- ‘पापी इन्द्र! अब तू बच नहीं सकता’। इन्द्र ने यह देखकर कि वह भयंकर त्रिशूल ग्रह और उल्का के समान चक्कर काटता हुआ आकाश में आ रहा है, किसी प्रकार की अधीरता नहीं प्रकट की और उस त्रिशूल के साथ ही वासुकि नाग के समान वृत्रासुर की विशाल भुजा अपने सौ गाँठों वाले वज्र से काट डाली। एक बाँह कट जाने पर वृत्रासुर को बहुत क्रोध हुआ। उसने वज्रधारी इन्द्र के पास जाकर उनकी ठोड़ी में और गजराज ऐरावत पर परिघ से ऐसा प्रहार किया कि उनके हाथ से वह वज्र गिर पड़ा। वृत्रासुर के इस अत्यन्त अलौकिक कार्य को देखकर देवता, असुर, चारण, सिद्धगण आदि सभी प्रशंसा करने लगे। परन्तु इन्द्र का संकट देखकर वे ही लोग बार-बार ‘हाय-हाय!’ कहकर चिल्लाने लगे। परीक्षित! वह वज्र इन्द्र के हाथ से छूटकर वृत्रासुर के पास ही जा पड़ा था। इसलिये लज्जित होकर इन्द्र ने उसे फिर नहीं उठाया। तब वृत्रासुर ने कहा- ‘इन्द्र! तुम वज्र उठाकर अपने शत्रु को मार डालो। यह विषाद करने का समय नहीं है। (देखो-) सर्वज्ञ, सनातन, आदिपुरुष भगवान् ही जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने में समर्थ हैं। उनके अतिरिक्त देहाभिमानी और युद्ध के लिये उत्सुक आततायियों को सर्वदा जय ही नहीं मिलती। वे कभी जीतते हैं तो कभी हारते हैं। ये सब लोक और लोकपाल जाल में फँसे हुए पक्षियों की भाँति जिसकी अधीनता में विवश होकर चेष्टा करते हैं, वह काल ही सबकी जय-पराजय का कारण है। वही काल मनुष्य के मनोबल, इन्द्रियबल, शरीरबल, प्राण जीवन और मृत्यु के रूप में स्थित है। मनुष्य उसे न जानकर जड़ शरीर को ही जय-पराजय आदि का कारण समझता है। इन्द्र! जैसे काठ की पुतली और यन्त्र का हरिण नचाने वाले के हाथ में होते हैं, वैसे ही तुम समस्त प्राणियों को भगवान् के अधीन समझो। भगवान् के कृपा-प्रसाद के बिना पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-चतुष्टय- ये कोई भी इस विश्व की उत्पत्ति आदि करने में समर्थ नहीं हो सकते। जिसे इस बात का पता नहीं है कि भगवान् ही सबका नियन्त्रण करते हैं, वही इस परतन्त्र जीव को स्वतन्त्र कर्ता-भोक्ता मान बैठता है। वस्तुतः स्वयं भगवान् ही प्राणियों के द्वारा प्राणियों की रचना और उन्हीं के द्वारा उनका संहार करते हैं। जिस प्रकार इच्छा न होने पर भी समय विपरीत होने से मनुष्य को मृत्यु और अपयश आदि प्राप्त होते हैं- वैसे ही समय की अनुकूलता होने पर इच्छा न होने पर भी उसे आयु, लक्ष्मी, यश और ऐश्वर्य आदि भोग भी मिल जाते हैं। इसलिये यश-अपयश, जय-पराजय, सुख-दुःख, जीवन-मरण- इनमें से किसी एक की इच्छा-अनिच्छा न रखकर सभी परिस्थियों में समभाव से रहना चाहिये- हर्ष-शोक के वशीभूत नहीं होना चाहिये। सत्त्व, रज और तम- ये तीनों गुण प्रकृति के हैं, आत्मा के नहीं; अतः जो पुरुष आत्मा को उनका साक्षीमात्र जानता है, वह उनके गुण-दोष से लिप्त नहीं होता। देवराज इन्द्र! मुझे भी तो देखो; तुमने मेरा हाथ और शस्त्र काटकर एक प्रकार से मुझे परास्त कर दिया है, फिर भी मैं तुम्हारे प्राण लेने के लिये यथाशक्ति प्रयत्न कर ही रहा हूँ। यह युद्ध क्या है, एक जुए का खेल। इसमें प्राण की बाजी लगती है, बाणों के पासे डाले जाते हैं और वाहन ही चौसर हैं। इसमें पहले से यह बात नहीं मालूम होती कि कौन जीतेगा कौन हारेगा। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! वृत्रासुर के ये सत्य एवं निष्कपट वचन सुनकर इन्द्र ने उनका आदर किया और अपना वज्र उठा लिया। इसके बाद बिना किसी प्रकार का आश्चर्य किये मुसकराते हुए वे कहने लगे। देवराज इन्द्र ने कहा- अहो दानवराज! सचमुच तुम सिद्ध पुरुष हो। तभी तो तुम्हारा धैर्य, निश्चय और भगवद्भाव इतना विलक्षण है। तुमने समस्त प्राणियों के सुहृद् आत्मस्वरूप जगदीश्वर की अनन्यभाव से भक्ति की है। अवश्य ही तुम लोगों को मोहित करने वाली भगवान् की माया को पार कर गये हो। तभी तो तुम असुरोचित भाव छोड़कर महापुरुष हो गये हो। अवश्य ही यह बड़े आश्चर्य की बात है कि तुम रजोगुणी प्रकृति के हो तो भी विशुद्ध सत्त्वस्वरूप भगवान् वासुदेव में तुम्हारी बुद्धि दृढ़ता से लगी हुई है। जो परमकल्याण के स्वामी भगवान् श्रीहरि के चरणों में प्रेममय भक्तिभाव रखता है, उसे जगत् के भोगों की क्या आवश्यकता है। जो अमृत के समुद्र में विहार कर रहा है, उसे क्षुद्र गड्ढ़ों के जल से प्रयोजन ही क्या हो सकता है। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इस प्रकार योद्धाओं में श्रेष्ठ महापराक्रमी देवराज इन्द्र और वृत्रासुर धर्म का तत्त्व जानने की अभिलाषा से एक-दूसरे के साथ बातचीत करते हुए आपस में युद्ध करने लगे। राजन्! अब शत्रुसूदन वृत्रासुर ने बायें हाथ से फौलाद का बना हुआ एक बहुत भयावना परिघ उठाकर आकाश में घुमाया और उससे इन्द्र पर प्रहार किया। किन्तु देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर का वह परिघ तथा हाथी की सूँड़ के समान लंबी भुजा अपने सौ गाँठों वाले वज्र से एक साथ ही काट गिरायी। जड़ से दोनों भुजाओं के कट जाने पर वृत्रासुर के बायें और दायें कंधों से खून की धारा बहने लगी। उस समय वह ऐसा जान पड़ा, मानो इन्द्र के वज्र की चोट से पंख कट जाने पर कोई पर्वत ही आकाश से गिरा हो। अब पैरों से चलने-फिरने वाले पर्वतराज के समान अत्यन्त दीर्घकाय वृत्रासुर ने अपनी ठोड़ी को धरती से और ऊपर के होठ को स्वर्ग से लगाया तथा आकाश के समन गहरे मुँह, साँप के समान भयावनी जीभ एवं मृत्यु के समान कराल दाढ़ों से मानो त्रिलोकी को निगलता, अपने पैरों की चोट से पृथ्वी को रौंदता और प्रबल वेग से पर्वतों को उलटता-पलटता वह इन्द्र के पास आया और उन्हें उनके वाहन ऐरावत हाथी के सहित इस प्रकार लील गया, जैसे कोई परम पराक्रमी और अत्यन्त बलवान् अजगर हाथी को निगल जाये। प्रजापतियों और महर्षियों के साथ देवताओं ने जब देखा कि वृत्रासुर इन्द्र को निगल गया, तब तो वे अत्यन्त दुःखी हो गये तथा ‘हाय-हाय! बड़ा अनर्थ हो गया।’ यों कहकर विलाप करने लगे। बल दैत्य का संहार करने वाले देवराज इन्द्र ने महापुरुष-विद्या (नारायण कवच) से अपने को सुरक्षित कर रखा था और उनके पास योगमाया का बल था ही। इसलिये वृत्रासुर के निगल लेने पर-उसके पेट में पहुँचकर भी वे मरे नहीं। उन्होंने अपने वज्र से उसकी कोख फाड़ डाली और उसके पेट से निकलकर बड़े वेग से उसका पर्वत-शिखर के समान ऊँचा सिर काट डाला। सूर्यादि ग्रहों की उत्तरायण-दक्षिणायनरूप गति में जितना समय लगता है, उतने दिनों में अर्थात् एक वर्ष में वृत्रवध का योग उपस्थित होने पर घूमते हुए उस तीव्र वेगशाली वज्र ने उसकी गरदन को सब ओर से काटकर भूमि पर गिरा दिया। उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं। महर्षियों के साथ गन्धर्व, सिद्ध आदि वृत्रघाती इन्द्र का पराक्रम सूचित करने वाले मन्त्रों से उनकी स्तुति करके बड़े आनन्द के साथ उन पर पुष्पों की वर्षा करने लगे। शत्रुदमन परीक्षित! उस समय वृत्रासुर के शरीर से उसकी आत्मज्योति बाहर निकली और इन्द्र आदि सब लोगों के देखते-देखते सर्वलोकातीत भगवान् के स्वरूप में लीन हो गयी। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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Dharmendra Mar 1, 2021

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🆚एक समय की बात है कि एक आदमी के पास बहुत कीमती घोड़ा था। उसको प्रतिपल यह चिन्ता लगी रहती थी कि कहीं कोई उस घोड़े को चुरा न ले जाए।* *एक दिन वह ऐसे नौकर की खोज में निकला जो कि रात भर जाग कर घोड़े का पहरा दे सके। रास्ते में उसे एक व्यक्ति मिला जिसने उस आदमी से कहा कि आपके घोड़े की रक्षा के लिए मुझ जैसा उपयुक्त नौकर आपको और कोई नहीं मिल सकता।* *क्योंकि मैं रात भर सोता नहीं हूँ। मुझे सोचने की आदत है। मैं हर समय कुछ न कुछ सोचता ही रहता हूँ। घोड़े का मालिक प्रसन्न हुआ और उस व्यक्ति को अपने घर ले आया। उसने घोड़े को कमरे में बंद कर बाहर से ताला लगा दिया और चाबी नौकर को दे दी।* *रात्रि के 12 बजे मालिक ने सोचा कि कहीं नौकर सो तो नहीं गया। इस बात की पुष्टि कर लेने के लिए वह नौकर के पास पहुंचा और पूछा- "क्या कर रहे हो भाई, सो तो नहीं रहे हो।" नौकर ने कहा कि नहीं, मैं सोया नहीं, मैं तो सोच रहा हूँ। मालिक आश्वस्त हुआ और बोला- "क्या सोच रहे हो?"* *नौकर ने कहा कि मैं यह सोच रहा हूँ कि जब दीवार में कील ठोकी जाती हैं तो जिस स्थान पर कील लगती है वहाँ की मिट्टी कहाँ चली जाती हैं?* *मालिक उसकी मूर्खता पर मुस्कुराया और साथ ही साथ आश्वस्त भी हुआ कि चलो नौकर तो ठीक मिल गया जो सोचता ही रहेगा, सोयेगा नहीं। मालिक ने कहा- ठीक है सोचते रहो। और वह वापस अपने घर में आ गया।* *रात्रि के दूसरे पहर मालिक पुनः उस नौकर के पास यह देखने के लिए पहुंचा कि कहीं वह अब तो नहीं सो गया। परन्तु मालिक ने पाया कि नौकर अभी भी किसी गहन चिंतन में डूबा हुआ है।* *मालिक ने पूछा- "अरे भाई, अब क्या सोच रहे हो?" नौकर बोला- "मैं यह सोच रहा हूँ कि जब टूथपेस्ट को दबाया जाता है तब पेस्ट बाहर क्यों आ जाता है, भीतर की ओर क्यों नहीं जाता?* *मालिक ने कहा- हाँ, ठीक है। इसी तरह सोचते रहो। सुबह चार बजे मालिक फिर आया और व्यक्ति से उसके चिन्तन का विषय पूछा। तो व्यक्ति ने कहा कि अब मैं एक अत्यंत गंभीर विषय पर विचार कर रहा हूँ। मालिक बोला- "वह कौन सा गंभीर विषय हैं?"* *नौकर ने कहा- "मैं यहाँ सारी रात बैठा रहा, सोया भी नहीं, कमरे को ताला भी लगा हुआ था, फिर घोड़ा गायब हुआ तो कैसे?"* *कहीं हम भी उस व्यक्ति की तरह सोचते ही न रह जायें और बिना ब्रह्मज्ञान(ईश्वर दर्शन) के हमारा समय पूर्ण हो जाएँ, और फिर से चौरासी के चक्कर में पड़ना पड़े! 🌀🌀 राधे राधे 🌀🌀 भगवान विष्णु का हयग्रीव रूप, पूजा से मिलता है अतुलनीय धन सबगुरु न्यूज। श्रावण पूर्णिमा के दिन हयग्रीव जयंती मनाई जाती है। हय, घोड़ा आपके जीवन में सकारात्मक चमत्कारिक परिवर्तन ला सकता है। घोड़ा-मस्तक हयग्रिव, विष्णु का एक दुर्लभ अवतार है। हयग्रीव पुनरुथापक का प्रतिनिधित्व करता है जो अज्ञानता के झुंड से ज्ञान बहाल करता है। भगवान विष्णु के इस रूप की आज पूजा करने से अतुलनीय धन मिलता है। हयग्रीव जयंती की कथा देव कथाओं के अनुसार एक समय की बात है कि भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी बैकुण्ठ में विराजमान थे। उस समय देवी लक्ष्मी के सुंदर रूप को देखकर भगवान विष्णु मुस्कुराने लगे। देवी लक्ष्मी को ऐसा लगा कि विष्णु भगवान उनके सौन्दर्य की हंसी उड़ा रहे हैं। देवी ने इसे अपना अपमान समझ लिया और बिना सोचे भगवान विष्णु को शाप दे दिया कि आपका सिर धड़ से अलग हो जाए। शाप का परिणाम यह हुआ कि एक बार भगवान विष्णु युद्ध करते हुए बहुत थक गए तो धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे धरती पर टिका दिया और उस पर सिर लगाकर सो गए। कुछ समय बाद जब देवताओं ने यज्ञ का आयोजन किया तो भगवान विष्णु को निद्रा से जगाने के लिए धनुष की प्रत्यंचा को कटवा दिया। प्रत्यंचा कटते ही उसका भगवान विष्णु के गर्दन पर प्रहार हुआ और भगवान का सिर धड़ से अलग हो गया। इसके बाद आदिशक्ति का देवताओं ने आह्वान किया। देवी ने बताया कि आप भगवान विष्णु के धड़ में घोड़े का सिर लगवा दें। देवताओं ने विश्वकर्मा के सहयोग से भगवान विष्णु के धड़ में घोड़े का सिर जोड़ दिया और यह अवतार हयग्रीव अवतार कहलाया। दरअसल देवी लक्ष्मी का शाप और इस अवतार के पीछे भगवान विष्णु की ही माया थी क्योंकि इस अवतार के जरिए भगवान विष्णु को एक बड़ा काम करना था। इस अवतार में भगवान विष्णु ने हयग्रीव नाम के ही एक दैत्य का वध किया जिसे देवी से यह वरदान प्राप्त हुआ था कि उसकी मृत्यु केवल उसी व्यक्ति के हाथों से हो सकती है जिसका सिर घोड़े का हो और शरीर मनुष्य का। इस तरह भगवान विष्णु का यह अवतार लेना सफल हुआ। भगवान विष्णु ने इस अवतार को लेकर हयग्रीव से वेदों को वापस लेकर ब्रह्माजी को सौंपा। हयग्रिव विष्णु का एक बहुत ही दुर्लभ घोड़ा मस्तक अवतार है। यह अवतार एक समय में हुआ जब राक्षसों ने वेदों द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले ज्ञान चुरा लिया। हयग्रिव राक्षसों से वेदों को बहाल करने के लिए अवतारित किया। हयग्रीव पुनस्र्थापक का प्रतिनिधित्व करता है जो अज्ञानता के झुंड से ज्ञान बहाल करता है। देवी सरस्वती के गुरु के रूप में, कला और विज्ञान के दिव्य संरक्षक, विष्णु के इस घोड़े के मस्तक अवतार बुद्धी और ज्ञान के सभी रूपों पर शासन करते हैं। पवित्र ग्रंथों के अनुसार विष्णु ने अपने हयग्रीव रूप में पवित्र वैदिक मंत्रों को संकलित किया, जिसका पाठ अभी भी वैदिक अग्नि प्रार्थनाओं (यज्ञ) के अभिन्न अंग हैं। यही कारण है कि पवित्र और सांसारिक विषयों दोनों के अध्ययन शुरू करने से पहले हयग्रीव से आशीर्वाद मांगा जाता है। 🕉️💫🌺🌿🌸🌴🌼🌱🚩🌻🕉️🍁🏵️🙏

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Virag Vajpeyi Feb 28, 2021

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Neha Sharma, Haryana Feb 27, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 137*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 06*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 12*🙏🌸 *इस अध्याय में वृत्रासुर का वध..... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! वृत्रासुर रणभूमि में अपना शरीर छोड़ना चाहता था, क्योंकि उसके विचार से इन्द्र पर विजय प्राप्त करके स्वर्ग पाने की अपेक्षा मरकर भगवान् को प्राप्त करना श्रेष्ठ था। इसलिये जैसे प्रलयकालीन जल में कैटभासुर भगवान् विष्णु पर चोट करने के लिये दौड़ा था, वैसे ही वह भी त्रिशूल उठाकर इन्द्र पर टूट पड़ा। वीर वृत्रासुर ने प्रलयकालीन अग्नि की लपटों के समान तीखी नोकों वाले त्रिशूल को घुमाकर बड़े वेग से इन्द्र पर चलाया और अत्यन्त क्रोध से सिंहनाद करके बोला- ‘पापी इन्द्र! अब तू बच नहीं सकता’। इन्द्र ने यह देखकर कि वह भयंकर त्रिशूल ग्रह और उल्का के समान चक्कर काटता हुआ आकाश में आ रहा है, किसी प्रकार की अधीरता नहीं प्रकट की और उस त्रिशूल के साथ ही वासुकि नाग के समान वृत्रासुर की विशाल भुजा अपने सौ गाँठों वाले वज्र से काट डाली। एक बाँह कट जाने पर वृत्रासुर को बहुत क्रोध हुआ। उसने वज्रधारी इन्द्र के पास जाकर उनकी ठोड़ी में और गजराज ऐरावत पर परिघ से ऐसा प्रहार किया कि उनके हाथ से वह वज्र गिर पड़ा। वृत्रासुर के इस अत्यन्त अलौकिक कार्य को देखकर देवता, असुर, चारण, सिद्धगण आदि सभी प्रशंसा करने लगे। परन्तु इन्द्र का संकट देखकर वे ही लोग बार-बार ‘हाय-हाय!’ कहकर चिल्लाने लगे। परीक्षित! वह वज्र इन्द्र के हाथ से छूटकर वृत्रासुर के पास ही जा पड़ा था। इसलिये लज्जित होकर इन्द्र ने उसे फिर नहीं उठाया। तब वृत्रासुर ने कहा- ‘इन्द्र! तुम वज्र उठाकर अपने शत्रु को मार डालो। यह विषाद करने का समय नहीं है। (देखो-) सर्वज्ञ, सनातन, आदिपुरुष भगवान् ही जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने में समर्थ हैं। उनके अतिरिक्त देहाभिमानी और युद्ध के लिये उत्सुक आततायियों को सर्वदा जय ही नहीं मिलती। वे कभी जीतते हैं तो कभी हारते हैं। ये सब लोक और लोकपाल जाल में फँसे हुए पक्षियों की भाँति जिसकी अधीनता में विवश होकर चेष्टा करते हैं, वह काल ही सबकी जय-पराजय का कारण है। वही काल मनुष्य के मनोबल, इन्द्रियबल, शरीरबल, प्राण जीवन और मृत्यु के रूप में स्थित है। मनुष्य उसे न जानकर जड़ शरीर को ही जय-पराजय आदि का कारण समझता है। इन्द्र! जैसे काठ की पुतली और यन्त्र का हरिण नचाने वाले के हाथ में होते हैं, वैसे ही तुम समस्त प्राणियों को भगवान् के अधीन समझो। भगवान् के कृपा-प्रसाद के बिना पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण-चतुष्टय- ये कोई भी इस विश्व की उत्पत्ति आदि करने में समर्थ नहीं हो सकते। जिसे इस बात का पता नहीं है कि भगवान् ही सबका नियन्त्रण करते हैं, वही इस परतन्त्र जीव को स्वतन्त्र कर्ता-भोक्ता मान बैठता है। वस्तुतः स्वयं भगवान् ही प्राणियों के द्वारा प्राणियों की रचना और उन्हीं के द्वारा उनका संहार करते हैं। जिस प्रकार इच्छा न होने पर भी समय विपरीत होने से मनुष्य को मृत्यु और अपयश आदि प्राप्त होते हैं- वैसे ही समय की अनुकूलता होने पर इच्छा न होने पर भी उसे आयु, लक्ष्मी, यश और ऐश्वर्य आदि भोग भी मिल जाते हैं। इसलिये यश-अपयश, जय-पराजय, सुख-दुःख, जीवन-मरण- इनमें से किसी एक की इच्छा-अनिच्छा न रखकर सभी परिस्थियों में समभाव से रहना चाहिये- हर्ष-शोक के वशीभूत नहीं होना चाहिये। सत्त्व, रज और तम- ये तीनों गुण प्रकृति के हैं, आत्मा के नहीं; अतः जो पुरुष आत्मा को उनका साक्षीमात्र जानता है, वह उनके गुण-दोष से लिप्त नहीं होता। देवराज इन्द्र! मुझे भी तो देखो; तुमने मेरा हाथ और शस्त्र काटकर एक प्रकार से मुझे परास्त कर दिया है, फिर भी मैं तुम्हारे प्राण लेने के लिये यथाशक्ति प्रयत्न कर ही रहा हूँ। यह युद्ध क्या है, एक जुए का खेल। इसमें प्राण की बाजी लगती है, बाणों के पासे डाले जाते हैं और वाहन ही चौसर हैं। इसमें पहले से यह बात नहीं मालूम होती कि कौन जीतेगा कौन हारेगा। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! वृत्रासुर के ये सत्य एवं निष्कपट वचन सुनकर इन्द्र ने उनका आदर किया और अपना वज्र उठा लिया। इसके बाद बिना किसी प्रकार का आश्चर्य किये मुसकराते हुए वे कहने लगे। देवराज इन्द्र ने कहा- अहो दानवराज! सचमुच तुम सिद्ध पुरुष हो। तभी तो तुम्हारा धैर्य, निश्चय और भगवद्भाव इतना विलक्षण है। तुमने समस्त प्राणियों के सुहृद् आत्मस्वरूप जगदीश्वर की अनन्यभाव से भक्ति की है। अवश्य ही तुम लोगों को मोहित करने वाली भगवान् की माया को पार कर गये हो। तभी तो तुम असुरोचित भाव छोड़कर महापुरुष हो गये हो। अवश्य ही यह बड़े आश्चर्य की बात है कि तुम रजोगुणी प्रकृति के हो तो भी विशुद्ध सत्त्वस्वरूप भगवान् वासुदेव में तुम्हारी बुद्धि दृढ़ता से लगी हुई है। जो परमकल्याण के स्वामी भगवान् श्रीहरि के चरणों में प्रेममय भक्तिभाव रखता है, उसे जगत् के भोगों की क्या आवश्यकता है। जो अमृत के समुद्र में विहार कर रहा है, उसे क्षुद्र गड्ढ़ों के जल से प्रयोजन ही क्या हो सकता है। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इस प्रकार योद्धाओं में श्रेष्ठ महापराक्रमी देवराज इन्द्र और वृत्रासुर धर्म का तत्त्व जानने की अभिलाषा से एक-दूसरे के साथ बातचीत करते हुए आपस में युद्ध करने लगे। राजन्! अब शत्रुसूदन वृत्रासुर ने बायें हाथ से फौलाद का बना हुआ एक बहुत भयावना परिघ उठाकर आकाश में घुमाया और उससे इन्द्र पर प्रहार किया। किन्तु देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर का वह परिघ तथा हाथी की सूँड़ के समान लंबी भुजा अपने सौ गाँठों वाले वज्र से एक साथ ही काट गिरायी। जड़ से दोनों भुजाओं के कट जाने पर वृत्रासुर के बायें और दायें कंधों से खून की धारा बहने लगी। उस समय वह ऐसा जान पड़ा, मानो इन्द्र के वज्र की चोट से पंख कट जाने पर कोई पर्वत ही आकाश से गिरा हो। अब पैरों से चलने-फिरने वाले पर्वतराज के समान अत्यन्त दीर्घकाय वृत्रासुर ने अपनी ठोड़ी को धरती से और ऊपर के होठ को स्वर्ग से लगाया तथा आकाश के समन गहरे मुँह, साँप के समान भयावनी जीभ एवं मृत्यु के समान कराल दाढ़ों से मानो त्रिलोकी को निगलता, अपने पैरों की चोट से पृथ्वी को रौंदता और प्रबल वेग से पर्वतों को उलटता-पलटता वह इन्द्र के पास आया और उन्हें उनके वाहन ऐरावत हाथी के सहित इस प्रकार लील गया, जैसे कोई परम पराक्रमी और अत्यन्त बलवान् अजगर हाथी को निगल जाये। प्रजापतियों और महर्षियों के साथ देवताओं ने जब देखा कि वृत्रासुर इन्द्र को निगल गया, तब तो वे अत्यन्त दुःखी हो गये तथा ‘हाय-हाय! बड़ा अनर्थ हो गया।’ यों कहकर विलाप करने लगे। बल दैत्य का संहार करने वाले देवराज इन्द्र ने महापुरुष-विद्या (नारायण कवच) से अपने को सुरक्षित कर रखा था और उनके पास योगमाया का बल था ही। इसलिये वृत्रासुर के निगल लेने पर-उसके पेट में पहुँचकर भी वे मरे नहीं। उन्होंने अपने वज्र से उसकी कोख फाड़ डाली और उसके पेट से निकलकर बड़े वेग से उसका पर्वत-शिखर के समान ऊँचा सिर काट डाला। सूर्यादि ग्रहों की उत्तरायण-दक्षिणायनरूप गति में जितना समय लगता है, उतने दिनों में अर्थात् एक वर्ष में वृत्रवध का योग उपस्थित होने पर घूमते हुए उस तीव्र वेगशाली वज्र ने उसकी गरदन को सब ओर से काटकर भूमि पर गिरा दिया। उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं। महर्षियों के साथ गन्धर्व, सिद्ध आदि वृत्रघाती इन्द्र का पराक्रम सूचित करने वाले मन्त्रों से उनकी स्तुति करके बड़े आनन्द के साथ उन पर पुष्पों की वर्षा करने लगे। शत्रुदमन परीक्षित! उस समय वृत्रासुर के शरीर से उसकी आत्मज्योति बाहर निकली और इन्द्र आदि सब लोगों के देखते-देखते सर्वलोकातीत भगवान् के स्वरूप में लीन हो गयी। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" **************************************************

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