Ishwari Sharma
Ishwari Sharma Oct 28, 2017

श्री हरि

श्री हरि

गोपाष्टमी कान्हा की गौ चारण लीला
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰
*कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने गौ-चारण लीला आरम्भ की थी।

गोपाष्टमी पूजन विधि
〰〰〰〰〰〰
इस दिन बछड़े सहित गाय का पूजन करने का विधान है। इस दिन प्रातः काल उठ कर नित्य कर्म से निवृत हो कर स्नान करते है, प्रातः काल ही गौओं और उनके बछड़ो को भी स्नान कराया जाता है। गौ माता के अंगो में मेहँदी, रोली हल्दी आदि के थापे लगाये जाते हैं, गायों को सजाया जाता है, प्रातः काल ही धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड, जलेबी, वस्त्र और जल से गौ माता की पूजा की जाती है और आरती उतरी जाती है।पूजन के बाद गौ ग्रास निकाला जाता है, गौ माता की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा के बाद गौओं के साथ कुछ दूर तक चला जाता है।

श्री कृष्ण की गौ-चारण लीला
〰〰〰〰〰〰〰〰〰
भगवान् ने जब छठे वर्ष की आयु में प्रवेश किया तब एक दिन भगवान् माता यशोदा से बोले – “मैय्या अब हम बड़े हो गए हैं”
मैय्या यशोदा बोली – “अच्छा लल्ला अब तुम बड़े हो गए हो तो बताओ अब क्या करें”
भगवान् ने कहा – “अब हम बछड़े चराने नहीं जाएंगे, अब हम गाय चराएंगे”
मैय्या ने कहा – “ठीक है बाबा से पूँछ लेना” मैय्या के इतना कहते ही झट से भगवान् नन्द बाबा से पूंछने पहुँच गए
बाबा ने कहा – “लाला अभी तुम बहुत छोटे हो अभी तुम बछड़े ही चाराओं”
भगवान् ने कहा – “बाबा अब में बछड़े नहीं जाएंगे, गाय ही चराऊँगा ”
जब भगवान नहीं मने तब बाबा बोले- “ठीक है लाल तुम पंडत जी को बुला लाओ- वह गौ चारण का महुर्त देख कर बता देंगे”
बाबा की बात सुनकर भगवान् झट से पंडत जी के पास पहुंचे और बोले – “पंडत जी ! आपको बाबा ने बुलाया है, गौ चारण का महुर्त देखना है, आप आज ही का महुर्त बता देना में आपको बहुत सारा माखन दुंगा” पंडित जी नन्द बाबा के पास पहुंचे और बार-बार पंचांग देख कर गड़ना करने लगे तब नन्द बाबा ने पूंछा “पंडित जी के बात है ? आप बार-बार के गिन रहे हैं ? पंडित जी बोले “क्या बताएं नन्दबाबा जी केवल आज का ही मुहुर्त निकल रहा है, इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहुर्त नहीं है” पंडित जी की बात सुन कर नंदबाबा ने भगवान् को गौ चारण की स्वीकृति दे दी। भगवान जी समय कोई कार्य करें वही शुभ-मुहुर्त बन जाता है। उसी दिन भगवान ने गौ चारण आरम्भ किया और वह शुभ तिथि थी “कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष अष्टमी” भगवान के गौ-चारण आरम्भ करने के कारण यह तिथि गोपाष्टमी कहलाई।
माता यशोदा ने अपने लल्ला के श्रृंगार किया और जैसे है पैरो में जूतियां पहनाने लगी तो लल्ला ने मना कर दिया और बोले “मैय्या यदि मेरी गौएँ जूतियाँ नहीं पहनती तो में कैसे पहन सकता हूँ। यदि पहना सकती हो तो उन सभी को भी जूतियां पहना दो” और भगवान जब तक वृन्दावन में रहे, भगवान ने कभी पैरो में जूतियां नहीं पहनी। आगे-आगे गौवें और उनके पीछे बांसुरी बजाते भगवान उनके पीछे बलराम और श्री कृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वाल-गोपाल इस प्रकार से विहार करते हुए भगवान् ने उस वन में प्रवेश किया तब से भगवान् की गौ-चारण लीला का आरम्भ हुआ। जब भगवान् गौएं चराते हुए वृन्दावन जाते तब उनके चरणो से वृन्दावन की भूमी अत्यन्त पावन हो जाती, वह वन गौओं के लिए हरी-भरी घास से युक्त एवं रंग-बिरंगे पुष्पों की खान बन गया था।

गोपाष्टमी से जुडी एक अन्य कथा भी है जो इस प्रकार है
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
गोपाष्टमी महोत्सव कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी महोत्सव मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से लेकर सप्तमी तक भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत धारण किया था। आठवें दिन इंद्र अहंकार रहित श्रीकृष्ण की शरण में आए तथा क्षमायाचना की। भगवान कृष्ण का “गोविन्द” नाम भी गायों की रक्षा करने के कारण पडा़ था। उसके बाद कामधेनु ने भगवान कृष्ण का अभिषेक किया और उसी दिन से इन्हें गोविन्द के नाम से पुकारा जाने लगा। तभी से कार्तिक शुक्ल अष्टमी को गोपाष्टमी का उत्सव मनाया जा रहा है। गौ अथवा गाय भारतीय संस्कृति का प्राण मानी जाती हैं। इन्हें बहुत ही पवित्र तथा पूज्यनीय माना जाता है। हिन्दु धर्म में यह पवित्र नदियों, पवित्र ग्रंथों आदि की तरह पूज्य माना गया है। शास्त्रों के अनुसार गाय समस्त प्राणियों की माता है। इसलिए आर्य संस्कृति में पनपे सभी सम्प्रदाय के लोग उपासना तथा कर्मकाण्ड की पद्धति अलग होने पर भी गाय के प्रति आदर भाव रखते हैं। गाय को दिव्य गुणों की स्वामिनी माना गया है और पृथ्वी पर यह साक्षात देवी के समान है।

धार्मिक मान्यताएँ
〰〰〰〰〰
गौ या गाय हमारी संस्कृति की प्राण है। यह गंगा, गायत्री, गीता, गोवर्धन और गोविन्द की तरह पूज्य है।

शास्त्रों में कहा गया है- *‘मातर: सर्वभूतानां गाव:’* यानी गाय समस्त प्राणियों की माता है। इसी कारण आर्य-संस्कृति में पनपे शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, जैन, बौद्ध, सिख आदि सभी धर्म-संप्रदायों में उपासना एवं कर्मकांड की पद्धतियों में भिन्नता होने पर भी वे सब गौ के प्रति आदर भाव रखते हैं।

हम गाय को ‘गोमाता’ कहकर संबोधित करते हैं। मान्यता है कि दिव्य गुणों की स्वामिनी गौ पृथ्वी पर साक्षात देवी के समान हैं।

सनातन धर्म के ग्रंथों में कहा गया है- ‘सर्वे देवा: स्थिता देहे सर्वदेवमयी हि गौ:।’ गाय की देह में समस्त देवी-देवताओं का वास होने से यह सर्वदेवमयी है।

मान्यता है कि जो मनुष्य प्रात: स्नान करके गौ स्पर्श करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है।

संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद हैं और वेदों में भी गाय की महत्ता और उसके अंग-प्रत्यंग में दिव्य शाक्तियां होने का वर्णन मिलता है।

गाय के गोबर में लक्ष्मी, गोमूत्र में भवानी, चरणों के अग्रभाग में आकाशचारी देवता, रंभाने की आवाज़ में प्रजापति और थनों में समुद्र प्रतिष्ठित हैं।

मान्यता है कि गौ के पैरों में लगी हुई मिट्टी का तिलक करने से तीर्थ-स्नान का पुण्य मिलता है। यानी सनातन धर्म में गौ को दूध देने वाला एक निरा पशु न मानकर सदा से ही उसे देवताओं की प्रतिनिधि माना गया है।

गाय के अंगों में देवी-देवताओं का निवास

पद्म पुराण के अनुसार गाय के मुख में चारों वेदों का निवास हैं। उसके सींगों में भगवान शंकर और विष्णु सदा विराजमान रहते हैं। गाय के उदर में कार्तिकेय, मस्तक में ब्रह्मा, ललाट में रुद्र, सीगों के अग्र भाग में इन्द्र, दोनों कानों में अश्विनीकुमार, नेत्रों में सूर्य और चंद्र, दांतों में गरुड़, जिह्वा में सरस्वती, अपान (गुदा) में सारे तीर्थ, मूत्र-स्थान में गंगा जी, रोमकूपों में ऋषि गण, पृष्ठभाग में यमराज, दक्षिण पार्श्व में वरुण एवं कुबेर, वाम पार्श्व में महाबली यक्ष, मुख के भीतर गंधर्व, नासिका के अग्रभाग में सर्प, खुरों के पिछले भाग में अप्सराएं स्थित हैं। भविष्य पुराण, स्कंद पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, महाभारत में भी गौ के अंग-प्रत्यंग में देवी-देवताओं की स्थिति का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।

गौ-सेवा का संकल्प
〰〰〰〰〰〰
माना जाता है कि गायों का समूह जहां बैठकर आराम से सांस लेता है, उस स्थान की न केवल शोभा बढ़ती है, बल्कि वहां का सारा पाप नष्ट हो जाता है।

तीर्थों में स्नान-दान करने से, ब्राह्मणों को भोजन कराने से, व्रत-उपवास और जप-तप और हवन-यज्ञ करने से जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य गौ को चारा या हरी घास खिलाने से प्राप्त हो जाता है।

गौ-सेवा से दुख-दुर्भाग्य दूर होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

जो मनुष्य गौ की श्रद्धापूर्वक पूजा-सेवा करते हैं, देवता उस पर सदैव प्रसन्न रहते हैं।

जिस घर में भोजन करने से पूर्व गौ-ग्रास निकाला जाता है, उस परिवार में अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती है।
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

Like Flower Jyot +198 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 111 शेयर

कामेंट्स

ऊँ🙏 शुभ पंचांग🌹शुभ राशिफल 🙏ऊँ

मंगलवार 2⃣1⃣अगस्त 2⃣0⃣1⃣8⃣

तिथि: एकादशी - पूर्ण रात्रि तक

#Astro Sunil Garg (Nail & Teeth)

#Whatsapp no :- 09911020152

सूर्योदय: ०५:५३
सूर्यास्त: १८:५४
हिन्दु सूर्योदय: ०५:५७
हिन्दु सूर्यास्त: १८:५०
चन्द्रोदय:...

(पूरा पढ़ें)
Pranam Like Flower +89 प्रतिक्रिया 12 कॉमेंट्स • 1155 शेयर

🌾💕🌾💕🌾💕🌾💕🌾💕🌾💕🌾💕🌾
🌾💕🌾 Good night ji 🌾💕🌾

Flower Pranam Like +63 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 377 शेयर
aayush rampal Aug 20, 2018

Pranam Flower Like +4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 71 शेयर
Ragni Dhiwar Aug 20, 2018

Like Pranam Flower +46 प्रतिक्रिया 12 कॉमेंट्स • 240 शेयर
T.K Aug 20, 2018

🌿shubhratri🌿

Belpatra Pranam Like +65 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 345 शेयर
T.K Aug 20, 2018

🌷suprabhat🌷

Flower Bell Fruits +11 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 63 शेयर
Anuradha Tiwari Aug 20, 2018

Like Pranam Jyot +16 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 127 शेयर
Babita m Aug 20, 2018

Like Pranam Flower +189 प्रतिक्रिया 68 कॉमेंट्स • 284 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB