मोरपंख से लाभ

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Harcharan Pahwa May 9, 2020

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RANJAN ADHIKARI May 9, 2020

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b singh May 8, 2020

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Uma Sood May 10, 2020

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Swami Lokeshanand May 10, 2020

इधर भरतजी ननिहाल में हैं, उधर अयोध्या में सुमंत्र जी भगवान को वन पहुँचाकर वापिस लौटे। संध्या हो रही है, हल्का प्रकाश है, सुमंत्र जी नगर के बाहर ही रुक गए। जीवनधन लूट गया, अब क्या मुंह लेकर नगर में प्रवेश करूं? अयोध्यावासी बाट देखते होंगे। महाराज पूछेंगे तो क्या उत्तर दूंगा? अभी नगर में प्रवेश करना ठीक नहीं, रात्रि हो जाने पर ही चलूँगा। अयोध्या में आज पूर्ण अमावस हो गई है। रघुकुल का सूर्य दशरथजी अस्त होने को ही है, चन्द्र रामचन्द्रजी भी नहीं हैं, प्रकाश कैसे हो? सामान्यतः पूर्णिमा चौदह दिन बाद होती है, पर अब तो पूर्णिमा चौदह वर्ष बाद भगवान के आने पर ही होगी। दशरथजी कौशल्याजी के महल में हैं, जानते हैं कि राम लौटने वालों में से नहीं, पर शायद!!! उम्मीद की किरण अभी मरी नहीं। सुमंत्रजी आए, कौशल्याजी ने देखकर भी नहीं देखा, जो होना था हो चुका, अब देखना क्या रहा? दशरथजी की दृष्टि में एक प्रश्न है, उत्तर सुमंत्रजी की झुकी गर्दन ने दे दिया। महाराज पथरा गए। बोले- "कौशल्या देखो वे दोनों आ गए" -कौन आ गए महाराज ? कोई नहीं आया। -तुम देखती नहीं हो, वे आ रहे हैं। इतने में वशिष्ठजी भी पहुँच गए। -गुरुजी, कौशल्या तो अंधी हो गई है, आप तो देख रहे हैं, वे दोनों आ गए। -आप किन दो की बात कर रहे हैं, महाराज? -गुरुजी ये दोनों तपस्वी आ गए, मुझे लेने आए हैं, ये श्रवण के मातापिता आ गए। महाराज ने आँखें बंद की, लगे राम राम करने और वह शरीर शांत हो गया। विचार करें, ये चक्रवर्ती नरेश थे, इन्द्र इनके लिए आधा सिंहासन खाली करता था, इनके पास विद्वानों की सभा थी, बड़े बड़े कर्मकाण्डी थे। इनसे जीवन में एकबार कभी भूल हुई थी, इनके हाथों श्रवणकुमार मारा गया था, इतना समय बीत गया, उस कर्म के फल से बचने का कोई उपाय होता तो कर न लेते? यह जो आप दिन रात, उपाय उपाय करते, दरवाजे दरवाजे माथा पटकते फिरते हैं, आप समझते क्यों नहीं? आप को बुद्धि कब आएगी? अब विडियो देखें- दशरथ जी का देह त्याग https://youtu.be/qO3KqNYTVCU

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Swami Lokeshanand May 10, 2020

रामू धोबी अपने गधे के साथ नदी किनारे जा रहा था, कि उसे रेत में एक सुंदर लाल पत्थर दिखाई दिया। वह सूर्य की रोशनी में बड़ा चमक रहा था। "वाह! इतना सुंदर पत्थर!" कहते हुए रामू ने उसे उठा कर, एक धोगे में लपेट अपने गधे के गले में लटका लिया। घर लौटते हुए, वे जौहरी बाजार से निकले। जगता नाम का जौहरी उस पत्थर को देखते ही पहचान गया, वह रंग का ही लाल नहीं था, वह तो सचमुच का लाल था। हीरे से भी कीमती लाल। उसने रामू को बुलाया और कहा- ये पत्थर कहाँ से पाया रे? बहुत सुंदर है। बेचेगा? रामू ने हैरानी से पूछा- ये बिक जाएगा? कितने का? जगता- एक रुपया दूंगा। रामू- दो रुपए दे दो। जगता- तूं पागल है? है क्या यह? पत्थर ही तो है। एक रुपया लेना है तो ले, नहीं तो भाग यहाँ से। रामू के लिए यूं तो एक रुपया भी कम नहीं था। पर वह भी पूरा सनकी था, आगे चल पड़ा। इतने में भगता जौहरी ने, जो यह सब कुछ देख सुन रहा था, रामू को आवाज लगाई और सीधे ही उसके हाथ पर दो रुपए रख कर वह लाल ले लिया। अब जगता, जो पीछे ही दौड़ा आता था, चिल्लाया- मूर्ख! अनपढ़! गंवार! बेवकूफ! हाय हाय! बड़ा पागल है। लाख का लाल दो रुपए में दे रहा है? रामू की भी आँखें घूम गई। पर सौदा हो चुका था, माल बिक गया था। अचानक वह जोर से हंसा, और बोला- सेठ जी! मूर्ख मैं नहीं हूँ, मूर्ख आप हैं। मैं तो कीमत नहीं जानता था, मैंने तो दो रुपए में भी मंहगा ही बेचा है। पर आप तो जानते हुए भी एक रुपया तक नहीं बढ़ा पाए? लोकेशानन्द कहता है कि हम भी जगता जौहरी जैसे ही मूर्ख हैं। ऐसा नहीं है कि हम भगवान की कथा की कीमत न जानते हों। जानते हैं। पर बिना किसी प्रयास के, अपनेआप, घर बैठे ही मिल रही इस कथा की असली कीमत, "अपना पूरा जीवन" देना तो दूर रहा, अपने दो मिनट भी देने को तैयार नहीं होते। फिर हीरा हाथ से निकल जाने पर, पछताने के सिवा हम करेंगे भी क्या?

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