Sn Vyas
Sn Vyas Oct 21, 2017

हमारी संस्कृति हमारी विरासत

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धर्म यात्रा

कर्कोटकेश्वर- संज्ञं च दशमं विद्धि पार्वती।
यस्य दर्शन मात्रेण विषैर्नैवाभिभूयते। ।

परिचय:

श्री कर्कोटकेश्वर महादेव की स्थापना की कथा कर्कोटक नामक सर्प और उसकी शिव आराधना से जुड़ी हुई है। श्री कर्कोटकेश्वर महादेव की कथा में धर्म आचरण की महत्ता दर्शाई गई है।

पौराणिक आधार एवं महत्व:

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार सर्पों की माता ने सर्पों के द्वारा अपना वचन भंग करने की दशा में श्राप दिया कि सारे सर्प जनमेजय के यज्ञ में जलकर भस्म हो जायेंगे। श्राप से भयभीत होकर कुछ सर्प हिमालय पर्वत पर तपस्या करने चले गए, कंबल नामक एक सर्प ब्रम्हाजी की शरण में गया और सर्प शंखचूड़ मणिपुर में गया। इसके साथ ही कालिया नामक सर्प यमुना में रहने चला गया, सर्प धृतराष्ट्र प्रयाग में, सर्प एलापत्रक ब्रम्ह्लोक में और अन्य सर्प कुरुक्षेत्र में जाकर तप करने लगे।

फिर सर्प एलापत्रक ने ब्रम्हाजी से कहा कि ‘प्रभु कृपया कोई उपाय बताइये जिससे हमें माता के श्राप से मुक्ति मिले और हमारा उद्धार हो। तब ब्रम्हाजी ने कहा आप महाकाल वन में जाकर महामाया के समीप स्थित देवताओं के स्वामी महादेव के दिव्य लिंग की आराधना करो। तब कर्कोटक नामक सर्प अपनी ही इच्छा से महामाया के पास स्थित दिव्य लिंग के सम्मुख बैठ शिव की स्तुति करने लगा। शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि जो नाग धर्म का आचरण करेंगे उनका विनाश नहीं होगा। तभी से उस लिंग को कर्कोटकेश्वर के नाम से जाना जाता है।

दर्शन लाभ:

माना जाता है कि श्री कर्कोटकेश्वर महादेव के दर्शन करने से कुल में सर्पों की पीड़ा नहीं होती है और वंश में वृद्धि होती है। यहाँ बारह मास ही दर्शन का महत्व है लेकिन पंचमी, चतुर्दशी, रविवार और श्रावण मास में दर्शन का विशेष महत्व माना गया है।

कहाँ स्थित है?

श्री कर्कोटकेश्वर महादेव उज्जयिनी के प्रसिद्ध श्री हरसिद्धि मंदिर प्रांगण में स्थित है। हरसिद्धि दर्शन करने वाले लगभग सभी भक्तगण श्री कर्कोटकेश्वर महादेव की आराधना कर दर्शन लाभ लेते हैं।

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white beauty Aug 8, 2020

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Shakti Aug 8, 2020

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Shakti Aug 8, 2020

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🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮 *आज का प्रेरक प्रसंग 👇👇👇* *!! किसान की घड़ी !!* ----------------------------------------------------- एक बार एक किसान की घड़ी कहीं खो गयी. वैसे तो घडी कीमती नहीं थी पर किसान उससे भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ था और किसी भी तरह उसे वापस पाना चाहता था. उसने खुद भी घडी खोजने का बहुत प्रयास किया, कभी कमरे में खोजता तो कभी बाड़े तो कभी अनाज के ढेर में ….पर तामाम कोशिशों के बाद भी घड़ी नहीं मिली. उसने निश्चय किया की वो इस काम में बच्चों की मदद लेगा और उसने आवाज लगाई , ” सुनो बच्चों , तुममे से जो कोई भी मेरी खोई घडी खोज देगा उसे मैं 100 रुपये इनाम में दूंगा.” फिर क्या था, सभी बच्चे जोर-शोर से इस काम में लग गए…वे हर जगह की ख़ाक छानने लगे, ऊपर-नीचे, बाहर, आँगन में ..हर जगह…पर घंटो बीत जाने पर भी घडी नहीं मिली. अब लगभग सभी बच्चे हार मान चुके थे और किसान को भी यही लगा की घड़ी नहीं मिलेगी, तभी एक लड़का उसके पास आया और बोला, ” काका मुझे एक मौका और दीजिये, पर इस बार मैं ये काम अकेले ही करना चाहूँगा.” किसान का क्या जा रहा था, उसे तो घडी चाहिए थी, उसने तुरंत हाँ कर दी. लड़का एक-एक कर के घर के कमरों में जाने लगा…और जब वह किसान के शयन कक्ष से निकला तो घड़ी उसके हाथ में थी. किसान घड़ी देख प्रसन्न हो गया और अचरज से पूछा,” बेटा, कहाँ थी ये घड़ी, और जहाँ हम सभी असफल हो गए तुमने इसे कैसे ढूंढ निकाला ?” लड़का बोला,” काका मैंने कुछ नहीं किया बस मैं कमरे में गया और चुप-चाप बैठ गया, और घड़ी की आवाज़ पर ध्यान केन्द्रित करने लगा, कमरे में शांति होने के कारण मुझे घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे गयी , जिससे मैंने उसकी दिशा का अंदाजा लगा लिया और आलमारी के पीछे गिरी ये घड़ी खोज निकाली.” *शिक्षा :-* *जिस तरह कमरे की शांति, घड़ी ढूढने में मददगार साबित हुई उसी प्रकार मन की शांति हमें Life की ज़रूरी चीजें समझने में मददगार होती है. हर दिन हमें अपने लिए थोडा वक़्त निकालना चाहिए, जसमे हम बिलकुल अकेले हों, जिसमे हम शांति से बैठ कर खुद से बात कर सकें और अपने भीतर की आवाज़ को सुन सकें, तभी हम Life को और अच्छे ढंग से जी पायेंगे। : 🛑🛑🛑🛑 *मैं कौन हूँ*🛑🛑🛑🛑 *एक था भिखारी ! रेल सफ़र में भीख़ माँगने के दौरान एक सूट बूट पहने सेठ जी उसे दिखे। उसने सोचा कि यह व्यक्ति बहुत अमीर लगता है, इससे भीख़ माँगने पर यह मुझे जरूर अच्छे पैसे देगा। वह उस सेठ से भीख़ माँगने लगा।* भिख़ारी को देखकर उस सेठ ने कहा, “तुम हमेशा मांगते ही हो, क्या कभी किसी को कुछ देते भी हो?” *भिख़ारी बोला, “साहब मैं तो भिख़ारी हूँ, हमेशा लोगों से मांगता ही रहता हूँ, मेरी इतनी औकात कहाँ कि किसी को कुछ दे सकूँ?”* सेठ:- जब किसी को कुछ दे नहीं सकते तो तुम्हें मांगने का भी कोई हक़ नहीं है। मैं एक व्यापारी हूँ और लेन-देन में ही विश्वास करता हूँ, अगर तुम्हारे पास मुझे कुछ देने को हो तभी मैं तुम्हे बदले में कुछ दे सकता हूँ। *तभी वह स्टेशन आ गया जहाँ पर उस सेठ को उतरना था, वह ट्रेन से उतरा और चला गया।* इधर भिख़ारी सेठ की कही गई बात के बारे में सोचने लगा। सेठ के द्वारा कही गयीं बात उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह सोचने लगा कि शायद मुझे भीख में अधिक पैसा इसीलिए नहीं मिलता क्योकि मैं उसके बदले में किसी को कुछ दे नहीं पाता हूँ। लेकिन मैं तो भिखारी हूँ, किसी को कुछ देने लायक भी नहीं हूँ।लेकिन कब तक मैं लोगों को बिना कुछ दिए केवल मांगता ही रहूँगा। *बहुत सोचने के बाद भिख़ारी ने निर्णय किया कि जो भी व्यक्ति उसे भीख देगा तो उसके बदले मे वह भी उस व्यक्ति को कुछ जरूर देगा। लेकिन अब उसके दिमाग में यह प्रश्न चल रहा था कि वह खुद भिख़ारी है तो भीख के बदले में वह दूसरों को क्या दे सकता है?* इस बात को सोचते हुए दिनभर गुजरा लेकिन उसे अपने प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला। *दुसरे दिन जब वह स्टेशन के पास बैठा हुआ था तभी उसकी नजर कुछ फूलों पर पड़ी जो स्टेशन के आस-पास के पौधों पर खिल रहे थे, उसने सोचा, क्यों न मैं लोगों को भीख़ के बदले कुछ फूल दे दिया करूँ। उसको अपना यह विचार अच्छा लगा और उसने वहां से कुछ फूल तोड़ लिए।* वह ट्रेन में भीख मांगने पहुंचा। जब भी कोई उसे भीख देता तो उसके बदले में वह भीख देने वाले को कुछ फूल दे देता। उन फूलों को लोग खुश होकर अपने पास रख लेते थे। अब भिख़ारी रोज फूल तोड़ता और भीख के बदले में उन फूलों को लोगों में बांट देता था। *कुछ ही दिनों में उसने महसूस किया कि अब उसे बहुत अधिक लोग भीख देने लगे हैं। वह स्टेशन के पास के सभी फूलों को तोड़ लाता था। जब तक उसके पास फूल रहते थे तब तक उसे बहुत से लोग भीख देते थे। लेकिन जब फूल बांटते बांटते ख़त्म हो जाते तो उसे भीख भी नहीं मिलती थी,अब रोज ऐसा ही चलता रहा। एक दिन जब वह भीख मांग रहा था तो उसने देखा कि वही सेठ ट्रेन में बैठे है जिसकी वजह से उसे भीख के बदले फूल देने की प्रेरणा मिली थी। *वह तुरंत उस व्यक्ति के पास पहुंच गया और भीख मांगते हुए बोला, आज मेरे पास आपको देने के लिए कुछ फूल हैं, आप मुझे भीख दीजिये बदले में मैं आपको कुछ फूल दूंगा।* सेठ ने उसे भीख के रूप में कुछ पैसे दे दिए और भिख़ारी ने कुछ फूल उसे दे दिए। उस सेठ को यह बात बहुत पसंद आयी। *सेठ:- वाह क्या बात है..? आज तुम भी मेरी तरह एक व्यापारी बन गए हो, इतना कहकर फूल लेकर वह सेठ स्टेशन पर उतर गया।* लेकिन उस सेठ द्वारा कही गई बात एक बार फिर से उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह बार-बार उस सेठ के द्वारा कही गई बात के बारे में सोचने लगा और बहुत खुश होने लगा। उसकी आँखे अब चमकने लगीं, उसे लगने लगा कि अब उसके हाथ सफलता की वह चाबी लग गई है जिसके द्वारा वह अपने जीवन को बदल सकता है। *वह तुरंत ट्रेन से नीचे उतरा और उत्साहित होकर बहुत तेज आवाज में ऊपर आसमान की ओर देखकर बोला, “मैं भिखारी नहीं हूँ, मैं तो एक व्यापारी हूँ..* मैं भी उस सेठ जैसा बन सकता हूँ.. मैं भी अमीर बन सकता हूँ! *लोगों ने उसे देखा तो सोचा कि शायद यह भिख़ारी पागल हो गया है, अगले दिन से वह भिख़ारी उस स्टेशन पर फिर कभी नहीं दिखा।* एक वर्ष बाद इसी स्टेशन पर दो व्यक्ति सूट बूट पहने हुए यात्रा कर रहे थे। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उनमे से एक ने दूसरे को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा, “क्या आपने मुझे पहचाना?” सेठ:- “नहीं तो ! शायद हम लोग पहली बार मिल रहे हैं। *भिखारी:- सेठ जी.. आप याद कीजिए, हम पहली बार नहीं बल्कि तीसरी बार मिल रहे हैं।* सेठ:- मुझे याद नहीं आ रहा, वैसे हम पहले दो बार कब मिले थे? अब पहला व्यक्ति मुस्कुराया और बोला: हम पहले भी दो बार इसी ट्रेन में मिले थे, मैं वही भिख़ारी हूँ जिसको आपने पहली मुलाकात में बताया कि मुझे जीवन में क्या करना चाहिए और दूसरी मुलाकात में बताया कि मैं वास्तव में कौन हूँ। *नतीजा यह निकला कि आज मैं फूलों का एक बहुत बड़ा व्यापारी हूँ और इसी व्यापार के काम से दूसरे शहर जा रहा हूँ।* आपने मुझे पहली मुलाकात में प्रकृति का नियम बताया था... जिसके अनुसार हमें तभी कुछ मिलता है, जब हम कुछ देते हैं। लेन देन का यह नियम वास्तव में काम करता है, मैंने यह बहुत अच्छी तरह महसूस किया है, लेकिन मैं खुद को हमेशा भिख़ारी ही समझता रहा, इससे ऊपर उठकर मैंने कभी सोचा ही नहीं था और जब आपसे मेरी दूसरी मुलाकात हुई तब आपने मुझे बताया कि मैं एक व्यापारी बन चुका हूँ। अब मैं समझ चुका था कि मैं वास्तव में एक भिखारी नहीं बल्कि व्यापारी बन चुका हूँ। *भारतीय मनीषियों ने संभवतः इसीलिए स्वयं को जानने पर सबसे अधिक जोर दिया और फिर कहा -* सोऽहं शिवोहम !! समझ की ही तो बात है... *भिखारी ने स्वयं को जब तक भिखारी समझा, वह भिखारी रहा | उसने स्वयं को व्यापारी मान लिया, व्यापारी बन गया |* जिस दिन हम समझ लेंगे कि मैं कौन हूँ... *अर्थात मैं भगवान का अंश हूॅ।* फिर जानने समझने को रह ही क्या जाएगा ? 🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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Shakti Aug 7, 2020

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Sunita Pawar Aug 6, 2020

आइए जानते हैं इस दिव्य वृक्ष पारिजात के बारे में जिसे आज माननीय प्रधानमंत्री जी ने भूमि पूजन से पहले अयोध्या की पावन भूमि पर लगाया और भगवान रामजी से क्या संबंध हैं इस वृक्ष का सुगंधित पुष्प को हरसिंगार के नाम से भी जाना जाता है बता दें कि पारिजात का पेड़ बहुत खूबसूरत होता है। पारिजात के फूल को भगवान हरि के श्रृंगार और पूजन में प्रयोग किया जाता है, इसलिए इस मनमोहक और सुगंधित पुष्प को हरसिंगार के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म में इस वृक्ष का बहुत महत्व माना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि पारिजात को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है। इसमें बहुत बड़ी मात्रा में फूल लगते हैं पारिजात का वृक्ष ऊंचाई में दस से पच्चीस फीट तक का होता है। इसके इस वृक्ष की एक खास बात ये भी है कि इसमें बहुत बड़ी मात्रा में फूल लगते हैं। एक दिन में इसके कितने भी फूल तोड़े जाएं, अगले दिन इस फिर बड़ी मात्रा में फूल खिल जाते हैं। यह वृक्ष खासतौर से मध्य भारत और हिमालय की नीची तराइयों में अधिक उगता है। सिर्फ पांच प्रजातियां पाई जाती हैं ये फूल रात में ही खिलता है और सुबह होते ही इसके सारे फूल झड़ जाते हैं। इसलिए इसे रात की रानी भी कहा जाता है। हरसिंगार का फूल पश्चिम बंगाल का राजकीय पुष्प भी है। दुनिया भर में इसकी सिर्फ पांच प्रजातियां पाई जाती हैं। पूजा के लिए इस वृक्ष से फूल तोड़ना पूरी तरह से निषिद्ध कहा जाता है कि धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के फूल अत्यंत प्रिय हैं। पूजा-पाठ के दौरान मां लक्ष्मी को ये फूल चढ़ाने से वो प्रसन्न होती हैं। खास बात ये है कि पूजा-पाठ में पारिजात के वे ही फूल इस्तेमाल किए जाते हैं जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते हैं। पूजा के लिए इस वृक्ष से फूल तोड़ना पूरी तरह से निषिद्ध है। ऐसा कहा या माना जाता है क‍ि 14 साल के वनवास के दौरान सीता माता हरसिंगार के फूलों से ही अपना श्रृंगार करती थीं। महाभारतकालीन पारिजात वृक्ष बाराबंकी जिले के पारिजात वृक्ष को महाभारतकालीन माना जाता है जो लगभग 45 फीट ऊंचा है। मान्यता है कि परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी, जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में लगाया था। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान माता कुंती ने पारिजात पुष्प से शिव पूजन करने की इच्छा जाहिर की थी। माता की इच्छा पूरी करने के लिए अर्जुन ने स्वर्ग से इस वृक्ष को लाकर यहां स्थापित कर दिया था। तभी से इस वृक्ष की पूजा अर्चना की जाती रही है। पारिजात को कल्पवृक्ष भी कहा गया है हरिवंश पुराण में पारिजात को कल्पवृक्ष भी कहा गया है। मान्यता है कि स्वर्गलोक में इसको स्पर्श करने का अधिकार सिर्फ उर्वशी नाम की अप्सरा को था। इस वृक्ष के स्पर्श मात्र से ही उर्वशी की सारी थकान मिट जाती थी। आज भी लोग मानते हैं कि इसकी छाया में बैठने से सारी थकावट दूर हो जाती है। फूलों के रस के सेवन से हृदय रोग से बचा जा सकता है पारिजात अपने औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। हर दिन इसके एक बीज के सेवन से बवासीर रोग ठीक हो जाता है। इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम माने जाते हैं। इनके फूलों के रस के सेवन से हृदय रोग से बचा जा सकता है। इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर खाने से सूखी खांसी भी ठीक हो जाती है। पारिजात की पत्तियों से त्वचा संबंधित रोग ठीक हो जाते हैं।🙏

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Swami Lokeshanand Aug 7, 2020

तुलसीदासजी ने विचित्र चौपाइयाँ लिखीं। "मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा" और "भवन एक पुनि दीख सुहावा" एक विभीषण के ही घर को घर कहा, रावण सहित शेष राक्षसों के घरों को घर नहीं कहा, मंदिर कह दिया। और जब लंका में आग लग गयी, तब तुलसीदास जी ने लिखा- "जारा नगर निमिष एक माहीं। एक विभीषण कर गृह नाहीं॥" वह "घर" तो छूट गया, "मंदिर" सभी जल गए? विचार करें, आपका मंदिर वहाँ है जहाँ आपकी प्रीति का केन्द्र है। भवन उपयोग के लिए है, रहने के लिए है, प्रीत लगाने के लिए नहीं है। भवन से प्रीत लगाने वाला ही तो प्रेत बनता है। जिसे भवन से प्रीत है, उसे घर में ही आसक्ति है, गृहासक्ति है, तो घर ही उसके जीवन का लक्ष्य हो गया, मंदिर हो गया। जबकि विभीषण जिस घर में रहता है, विभीषण को उस घर में आसक्ति नहीं है। मंदिर तो वहाँ भी है, पर अलग से बना है- "हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा" इसे समझें, मंदिर दो प्रकार के हैं, देव मंदिर और देह मंदिर। विभीषण के मंदिर में देव पूजा होती है, वहाँ श्रीसीतारामजी विराजते हैं, वह तो देव मंदिर है। शेष सबमें देह की पूजा होती थी, वे देह मंदिर हैं। देखो, देह संभालो, पर उसे भी तो देखो जिससे यह जीवित है, उसी से इसकी कीमत है। हिसाब लगाओ! कितने टिन तेल, साबुन, पाउडर, क्रीम इस पर मले, कितना घी, गेहूँ, चावल, दाल, फल, सब्जी, मिठाइयाँ, पापड़, पकोड़े, अचार, चटनी, मुरब्बे इसे खिलाए, इसकी पूजा का कोई अंत है? देव को न जाने, देह को ही पूजे, इसी के सुख के लिए जीवन बिता दे, कमाना खाना और पैखाना ही जिसके जीवन का लक्ष्य है, वही तो असली राक्षस है। लोकेशानन्द कहता है कि अ दुनियावालों! इस देह की कितनी ही पूजा कर लो, सज़ा लो, संवार लो, इसे तो जलना ही पड़ेगा, जलना ही पड़ेगा। अब यह विडियो देखें- हनुमानजी ने देह मंदिरों में आग लगा दी- https://youtu.be/_DW_XzDxzQk

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