राधारानी-श्याम भजन

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होकर श्याम की दिवानी राधारानी नाचे

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Neha Sharma, Haryana Jan 22, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ रात्रि वंदन ठाकुर जी ने ली भक्त की परीक्षा............... 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 एक गाँव के बाहरी हिस्से में एक वृद्ध साधु बाबा छोटी से कुटिया बना कर रहते थे। वह ठाकुर जी के परम भक्त थे। स्वाभाव बहुत ही शांत और सरल। दिन-रात बस एक ही कार्य था, बस ठाकुर जी के ध्यान-भजन में खोए रहना। ना खाने की चिंता ना पीने की, चिंता रहती थी तो बस एक कि ठाकुर जी की सेवा कमी ना रह जाए। भोर से पूर्व ही जाग जाते, स्नान और नित्य कर्म से निवृत्त होते लग जाते ठाकुर जी की सेवा में। उनको स्नान कराते, धुले वस्त्र पहनाते, चंदन से तिलक करते, पुष्पों की माला पहनाते फिर उनका पूजन भजन आदि करते जंगल से लाये गए फलों से ठाकुर जी को भोग लगाते। बिल्कुल वैरागी थे, किसी से विशेष कुछ लेना देना नहीं था। फक्कड़ थे किन्तु किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते थे। यदि कोई कुछ दे गया तो स्वीकार कर लिया नहीं तो राधे-राधे। फक्कड़ होने पर भी एक विशेष गुण उनमे समाहित था, उनके द्वार पर यदि कोई भूखा व्यक्ति आ जाए तो वह उसको बिना कुछ खिलाए नहीं जाने देते थे। कुछ नहीं होता था तो जंगल से फल लाकर ही दे देते थे किन्तु कभी किसी को भूखा नहीं जाने दिया। यही स्तिथि ठाकुर जी के प्रति भी थी। उनको इस बात की सदैव चिंता सताती रहती थी कि कही ठाकुर जी किसी दिन भूखे ना रह जाएं। उनके पास कुछ होता तो था नहीं कही कोई कुछ दे जाता था तो भोजन बना लेते थे, अन्यथा वह अपने पास थोड़ा गुड अवश्य रखा करते थे। यदि भोजन बनाते थे तो पहले भोजन ठाकुर जी को अर्पित करते फिर स्वयं ग्रहण करते, किन्तु यदि कभी भोजन नहीं होता था तो गुड से ही काम चला लेते थे। थोड़ा गुड ठाकुर जी को अर्पित करते और फिर थोड़ा खुद खा कर पानी पी लेते थे। एक बार वर्षा ऋतु में कई दिन तक लगातार वर्षा होती रही, जंगल में हर और पानी ही पानी भर गया, जंगल से फल ला पान संभव नहीं रहा, उनके पास रखा गुड भी समाप्त होने वाला था। अब बाबा जी को बड़ी चिंता हुई, सोंचने लगे यदि वर्षा इसी प्रकार होती रही तो में जंगल से फल कैसे ला पाउँगा, ठाकुर जी को भोग कैसे लगाऊंगा, गुड भी समाप्त होने वाला है, ठाकुर जी तो भूखे ही रह जायेंगे, और यदि द्वार पर कोई भूखा व्यक्ति आ गया तो उसको क्या खिलाऊंगा। यह सोंचकर वह गहरी चिंता में डूब गए, उन्होंने एक निश्चय किया कि अब से में कुछ नहीं खाऊंगा, जो भी मेरे पास है वह ठाकुर जी और आने वालो के लिए रख लेता हूँ। ऐसा विचार करके उन्होंने कुछ भी खाना बंद कर दिया और मात्र जल पीकर ही गुजरा करने लगे, किन्तु ठाकुर जी को नियमित रूप से भोग देते रहे। बाबा जी की भक्ति देखकर ठाकुर जी अत्यन्त प्रसन्न हुए, किन्तु उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया। दो दिन बाद ठाकुर जी ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उनकी कुटिया में उस समय पहुंचे जब तेज वर्षा हो रही थी। वृद्ध ब्राह्मण को कुटिया पर आया देख साधु बाबा बहुत प्रसन्न हुए और उनको प्रेम पूर्वक कुटिया के अंदर ले गए। उनको प्रेम से बैठाया कुशल क्षेम पूँछी, तब वह ब्राहमण बड़ी ही दीन वाणी में बोला कि तीन दिन भूखा है, शरीर बहुत कमजोर हो गया है, यदि कुछ खाने का प्रबन्ध हो जाये तो बहुत कृपा होगी। तब साधु बाबा ने ठाकुर जी को मन ही मन धन्यवाद दिया कि उनकी प्रेरणा से ही वह कुछ गुड बचा पाने में सफल हुए। वह स्वयं भी तीन दिन से भूखे थे किन्तु उन्होंने यथा संभव गुड और जल उस ब्राह्मण को अर्पित करते हुए कहा कि श्रीमान जी इस समय तो इस कंगले के पास मात्र यही साधन उपलब्ध है, कृपया इसको ग्रहण करें। बाबा की निष्ठा देख ठाकुर जी अत्यन्त प्रसन्न थे, किन्तु उन्होंने अभी और परीक्षा लेने की ठानी, वह बोले इसके मेरी भूख भला कैसे मिटेगी, यदि कुछ फल आदि का प्रबंध हो तो ठीक रहेगा। अब बाबा जी बहुत चिंतित हुए, उनके द्वार से कोई भूखा लोटे यह उनको स्वीकार नही था, वह स्वयं वृद्ध थे, तीन दिन से भूखे थे, शरीर भूख निढाल था, किन्तु सामने विकट समस्या थी। उन्होंने उन ब्राह्मण से कहा ठीक है श्रीमान जी आप थोड़ा विश्राम कीजिये में फलों का प्रबन्ध करता हूँ। बाबा जी ने ठाकुर जी को प्रणाम किया और चल पड़े भीषण वर्षा में जंगल की और फल लाने। जंगल में भरा पानी था, पानी में अनेको विषैले जीव इधर-उधर बहते जा रहे थे, किन्तु किसी भी बात की चिन्ता किये बिना साधु बाबा, कृष्णा कृष्णा का जाप करते चलते रहे, उनको तो मात्र एक ही चिंता थी की द्वार पर आए ब्राह्मण देव भूखे ना लोट जाएं। जंगल पहुंच कर उन्होंने फल एकत्र किये और वापस चल दिए। कुटिया पर पहुंचे तो देखा कि ब्राह्मण देव उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे, बाबा जी ने वर्षा और भरे हुए पानी के कारण हुए विलम्ब के कारण उनसे क्षमा मांगी और फल उनको अर्पित किए। वह वृद्ध ब्राह्मण बोला बाबा जी आप भी तो ग्रहण कीजिये किन्तु वह बाबा जी बोले क्षमा करें श्रीमान जी, में अपने ठाकुर जी को अर्पित किए बिना कुछ भी ग्रहण नहीं करता, यह फल में आपके लिए लाया हूँ मेने इनका भोग ठाकुर जी को नही लगाया है। तब वह ब्राह्मण बोला ऐसा क्यों कह रह हैं आप ठाकुर जी को तो आपने अभी ही फल अर्पित किये हैं। बाबा बोले अरे ब्राह्मण देव क्यों परिहास कर रहे हैं, मेने कब अर्पित किये ठाकुर जी को फल। तब ब्राह्मण देव बोले अरे यदि मुझे पर विश्वाश नहीं तो जा कर देख लो अपने ठाकुर जी को, वह तो तुम्हारे द्वारा दिए फलों को प्रेम पूर्वक खा रहे हैं। ब्राह्मण देव की बात सुनकर बाबा जी ने जा कर देखा तो वह सभी फल ठाकुर जी के सम्मुख रखे थे जो उन्होंने ब्राह्मण देव को अर्पित किये थे। वह तुरंत बाहर आए और आकर ब्राह्मण देव के पेरो में पड़ गए और बोले कृपया बताएं आप को है। यह सुनकर श्री हरी वहां प्रत्यक्ष प्रकट हो गए, ठाकुर जी को देख वह वृद्ध बाबा अपनी सुध-बुध खो बैठे बस ठाकुर जी के चरणों से ऐसे लिपटे मानो प्रेम का झरना बह निकला हो, आँखों से अश्रुओं की धारा ऐसे बहे जा रही थी जैसे कुटिया में ही वर्षा होने लगी हो। ठाकुर जी ने उनको प्रेम पूर्वक उठाया और बोले तुम मेरे सच्चे भक्त हो, में तुम्हारी भक्ति तुम्हारी निष्ठा और प्रेम से अभिभूत हूँ, में तुम्हारी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करूँगा, कहो क्या चाहते हो। किन्तु साधु बाबा की तो मानो वाणी ही मारी गई हो, बस अश्रु ही बहे जा रहे थे, वाणी मौन थी, बहुत कठिनता से स्वयं को संयत करके बोले है नाथ जिसने आपको पा लिया हो उसको भला और क्या चाहिए। अब तो बस इन चरणों में आश्रय दे दीजिये, ऐसा कह कर वह पुनः ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़े। तब ठाकुर जी बोले मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता, मांगो क्या चाहते हो, कहो तो तुमको मुक्ति प्रदान करता हूँ , यह सुनते ही बाबा विचलित हो उठे तब बाबा बोले है हरी, है नाथ, मुझको यूं ना छलिये , में मुक्ति नहीं चाहता, यदि आप देना ही चाहते है, तो जन्मों-जन्मों तक इन चरणों का आश्रय दी जिए, है नाथ बस यही वरदान दी जिए कि में बार-बार इस धरती पर जन्म लूँ और हर जन्म में आपके श्री चरणों के ध्यान में लगा रहूँ, हर जन्म में इसी प्रकार आपको प्राप्त करता रहूँ। तब श्री हरी बोले तथास्तु, भगवान् के ऐसा कहते ही साधु बाबा के प्राण श्री हरी में विलीन हो गए। हरे कृष्णा जय जय श्रीराधे 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 जब देवी सीता को उठाने पड़े हथियार यह कथा आप नहीं जानते हैं जब राजा राम ने नहीं, देवी सीता ने चलाए बाण.... भगवान श्रीराम राजसभा में विराज रहे थे उसी समय विभीषण वहां पहुंचे। वे बहुत भयभीत और हड़बड़ी में लग रहे थे। सभा में प्रवेश करते ही वे कहने लगे- हे राम! मुझे बचाइए, कुंभकर्ण का बेटा मूलकासुर आफत ढा रहा है। अब लगता है, न लंका बचेगी और न मेरा राजपाट। भगवान श्रीराम द्वारा ढांढस बंधाए जाने और पूरी बात बताए जाने पर विभीषण ने बताया कि कुंभकर्ण का एक बेटा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था इसलिए उस का नाम मूलकासुर रखा गया। इसे अशुभ जान कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था। जंगल में मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाल लिया। मूलकासुर जब बड़ा हुआ तो उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया। अब उनके दिए वर और बल के घमंड में भयानक उत्पात मचा रखा है। जब जंगल में उसे पता चला कि आपने उसके खानदान का सफाया कर लंका जीत ली और राजपाट मुझे सौंप दिया है, तो वह क्रोधित है। भगवन्, आपने जिस दिन मुझे राजपाट सौंपा उसके कुछ दिन बाद ही उसने पातालवासियों के साथ लंका पहुंचकर मुझ पर धावा बोल दिया। मैंने 6 महीने तक मुकाबला किया, पर ब्रह्माजी के वरदान ने उसे इतना ताकतवर बना दिया है कि मुझे भागना पड़ा तथा अपने बेटे, मंत्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग के जरिए भागकर यहां पहुंचा हूं। उसने कहा कि 'पहले धोखेबाज भेदिया विभीषण को मारूंगा फिर पिता की हत्या करने वाले राम को भी मार डालूंगा। वह आपके पास भी आता ही होगा। समय कम है, लंका और अयोध्या दोनों खतरे में हैं। जो उचित समझते हों तुरंत कीजिए।' भक्त की पुकार सुन श्रीरामजी हनुमान तथा लक्ष्मण सहित सेना को तैयार कर पुष्पक यान पर चढ़ झट लंका की ओर चल पड़े। मूलकासुर को श्रीरामचन्द्र के आने की बात मालूम हुई, वह भी सेना लेकर लड़ने के लिए लंका के बाहर आ डटा। भयानक युद्ध छिड़ गया। 7 दिनों तक घोर युद्ध होता रहा। मूलकासुर भगवान श्रीराम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था। अयोध्या से सुमंत्र आदि सभी मंत्री भी आ पहुंचे। हनुमानजी संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते जा रहे थे। पर सब कुछ होते हुए भी युद्ध का नतीजा उनके पक्ष में जाता नहीं दिख रहा था। भगवान भी चिंता में थे। विभीषण ने बताया कि इस समय मूलकासुर तंत्र-साधना करने गुप्त गुफा में गया है। उसी समय ब्रह्माजी वहां आए और भगवान से कहने लगे- 'रघुनंदन! इसे तो मैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है। आपका प्रयास बेकार ही जाएगा। श्रीराम, इससे संबंधित एक बात और है, उसे भी जान लेना फायदेमंद हो सकता है। जब इसके भाई-बिरादर लंका युद्ध में मारे जा चुके तो एक दिन इसने मुनियों के बीच दुखी होकर कहा, 'चंडी सीता के कारण मेरा समूचा कुल नष्ट हुआ'। इस पर एक मुनि ने नाराज होकर उसे शाप दे दिया- 'दुष्ट! तूने जिसे 'चंडी' कहा है, वही सीता तेरी जान लेगी।' मुनि का इतना कहना था कि वह उन्हें खा गया बाकी मुनि उसके डर से चुपचाप खिसक गए। तो हे राम! अब कोई दूसरा उपाय नहीं है। अब तो केवल सीता ही इसका वध कर सकती हैं। आप उन्हें यहां बुलाकर इसका वध करवाइए, इतना कहकर ब्रह्माजी चले गए। भगवान श्रीराम ने हनुमानजी और गरूड़ को तुरंत पुष्पक विमान से सीताजी को लाने भेजा। इधर सीता देवी-देवताओं की मनौती मनातीं, तुलसी, शिव-प्रतिमा, पीपल आदि के फेरे लगातीं, ब्राह्मणों से 'पाठ, रुद्राक्ष धारण करती है।

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Naresh Shakya Jan 22, 2020

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Amit Kumar Jan 22, 2020

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gopal jalan Jan 22, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 22, 2020

ओम् श्री गणेशाय नमः जय श्री राधेकृष्णा शुभ प्रभात वंदन : और.. कान्हा लुट गये - . एक बार एक पंडित जी थे, वो रोज घर घर जा के भगवत गीता का पाठ करते तथा कान्हा की कथा सुनाते थे | . एक दिन उन्हे एक चोर ने पकड़ लिया और उसे कहा तेरे पास जो कुछ भी है मुझे दे दो , . तब वो पंडित बोला की बेटा मेरे पास कुछ भी नहीं है, तुम एक काम करना मैं यहीं पड़ोस के घर मैं जाके भगवत गीता का पाठ करता हूँ, . वो यजमान बहुत दानी लोग हैं, जब मैं कथा सुना रहा होऊंगा तुम उनके घर में जाके चोरी कर लेना, चोर मान गया . अगले दिन जब पंडित जी कथा सुना रहे थे तब वो चोर भी वहां आ गया, . तब पंडितजी बोले की यहाँ से मीलों दूर एक गाँव है वृन्दावन, वहां पे एक लड़का रहता है, जिसका नाम कान्हा है, . वो हीरों जवाहरातों से लड़ा रहता है, अगर कोई लूटना चाहता है तो उसको लूटो वो रोज रात को एक पीपल के पेड़ के नीचे आता है, जिसके आस पास बहुत सी झाडिया हैं... . चोर ने ये सुना और ख़ुशी ख़ुशी वहां से चला गया, वो अपने घर गया और अपनी बीवी से बोला आज मैं एक कान्हा नाम के बच्चे को लुटने जा रहा हूँ , . मुझे रास्ते में खाने के लिए कुछ बांध दे , पत्नी ने कुछ सत्तू उसको दे दिया और कहा की बस यही है जो भी है, . चोर वहां से ये संकल्प लेके चला कि अब तो में उस कान्हा को लुट के ही आऊंगा, वो बेचारा पैदल पैदल टूटे चप्पल में ही वहां से चल पड़ा, . रास्ते में बस कान्हा का नाम लेते हुए, वो अगले दिन शाम को वहां पहुंचा जो जगह उसे पंडित जी ने बताई थी, . अब वहां पहुँच के उसने सोचा कि अगर में यहीं सामने खड़ा हो गया तो बच्चा मुझे देख के भाग जायेगा तो मेरा यहाँ आना बेकार हो जायेगा, . इसलिए उसने सोचा क्यूँ न पास वाली झाड़ियों में ही छुप जाऊ, वो जैसे ही झाड़ियों में घुसा, . झाड़ियों के कांटे उसे चुभने लगे, उस समय उसके मुंह से एक ही आवाज आयी कान्हा, कान्हा , . उसका शरीर लहू लुहान हो गया पर मुंह से सिर्फ यही निकला, कि कान्हा आ जाओ, . अपने भक्त कि ऐसी दशा देख के कान्हा जी चल पड़े तभी लक्ष्मी जी बोली कि प्रभु कहाँ जा रहे हो वो आपको लूट लेगा, . प्रभु बोले कि कोई बात नहीं अपने ऐसे भक्तों के लिए तो में लुट जाना तो क्या मिट जाना भी पसंद करूँगा, . और ठाकुरजी बच्चे का रूप बना के आधी रात को वहां आए वो जैसे ही पेड़ के पास पहुंचे चोर एक दम से बाहर आ गया और उन्हें पकड़ लिया, . और बोला कि ओ कान्हा तुने मुझे बहुत दुखी किया है, अब ये चाकू देख रहा है न, अब चुपचाप अपने सारे गहने , मुझे दे दे . कान्हा जी ने हँसते हुए उसे सब कुछ दे दिया, वो चोर हंसी ख़ुशी अगले दिन अपने गाँव में वापिस पहुंचा, . और सबसे पहले उसी जगह गया जहाँ पे वो पंडित जी कथा सुना रहे थे, और जितने भी गहने वो चोरी करके लाया था उनका आधा उसने पंडित जी के चरणों में रख दिया, . जब पंडित ने पूछा कि ये क्या है, तब उसने कहा अपने ही मुझे उस कान्हा का पता दिया था में उसको लूट के आया हूँ, और ये आपका हिस्सा है, . पंडित ने सुना और उसे यकीन ही नहीं हुआ, वो बोला कि में इतने सालों से पंडिताई कर रहा हूँ वो मुझे आज तक नहीं मिला, . तुझ जैसे पापी को कान्हा कहाँ से मिल सकता है, चोर के बार बार कहने पर पंडित बोला कि चल में भी चलता हूँ तेरे साथ वहां पर, मुझे भी दिखा कि कान्हा कैसा दिखता है, . और वो दोनों चल दिए, चोर ने पंडित जी को कहा कि आओ मेरे साथ यहाँ पे छुप जाओ, और काटो के कारण दोनों का शरीर लहू लुहान हो गया, और मुंह से बस एक ही आवाज निकली कान्हा,कान्हा, . ठीक मध्य रात्रि कान्हा बच्चे के रूप में फिर वहीँ आये , और दोनों झाड़ियों से बाहर निकल आये, . पंडित कि आँखों में आंसू थे वो फूट फूट के रोने लग गया, और जाके चोर के चरणों में गिर गया और बोला कि . हम जिसे आज तक देखने के लिए तरसते रहे, जो आज तक लोगो को लुटता आया है, तुमने उसे ही लूट लिया तुम धन्य हो, . आज तुम्हारी वजह से मुझे कान्हा के दर्शन हुए हैं, तुम धन्य हो.. ऐसा है हमारे कान्हा का प्यार, अपने सच्चे भक्तों के लिए , . जो उसे सच्चे दिल से पुकारते हैं, तो वो भागे भागे चले आते हैं .. हरि ओम्🌹🌹🚩🚩🌹🌹 [1क्षमाप्रार्थना बहुत जरूरी है पूजा में । हम परमात्मा की पूजा अर्चना में जितना समय लगाते हैं , 24 घंटों में बस वही पल सार्थक होते हैं। उन क्षणों में हमारी बुद्धि सात्विक रहती है। हम अपनी दुष्प्रवृत्तियों से दूर रहते हैं। शेष सारा समय तो सांसारिकता में ही बीतता है। पूरी दिनचर्या में जाने-अनजाने ही हमसे बहुत सी गलतियां होती रहती हैं। प्रयास तो ऐसा होना चाहिए कि ये त्रुटियां कम से कम हों , लेकिन जो भूलवश हो जाएं , उनके लिए क्षमायाचना करनी जरूरी है। त्रुटियों का प्रायश्चित करने के लिए आवश्यक है कि हम उस परमपिता से क्षमायाचना करें , जिसने इस समूचे संसार की रचना की है। इसी के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि हम इस बात का ख्याल रखें कि उन गलतियों की पुनरावृत्ति न हो। इसके लिए हमें अत्यधिक सावधान और सचेष्ट रहना चाहिए। पूजा के प्रारंभ में गणेश की वंदना तथा अंत में आरती , शांति पाठ तथा क्षमायाचना की जाती है। इसके अंतर्गत देव अपराध समापन स्त्रोत का पाठ किया जाता है। श्री दुर्गा सप्तशती आदि ग्रंथों के अंत में यह विस्तार से दिया गया होता है। इसका अर्थ यही है कि हमें मंत्रों तथा पूजन आदि के बारे में ठीक से नहीं पता है , अत: कृपा पूर्वक हमारे अपराध क्षमा करो। अपने प्रभु से क्षमायाचना करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह भक्त के अंदर याचक होने का भाव भरता है। हमारे दर्प भरे मस्तक को सबसे बड़े दाता के दर पर झुका देता है। हमारे प्राचीन मनीषियों ने हमारे अहंकार को तोड़ने के लिए ही यह उपाय खोजा था कि हम केवल प्रार्थना , उपासना और आराधना ही नहीं , बल्कि साथ में ईश्वर से अपने अपराधों के प्रति क्षमा याचना भी अवश्य करें। अपनी गलती को स्वीकारने और उसके लिए क्षमा मांगने में संकोच न करें। वस्तुत: अहंकार क्षमा का शत्रु है। यदि तनिक सा भी अहंकार हमारे मन के किसी कोने में शेष है , तो हम किसी को क्षमा नहीं कर सकते और ऐसे में क्षमा याचना करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। याद रहे , जो किसी को क्षमा नहीं करता , वह क्षमा याचना करने का भी अधिकारी नहीं हो सकता। इसलिए क्षमायाचना वही कर सकता है , जो सभी को क्षमा करना जानता हो अर्थात क्षमा करना जिसके स्वभाव का अंग हो। इसके लिए विनम्रता और सहनशीलता की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए जैन मत में क्षमा का इतना महत्व है कि इसके लिए विशेष रूप से क्षमावणी दिवस मनाया जाता है। ईश्वर के यहां हमारी क्षमा याचना तभी स्वीकार होती है , जबकि हम खुद दूसरों को क्षमा करते हों और भूल जाते हों। ईश्वर तो बहुत दयावान है। वह हमारी असंख्य त्रुटियों को क्षमा करता है। इसीलिए यदि हम क्षमा करने का दिव्य गुण सीख लेते हैं , तो ईश्वर भी हमें क्षमा करने में उदार हो जाता है। किंतु ध्यान रहे कि गुनाह , गलती तथा भूल में बहुत अंतर है। भूल , असावधानी का परिणाम है। गलती अनजाने में होती है , लेकिन गुनाह जान-बूझकर किया जाता है। परमात्मा से पूजा-अर्चन करते समय हमें इन तीनों के बारे में ही क्षमा याचना अवश्य करनी चाहिए। अन्यथा बुद्धि आत्मनिष्ठ नहीं हो पाती। भ्रांति , जड़ता और अहंकार आदि दोष दूर नहीं होते। परमात्मा की समीपता प्राप्त नहीं होती , अत: परमानंद की अनुभूति होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। परिणामत: सारी आध्यात्मिक यात्रा ही अधूरी रह जाती है। विभिन्न धर्मों में उपासना की पद्धतियां अलग-अलग हैं। इन सबके बावजूद कोई भी , कभी भी , कहीं भी , किसी तरह से भी अपने इष्ट , आराध्य का नाम ले सकता है। उसका ध्यान और सुमिरन कर सकता है , उसमें खो सकता है। परमात्मा सबकी सुनता है , बशर्ते हमारे अंदर पात्रता हो। अपनी पूजा-अर्चना में किसी कमी या भूल-चूक से वह कभी रुष्ट या क्रुद्ध नहीं होता। ये सब बातें तो मानव स्वभाव का हिस्सा हैं। क्षमायाचना करके हम मुक्त हो जाते हैं। प्रतिशोध की ज्वाला जब तक हृदय में शांत न हो जाए , तब तक श्रद्धा और भक्ति के अंकुर नहीं फूटते हैं। असहिष्णुता के बंधन नहीं टूटते हैं। इसलिए भक्त को सर्वप्रथम क्षमाशील तथा क्षमायाची बनना पड़ता है। क्षमाहीन के अपराध कभी क्षम्य नहीं होते। इसलिए अध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों को जैसे को तैसा , ईंट का जवाब पत्थर से देने तथा धूल चटाने जैसे कुभावों को अपने हृदय से निकाल देना चाहिए । हरि ओम्🙏🏽🙏🏽

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parm Krishna Jan 22, 2020

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