*🚩।।श्री गणेशाय नम:।।🚩* *🥅 ÷दैनिक~पंचांग÷ 🥅* *🥅 12 - 04 - 2021* *🥅 श्रीमाधोपुर~पंचांग* 🥅 तिथि अमावस्या 08:02:25 🥅 नक्षत्र रेवती 11:29:59 🥅 करण : नाग 08:02:25 किन्स्तुघ्ना 21:08:18 🥅 पक्ष कृष्ण 🥅 योग वैधृति 14:26:24 🥅 वार सोमवार 🥅 सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ 🥅 सूर्योदय 06:07:00 🥅 चन्द्रोदय 06:21:59 🥅 चन्द्र राशि मीन - 11:29:59 तक 🥅 सूर्यास्त 18:50:32 🥅 चन्द्रास्त 19:07:59 🥅 ऋतु वसंत 🥅 हिन्दू मास एवं वर्ष 🥅 शक सम्वत 1942 शार्वरी 🥅 कलि सम्वत 5122 🥅 दिन काल 12:43:31 🥅 विक्रम सम्वत 2077 🥅 मास अमांत फाल्गुन 🥅 मास पूर्णिमांत चैत्र 🥅 शुभ और अशुभ समय 🥅 शुभ समय 🥅 अभिजित 12:03:18 - 12:54:13 🥅 अशुभ समय 🥅 दुष्टमुहूर्त : 12:54:13 - 13:45:07 15:26:55 - 16:17:49 🥅 कंटक 08:39:42 - 09:30:36 🥅 यमघण्ट 12:03:18 - 12:54:13 🥅 राहु काल 07:42:26 - 09:17:53 🥅 कुलिक 15:26:55 - 16:17:49 🥅 कालवेला या अर्द्धयाम 10:21:30 - 11:12:24 🥅 यमगण्ड 10:53:19 - 12:28:46 🥅 गुलिक काल 14:04:12 - 15:39:39 🥅 दिशा शूल 🥅 दिशा शूल पूर्व 🥅चन्द्रबल और ताराबल 🥅 ताराबल 🥅 अश्विनी, भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, श्रवण, शतभिषा, उत्तराभाद्रपद, रेवती 🥅 चन्द्रबल 🥅 वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर, मीन 1️⃣2️⃣🔲0️⃣4️⃣🔲2️⃣1️⃣ *[]🌷🔥जय श्रीकृष्णा🔥🌷[]* *ज्योतिषशास्त्री-सुरेन्द्र कुमार चेजारा व्याख्याता राउमावि होल्याकाबास निवास-श्रीमाधोपुर* 🎴🎴🎴🎴🎴🎴🎴🎴

*🚩।।श्री गणेशाय नम:।।🚩* 
*🥅 ÷दैनिक~पंचांग÷ 🥅*
*🥅 12 - 04 - 2021*

*🥅 श्रीमाधोपुर~पंचांग*    
🥅 तिथि  अमावस्या  08:02:25
🥅 नक्षत्र  रेवती  11:29:59
🥅 करण :
           नाग  08:02:25
           किन्स्तुघ्ना  21:08:18
🥅 पक्ष  कृष्ण  
🥅 योग  वैधृति  14:26:24
🥅 वार  सोमवार  

🥅 सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ    
🥅 सूर्योदय  06:07:00  
🥅 चन्द्रोदय  06:21:59  
🥅 चन्द्र राशि  मीन - 11:29:59 तक  
🥅 सूर्यास्त  18:50:32  
🥅 चन्द्रास्त  19:07:59  
🥅 ऋतु  वसंत  

🥅 हिन्दू मास एवं वर्ष    
🥅 शक सम्वत  1942  शार्वरी
🥅 कलि सम्वत  5122  
🥅 दिन काल  12:43:31  
🥅 विक्रम सम्वत  2077  
🥅 मास अमांत  फाल्गुन  
🥅 मास पूर्णिमांत  चैत्र  

🥅 शुभ और अशुभ समय    
🥅 शुभ समय    
🥅 अभिजित  12:03:18 - 12:54:13
🥅 अशुभ समय    
🥅 दुष्टमुहूर्त : 
                    12:54:13 - 13:45:07
                    15:26:55 - 16:17:49
🥅 कंटक  08:39:42 - 09:30:36
🥅 यमघण्ट  12:03:18 - 12:54:13
🥅 राहु काल  07:42:26 - 09:17:53
🥅 कुलिक  15:26:55 - 16:17:49
🥅 कालवेला या अर्द्धयाम  10:21:30 - 11:12:24
🥅 यमगण्ड  10:53:19 - 12:28:46
🥅 गुलिक काल  14:04:12 - 15:39:39
🥅 दिशा शूल    
🥅 दिशा शूल  पूर्व  

🥅चन्द्रबल और ताराबल    
🥅 ताराबल  
🥅 अश्विनी, भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, श्रवण, शतभिषा, उत्तराभाद्रपद, रेवती  
🥅 चन्द्रबल  
🥅 वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर, मीन  
1️⃣2️⃣🔲0️⃣4️⃣🔲2️⃣1️⃣
*[]🌷🔥जय श्रीकृष्णा🔥🌷[]*
*ज्योतिषशास्त्री-सुरेन्द्र कुमार चेजारा व्याख्याता राउमावि होल्याकाबास निवास-श्रीमाधोपुर*
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* *🚩॥श्री गणेशाय नम:॥🚩* *🛣️ <दैनिक~पंचांग> 🛣️* *🥅 10 - 05 - 2021* *🥅 श्रीमाधोपुर~पंचांग* 🥅 तिथि *चतुर्दशी* 21:57:39 🥅 नक्षत्र *अश्विनी* 20:25:55 🥅 करण : *विष्टि* 08:43:48 *शकुन* 21:57:39 🥅 पक्ष *कृष्ण* 🥅 योग *आयुष्मान* 21:38:01 🥅 वार *सोमवार* 🥅 सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ *🥅 सूर्योदय 05:42:20* 🥅 चन्द्रोदय 29:25:00 🥅 चन्द्र राशि *मेष* 🥅 सूर्यास्त 19:06:01 🥅 चन्द्रास्त 17:55:00 🥅 ऋतु ग्रीष्म 🥅 हिन्दू मास एवं वर्ष 🥅 शक सम्वत 1943 प्लव 🥅 कलि सम्वत 5123 🥅 दिन काल 13:23:41 🥅 विक्रम सम्वत 2078 🥅 मास अमांत चैत्र 🥅 मास पूर्णिमांत वैशाख 🥅 शुभ और अशुभ समय 🥅 शुभ समय 🥅 अभिजित 11:57:23 - 12:50:58 🥅 अशुभ समय 🥅 दुष्टमुहूर्त : 12:50:58 - 13:44:33 15:31:42 - 16:25:17 🥅 कंटक 08:23:04 - 09:16:39 🥅 यमघण्ट 11:57:23 - 12:50:58 🥅 राहु काल 07:22:47 - 09:03:15 🥅 कुलिक 15:31:42 - 16:25:17 🥅 कालवेला या अर्द्धयाम 10:10:14 - 11:03:48 🥅 यमगण्ड 10:43:43 - 12:24:10 🥅 गुलिक काल 14:04:38 - 15:45:06 🥅 दिशा शूल 🥅 दिशा शूल पूर्व 🥅 चन्द्रबल और ताराबल 🥅 ताराबल 🥅 अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, मृगशिरा, पुनर्वसु, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद, रेवती 🥅 चन्द्रबल 🥅 मेष, मिथुन, कर्क, तुला, वृश्चिक, कुम्भ 1️⃣0️⃣🔲0️⃣5️⃣🔲2️⃣1️⃣ *🔥🌷जयश्री कृष्णा🌷🔥* *ज्योतिषशास्त्री- सुरेन्द्र कुमार चेजारा व्याख्याता राउमावि होल्याकाबास निवास-श्रीमाधोपुर* 🛣️🛣️🛣️🛣️🛣️🛣️🛣️🛣️

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नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय| नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे “न” काराय नमः शिवायः॥ मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय| मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे “म” काराय नमः शिवायः॥ शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय| श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै “शि” काराय नमः शिवायः॥ वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय| चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै “व” काराय नमः शिवायः॥ यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय| दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै “य” काराय नमः शिवायः॥ पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ| जय श्री भोलेनाथ जय श्री केदारनाथ ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव जय महाकाल जी जय माता महाकाली की जय हो ॐ गं गणपतये नम : शंभो पार्वती पति शिव हर हर महादेव 🙏🚩 आप सभी भारतवासी मित्रों को और बहनों को शुभ 🌅 वंदन धन्यवाद शुभ सोमवार हर हर महादेव 👏 🐍 🌹🌙🙏👪🌷✨💫🎉💞🌿🚩 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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महर्षि दधीचि ने, देवताओं की प्राण रक्षा के लिए किया था अपनी अस्थियों का दान!!!!!! एक बार देवराज इंद्र के मन में अभिमान पैदा हो गया जिसके फलस्वरूप उसने देवगुरु बृहस्पति का अपमान कर दिया। उसके आचरण से क्षुब्ध होकर देवगुरु इंद्रपुरी छोड़कर अपने आश्रम में चले गए। बाद में जब इंद्र को अपनी भूल का आभास हुआ तो वह बहुत पछताया, क्योंकि अकेले देवगुरु बृहस्पति ही ऐसे व्यक्ति थे, जिनके कारण देवता, दैत्यों के कोप से बचे रहते थे। पश्चाताप करता इंद्र देवगुरु को मनाने के लिए उनके आश्रम में पहुंचा। उसने हाथ जोड़कर देवगुरु को प्रणाम किया और कहा, “आचार्य। मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया था। उस समय क्रोध में भरकर मैंने आपके लिए जो अनुचित शब्द कह दिए थे, मैं उनके लिए आपसे क्षमा मांगता हूं। आप देवों के कल्याण के लिए पुनः इंद्रपुरी लौट चलिए। हम सारे देव मिलकर आपकी भली-भांति सेवा…।” इंद्र का शेष वाक्य अधूरा ही रह गया क्योंकि देवगुरु अपने तपोबल से अदृश्य हो चुके थे। इंद्र ने उनकी बहुत खोज की किन्तु जब देवगुरु का कुछ पता न चला तो वह थक-हार कर इंद्रपुरी लौट गया। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने जब यह समाचार सुना तो उन्होंने दैत्यों से कहा, “दैत्यों ! यही अवसर है जब तुम देवलोक पर अधिकार कर सकते हो। आचार्य बृहस्पति के चले जाने के बाद देवों की शक्ति आधी रह गई है। तुम लोग चाहो तो अब आसानी से देवलोक पर अधिकार कर सकते हो।” उचित अवसर देखकर दैत्यों ने अमरावती को चारों ओर से घेर लिया और चारों और मार-काट मचा दी। इंद्र किसी तरह जान बचाकर वहां से भाग निकला और पितामह ब्रह्मा की शरण में पहुंच गया। वह करबद्ध होकर ब्रह्माजी से बोला, “पितामह, देवों की रक्षा कीजिए। दैत्यों ने अचानक हमला करके अमरावती में मार-काट मचा दी है। वे चुन-चुनकर देव योद्धाओं का वध कर रहे है। मैं किसी तरह जान बचाकर यहां तक पहुंचा हूं।” पितामह ब्रह्मा आचार्य बृहस्पति के देवलोक छोड़ जाने की बात सुन चुके थे। बोले, “यह सब तुम्हारे अहंकार के कारण हुआ है, देवराज। अब भी यदि तुम आचार्य बृहस्पति की मना सको और उन्हें देवलोक में ले आओ तो वे दैत्यों पर विजय प्राप्त करने का कोई उपाय तुम्हे बता देंगे। “मैं अपनी भूल पर बहुत पश्चाताप करता उन्हें खोजने के लिए गया था, पितामह। किन्तु मेरे देखते ही देखते वे अपने तपोबल से अदृश्य हो गए।” इंद्र ने कहा। “आचार्य तुमसे कुपित है, इंद्र।” ब्रह्माजी ने कहा, “अब जब तक तुम उनकी आराधना करके उन्हें स्वयं सम्मानपूर्वक देवलोक नहीं ले जाओगे, वे अमरावती नहीं आएंगे।” “फिर क्या किया जाए, पितामह ? आचार्य का कुछ पता-ठिकाना भी तो हमारे पास नहीं है। उन्हें खोजने में समय लगेगा। तब तक तो दैत्य सम्पूर्ण अमरावती को जलाकर राख कर देंगे।” इंद्र की बात सुनकर ब्रह्माजी ने अपने नेत्र बन्द कर लिए। वे चिंतन में डूब गए। कुछ देर बाद उन्होंने अपने नेत्र खोले और इंद्र से कहा, “इंद्र ! इस समय भूमण्डल में सिर्फ एक ही व्यक्ति है जो तुम्हे इस आपदा से मुक्ति दिला सकता है और वह है महर्षि त्वष्टा का महाज्ञानी पुत्र विश्वरूप। अगर तुम उसे अपना पुरोहित नियुक्त कर लो तो वह तुम्हें इस संकट से मुक्त करा देगा।” ब्रह्मा जी ने उपाय बताया। पितामह का परामर्श मानकर देवराज इंद्र महर्षि विश्वरूपं के पास पहुंचे। विश्वरूप के तीन मुख थे। पहले मुख से वे सोमवल्ली लता का रस निकालकर यज्ञ करते समय पीते थे। दूसरे मुख से मदिरा पान करते तथा तीसरे मुख से अन्न आदि भोजन का आहार करते थे। इंद्र ने उन्हें प्रणाम किया तो महर्षि ने पूछा, “आज यहां कैसे आगमन हुआ, देवराज ? आप किसी विपत्ति में तो नही फंस गए ?” “आपने ठीक अनुमान लगाया है मुनिश्रेष्ठ।” इंद्र ने कहा, “देवो पर इस समय बहुत बड़ी विपत्ति आई हुई है, दैत्यों ने अमरावती को घेर रखा है। चारो ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है।” विश्वरूप मुस्कुराए। बोले, ” तो देवो और दैत्यों का पुराना झगड़ा है, देवराज। दोनों हो महर्षि कश्यप की सन्ताने है। इसलिए कोई एक-दूसरे से छोटा नहीं बनना चाहता। तुम्हारे इस झगड़े में मैं क्या कर सकता हूं ?” “देवो को इस समय आपकी सहायता की आवश्यकता है मुनिश्रेष्ठ। सिर्फ आप ही उनका भय दूर कर सकते है।” इस प्रकार इंद्र ने जब विश्वरूप की बहुत अनुनय-विनय की तो विश्वरूप पिघल गए। उन्होंने देवो के यज्ञ का होता (पुरोहित) बनना स्वीकार कर लिया। वे बोले, “देवो की दुर्दशा देखकर ही मैने आपके यज्ञ का होता बनना स्वीकार किया है, देवराज।” ततपश्चात उन्होंने देवराज को नारायण कवच प्रदान करते हुए कहा, “यह कवच ले जाओ देवराज। दैत्यों से युद्ध करते समय यह न सिर्फ तुम्हारी रक्षा करेगा बल्कि तुम्हे विजयश्री भी प्रदान करेगा।” विश्वरूप से नारायण कवच प्राप्त करके देवराज पुनः अमरावती पहुंचे। उनके वहां पहुचने से देवो में नए उत्साह का संचरण हो गया और वे पूरी शक्ति के साथ दैत्यों पर टूट पड़े। भयंकर युद्ध छिड़ गया। इस बार इंद्र के पास नारायण कवच होने के कारण दैत्य मैदान में नहीं ठहर सके। वे पराजित होकर भाग खड़े हुए। विजयश्री देवताओं के हाथ लगी। युद्ध समाप्त होने पर देवराज विश्वरूप का आभार व्यक्त करने के लिए उनके पास पहुंचे। बोले, “आपकी कृपा से हमने दैत्यों पर विजय प्राप्त कर ली है, मुनिवर। अब हम एक इस यज्ञ करना चाहते है जिसके फलस्वरूप देवलोक हमेशा के लिए दैत्यों के भय से मुक्त रह सके। और आप हमे वचन दे ही चुके है कि उस यज्ञ के होता होंगे, तो कृपा करके अब आप हमारे साथ चलिए।” देवराज के अनुरोध पर विश्वरूप अमरावती पहुंचे। उन्होंने यज्ञ में आहुतियां डालनी आरम्भ कर दी। उसी समय एक दैत्य ब्राह्मण का वेश धारण कर महर्षि विश्वरूप के पास आ बैठा। उसने धीरे से महर्षि विश्वरूप से कहा, “महर्षि ! देवताओं का पक्ष लेकर आप जो यह यज्ञ दैत्यों के विनाश के लिए कर रहे है, यह उचित नहीं है।” “क्यों उचित नहीं है ?” विश्वरूप ने पूछा। “इसलिए उचित नहीं है कि देव और दैत्य एक ही पिता की सन्ताने है। आप भूल रहे है कि स्वयं आपकी माताजी दैत्य परिवार से है। क्या आप चाहेंगे कि आपका मातृकुल हमेशा के लिए नष्ट हो जाए ?” बात विश्वरूप की समझ में आ गई। उन्होंने आहुतियां देते समय देवो के साथ-साथ दैत्यों का नाम भी लेना आरम्भ कर दिया। यज्ञ समाप्त हुआ, लेकिन उसका कोई लाभ देवो को न मिला। इस पर देवराज इंद्र ने विश्वरूप से कहा, “मुनिवर ! इतने बड़े यज्ञ का कोई अच्छा सुफल नहीं मिला। देवताओ की शक्ति में तो किंचित भी बदलाव नहीं आया। वे तो जैसे पहले थे, वैसे ही अब भी है।” तभी इंद्र का एक गुप्तचर उनके पास पहुंचा, उसने इंद्र को बताया, “यज्ञ का सुफल कैसे मिलता देवराज। मुनिवर देवो के साथ-साथ दैत्यों को भी तो आहुतियां देते रहे है। इस यज्ञ का जितना लाभ देवो को मिला है उतना ही दैत्यों को भी मिला है।” गुप्तचर के मुख से यह समाचार सुनकर इंद्र गुस्से से भर उठे। उन्होंने तलवार निकाल ली और ऋषि विश्वरूप पर झपटे, “ढोंगी ऋषि। तूने देवो के साथ विश्वासघात किया है। यज्ञ देवो ने कराया और तू आहुतियां अपने मातृकुल के लोगो को देता रहा। अब मैं तुझे जीवित नहीं छोडूंगा।” कहते हुए उसने तलवार के एक ही वार से विश्वरूप के तीनों सिर काट दिए। इंद्र द्वारा एक ब्राह्मण की यज्ञस्थल पर ही हत्या किए जाने की सर्वज्ञ निंदा होने लगी। देवो के साथ-साथ ऋषि-मुनि और ब्राह्मण भी उसे धिक्कारने लगे, “इंद्र तू हत्यारा है-तूने ब्रह्म हत्या की है, तेरे जैसे व्यक्ति को इंद्र पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं। तेरे लिए यही उचित है कि किसी कुएं या बावली में कूद कर अपने प्राणों का विसर्जन कर डाल।” आदि-आदि। नित्य प्रति की धिक्कार और प्रताड़ना सुनकर इंद्र दुखी रहने लगा। उधर, जब यह समाचार महर्षि त्वष्टा तक पहुंचा तो वे बेहद क्रोधित हुए। गुस्से दहाड़ते हुए बोले, “इंद्र की ऐसी हिम्मत कैसे हुई कि वह मेरे पुत्र का वध करके इन्द्रासन पर बैठा रहे। मैं उसे मिट्टी में मिला दूंगा। मेरे पुत्र की हत्या करने का परिणाम उसे भोगना ही पड़ेगा।” त्वष्टा उसी दिन यज्ञ करने के लिए बैठ गए। यज्ञ की समाप्ति पर यज्ञ वेदी से एक पर्वत के समान आकार वाला दैत्य प्रकट हुआ। उसके एक हाथ में गदा और दूसरे में शंख था। उसने झुककर ऋषि को प्रणाम किया। ऋषि ने उसको नाम दिया-वृत्रासुर। “आज्ञा दीजिए ऋषिवर ?” वृत्रासुर ने सिर झुकाकर कहा। “वृत्रासुर। तुम तत्काल अमरावती जाओ और कपटी इंद्र के साथ-साथ समस्त देवताओं का विनाश कर दो।” महर्षि त्वष्टा ने क्रोध से कांपते हुए आदेश दिया। त्वष्टा का आदेश पाते ही वृत्रासुर वायुवेग से देवलोक की ओर उड़ चला। वृत्रासुर ने अमरावती में पहुंचकर देवो का विध्वंस करना शुरू कर दिया। जो भी सामने आता, वह निःसंकोच होकर उसका वध कर डालता। उसने अमरावती में ऐसा कोहराम मचाया कि देवता त्राहि-त्राहि कर उठे। इंद्र अपने ऐरावत पर चढ़कर उसके सामने पहुंचा और उस पर वज्र प्रहार किया, किन्तु वृत्रासुर ने एक ही झटके में उसके हाथ से वज्र छीनकर दूर फेंक दिया। इस पर इंद्र ने उस पर आग्नेय अस्त्रों से आक्रमण किया, किन्तु उनका किंचित भी असर वृत्रासुर पर न हुआ। किसी खिलौने की तरह उसने इंद्र के हाथ से उसका धनुष छीन लिया और उसे तोड़कर एक और फेंक दिया। फिर वह अपना भयंकर मुख खोलकर इंद्र को खाने के लिए उसकी ओर झपटा। यह देखकर इंद्र भयभीत हो गया और ऐरावत से कूद कर अपनी जान बचाने के लिए भाग निकला। पीछे वृत्रासुर अपने भयंकर अट्टहासों से अमरावती को गुंजाता रहा। देवराज भागकर सीधे पहुंचे विष्णुलोक में भगवान विष्णु के पास। “रक्षा कीजिए देव। देवताओं को बचाइए।” उसने आर्त्त स्वर में भगवान से विनती की, “देवो को वृत्रासुर के कोप से बचाइए अन्यथा वह समस्त देवजाति का विनाश कर डालेगा।” यह सुनकर भगवान विष्णु ने भी उसे धिक्कारा। कहा, “इंद्र। एक ब्राह्मण, और वह भी ऐसा जो तुम्हारे यज्ञ का संचालन कर रहा हो, उसका यज्ञस्थल पर ही वध करके तुमने समस्त देवजाति को कलंकित कर दिया। तुमने अक्षम्य अपराध किया है। महर्षि त्वष्टा ने तुम्हारे लिए उचित ही दंड का निर्णय किया है।” “मुझे अपने कृत्य पर बहुत पश्चाताप हो रहा है, प्रभु। मैं उस समय क्रोध में अंधा हो रहा था, इसलिए ब्रह्म हत्या जैसा पाप कर बैठा। मुझे क्षमा कर दीजिए और मुझे उस महाभयंकर दैत्य से मुक्ति दिलाइए।” इंद्र ने शर्मिंदगी भरे स्वर में कहा। “देवेंद्र।” श्री हरि बोले, “इस समय मैं तो क्या स्वयं भगवान शिव अथवा ब्रह्मा जी भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते। तुम्हारी रक्षा तो पृथ्वी पर एक ही व्यक्ति कर सकता है।” “वह कौन है देव ?” “महर्षि दधीचि।” विष्णु बोले, “सिर्फ वे ही तुम्हारी रक्षा कर सकते है। तुम महर्षि दधीचि के आश्रम में जाओ और उन्हें प्रसन्न करके किसी तरह उनके शरीर की हड्डियां प्राप्त कर लो। फिर उन हड्डियों से वज्र बनाकर यदि तुम वृत्रासुर से युद्ध करोगे तो विजयश्री तुम्हें ही मिलेगी।” भगवान विष्णु का परामर्श मानकर इंद्र दधीचि के आश्रम में पहुंचा। महर्षि दधीचि उस समय समाधि लगाए बैठे थे। उनकी कामधेनु उनके निकट खड़ी थी। इंद्र महर्षि की समाधि भंग होने की प्रतीक्षा करने लगा। फिर जब महर्षि ने अपनी समाधि भंग की तो उनकी दृष्टी करबद्ध खड़े इंद्र पर पड़ी। महर्षि ने हंसते हुए पूछा, “देवेंद्र ! आज इस मृत्युलोक में तुम्हारा आगमन क्योकर हुआ ? देवलोक में सब कुशल से तो है ?” “कुशलता कैसी महर्षि।” इंद्र ने शर्मसार होते हुए कहा, “देवो के दुर्दिन आ गए है। वृत्रासुर के भय से देव अमरावती छोड़कर जंगलों और गिरिकन्दराओ में छिपते फिर रहे है।” फिर महर्षि के पूछने पर इंद्र ने सारी बाते उन्हें बता दी। सुनकर दधीचि बोले, “यह तो बड़ी अशुभ बाते बताई तुमने, देवेंद्र। अब इनका निराकरण कैसे हो ?” “महर्षि ! मैं भगवान विष्णु के पास गया था।” इंद्र बोला, “उन्होंने परामर्श दिया है कि यदि आप प्रसन्न होकर मुझे अपनी हड्डियो का दान दे दे और उनसे वज्र बनाकर यदि वृत्रासुर से युद्ध किया जाए तो वह दैत्य उस वज्र के प्रहार से मर सकता है। हे ऋषिश्रेष्ठ। देवो पर कृपा करके अपनी अस्थियों का दान दे दीजिये।” “देवेंद्र !” महर्षि दधीचि बोले, “यदि मेरी अस्थियों से मानव और देव जाति का कुछ हित होता है तो मैं सहर्ष अपनी अस्थियों का दान देने के लिए तैयार हूं।” तत्पश्चात अपने शरीर पर मिष्ठान का लेपन करके महर्षि समाधिस्थ होकर बैठ गए। कामधेनु ने उनके शरीर को चाटना आरम्भ कर दिया। कुछ ही देर में महर्षि के शरीर की त्वचा, मांस और मज्जा उनके शरीर से विलग हो गए। मानव देह के स्थान पर सिर्फ उनकी अस्थियां ही शेष रह गई। इंद्र ने उन अस्थियों को श्रद्धापुर्वक नमन किया और उन्हें ले जाकर उन हड्डियों से ‘तेजवान’ नामक वज्र बनाया। तत्पश्चात उस वज्र के बल पर उसने वृत्रासुर को ललकारा। दोनों के मध्य भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन वृत्रासुर ‘तेजवान’ वज्र के आगे देर तक टिका न रह सका। इंद्र ने वज्र प्रहार करके उसका वध कर डाला। देवता उसके भय से मुक्त हो गए।

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M.S.Chauhan May 9, 2021

*जय माँ भवानी* *महाराणा प्रताप सिंह का जीवन परिचय* *महाराणा प्रताप जी की जयन्ती पर उनको कोटि कोटि नमन और आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं* *महाराणा प्रताप* *16वी शताब्दी में मेवाड़ के एक शासक महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत 1597 तदनुसार 9 मई 1540–19 जनवरी 1597) उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया।* महाराणा प्रताप राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 पूर्ववर्ती महाराणा उदयसिंह उत्तरवर्ती महाराणा अमर सिंह शिक्षक आचार्या राघवेन्द्र जन्म 9 मई 1540 कुम्भलगढ़ दुर्ग, मेवाड़ (वर्तमान में: कुम्भलगढ़ दुर्ग, राजसमंद जिला, राजस्थान, भारत)* *निधन 19 जनवरी 1597 (उम्र 56) चावंड, मेवाड़ (वर्तमान में:चावंड, उदयपुर जिला, राजस्थान, भारत)* *जीवनसंगी महारानी अजबदे पंवार सहित कुल 11 पत्नियाँ संतान अमर सिंह प्रथम भगवान दास (17 पुत्र) पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया घराना सिसोदिया राजपूत पिता महाराणा उदयसिंह माता महाराणी जयवन्ताबाई धर्म सनातन धर्म उनका जन्म वर्तमान राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता रानी जयवंताबाई के घर हुआ था। लेखक जेम्स टॉड के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म मेवाड़ के कुम्भलगढ में हुआ था। इतिहासकार विजय नाहर के अनुसार राजपूत समाज की परंपरा व महाराणा प्रताप की जन्म कुंडली व कालगणना के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म पाली के राजमहलों में हुआ।1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 500 भील लोगो को साथ लेकर राणा प्रताप ने आमेर सरदार राजा मानसिंह के 80,000 की सेना का सामना किया। हल्दीघाटी युद्ध में भील सरदार राणा पूंजा जी का योगदान सराहनीय रहा। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया और महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। हल्दीघाटी के युद्ध में और देवर और चप्पली की लड़ाई में प्रताप को सबसे बड़ा राजपूत और उनकी बहादुरी के लिए जाना जाता था। मुगलों के सफल प्रतिरोध के बाद, उन्हें "मेवाड़ी राणा" माना गया।* *यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17,000 लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिन्ताजनक होती चली गई। 24,000 सैनिकों के 12 साल तक गुजारे लायक अनुदान देकर भामाशाह भी अमर हुआ।* *जन्म स्थान* *महाराणा प्रताप के जन्मस्थान के प्रश्न पर दो धारणाएँ है। पहली महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था क्योंकि महाराणा उदयसिंह एवम जयवंताबाई का विवाह कुंभलगढ़ महल में हुआ। दूसरी धारणा यह है कि उनका जन्म पाली के राजमहलों में हुआ। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप का बचपन भील समुदाय के साथ बिता , भीलों के साथ ही वे युद्ध कला सीखते थे , भील अपने पुत्र को किका कहकर पुकारते है इसलिए भील महाराणा को कीका नाम से पुकारते थे।[13] लेखक विजय नाहर की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार जब प्रताप का जन्म हुआ था उस समय उदयसिंह युद्व और असुरक्षा से घिरे हुए थे। कुंभलगढ़ किसी तरह से सुरक्षित नही था। जोधपुर का राजा मालदेव उन दिनों उत्तर भारत मे सबसे शक्तिसम्पन्न था। एवं जयवंता बाई के पिता एवम पाली के शाषक सोनगरा अखेराज मालदेव का एक विश्वसनीय सामन्त एवं सेनानायक था।* *इस कारण पाली और मारवाड़ हर तरह से सुरक्षित था। अतः जयवंता बाई को पाली भेजा गया। वि. सं. ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया सं 1597 को प्रताप का जन्म पाली मारवाड़ में हुआ। प्रताप के जन्म का शुभ समाचार मिलते ही उदयसिंह की सेना ने प्रयाण प्रारम्भ कर दिया और मावली युद्ध मे बनवीर के विरूद्ध विजय श्री प्राप्त कर चित्तौड़ के सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया। भारतीय प्रशासनिक सेवा से सेवानिवत्त अधिकारी देवेंद्र सिंह शक्तावत की पुस्तक महाराणा प्रताप के प्रमुख सहयोगी के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म स्थान महाराव के गढ़ के अवशेष जूनि कचहरी पाली में विद्यमान है। यहां सोनागरों की कुलदेवी नागनाची का मंदिर आज भी सुरक्षित है। पुस्तक के अनुसार पुरानी परम्पराओं के अनुसार लड़की का पहला पुत्र अपने पीहर में होता है।* *इतिहासकार अर्जुन सिंह शेखावत के अनुसार महाराणा प्रताप की जन्मपत्रिका पुरानी दिनमान पद्धति से अर्धरात्रि 12/17 से 12/57 के मध्य जन्मसमय से बनी हुई है। 5/51 पलमा पर बनी सूर्योदय 0/0 पर स्पष्ट सूर्य का मालूम होना जरूरी है इससे जन्मकाली इष्ट आ जाती है। यह कुंडली चित्तौड़ या मेवाड़ के किसी स्थान में हुई होती तो प्रातः स्पष्ट सूर्य का राशि अंश कला विक्ला अलग होती। पण्डित द्वारा स्थान कालगणना पुरानी पद्धति से बनी प्रातः सूर्योदय राशि कला विकला पाली के समान है।* *डॉ हुकमसिंह भाटी की पुस्तक सोनगरा सांचोरा चौहानों का इतिहास 1987 एवं इतिहासकार मुहता नैणसी की पुस्तक ख्यात मारवाड़ रा परगना री विगत में भी स्पष्ट है "पाली के सुविख्यात ठाकुर अखेराज सोनगरा की कन्या जैवन्ताबाई ने वि. सं. 1597 जेष्ठ सुदी 3 रविवार को सूर्योदय से 47 घड़ी 13 पल गए एक ऐसे देदीप्यमान बालक को जन्म दिया। धन्य है पाली की यह धरा जिसने प्रताप जैसे रत्न को जन्म दिया।* *वंश वृक्ष* *राणा सांगा उदय सिंह रानी कर्णावती महाराणा प्रताप राज सोंगरा चौहान जयवंताबाई राय भा* *जीवन* *चेतक पर सवार राणा प्रताप की प्रतिमा (महाराणा प्रताप स्मारक समिति, मोती मगरी , उदयपुर) राणा उदयसिंह केे दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी | प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है। महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक मेंं 28 फरवरी, 1572 में गोगुन्दा में हुआ था, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में हुआ, दुसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेेन भी उपस्थित थे।* *राणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियाँ की थी उनकी पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम हैं * *महारानी अजबदे पंवार :- अमरसिंह और भगवानदास अमरबाई राठौर :- नत्था शहमति बाई हाडा :-पुरा अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह रत्नावती बाई परमार :-माल,गज,क्लिंगु लखाबाई :- रायभाना जसोबाई चौहान :- कल्याणदास चंपाबाई जंथी :- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह सोलनखिनीपुर बाई :- साशा और गोपाल फूलबाई राठौर :-चंदा और शिखा खीचर आशाबाई :- हत्थी और राम सिंह महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।* *हल्दीघाटी का युद्ध:* *हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ते हुए महाराणा। यह युद्ध १८ जून १५७६ ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी।* *लड़ाई का स्थल राजस्थान के गोगुन्दा के पास हल्दीघाटी में एक संकरा पहाड़ी दर्रा था। महाराणा प्रताप ने लगभग 3,000 घुड़सवारों और 400 भील धनुर्धारियों के बल को मैदान में उतारा। मुगलों का नेतृत्व आमेर के राजा मान सिंह ने किया था, जिन्होंने लगभग 5,000-10,000 लोगों की सेना की कमान संभाली थी। तीन घंटे से अधिक समय तक चले भयंकर युद्ध के बाद, महाराणा प्रताप ने खुद को जख्मी पाया जबकि उनके कुछ लोगों ने उन्हें समय दिया, वे पहाड़ियों से भागने में सफल रहे और एक और दिन लड़ने के लिए जीवित रहे। मेवाड़ के हताहतों की संख्या लगभग 1,600 पुरुषों की थी। मुगल सेना ने 3500-7800 लोगों को खो दिया, जिसमें 350 अन्य घायल हो गए। इसका कोई नतीजा नही निकला जबकि वे(मुगल) गोगुन्दा और आस-पास के क्षेत्रों पर कब्जा करने में सक्षम थे, वे लंबे समय तक उन पर पकड़ बनाने में असमर्थ थे। जैसे ही साम्राज्य का ध्यान कहीं और स्थानांतरित हुआ, प्रताप और उनकी सेना बाहर आ गई और अपने प्रभुत्व के पश्चिमी क्षेत्रों को हटा लिया।* *इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध मे राणा पूंजा भील का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गया।* *इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।* *समर्पण विचार* *वह जंगल में लौट आया और अपनी लड़ाई जारी रखी। टकराव के उनके एक प्रयास की विफलता के बाद, प्रताप ने छापामार रणनीति का सहारा लिया। एक आधार के रूप में अपनी पहाड़ियों का उपयोग करते हुए, प्रताप ने बड़े पैमाने पर मुगल सैनिकों को वहाँ से हटाना शुरू कर दिया। वह इस बात पर अड़े थे कि मेवाड़ की मुगल सेना को कभी शान्ति नहीं मिलनी चाहिए: अकबर ने तीन विद्रोह किए और प्रताप को पहाड़ों में छुपाने की असफल कोशिश की। इस दौरान, उन्हें प्रताप भामाशाह से सहानुभूति के रूप में वित्तीय सहायता मिली। अरावली पहाड़ियों से बिल, युद्ध के दौरान प्रताप को अपने समर्थन के साथ और मोर के दिनों में जंगल में रहने के साधन के साथ। इस तरह कई साल बीत गए। जेम्स टॉड लिखते हैं: "अरावली शृंखला में एक अच्छी सेना के बिना भी, महाराणा प्रताप सिंह जैसे महान स्वतन्त्रता सेनानी के लिए वीर होने का कोई रास्ता नहीं है: कुछ भी एक शानदार जीत हासिल कर सकता है या अक्सर भारी हार। एक घटना में, गोलियाँ सही समय पर बच निकलीं और उदयपुर के पास सावर की गहरी जस्ता खानों में राजपूत महिलाओं और बच्चों को अगवा कर लिया। बाद में, प्रताप ने अपने स्थान को मेवाड़ा के दक्षिणपूर्वी हिस्से में सावन में स्थानान्तरित कर दिया।* *पृथ्वीराज राठौर का पत्र* *जब निर्वासन वास्तव में भूख से मर रहे थे, तो उन्होंने प्रताप अकबर को एक पत्र लिखा, जिसमें कहा गया था कि वह शांति समझौते के लिए तैयार हैं। प्रताप के प्रमुख (उनकी मां की बहन का बच्चा) पृथ्वीराज राठौर, जो अकबर की मंडली के सदस्यों में से एक थे, ने यह कहा* *दिवेर-छापली का युुद्ध* *बिरला मंदिर, दिल्ली में महाराणा प्रताप का शैल चित्र राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "मेवाड़ का मैराथन" कहा है।* *मेवाड़ के उत्तरी छोर का दिवेर का नाका अन्य नाकों से विलक्षण है। इसकी स्थिति मदारिया और कुंभलगढ़ की पर्वत श्रेणी के बीच है। प्राचीन काल में इस पहाड़ी क्षेत्र में गुर्जर प्रतिहारों का आधिपत्य था, जिन्हें इस क्षेत्र में बसने के कारण मेर कहा जाता था। यहां की उत्पत्यकाताओं में इस जाति के निवास स्थलों के कई अवशेष हैं। मध्यकालीन युग में देवड़ा जाति के राजपूत यहां प्रभावशील हो गये, जिनकी बस्तियां आसपास के उपजाऊ भागों में बस गई और वे उदयपुर के निकट भीतरी गिर्वा तक प्रसारित हो गई। चीकली के पहाड़ी भागों में आज भी देवड़ा राजपूत बड़ी संख्या में बसे हुए हैं। देवड़ाओं के पश्चात यहां रावत शाखा के राजपूत बस गये।* *इन विभिन्न समुदायों के दिवेर में बसने के कई कारण थे। प्रथम तो दिवेर का एक सामरिक महत्व रहा है, जो समुदाय शौर्य के लिए प्रसिद्ध रहे हैं, वे उत्तरोत्तर अपने पराक्रम के कारण यहां बसते रहे और एक-दूसरे पर प्रभाव स्थापित करते रहे। दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह रहा कि इसकी स्थिति ऐसे मार्गों पर है, जहां से मारवाड़, मालवा, गुजरात, अजमेर के आदान-प्रदान की सुविधा रही है। ये मार्ग तंग घाटियों वाले उबड़-खाबड़ मार्ग के रूप में आज भी देखे जा सकते हैं। इनके साथ सदियों से आवागमन होने से घोड़ों की टापों के चिन्ह पत्थरों पर अद्यावधि विद्यमान है। मार्गों में पानी की भी कमी नहीं है, जिसके लिये जगह-जगह झरनों के बांध के अवशेष दृष्टिगोचर होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से स्थान-स्थान पर चौकियों के ध्वंसाशेष भी दिखाई देते हैं। जब अकबर ने कुंभलगढ़, देवगढ़, मदारिया आदि स्थानों पर कब्जा कर लिया तो वहां की चौकियों से संबंध बनाए रखने के लिए दिवेर का चयन एक रक्षा स्थल के रूप में किया गया। यहां बड़ी संख्या में घुड़सवारों और हाथियों का दल रखा गया। इंतर चौकियों के लिए रसद भिजवाने का भी यह सुगम स्थान था।* *ज्यों महाराणा प्रताप छप्पन के पहाड़ी स्थानों में बस्तियां बसाने और मेवाड़ के समतल भागों में खेतों को उजाड़ने में व्यस्त थे त्यों अकबर दिवेर के मार्ग से उत्तरी सैनिक चौकियों का पोषण भेजने की व्यवस्था में संलग्न रहा। प्रताप की नीतियों छप्पन की चौकियों को हटाने में तथा मध्यभागीय मेवाड़ की चौकियों को निर्बल बनाने में अवश्य सफल हो गये, परंतु दिवेर का केंद्र अब भी मुगलों के लिए सुदृढ़ था।* *इस पृष्ठभूमि में दिवेर का महाराणा प्रताप का व मुगलों का संघर्ष जुड़ा हुआ था। इस युद्ध की तैयारी के लिए प्रताप ने अपनी शक्ति सुदृढ़ करने की नई योजना तैयार की। वैसे छप्पन का क्षेत्र मुगल से युक्त हो चला था और मध्य मेवाड़ में रसद के अभाव में मुगल चौकियां निष्प्राण हो गई थी अब केवल उत्तरी मेवाड़ में मुगल चौकियां व दिवेर के संबंध में कदम उठाने की आवश्यकता थी।* *इस संबंध में महाराणा ने गुजरात और मालवा की ओर अपने अभियान भेजना आरंभ किया और साथ ही आसपास के मुगल अधिकार क्षेत्र में छापे मारना शुरू कर दिया। इसी क्रम में भामाशाह ने, जो मेवाड़ के प्रधान और सैनिक व्यवस्था के अग्रणी थे, मालवे पर चढ़ाई कर दी और वहां से 2.3 लाख रुपए और 20 हजार अशर्फियां दंड में लेकर एक बड़ी धनराशि इकट्ठी की। इस रकम को लाकर उन्होंने महाराणा को चूलिया ग्राम में समर्पित कर दी। इसी दौरान जब शाहबाज खां निराश होकर लौट गया था, तो महाराणा ने कुंभलगढ़ और मदारिया के मुगली थानों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इन दोनों स्थानों पर महाराणा का अधिकार होना दिवेर पर कब्जा करने की योजना का संकेत था।* *अतएव इस दिशा में सफलता प्राप्त करने के लिए नई सेना का संगठन किया गया। जगह-जगह रसद और हथियार इकट्ठे किए गए। सैनिकों को धन और सुविधाएं उपलब्ध कराई गई। सिरोही, ईडर, जालोर के सहयोगियों का उत्साह परिवर्धित कराया गया। ये सभी प्रबंध गुप्त रीति से होते रहे। मुगलों को यह भ्रम हो गया कि प्रताप मेवाड़ छोड़कर अन्यत्र जा रहे हैं। ऐसे भ्रम के वातावरण से बची हुई मुगल चौकियों के सैनिक बेखटके रहने लगे। जब सब प्रकार की तैयारी हो गई तो महाराणा प्रताप, कु. अमरसिंह, भामाशाह, चुंडावत, शक्तावत, सोलंकी, पडिहार, रावत शाखा के राजपूत और अन्य राजपूत सरदार दिवेर की ओर दल बल के साथ चल पड़े। दिवेर जाने के अन्य मार्गों व घाटियों में भीलों की टोलियां बिठा दी गई, जिससे मेवाड़ में अन्यत्र बची हुई सैनिक चौकियों का दिवेर से कोई संबंध स्थापित न हो सके।* *अचानक महाराणा की फौज दिवेर पहुंची तो मुगल दल में भगदड़ मच गई। मुगल सैनिक घाटी छोड़कर मैदानी भाग की तलाश में उत्तर के दर्रे से भागने लगे। महाराणा ने अपने दल के साथ भागती सेना का पीछा किया। घाटी का मार्ग इतना कंटीला तथा ऊबड़-खाबड़ था कि मैदानी युद्ध में अभ्यस्त मुगल सैनिक विथकित हो गए। अन्ततोगत्वा घाटी के दूसरे छोर पर जहां कुछ चौड़ाई थी और नदी का स्त्रोत भी था, वहां महाराणा ने उन्हें जा दबोचा। दिवेर थाने के मुगल अधिकारी सुल्तानखां को कुं. अमरसिंह ने जा घेरा और उस पर भाले का ऐसा वार किया कि वह सुल्तानखां को चीरता हुआ घोड़े के शरीर को पार कर गया। घोड़े और सवार के प्राण पखेरू उड़ गए। महाराणा ने भी इसी तरह बहलोलखां और उसके घोड़े का काम तमाम कर दिया। एक राजपूत सरदार ने अपनी तलवार से हाथी का पिछला पांव काट दिया। इस युद्ध में विजयश्री महाराणा के हाथ लगी।* *यह महाराणा की विजय इतनी कारगर सिद्ध हुई कि इससे मुगल थाने जो सक्रिय या निष्क्रिय अवस्था में मेवाड़ में थे जिनकी संख्या 36 बतलाई जाती है, यहां से उठ गए। शाही सेना जो यत्र-तत्र कैदियों की तरह पडी हुई थी, लड़ती, भिड़ती, भूखे मरते उलटे पांव मुगल इलाकों की तरफ भाग खड़ी हुई। यहां तक कि 1585 ई. के आगे अकबर भी उत्तर - पश्चिम की समस्या के कारण मेवाड़ के प्रति उदासीन हो गया, जिससे महाराणा को अब चावंड में नवीन राजधानी बनाकर लोकहित में जुटने का अच्छा अवसर मिला। दिवेर की विजय महाराणा के जीवन का एक उज्ज्वल कीर्तिमान है। जहां हल्दीघाटी का युद्ध नैतिक विजय और परीक्षण का युद्ध था, वहां दिवेर-छापली का युद्ध एक निर्णायक युद्ध बना। इसी विजय के फलस्वरूप संपूर्ण मेवाड़ पर महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। एक अर्थ में हल्दीघाटी का युद्ध में राजपूतो ने रक्त का बदला दिवेर में चुकाया। दिवेर की विजय ने यह प्रमाणित कर दिया कि महाराणा का शौर्य, संकल्प और वंश गौरव अकाट्य और अमिट है, इस युद्ध ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि महाराणा के त्याग और बलिदान की भावना के नैतिक बल ने सत्तावादी नीति को परास्त किया। कर्नल टाॅड ने जहां हल्दीघाटी को 'थर्मोपाली' कहा है वहां के युद्ध को 'मेरोथान' की संज्ञा दी है। जिस प्रकार एथेन्स जैसी छोटी इकाई ने फारस की बलवती शक्ति को 'मेरोथन' में पराजित किया था, उसी प्रकार मेवाड़ जैसे छोटे राज्य ने मुगल राज्य के वृहत सैन्यबल को दिवेर में परास्त किया। महाराणा की दिवेर विजय की दास्तान सर्वदा हमारे देश की प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।* *सफलता और अवसान* *पू. 1579 से 1585 तक पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585ई. में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर दिया। महाराणा जी की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया।* *महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया , उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था, पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 ई. में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई।* *महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सिधारने के बाद आगरा ले आया।* *'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।* *मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया* *अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, बल्कि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक वह था जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था, जब की एक तरफ महाराणा प्रताप जी थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जनता था की महाराणा प्रतात जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए!* *महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है। अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-* *महाराणा प्रताप की प्रतिमा उनकी बहादुरी और वीरता को दर्शाती है।* *अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी* *गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी* *नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली* *न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली* *गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी* *निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी* *हिंदी में अनुवाद* *हे गेहलोत राणा प्रतापसिंघ तेरी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।* *अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम।* 🌷💐🌼🙏🌼💐🌷

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 10 वैशाख मास के माहात्म्य-श्रवण से सर्प क उद्धार और एक वैशाख धर्म के पालन तथा रामनाम-जप से व्याध का वाल्मीकि होना - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - देव कहते हैं- तदनन्तर व्याध सहित शंख मुनि ने विस्मित होकर पूछा- ' तुम कौन हो? और तुम्हें यह दशा कैसे प्राप्त हुई थी? सर्प ने कहा- पूर्वजन्म में मैं प्रयाग का ब्राह्मण था। मेरे पिता का नाम कुशीद मुनि और मेरा नाम रोचन था मैं धनाढ्य, अनेक पुत्रों का पिता और सदैव अभिमान से दूषित था। बैठे-बैठे बहुत बकवाद किया करता था। बैठना, सोना, नींद लेना मैथुन करना, जुआ खेलना, लोगों की बातें करना और सूद लेना यही मेरे व्यापार थे। मैं लोकनिन्दा से डरकर नाम मात्र के शुभ कर्म करता था; सो भी दम्भ के साथ उन कर्मों में मेरी श्रद्धा नहीं थी। इस प्रकार मुझ दुष्ट और दुर्बुद्धि के कितने ही वर्ष बीत गये। तदनन्तर इसी वैशाख मास में जयन्त नामक ब्राह्मण प्रयाग क्षेत्र में निवास करने वाले पुण्यात्मा द्विजों को वैशाख मास के धर्म सुनाने लगे स्त्री, पुरुष, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- सहस्रों श्रोता प्रात:काल स्नान करके अविनाशी भगवान् विष्णु की पूजा के पश्चात् प्रतिदिन जयन्त की कही हुई कथा सुनते थे। वे सभी पवित्र एवं मौन होकर उस भगवत् कथा में अनुरक्त रहते थे एक दिन मैं भी कौतूहलवश देखने की इच्छा से श्रोताओं की उस मण्डली में जा बैठा। मेरे मस्तक पर पगड़ी बँधी थी। इसलिये मैंने नमस्कार तक नहीं किया और संसारी वार्तालाप में अनुरक्त हो कथा में विघ्न डालने लगा। कभी मैं कपड़े फैलाता, कभी किसी की निन्दा करता और कभी जोर से हँस पड़ता था। जब तक कथा समाप्त हुई, तब तक मैंने इसी प्रकार समय बिताया। तत्पश्चात् दूसरे दिन सन्निपात रोग से मेरी मृत्यु हो गयी। मैं तपाये हुए शीशे के जल से भरे हुए हलाहल नरक में डाल दिया गया और चौदह मन्वन्तरों तक वहाँ यातना भोगता रहा। उसके बाद चौरासी लाख योनियों में क्रमश: जन्म लेता और मरता हुआ में इस समय क्रूर तमोगुणी सर्प होकर इस वृक्ष के खोंखले में निवास करता था। मुने ! सौभाग्यवश आपके मुखारविन्द से निकली हुई अमृतमयी कथा को मैंने अपने दोनों नेत्रों से सुना, जिससे तत्काल मेरे सारे पाप नष्ट हो गये मुनिश्रेष्ठ ! मैं नहीं जानता कि आप किस जन्म के मेरे बन्धु हैं; क्योंकि मैंने कभी किसी का उपकार नहीं किया है तो भी मुझ पर आपकी कृपा हुई। जिनका चित्त समान है, जो सब प्राणियों पर दया करने वाले साधु पुरुष हैं, उनमें परोपकार की स्वाभाविक प्रवृति होती है। उनकी कभी किसी के प्रति विपरीत बुद्धि नहीं होती। आज आप मुझ पर कृपा कीजिये, जिससे मेरी बुद्धि धर्म में लगे। देवाधिदेव भगवान् विष्णु की मुझे कभी विस्मृति न हो और साधु चरित्र वाले महापुरुषों का सदा ही संग प्राप्त हो। जो लोग मद से अंधे हो रहे हों, उनके लिये एकमात्र दरिद्रता ही उत्तम अंजन है। इस प्रकार नाना भाँति से स्तुति करके रोचन ने बार-बार शंख को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर चुपचाप उनके आगे खड़ा हो गया। तब शंख ने कहा- ब्रह्मन्! तुमने वैशाख मास और भगवान् विष्णु का माहात्म्य सुना है, इससे उसी क्षण तुम्हारा सारा बन्धन नष्ट हो गया। द्विजश्रेष्ठ! परिहास भय, क्रोध, द्वेष, कामना अथवा स्नेह से भी एक बार भगवान् विष्णु के पापहारी नाम का उच्चारण करके बड़े भारी पापी भी रोग-शोक रहित वैकुण्ठधा में चले जाते हैं। फिर जो श्रद्धा से युक्त हो क्रोध और इन्द्रियों को जीतकर सबके प्रति दया भाव रखते हुए भगवान् की कथा सुनते हैं, वे उनके लोकमें जाते हैं, इस विषय में तो कहना ही क्या है। कितने ही मनुष्य केवल भक्ति के बल से एकमात्र भगवान् की कथा-वार्ता में तत्पर हो अन्य सब धर्मों का त्याग कर देने पर भी भगवान् विष्णु के परम पद को पा लेते हैं। भक्ति से अथवा द्वेष आदि से भी जो कोई भगवान् की भक्ति करते हैं, वे भी प्राण हारिणी पूतना की भाँति परमपद को प्राप्त होते हैं। सदा महात्मा पुरुषों का संग और उन्हीं के विषय में वार्तालाप करना चाहिये। रचना शिथिल होने पर भी जिसके प्रत्येक श्लोक में भगवान् के सुयश सूचक नाम हैं, वही वाणी जनसमुदाय की पापराशि का नाश करने वाली होती है; क्योंकि साधु पुरुष उसी को सुनते, गाते और कहते हैं। जो भगवान् किसी से कष्ट साध्य सेवा नहीं चाहते, आसन आदि विशेष उपकरणों की इच्छा नहीं रखते तथा सुन्दर रूप और जवानी नहीं चाहते, अपितु एक बार भी स्मरण कर लेने पर अपना परम प्रकाशमय वैकुण्ठ धाम दे डालते हैं, उन दयालु भगवान् को छोड़कर मनुष्य किसकी शरण में जाय। उन्हीं रोग-शोक से रहित, चित्त द्वारा चिन्तन करने योग्य, अव्यक्त, दयानिधान, भक्तवत्सल भगवान् नारायण की शरण में जाओ। महामते ! वैशाख मास में कहे हुए इन सब धर्मों का पालन करो, उससे प्रसन्न होकर भगवान् जगन्नाथ तुम्हारा कल्याण करेंगे। ऐसा कहकर शंख मुनि व्याध की ओर देखकर चुप हो रहे। तब उस दिव्य पुरुष ने पुन: इस प्रकार कहा- 'मुने ! मैं धन्य हूँ, आप-जैसे दयालु महात्मा ने मुझपर अनुग्रह किया है। मेरी कुत्सित योनि दूर हो गयी और अब मैं परमगति को प्राप्त हो रहा हूँ, यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है।' यो कहकर दिव्य पुरुष ने शंख मुनि की परिक्रमा की तथा उनकी आज्ञा लेकर वह दिव्य लोक को चला गया। तदनन्तर सन्ध्या हो गयी। व्याध ने शंख को अपनी सेवा से सन्तुष्ट किया और उन्होंने सांयकाल की सन्ध्योपासना करके शेष रात्रि व्यतीत की। भगवान् के लीलावतारों की कथावार्ता द्वारा रात व्यतीत करके शंख मुनि ब्राह्ममुहूर्त में उठे और दोनों पैर धोकर मौनभाव से तारक ब्रह्म का ध्यान करने लगे। तत्पश्चात् शौचादि क्रिया से निवृत्त होकर वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान किया और सन्ध्या-तर्पण आदि सब कर्म समाप्त करके उन्होंने हर्षयुक्त हृदय से व्याध को बुलाया। बुलाकर उसे 'राम' इस दो अक्षर वाले नाम का उपदेश दिया, जो वेद से भी अधिक शुभकारक है। उपदेश देकर इस प्रकार कहा-'भगवान् विष्णु का एक-एक नाम भी सम्पूर्ण वेदों से अधिक महत्त्वशाली माना गया है। ऐसे अनन्त नामों से अधिक है भगवान् विष्णुका सहस्रनाम। उस सहस्रनाम के समान राम-नाम माना गया है। इसलिये व्याध! तुम निरन्तर रामनाम का जप करो और मृत्युपर्यन्त मेरे बताये हुए धर्मो का पालन करते रहो। इस धर्म के प्रभाव से तुम्हारा वल्मिक ऋषि के घर जन्म होगा और तुम इस पृथ्वी पर वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध होओगे।' व्याध को ऐसा आदेश देकर मुनिवर शंख ने दक्षिण दिशा को प्रस्थान किया व्याध ने भी शंख मुनि की परिक्रमा करके बार-बार उनके चरणों में प्रणाम किया और जब तक वे दिखायी दिये, तब तक उन्हीं की ओर देखता रहा। फिर उसने अति योग्य वैशाखोक्त धर्मो का पालन किया। जंगली कैथ, कटहल, जामुन और आम आदि के फलों से राह चलने वाले थके-माँदे पथिकों को वह भोजन कराता था। जूता, चन्दन, छाता, पंखा आदि के द्वारा तथा बालू के बिछावन और छाया आदि की व्यवस्था से पथिकों के परिश्रम और पसीने का निवारण करता था। प्रात:काल स्नान करके दिन-रात राम-नामका जप करता था। इस प्रकार धर्मानुष्ठान करके वह दूसरे जन्म में बल्मिक का पुत्र हुआ। उस समय वह महायशस्वी बाल्मीकि के नामसे विख्यात हुआ। उन्हीं बाल्मीकिजी ने अपने मनोहर प्रबन्ध रचना द्वारा संसार में दिव्य राम-कथा को प्रकाशित किया, जो समस्त कर्म-बन्धनों का उच्छेद करने वाली है। मिथिलापते ! देखो, वैशाख का माहात्म्य कैसा ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है, जिससे एक व्याध भी परम दुर्लभ ऋषिभाव को प्राप्त हो गया यह सेमांचकारी उपाख्यान सब पापों का नाश करने वाला हैं। जो इसे सुनता और सुनाता है, वह पुनः माता के स्तनका दूध पीने वाला नहीं होता। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ******************************************

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