हर हर महादेव

|| #चौपाई ||

अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार।
बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार॥

आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति -मुक्ति -दातार।
करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार॥

पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार।
सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार॥

पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार।
ढरौ तुरन्त स्वभाववश, नेक न करौ अबार॥

जय शिव शङ्कर औढरदानी।
जय गिरितनया मातु भवानी॥

सर्वोत्तम योगी योगेश्वर।
सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर॥

सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता।
उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता॥

पराशक्ति - पति अखिल विश्वपति।
परब्रह्म परधाम परमगति॥

सर्वातीत अनन्य सर्वगत।
निजस्वरूप महिमामें स्थितरत॥

अंगभूति - भूषित श्मशानचर।
भुजंगभूषण चन्द्रमुकुटधर॥

वृषवाहन नंदीगणनायक।
अखिल विश्व के भाग्य-विधायक॥

व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर।
रीछचर्म ओढे गिरिजावर॥

कर त्रिशूल डमरूवर राजत।
अभय वरद मुद्रा शुभ साजत॥

तनु कर्पूर-गोर उज्ज्वलतम।
पिंगल जटाजूट सिर उत्तम॥

भाल त्रिपुण्ड्र मुण्डमालाधर।
गल रुद्राक्ष-माल शोभाकर॥

विधि-हरि-रुद्र त्रिविध वपुधारी।
बने सृजन-पालन-लयकारी॥

तुम हो नित्य दया के सागर।
आशुतोष आनन्द-उजागर॥

अति दयालु भोले भण्डारी।
अग-जग सबके मंगलकारी॥

सती-पार्वती के प्राणेश्वर।
स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर॥

हरि-हर एक रूप गुणशीला।
करत स्वामि-सेवक की लीला॥

रहते दोउ पूजत पुजवावत।
पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत॥

मारुति बन हरि-सेवा कीन्ही।
रामेश्वर बन सेवा लीन्ही॥

जग-जित घोर हलाहल पीकर।
बने सदाशिव नीलकंठ वर॥

असुरासुर शुचि वरद शुभंकर।
असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर॥

नम: शिवाय मन्त्र जपत मिटत सब क्लेश भयंकर॥

जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित।
तिनको शिव अति करत परमहित॥

श्रीकृष्ण तप कीन्हों भारी।
ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारी॥

अर्जुन संग लडे किरात बन।
दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन॥

भक्तन के सब कष्ट निवारे।
दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे॥

शङ्खचूड जालन्धर मारे।
दैत्य असंख्य प्राण हर तारे॥

अन्धकको गणपति पद दीन्हों।
शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों॥

तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं।
बाणासुर गणपति-गति कीन्हीं॥

अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय।
द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग ज्योतिर्मय॥

भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा।
अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा॥

काशी मरत जंतु अवलोकी।
देत मुक्ति -पद करत अशोकी॥

भक्त भगीरथ की रुचि राखी।
जटा बसी गंगा सुर साखी॥

रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी।
ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी॥

शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक।
शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक॥

इनके शुभ सुमिरनतें शंकर।
देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर॥

अति उदार करुणावरुणालय।
हरण दैन्य-दारिद्रय-दु:ख-भय॥

तुम्हरो भजन परम हितकारी।
विप्र शूद्र सब ही अधिकारी॥

बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं।
ते अलभ्य शिवपद को पावहिं॥

भेदशून्य तुम सबके स्वामी।
सहज सुहृद सेवक अनुगामी॥

जो जन शरण तुम्हारी आवत।
सकल दुरित तत्काल नशावत॥


|| दोहा ||

बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार।
गनौ न अघ, अघ-जाति कछु, सब विधि करो सँभार॥

तुम्हरो शील स्वभाव लखि, जो न शरण तव होय।
तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नहिं कुभाग्य जन कोय॥

दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार।
कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करो पाप सब छार॥

कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करो पवित्र।
राखो पदकमलनि सदा, हे कुपात्र के मित्र॥


।। इति श्री शिव चालीसा समाप्त ।।

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pankaj keshri Mar 3, 2021

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sn vyas Mar 4, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *चित्त के दर्पण को भगवान की भक्ति के* *जल से स्वच्छ कीजिए और तब आपको बिना* *परिश्रम के ही चिन्मय तत्त्व दिखाई दे जाएगा।* °"" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" ""° रामचरितमानस में वेद भगवान की स्तुति करते हुए कहा गया है कि वृक्ष को ऊपर से अगर कोई देखे तो उसे वृक्ष का एक बड़ा भाग तो दिखाई देता है परन्तु वृक्ष का मूल नहीं दिखाई देता। पर जो वृक्ष के मूल को देखना चाहे तो उसे सबसे पहले यह जानना होगा कि इसका मूल तो पृथ्वी की आड़ में छिपा हुआ है। जब व्यक्ति की दृष्टि ऊपर की ओर नहीं बल्कि नीचे पैठती है तब वह मूल को पहचान पाता है। इसलिए वेद भगवान की स्तुति करते हुए कहते हैं— *'अव्यक्त मूल'* -- प्रभु ! सृष्टि तो दिखाई दे रही है व्यक्त, पर वस्तुतः इसके मूल में अव्यक्त आप ही हैं। जो अव्यक्त है वही अपने आपको सृष्टि के रूप में व्यक्त कर देता है। *अव्यक्त मूलमनादि तरु त्वचचारि निगमागम मने।* *षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥* *फल जुगुल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।* *पल्लवत फूलत नवल नित संसार विटप नमामहे ॥* हे प्रभु ! संसार-वृक्ष तो आप ही हैं, हम आपको प्रणाम करते हैं। व्यक्ति की समस्या है कि वह व्यक्त को देख लेता है पर अव्यक्त को नहीं देख पाता। ब्रह्मा व्यक्त हैं और उनका जो मूल तत्त्व है वह है अव्यक्त, तो फिर वह दिखाई कैसे दे ? रामायण में इसका सूत्र देते हुए कहा गया कि अगर आप संसार में भी किसी की रचना का रहस्य जानना चाहें तो आपको उसके निर्माता से ही यह जानने को मिलता है कि उसने उस वस्तु का निर्माण कैसे किया। इसी प्रकार हम संसार के निर्माण का रहस्य जानना चाहें तो हमें भी उस पद्धति का आश्रय लेना होगा। किन्तु जानने की प्रक्रिया में वैज्ञानिकों तथा भक्तों की शैली में अन्तर है। वैज्ञानिक यन्त्र के माध्यम से शोध करके मूल की खोज कर रहा है। उस शोध में वह ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता जाता है, मूल में उसे जड़ ही दिखाई देता है। जड़ के पीछे जो चेतन तत्त्व है वह नहीं दिखाई देता। क्योंकि यन्त्र के द्वारा जड़ वस्तु तो दिखाई दे सकती है पर जो चेतन तत्त्व है वह भला कैसे दिखाई देगा ? भक्त जानते हैं कि यह रचना तो भगवान की है इसलिए उन्हीं से कहते हैं कि महाराज ! आप ही अपना भेद खोल दो कि इसे आपने कैसे बनाया ? इस सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध वाक्य कहा गया कि -- *जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे।* *बिधि हरि संभु नचावनिहारे ॥* *तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा।* *और तुम्हहि को जाननिहारा॥* -- ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी आपके रहस्य को नहीं जानते तो भला दूसरा कैसे जानेगा ? अब यहाँ पर यह प्रश्न किया जा सकता है कि जिसको कोई नहीं जानता उसके होने का प्रमाण क्या है ? परन्तु महर्षि वाल्मीकि ने कहा -- महाराज ! व्यक्ति अपनी बुद्धि और क्षमता से जानना चाहे तब तो नहीं जान सकता पर जानने का दूसरा उपाय अत्यन्त सरल है और वह उपाय यह है कि : *“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।"* आप स्वयं अपना रहस्य जिसको जनाना चाहें वह जान लेता है। इसलिए भाई जड़ की खोज बड़ी लम्बी है। जड़ स्वयं तो बोलेगा नहीं, हाँ जड़ के द्वारा आप जो भी निष्कर्ष निकालना चाहें निकाल लीजिए। पर जड़ के मूल में जो चैतन्य तथा अव्यक्त तत्त्व है उस अव्यक्त तत्त्व को जब कोई उससे ही जान लेता है तो उसका परिणाम यह होता है कि वह भी चिन्मय चैतन्य हो जाता है। *“जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई।"* -- गोस्वामीजी ने उस चिन्मय तत्त्व की अनुभूति की जानकारी का उपाय बतलाते हुए कहा कि पहले अपने चित्त के दर्पण को भगवान की भक्ति के जल से स्वच्छ कीजिए और तब आपको बिना परिश्रम के ही दिखाई दे जाएगा। *रघुपति-भगति-बारि छालित चित बिनु प्रयास ही सूझै।* वस्तुतः बुद्धि के द्वारा कोई उनके रहस्य को जान नहीं पाता क्योंकि बुद्धि ससीम है और ब्रह्म असीम है। इसलिए हम अगर उसका ज्ञान प्राप्त करना चाहें तो उसके मूल में प्रेम और भक्ति ही हो सकती है। 👏 🌳💕 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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