madan pal 🌷🙏🏼
madan pal 🌷🙏🏼 Apr 14, 2021

🌹🕉️🙏🏼 ओम् नमो हरी विष्णु जी 🙏🏼🕉️🌹🌹🕉️🙏🏼 जय मां लक्ष्मी जी 🙏🏼🕉️🌹👏🌷🌹🕉️🙏🏼 जय माता दी 🙏🏼🕉️🌹👏🌷🧡🌹🕉️🙏🏼 शूभ प्रभात वंदन जी 🙏🏼🕉️🌹👏🌹🕉️🙏🏼 सभी भाई बहनों को प्रणाम जी 🙏🏼🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡🧡

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कामेंट्स

sunil Apr 14, 2021
ॐ गणेशाय नामों

Madhuben patel Apr 15, 2021
जय माता दी शुभ प्रभात स्नेहवंदन भाईजी आपको सपरिवार नवरात्रि के तीसरे दिन की हार्दिक शुभकामनाएं माता रानी सदैव आपकी मनोकामनाएं पूरी करे भाईजी

dhruv wadhwani Apr 15, 2021
ओम भगवते वासुदेवाय नमः ओम भगवते वासुदेवाय नमः ओम भगवते वासुदेवाय नमः ओम भगवते वासुदेवाय नमः ओम भगवते वासुदेवाय

dhruv wadhwani Apr 15, 2021
मां चंद्रघंटा की कृपा से आपका दिन शुभ मंगलमय हो

Radhe Krishna Apr 15, 2021
जय माता दी🙏🙏 शुभ प्रभात वंदन जी🌹🌹

Radhe Krishna Apr 15, 2021
जय श्री राधे राधे कृष्णा🌹🌹

sanjay choudhary Apr 15, 2021
🙏🙏 जय माता दी 🙏🙏 ।।🙏 जय श्री विष्णु हरि 🙏।। ।।। शुभ प्रभातं जी।।।।�🍁🍁

Mamta Chauhan Apr 15, 2021
Jai mata di🌷🙏shubh prabhat vandan bhai ji aapka har pal khushion bhara ho mata rani ki kripa sda aap or aapke priwar pr bni rhe🌷🌷🌷🙏🙏🙏

Bhagat ram Apr 15, 2021
🌹🌹🕉️ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🙏🌺💐🌿🌹 सुप्रभात वंदन जी 🙏🙏🌺💐🌿🌹 जय माता दी 🙏🙏🌺💐🌿🌹

Renu Singh Apr 15, 2021
🙏🌹 Jai Mata Di 🌹🙏 Good Morning Bhai Ji 🙏 Mata Rani Aapko aur Aàpki Family ko Sadaiv Sukhi Swasth Avam Khush rakhein Bhai ji 🙏🌹

Neeta Trivedi Apr 15, 2021
जय श्री हरि विष्णु शुभ प्रभात वंदन जी आप का हर एक पल शुभ और मंगलमय हो हरि की असीम कृपा सदा आप पर बनी रहे जी 🙏🌹🙏

RAJ RATHOD Apr 15, 2021
🚩🚩‘या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नसस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:‘🚩🚩

ಗಿರಿಜಾ ನೂಯಿ Apr 15, 2021
🙏🙏 Good Afternoon Ji🌹🌹 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️Om Shri Bhagavate Vasudevay Namo Namah🙏🌷🎆💐🙏 Super Video Song Ji👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌 Have a blessed day,Shri Lakshmi Narayana ‌ ji bless you & your family always be happy, healthy & wealthy dear brother ji🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌸🌸🌸🌸🍎🍈🍍🍓🍏🍐🍒🍊💐💐💐💐

Shanti pathak Apr 15, 2021
🌷🙏जय माता दी,जय मां चन्द्रघण्टा🌷शुभ दोपहर वंदन जी 🌷आपका हर पल शुभ एवं मंगलमय हो 🌷माँ चन्द्रघण्टा की कृपादृष्टि आप एवं आपके परिवार पर सदैव बनी रहे🌷मातारानी आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें 🌷🙏🌷

EXICOM Apr 20, 2021
🙏🏻🌷ऊँ🌷🙏🏻 🙏🏻🌷शाँतिं🌷🙏🏻 🙏🏻🌷दीदी🌷🙏🏻 🙏🏻🌷जी🌷🙏🏻

Manoj sahu May 8, 2021

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chandra sen sahu May 10, 2021

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Ravi Kumar Taneja May 9, 2021

🌹माँ के बारे में क्या लिखें🙏 🌹🙏 जबकी मैं खुद उसके द्वारा लिखा गया हूँ🙏🌹🙏 मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाये ,अभिनंदन 🙏🌹🙏 🕉 *नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।* *नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।*🕉 🔯 *(माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय नहीं है।)*🔯 *मातृदिवस के पावन अवसर पर मातृशक्ति को नमन्।* 🙏🌹🙏 🌹🌹🌹माँ 🌹🌹🌹 🌹माँ -मां संवेदना है, भावना है अहसास है🌹 🌹माँ : मां जीवन के फूलों में खुशबू का वास है!🌹 🌹माँ: मां मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है,🌹 🌹माँ: मां रोते हुए बच्चों का खुशनुमा पालना है!🌹 🌹माँ: मां लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,🌹 🌹माँ: मां पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है!🌹 🌹माँ: मां आंखों का सिसकता हुआ किनारा है, 🌹माँ: मां गालों पर पप्पी है, ममता की धारा है!!!🌹 🌹माँ : मां झुलसते दिलों में कोयल की बोली है,🌹 🌹माँ: मां मेहंदी है, कुमकुम है, सिंदूर है, रोली है!🌹 🌹माँ : मां कलम है, दवात है, स्याही है,🌹 🌹माँ : मां परमात्मा की स्वयं एक गवाही है!🌹 🌹माँ: मां त्याग है, तपस्या है, सेवा है,🌹 🌹माँ: मां फूंक से ठंडा किया हुआ कलेवा है!🌹 🌹माँ: मां अनुष्ठान है, साधना है, जीवन का हवन है,🌹 🌹माँ : मां जिंदगी के मोहल्ले में आत्मा का भवन है!🌹 🌹माँ : मां चूड़ी वाले हाथों के मजबूत कंधों का नाम है,🌹 🌹माँ: मां काशी है,काबा है और चारों धाम है!🌹 🌹माँ: मां चिंता है, याद है, हिचकी है,🌹 🌹माँ: मां बच्चों की चोट पर सिसकी है!🌹 🌹माँ: मां चुल्हा-धुंआ-रोटी और हाथों का छाला है,🌹 🌹माँ: मां जिंदगी की कड़वाहट में अमृत का प्याला है!🌹 🌹माँ : मां पृथ्वी है,जगत है,धूरी है, मां बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है!!!🌹 🌹तो मां की ये कथा अनादि है... ये अध्याय नहीं है… ….और मां का जीवन में कोई पर्याय नहीं है!!!🌹 🕉 *मां का महत्व दुनिया में कम हो नहीं सकता,* और *मां जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता!*🕉 *मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामना* 🙏 🌹 मैं अपने छोटे मुख से कैसे करूं तेरा गुणगान, मां तेरी ममता के आगे फीका सा लगता है भगवान!!!🙏🌷🙏 *मातृ दिवस के पावन दिन पर समूचे विश्व की *माताओं* को 🌹बधाई, 🌹शुभकामनाएँ, 🌹शाष्टांग प्रणाम!!!🙏🌷🙏

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Raj May 10, 2021

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 207 स्कन्ध - 09 अध्याय - 24 (अन्तिम) इस अध्याय में:- विदर्भ के वंश का वर्णन श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजा विदर्भ की भोज्या नामक पत्नी से तीन पुत्र हुए- कुश, क्रथ और रोमपाद। रोमपाद विदर्भ वंश में बहुत ही श्रेष्ठ पुरुष हुए। रोमपाद का पुत्र बभ्रु, बभ्रु का कृति, कृति का उशिक और उशिक का चेदि। राजन! इस चेदि के वंश में ही दमघोष और शिशुपाल आदि हुए। क्रथ का पुत्र हुआ कुन्ति, कुन्ति का धृष्टि, धृष्टि का निर्वृति, निर्वृति का दशार्ह और दशार्ह का व्योम। व्योम का जीमूत, जीमूत का विकृति, विकृति का भीमरथ, भीमरथ का नवरथ और नवरथ का दशरथ। दशरथ से शकुनि, शकुनि से करम्भि, करम्भि से देवरात, देवरात से देवक्षत्र, देवक्षत्र से मधु, मधु से कुरुवश और कुरुवश से अनु हुए। अनु से पुरुहोत्र, पुरुहोत्र से आयु और आयु से सात्वत का जन्म हुआ। परीक्षित! सात्वत के सात पुत्र हुए- भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक और महाभोज। भजमान की दो पत्नियाँ थीं, एक से तीन पुत्र हुए- निम्लोचि, किंकिण और धृष्टि। दूसरी पत्नी से भी तीन पुत्र हुए- शताजित, सहस्रजित् और अयुताजित। देवावृध के पुत्र का नाम था बभ्रु। देवावृध और बभ्रु के सम्बन्ध में यह बात कही जाती है- ‘हमने दूर से जैसा सुन रखा था, अब वैसा ही निकट से देखते भी हैं। बभ्रु मनुष्यों में श्रेष्ठ है और देवावृध देवताओं के समान है। इसका कारण यह है कि बभ्रु और देवावृध से उपदेश लेकर चौदह हजार पैंसठ मनुष्य परम पद को प्राप्त कर चुके हैं।’ सात्वत के पुत्रों में महाभोज भी बड़ा धर्मात्मा था। उसी के वंश में भोजवंशी यादव हुए। परीक्षित! वृष्णि के दो पुत्र हुए- सुमित्र और युधाजित्। युधाजित् के शिनि और अनमित्र-ये दो पुत्र थे। अनमित्र से निम्न का जन्म हुआ। सत्रजित् और प्रसेन नाम से प्रसिद्ध यदुवंशी निम्न के ही पुत्र थे। अनमित्र का एक और पुत्र था, जिसका नाम था शिनि। शिनि से ही सत्यक का जन्म हुआ। इसी सत्यक के पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकि के नाम से प्रसिद्ध हुए। सात्यकि का जय, जय का कुणि और कुणि का पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्र के तीसरे पुत्र का नाम वृष्णि था। वृष्णि के दो पुत्र हुए- श्वफल्क और चित्ररथ। श्वफल्क की पत्नी का नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूर के अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्न हुए- आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूर के दो पुत्र थे- देववान् और उपदेव। श्वफल्क के भाई चित्ररथ के पृथु विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए-जो वृष्णिवंशियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं। सात्वत के पुत्र अन्धक के चार पुत्र हुए- कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि। उनमें कुकुर का पुत्र वह्नि, वह्नि का विलोमा, विलोमा का कपोतरोमा और कपोतरोमा का अनु हुआ। तुम्बुरु गन्धर्व के साथ अनु की बड़ी मित्रता थी। अनु का पुत्र अन्धक, अन्धक का दुन्दुभि, दुन्दुभि का अरिद्योत, अरिद्योत का पुनर्वसु और पुनर्वसु के आहुक नाम का एक पुत्र तथा आहुकी नाम की एक कन्या हुई। आहुक के दो पुत्र हुए- देवक और उग्रसेन। देवक के चार पुत्र हुए- देववान्, उपदेव, सुदेव और देववर्धन। इनकी सात बहिनें भी थीं- धृत, देवा, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी। वसुदेव जी ने इन सबके साथ विवाह किया था। उग्रसेन के नौ लड़के थे- कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान। उग्रसेन के पाँच कन्याएँ भी थीं- कंसा, कंसवती, कंका, शूरभू और राष्ट्रपालिका। इनका विवाह देवभाग आदि वसुदेव जी के छोटे भाइयों से हुआ था। चित्ररथ के पुत्र विदूरथ से शूर, शूर से भजमान, भजमान से शिनि, शिनि से स्वयम्भोज और स्वयम्भोज से हृदीक हुए। हृदीक से तीन पुत्र हुए- देवबाहु, शतधन्वा और कृतवर्मा। देवमीढ के पुत्र शूर की पत्नी का नाम था मारिषा। उन्होंने उसके गर्भ से दस निष्पाप पुत्र उत्पन्न किये- वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेव जी के जन्म के समय देवताओं के नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनन्ददुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्ण के पिता हुए। वसुदेव आदि की पाँच बहनें भी थीं- पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेव के पिता शूरसेन के एक मित्र थे- कुन्तिभोज। कुन्तिभोज के कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेन ने उन्हें पृथा नाम की अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी। पृथा ने दुर्वासा ऋषि को प्रसन्न करके उनसे देवताओं को बुलाने की विद्या सीख ली। एक दिन उस विद्या के प्रभाव की परीक्षा लेने के लिये पृथा ने परम पवित्र भगवान् सूर्य का आवाहन किया। उसी समय भगवान् सूर्य वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर कुन्ती का हृदय विस्मय से भर गया। उसने कहा- ‘भगवन! मुझे क्षमा कीजिये। मैंने तो परीक्षा करने के लिये ही इस विद्या का प्रयोग किया था। अब आप पधार सकते हैं’। सूर्यदेव ने कहा- ‘देवि! मेरा दर्शन निष्फल नहीं हो सकता। इसलिय हे सुन्दरी! अब मैं तुझसे एक पुत्र उत्पन्न करना चाहता हूँ। हाँ, अवश्य ही तुम्हारी योनि दूषित न हो, इसका उपाय मैं कर दूँगा।' यह कहकर भगवान सूर्य ने गर्भ स्थापित कर दिया और इसके बाद वे स्वर्ग चले गये। उसी समय उससे एक बड़ा सुन्दर एवं तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुआ। वह देखने में दूसरे सूर्य के समान जान पड़ता था। पृथा लोकनिन्दा से डर गयी। इसलिये उसने बड़े दुःख से उस बालक को नदी के जल में छोड़ दिया। परीक्षित! उसी पृथा का विवाह तुम्हारे परदादा पाण्डु से हुआ था, जो वास्तव में बड़े सच्चे वीर थे। परीक्षित! पृथा की छोटी बहिन श्रुतदेवा का विवाह करुष देश के अधिपति वृद्धशर्मा से हुआ था। उसके गर्भ से दन्तवक्त्र का जन्म हुआ। यह वही दन्तवक्त्र है, जो पूर्व जन्म में सनकादि ऋषियों के शाप से हिरण्याक्ष हुआ था। कैकय देश के राजा धृष्टकेतु ने श्रुतकीर्ति से विवाह किया था। उससे सन्तर्दन आदि पाँच कैकय राजकुमार हुए। राजाधिदेवी का विवाह जयसेन से हुआ था। उसके दो पुत्र हुए- विन्द और अनुविन्द। वे दोनों ही अवन्ती के राजा हुए। चेदिराज दमघोष ने श्रुतश्रवा का पाणिग्रहण किया। उसका पुत्र था शिशुपाल, जिसका वर्णन मैं पहले (सप्तम स्कन्ध में) कर चुका हूँ। वसुदेव जी के भाइयों में से देवभाग की पत्नी कंसा के गर्भ से दो पुत्र हुए- चित्रकेतु और बृहद्बल। देवश्रवा की पत्नी कंसवती से सुवीर और इषुमान नाम के दो पुत्र हुए। आनक की पत्नी कंका के गर्भ से भी दो पुत्र हुए- सत्यजित और पुरुजित। सृंजय ने अपनी पत्नी राष्ट्रपालिका के गर्भ से वृष और दुर्मर्षण आदि कई पुत्र उत्पन्न किये। इसी प्रकार श्यामक ने शूरभूमि (शूरभू) नाम की पत्नी से हरिकेश और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्न किये। मिश्रकेशी अप्सरा के गर्भ से वत्सक के भी वृक आदि कई पुत्र हुए। वृक ने दुर्वाक्षी के गर्भ से तक्ष, पुष्कर और शाल आदि कई पुत्र उत्पन्न किये। शमीक की पत्नी सुदामिनी ने भी सुमित्र और अर्जुनपाल आदि कई बालक उत्पन्न किये। कंक की पत्नी कर्णिका के गर्भ से दो पुत्र हुए- ऋतधाम और जय। आनकदुन्दुभि वसुदेव जी की पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला और देवकी आदि बहुत-सी पत्नियाँ थीं। रोहिणी के गर्भ से वसुदेव जी के बलराम, गद, सारण, दुर्मद, विपुल, ध्रुव और कृत आदि पुत्र हुए थे। पौरवी के गर्भ से उनके बारह पुत्र हुए- भूत, सुभद्र, भद्रवाह, दुर्मद और भद्र आदि। नन्द, उपनन्द, कृतक, शूर आदि मदिरा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। कौसल्या ने एक ही वंश-उजागर पुत्र उत्पन्न किया था। उसका नाम था केशी। उसने रोचना से हस्त और हेमांगद आदि तथा इला से उरुवल्क आदि प्रधान यदुवंशी पुत्रों को जन्म दिया। परीक्षित! वसुदेव जी के धृतदेवा के गर्भ से विपृष्ठ नाम का एक ही पुत्र हुआ और शान्तिदेवा से श्रम और प्रतिश्रुत आदि कई पुत्र हुए। उपदेवा के पुत्र कल्पवर्ष आदि दस राजा हुए और श्रीदेवा के वसु, हंस, सुवंश आदि छः पुत्र हुए। देवरक्षिता के गर्भ से गद आदि नौ पुत्र हुए तथा स्वयं धर्म ने आठ वसुओं को उत्पन्न किया था, वैसे ही वसुदेव जी ने सहदेवा के गर्भ से पुरुविश्रुत आदि आठ पुत्र उत्पन्न किये। परम उदार वसुदेव जी ने देवकी के गर्भ से भी आठ पुत्र उत्पन्न किये, जिसमें सात के नाम हैं- कीर्तिमान, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, संमर्दन, भद्र और शेषावतार श्रीबलराम जी। उन दोनों के आठवें पुत्र स्वयं श्रीभगवान् ही थे। परीक्षित! तुम्हारी परासौभाग्यवती दादी सुभद्रा भी देवकी जी की ही कन्या थीं। जब-जब संसार में धर्म का ह्रास और पाप की वृद्धि होती है, तब-तब सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि अवतार ग्रहण करते हैं। परीक्षित! भगवान् सब के द्रष्टा और वास्तव में असंग आत्मा ही हैं। इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमाया के अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्म का और कोई भी कारण नहीं है। उनकी माया का विलास ही जीव के जन्म, जीवन और मृत्यु का कारण है। और उनका अनुग्रह ही माया को अलग करके आत्मस्वरूप को प्राप्त करने वाला है। जब असुरों ने राजाओं का वेष धारण कर लिया और कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके वे सारी पृथ्वी को रौंदने लगे, तब पृथ्वी का भार उतारने के लिये भगवान् मधुसूदन बलराम जी के साथ अवतीर्ण हुए। उन्होंने ऐसी-ऐसी लीलाएँ कीं, जिनके सम्बन्ध में बड़े-बड़े देवता मन से अनुमान भी नहीं कर सकते-शरीर से करने की बात तो अलग रही। पृथ्वी का भार तो उतरा ही, साथ ही कलियुग में पैदा होने वाले भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये भगवान् ने ऐसे परम पवित्र यश का विस्तार किया, जिसका गान और श्रवण करने से ही उनके दुःख, शोक और अज्ञान सब-के-सब नष्ट हो जायेंगे। उनका यश क्या है, लोगों को पवित्र करने वाला श्रेष्ठ तीर्थ है। संतों के कानों के लिये तो वह साक्षात् अमृत ही है। एक बार भी यदि कान की अंजलियों से उसका आचमन कर लिया जाता है, तो कर्म की वासनाएँ निर्मूल हो जाती हैं। परीक्षित! भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशार्ह, कुरु, सृंजय और पाण्डुवंशी वीर निरन्तर भगवान की लीलाओं की आदरपूर्वक सराहना करते रहते थे। उनका श्यामल शरीर सर्वांगसुन्दर था। उन्होंने उस मनोहर विग्रह से तथा अपनी प्रेमभरी मुसकान, मधुर चितवन, प्रसादपूर्ण वचन और पराक्रमपूर्ण लीला के द्वारा सारे मनुष्य लोक को आनन्द में सराबोर कर दिया था। भगवान् के मुखकमल की शोभा तो निराली ही थी। मकराकृति कुण्डलों से उनके कान बड़े कमनीय मालूम पड़ते थे। उनकी आभा से कपोलों का सौन्दर्य और भी खिल उठता था। जब वे विलास के साथ हँस देते, तो उनके मुख पर निरन्तर रहने वाले आनन्द में मानो बाढ़-सी आ जाती। सभी नर-नारी अपने नेत्रों के प्यालों से उनके मुख की माधुरी का निरन्तर पान करते रहते, परन्तु तृप्त नहीं होते। वे उसका रस ले-लेकर आनन्दित तो होते ही, परन्तु पलकें गिरने से उनके गिराने वाले निमि पर खीझते भी। लीला पुरुषोत्तम भगवान अवतीर्ण हुए मथुरा में वसुदेव जी के घर, परन्तु वहाँ वे रहे नहीं, वहाँ से गोकुल में नन्दबाबा के घर चले गये। वहाँ अपना प्रयोजन-जो ग्वाल, गोपी और गौओं को सुखी करना था-पूरा करके मथुरा लौट आये। व्रज में, मथुरा में तथा द्वारका में रहकर अनेकों शत्रुओं का संहार किया। बहुत-सी स्त्रियों से विवाह करके हजारों पुत्र उत्पन्न किये। साथ ही लोगों में अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराने वाली अपनी वाणीस्वरूप श्रुतियों की मर्यादा स्थापित करने के लिये अनेक यज्ञों के द्वारा स्वयं अपना ही यजन किया। कौरव और पाण्डवों के बीच उत्पन्न हुए आपस के कलह से उन्होंने पृथ्वी का बहुत-सा भार हलका कर दिया और युद्ध में अपनी दृष्टि से ही राजाओं की बहुत-सी अक्षौहिणियों को ध्वंस करके संसार में अर्जुन की जीत का डंका पिटवा दिया। फिर उद्धव को आत्मतत्त्व का उपदेश किया और इसके बाद वे अपने परमधाम को सिधार गये। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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