Kishore Bhambhani
Kishore Bhambhani Aug 21, 2017

श्री गणेशजी का रहस्य जानिए...

भारतीय धर्म और संस्कृति में भगवान #गणेशजी सर्वप्रथम पूजनीय और प्रार्थनीय हैं। उनकी पूजा के बगैर कोई भी मंगल कार्य शुरू नहीं होता।

कोई उनकी पूजा के बगैर कार्य शुरू कर देता है तो किसी न किसी प्रकार के विघ्न आते ही हैं। सभी धर्मों में गणेश की किसी न किसी रूप में पूजा या उनका आह्वान किया ही जाता है।

* गणेश देव : वे अग्रपूज्य, गणों के ईश गणपति, स्वस्तिक रूप तथा प्रणव स्वरूप हैं। उनके स्मरण मात्र से ही संकट दूर होकर शांति और समृद्धि आ जाती है।
* माता-पिता : शिव और पार्वती।
* भाई-बहन : कार्तिकेय और अशोक सुंदरी।
*पत्नी : प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री ऋद्धि और सिद्धि।
*पुत्र : सिद्धि से 'क्षेम' और ऋद्धि से 'लाभ' नाम के दो पुत्र हुए। लोक-परंपरा में इन्हें ही शुभ-लाभ कहा जाता है।
*जन्म समय : अनुमानत: 9938 विक्रम संवत पूर्व भाद्रपद माह की चतुर्थी अर्थात आज से 12,016 वर्ष पूर्व।
*प्राचीन प्रमाण : दुनिया के प्रथम धर्मग्रंथ ऋग्वेद में भी भगवान गणेशजी का जिक्र है। ऋग्वेद में 'गणपति' शब्द आया है। यजुर्वेद में भी ये उल्लेख है।
*गणेश ग्रंथ : गणेश पुराण, गणेश चालीसा, गणेश स्तुति, श्रीगणेश सहस्रनामावली, गणेशजी की आरती, संकटनाशन गणेश स्तोत्र।
*गणेश संप्रदाय : गणेश की उपासना करने वाला सम्प्रदाय गाणपतेय कहलाते हैं।
*गणेशजी के 12 नाम : सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र, विघ्नराज, द्वैमातुर, गणाधिप, हेरम्ब, गजानन।
*अन्य नाम : अरुणवर्ण, एकदन्त, गजमुख, लम्बोदर, अरण-वस्त्र, त्रिपुण्ड्र-तिलक, मूषकवाहन।
*गणेश का स्वरूप : वे एकदन्त और चतुर्बाहु हैं। अपने चारों हाथों में वे क्रमश: पाश, अंकुश, मोदक पात्र तथा वरमुद्रा धारण करते हैं। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा पीतवस्त्रधारी हैं। वे रक्त चंदन धारण करते हैं।
*प्रिय भोग : मोदक, लड्डू
*प्रिय पुष्प : लाल रंग के
*प्रिय वस्तु : दुर्वा (दूब), शमी-पत्र
*अधिपति : जल तत्व के
*प्रमुख अस्त्र : पाश, अंकुश
*वाहन : मूषक
*गणेशजी का दिन : बुधवार।
*गणेशजी की तिथि : चतुर्थी।
*ग्रहाधिपति : केतु और बुध
*गणेश पूजा-आरती : केसरिया चंदन, अक्षत, दूर्वा अर्पित कर कपूर जलाकर उनकी पूजा और आरती की जाती है। उनको मोदक का लड्डू अर्पित किया जाता है। उन्हें रक्तवर्ण के पुष्प विशेष प्रिय हैं।

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S.B. Yadav Aug 21, 2017
JAI JAISHRI GANESH JI MAHARAJ KI JAI JAI HO

*1.कुंडली के भावों पे विभिन्न मत-* *2.मार्केश ग्रह के लक्षण व समाधान-* *3.पुत्र द्वारा धन प्राप्ति के योग-* *4- वास्तु टिप्स-* *1.किसी भी जन्म कुंडली मे चन्द्रमा 10 वें अंक अर्थात मकर राशि मे किसी भी घर में स्थित हो तो उस व्यक्ति को जीवन में एक बार तो अवश्य ही भयँकर विफलता झेलनी ही होगी , समाज में अपना मुख दिखाने में भी संकोच करेगा।* *2.चन्द्रमा के साथ एक ही घर में शनि , राहु अथवा मंगल जैसे दुष्ट ग्रह हो तो वह व्यक्ति मानसिक रूप से इतना परेशान होगा कि लगे पागल है।* *3.चन्द्रमा चार दुष्ट ग्रहों शनि , राहु , मंगल , केतु में से किसी दो के साथ किसी भी घर मे हो अथवा दो दुष्ट ग्रह चन्द्रमा को देखते हैं तब भी उपरोक्त से मिलता जुलता प्रभाव ही पड़ता है। । यदि दो दुष्ट ग्रह चंद्र के साथ न हों किन्तु उससे अगले पिछले घर में हों तो भी मानसिक यातना और परेशानी का अनुभव उस व्यक्ति को होता ही है ।* *4. यदि किसी की कुंडली मे मंगल और शुक्र एक ही भाव मे साथ हों तो उस व्यक्ति के विवाह पश्चात भी अन्यत्र सम्बन्ध होते ही हैं ।चाहे वो कितना ही संयमी और सदाचारी हो।* *5.यदि कुंडली मे 10 नम्बर अर्थात मकर राशि का मंगल हो तो दो परिणाम होंगे , यदि कुंडली महिला की है तो उसके पिता का स्वभाव बात बात में भद्दी गालियां देना होगा और यदि पुरुष की है तो ऐसी ही अभद्र भाषा का प्रयोग उसके चाचा करेंगे । साथ ही वह व्यक्ति उत्तम श्रेणी का विद्यार्थी भी होगा।* *6.शनि यदि तुला राशि 7 अंक में होगा तब वह विद्वान और श्रेष्ठ विद्यार्थी होगा।* *7.यदि गुरु 4 अंक में अर्थात कर्क राशि मे उच्च होगा तो वो व्यक्ति सज्जन , उदार ह्रदय , चरित्रवान और सत्यवादी होगा ।* *8. यदि लग्न में मंगल हो और अस्त न हो तो व्यक्ति क्रोधी होगा ही।* *9. यदि लग्न मेष है तो व्यक्ति धैर्यहीन होगा।* *10. कर्क लग्न में या नौवें घर अथवा भाव कहें में गुरु और चन्द्र स्थित हों तो वह व्यक्ति महान नेता , निडर सत्यवादी और ख्याति प्राप्त हो।* *11. यदि मकर लग्न में अकेला केतु हो वो व्यक्ति जर्जर शरीर , जिसके देह में माँस न दिखता हो पीत शरीर वाला होता है और क्षय रोग tb से पीड़ित हो ।* *12. तीसरे भाव का मंगल व्यक्ति को साहसी बनाता है।* *13.किसी भी भाव में मकर राशि मे चार ग्रह वाला व्यक्ति कलंक , लज्जा या पराजय की भावना से ग्रस्त होता है और समाज के उच्च लोगो के सामने प्रकट होने में लज्जा महसूस करे।* *14. किसी भी घर मे चन्द्र और राहु साथ हों वो व्यक्ति कारावास , आरोप , मुक़्क़दमें , अकस्मात दुःख आदि से ग्रस्त हो ।* *15.किसी भी भाव में गुरु और चन्द्र अथवा शुक्र और चन्द्र साथ हों , वो व्यक्ति बहुत सुंदर आकर्षक होगा और यदि यही सहयोग चौथे भाव में हों तो माता का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक होता है । यदि यही सहयोग सप्तम भाव अर्थात पत्नी के भाव मे हो तो पत्नी लुभावन होगी ।और यदि दशम भाव हो तो पिता सुंदर होंगें ।* *16.चन्द्र ,शनि एक साथ चौथे घर हों तो बचपन और जवानी घोर आपदाओं में बीते ।* *चंद्र और राहु युति के प्रभाव से माता या पत्नी को कष्ट होता है, मानसिक तनाव रहता है, आर्थिक परेशानियाँ, गुप्त रोग, भाई से बैर और परिजनों का व्यवहार भी परायों जैसा होने के फल मिल सकते हैं।* *दरअसल चंद्र-राहु या सूर्य-राहु की युति को ग्रहण योग कहते हैं। अब यदि बुध की युति राहु के साथ है तो यह जड़त्व योग बन जाता है। इन योगों के प्रभाव स्वरुप भाव स्वामी की स्थिति के अनुसार ही अशुभ फल मिलते हैं। वैसे चंद्र की युति राहु के साथ कभी भी शुभ नही मानी जाती है। ऐसे में शिव आराधना अच्छा लाभ दे सकती है।* *कुंडली के भावों पे विभिन्न मत-* *वैदिक ज्योतिष में आचार्यो के विभिन्न्न मत की बात करे तो सभी विद्धवान के विभिन्न मत है जो यहाँ लिख रहे है।* *लग्नेश सदैव शुभ फल देता है।* *लग्नेश यदि अष्टमेश हो तो भी शुभ होता है।* *लग्नेश यदि ष्टमेश हो तो थोड़ा दोष युक्त होता है।* *लग्नेश यदि द्वादेश हो तो भी थोड़ा दोष युक्त होता है।* *लग्नेश चाहे शुभ ग्रह हो किंतु निकृष्ट स्थान का भी स्वामी हो तो कुछ पाप फल उसमे आ जाता है।* *द्वितीयेश और व्ययेश-* *यह स्वयं न शुभ होते है और न पाप होते है जैसी इनकी दूसरी राशि होती है उसके स्वामित्व के अनुसार ही जैसे शुभ या पाप ग्रह बैठे हो वैसा ही फल करते है यह मारक भी होते है।* *त्रिकोण-* *त्रिकोण सदैव शुभ फल करते है।* *त्रिकोण यदि अष्टमेश हो तो दोष युक्त होते है।* *त्रिकोण यदि अष्टमेश भी हो और पंचम में बैठा हो यो पाप नही होता।* *त्रिकोण यदि व्ययेश भी हो तो शुभ ही रहता है।* *त्रिकोण यदि द्वितीयेश हो तो मारक भी हो जाता है किंतु भाग्य उदय उसी में ही होता है।* *त्रिकोण यदि केन्द्रेश भी हो तो योगकारक होता है।* *त्रिकोण यदि ष्टमेश भी हो तो दोषयुक्त हो जात है |* *मार्केश ग्रह के लक्षण व समाधान-* *मारक ग्रह के बारे में तो सुना ही होगा, क्योंकि प्रत्येक कुंडली में कुछ ग्रह मारक का काम करते हैं, माना जाता है कि जब भी इन ग्रहों की दशा या अंतर्दशा आती है तो उस समय यह ग्रह जातक को कष्ट देते हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि सभी को एक जैसा ही कष्ट और परेशानी दें, यह सब अलग-2 लग्नो के हिसाब से कष्ट देते हैं, और यह प्रत्येक कुंडली में शुभ अशुभ ग्रह, ग्रहों की अच्छी व बुरी दृष्टि पर ही निर्भर करता है इसलिए घबराना नहीं चाहिए।* *आप अपनी कुंडली चेक कर जान सकते हैं कि कौन सा ग्रह आपके लिए मारक मतलब कष्टकारक होंगे।* *कुंडली में लग्न से गिनने पर दूसरा घर और सातवां घर मारक स्थान या भाव कहलाते हैं, (कुछ विद्वान 12वें घर को भी मारक मानते है) इन घरों में जो भी राशि आती है उनके स्वामी मारकेश कहलाते हैं।* *लक्षण-* *मारकेश की दशा/अंतर्दशा या प्रत्यंतर दशा में मानसिक व शारीरिक कष्ट, चोट लगना, दुर्घटना होना, कोई लंबी बीमारी, मानसिक तनाव, अपयश, कार्यों में बाधाएं और अड़चने, वैवाहिक जीवन में क्लेश, बिना वजह क्लेश, डर व घबराहट, आत्म विश्वास की कमी आदि परेशानियां हो सकती है।* *सौम्य और शुभ ग्रह यदि मारकेश हैं तो इतने कष्टकारी नहीं होते किन्तु यदि पापी और क्रूर ग्रह मारकेश हैं तो फिर कुछ कष्ट अवस्य देते हैं।* *चंद्रमा और सूर्य यदि मारकेश हों तो मारकेश होकर भी मारकेश नहीं होते मतलब अशुभ फल नहीं देते।* *उपाय- यदि मारकेश की दशा/अंतर /प्रत्यंतर चल रहा हो तो घबराना नहीं चाहिए क्योंकि जहां चाह वहां राह होती है, अगर ज्योतिष में कुछ बुरे योग हैं तो वहां उपाय भी हैं।* *शिव आराधना से लाभ मिलता है, शिवजलाभिषेख करें।* *मारक ग्रहों की दशा मे उनके उपाय करना चाहिए.* *महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र इस प्रकार है-* *ॐ हौं जूं स: ॐ भू: भुव: स्वःॐत्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्।* *उर्व्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतातॐ भू:भूव: स्वः ॐ जूं स: हौं ॐ।।* *इस विषय में राम रक्षा स्त्रोत, महामृत्युंजय मन्त्र, लग्नेश और राशीश के मन्त्रों का अनुष्ठान और गायत्री मन्त्रों द्वारा इनमे कुछ वृद्धि की जा सकती है।* *चार बातें नोट कर लीजिए-* *कभी भी उच्च के ग्रहों का दान नहीं करना चाहिए और नीच ग्रहों की कभी पूजा नहीं करनी चाहिए।* *कुंडली में गुरु दसम भाव में हो या चौथे भाव में हो तो किसी भी प्रकार के धार्मिक निर्माण के लिए धन नहीं देना चाहिए यह अशुभ होता है और जातक को कभी भी फांसी तक पहुंचा सकता है। आप चाहें तो शारीरिक श्रम दान दे सकते हैं।* *कुंडली के सप्तम भाव में गुरु हो तो कभी भी पीले रंग के वस्त्र दान नहीं करने चाहिए।* *बारहवें भाव में चन्द्र हो तो साधुओं का संग करना बहुत अशुभ होगा। इससे परिवार की वृद्धि तक भी रुक सकती है।* *सूर्य पापी व्यक्ति के लिए बुरा है , चंद्र तार्किक व्यक्ति के लिए बुरा है , शुक्र वैरागी व्यक्ति के लिए बुरा है, गुरु अधर्मी व्यक्ति के लिए बुरा है , राहु सत्यवादी व्यक्ति के लिए बुरा है , बुध भावप्रधान व्यक्ति के लिए बुरा है , मंगल शांतिप्रिय व्यक्ति के लिए बुरा है , शनि अत्याचारी व्यक्ति के लिए बुरा है, केतु सांसारिक लोभी व्यक्ति के लिए बुरा है।* *उदाहरण-* *मान लीजिए किसी का शराब का व्यापार है, तो गुरु उसके व्यापार में लाभ नही देगा, या किसी की हवन पूजन सामग्री की दुकान है तो राहु उसके व्यापार में लाभ नही देगा।* *इसी प्रकार ग्रहों के कारकत्व का विस्तार में विश्लेषण करें फिर स्वयं ही पता चल जाएगा की ज्योतिष फलित क्यो नही हो-* *पुत्र द्वारा धन प्राप्ति के योग-* *जन्मपतरी से कैसे मालूम हो कि आपको पुत्र से धन प्राप्ति होगी कि नही।* *जन्मपत्री का दूसरा भाव आपकी सन्तान का। देवगुरु बृहस्पति सन्तान के कारक* *जब कभी भी दूसरे भाव के स्वामी का सम्बन्ध पंचमेश या पंचम भाव से होगा जातक को सन्तान से धन की प्राप्ति अवश्य ही होगी।* *देवगुरु बृहस्पति पंचम भाव मे हो और उस पर नवमेश की दृश्टि हो तब भी जातक को पुत्र से धन की प्राप्ति होती है।* *किसी भी योग को फलित होने के लिए लगनेश का बलवान होना अत्यंत आवश्यक है। यदि लगनेश कमजोर हो जाये तो जन्मपत्री के शुभ योगो में कमी आ जाती है। अतः लगनेश की स्तिथि अवश्य ही देख ले।* *कुछ वास्तु टिप्स-* *केक्टस और किसी भी प्रकार के काँटे वाले पौधे घर में स्थापित करना शुभ नहीं होता है।आज के जमाने में केक्टस राहु के कारक हैं।* *केतु इमली का वृक्ष, तिल के पौधे तथा केले के फल का कारक है। यदि केतु खराब हो तो इन पौधों को घर के आसपास लगाना घर के मालिक के बेटे के लिए अशुभ फल का कारक हो जाता है,क्योंकि कुंडली में केतु हमारे बेटे को कारक भी है।*

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Durga Pawan Sharma Jan 26, 2020

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Pankaj Jan 26, 2020

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Jeetram Bairwa Jan 24, 2020

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kalimehra Jan 24, 2020

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