AARYAM
AARYAM Nov 16, 2017

एक साधे सब सधे ? आर्यम

https://youtu.be/rp6MMQcDnrM

*"आर्यम-सूत्र"*

*एक साधे सब सधे*
*What is Deeksha !*

व्यक्ति जब एक बिंदु पर केंद्रित होता है अपने पूर्ण समर्पण के साथ एकनिष्ठ हो किसी सकारात्मक दिशा में तटस्थ बना रहता है और निरंतर गतिमान हो चलता रहता है तो फिर वहां से उसका जीवन *एक साधे सब सधे* की तर्ज़ पर उस अनंत परमात्मा की ओर बढ़ने लगता है।
किसी रोग के निदान के लिए यदि कोई रोगी होम्योपैथी, एलोपैथी, यूनानी या आयुर्वेद सभी चिकित्सा पद्धति को अपना कर उनका अनुसरण करने लगे तो फिर उससे उसे स्वास्थ्य लाभ की जगह हानि ही उठानी पड़ेगी! चूंकि एक पद्धति को अपना कर ही स्वास्थ्य लाभ पाया जा सकता है। उसी तरह आध्यात्म जगत में भी जिसे जिस मार्ग में आस्था व विश्वास है उसे वहीं रहना चाहिए, ताकि उस पद्धति के अनुसार पालना हो सके! यदि कोई ईधर भी भागे उधर भी भागे तो कुछ भी हासिल न हो सकेगा।
सन्यस्थ की अवस्था में पहुँच कर यह कोई भी कहता नही है! बल्कि सद्गुरु स्वयं अपने अनुभव व आंकलन के आधार पर शिष्यों की स्थिति या अवस्था के आधार पर उनकी भक्ति व योग्यता का स्थान तय करते हैं। गौर करने वाली बात यहां यह भी है कि आमजन अक्सर बने बनाए शब्दों के आधार पर उनके निहितार्थ भी वैसे ही लगाते हैं जबकि सदैव ऐसा होता नही है! 'सन्यास' शब्द का अभिप्राय किसी ऐसी व्यवस्था से भी नही है कि- कोई गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए हांथों में कमण्डल पकड़े हुए पैरों में खड़ाऊ पहन कर यायावरी जीवन ही व्यतीत करे! सन्यास से तात्पर्य यहां मुख्य धारा से जुड़े हुए होते हुए इतने दर्पित और सच्चे जीवन के अनुगामी बनें कि- फिर उस मनुष्य का जीवन ऐसी ऊंचाइयों पर हो जहां से वह सबके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बने! उसके शुभ कृत्य से लोगों के जीवन भी अवलंबित हों और समाज में उसकी योग्यता व अच्छाइयों के योगदान से सुंदर व शुभ वातावरण निर्मित हो। यदि सभी ईश्वरनुगामी सन्यस्थ हो हिमालय चले जाएं और समाज में कलुषित व स्वार्थी मानसिकता वाले चोर-उचक्के ही रह जाएं तो फिर सही दिशा देगा कौन? फिर सभी समाज को ही दोष मढ़ने लगेंगे कि-समाज बड़ा खराब है! आखिर हम सभी की जिम्मेदारी है समाज!
इसीलिए अच्छा होना जरूरी है, उसके लिए स्थान बदलने की आवश्यकता नही। कोई दुकान चलाता है तो अपने उस कार्य को पूरी क्षमता व गुणधर्मिता के साथ निभाए! व्यक्ति के व्यवहार से झलकना चाहिए कि वह किसी विशेष वर्ग से है। क्योंकि आध्यात्म मार्ग को हमने नही चुना बल्कि हमें ईश्वर ने इस मार्ग के लिए चुना है तो फिर हमारे हर कृत्य व व्यवहार से जाहिर होना चाहिए कि हमारे मार्ग में प्रभु की विशिष्ट ज्योति जली है तो फिर उसके प्रतिछाया दिखलाई पड़नी चाहिए कि आमजन होने में और प्रभुजन होने में कितना फर्क या अंतर आ जाता है...।
जारी...

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Shivani Apr 9, 2020

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय "कर्म भोग-प्रारब्ध" ll🌸🍁🌿🌻🌺🌻🌿🍁🌸 एक गाँव में एक किसान रहता था उसके परिवार में उसकी पत्नी और एक लड़का था ll कुछ सालों के बाद पत्नी मृत्यु हो गई उस समय लड़के की उम्र दस साल थी किसान ने दुसरी शादी कर ली, उस दुसरी पत्नी से भी किसान को एक पुत्र प्राप्त हुआ ll किसान की दुसरी पत्नी की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई किसान का बड़ा बेटा जो पहली पत्नी से प्राप्त हुआ था जब शादी के योग्य हुआ तब किसान ने बड़े बेटे की शादी कर दी ll फिर किसान की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई, किसान का छोटा बेटा जो दुसरी पत्नी से प्राप्त हुआ था और पहली पत्नी से प्राप्त बड़ा बेटा दोनो साथ साथ रहते थे ll कुछ टाईम बाद किसान के छोटे लड़के की तबीयत खराब रहने लगी ll बड़े भाई ने कुछ आस पास के वैद्यों से ईलाज करवाया पर कोई राहत ना मिली। छोटे भाई की दिन पर दिन तबीयत बिगड़ी जा रही थी और बहुत खर्च भी हो रहा था एक दिन बड़े भाई ने अपनी पत्नी से सलाह की, यदि ये छोटा भाई मर जाऐ तो हमें इसके ईलाज के लिऐ पैसा खर्च ना करना पड़ेगा ll तब उसकी पत्नी ने कहा: कि क्यों न किसी वैद्य से बात करके इसे जहर दे दिया जाऐ किसी को पता भी ना चलेगा कोई रिश्तेदारी में भी कोई शक ना करेगा कि बिमार था बिमारी से मृत्यु हो गई, बड़े भाई ने ऐसे ही किया एक वैद्य से बात की आप अपनी फीस बताओ और ऐसा करना मेरे छोटे भाई को जहर देना है, वैद्य ने बात मान ली और लड़के को जहर दे दिया और लड़के की मृत्यु हो गई ll उसके भाई भाभी ने खुशी मनाई की रास्ते का काँटा निकल गया अब सारी सम्पति अपनी हो गई, उसका अतिँम संस्कार कर दिया ll कुछ महीनो पश्चात उस किसान के बड़े लड़के की पत्नी को लड़का हुआ उन पति पत्नी ने खुब खुशी मनाई, बड़े ही लाड प्यार से लड़के की परवरिश की गिने दिनो में लड़का जवान हो गया। उन्होंने अपने लड़के की शादी कर दी शादी के कुछ समय बाद अचानक लड़का बीमार रहने लगा। माँ बाप ने उसके ईलाज के लिऐ बहुत वैद्यों से ईलाज करवाया, जिसने जितना पैसा माँगा दिया सब दिया कि लड़का ठीक हो जाऐ अपने लड़के के ईलाज में अपनी आधी सम्पति तक बेच दी पर लड़का बिमारी के कारण मरने की कगार पर आ गया, शरीर इतना ज्यादा कमजोर हो गया कि अस्थि पिजंर शेष रह गया था एक दिन लड़के को चारपाई पर लेटा रखा था और उसका पिता साथ में बैठा अपने पुत्र की ये दयनीय हालत देख कर दुःखी होकर उसकी और देख रहा था तभी लड़का अपने पिता से बोला, कि भाई! अपना सब हिसाब हो गया बस अब कफन और लकड़ी का हिसाब बाकी है उसकी तैयारी कर लो ll ये सुनकर उसके पिता ने सोचा कि लड़के का दिमाग भी काम ना कर रहा बीमारी के कारण और बोला बेटा मैं तेरा बाप हुँ, भाई नहीं ll तब लड़का बोला मै आपका वही भाई हुँ जिसे आप ने जहर खिलाकर मरवाया था जिस सम्पति के लिऐ आप ने मरवाया था मुझे अब वो मेरे ईलाज के लिऐ आधी बिक चुकी है आपकी की शेष है हमारा हिसाब हो गया तब उसका पिता फूट-फूट कर रोते हुवे बोला, कि मेरा तो कुल नाश हो गया जो किया मेरे आगे आ गया पर तेरी पत्नी का क्या दोष है जो इस बेचारी को जिन्दा जलाया जायेगा(उस समय सतीप्रथा थी, जिसमें पति के मरने के बाद पत्नी को पति की चिता के साथ जला दिया जाता था) तब वो लड़का बोला:-कि वो वैद्य कहाँ, जिसने मुझे जहर खिलाया था, तब उसके पिता ने कहा कि आपकी मृत्यु के तीन साल, बाद वो मर गया था तब लड़के ने कहा कि ये वही दुष्ट वैद्य आज मेरी पत्नी रुप में है मेरे मरने पर इसे जिन्दा जलाया जायेगा ll परमेश्वर कहते हैं कि तुमने उस दरगाह का महल ना देखा धर्मराज लेग,तिल तिल का लेखा एक लेवा एक देवा दुतम, कोई किसी का पिता ना पुत्रम, ऋण सबंध जुड़ा है ठाडा, अंत समय सब बारह बाटा ll ईस काहानी की सीख ये है की, हम आत्माओं के, किये हूये कर्मों का फल बहूत भारी है, कोई माने या ना माने, कोई जाने या ना जाने, जिसने जैसा बोया है वैसा ही ऊसने पाया है ll🙏🙏🕉🌿🕉🙏🙏

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GEETA DEVI Apr 9, 2020

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Minakshi Tiwari Apr 9, 2020

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sharda gupta Apr 9, 2020

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Somchand soni Apr 9, 2020

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sheela sharma Apr 9, 2020

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