BHAKTI Vichar (Number 58)

Chapter - 01,  Serial No  286 –290

एकमात्र भक्ति से ही जीव परमानंद की प्राप्ति कर सकता है ।

मुक्ति के बाद भी भक्त प्रभु की भक्ति करते रहते हैं । भक्ति के रस का रसास्वादन करने के लिए मुक्ति के पश्चात भी भक्त कभी भी भक्ति का त्याग नहीं करते ।

जैसे कोई नदी सागर से मिल चुकी है फिर भी नयी तरंगे लेकर रोजाना सागर से मिलती रहती है वैसे ही भक्त मोक्ष के बाद भी प्रभु से निरंतर मिलते रहते हैं ।

वैसे हम प्रभु के दास हैं और प्रभु हमारे स्वामी है पर भक्ति प्रभु और भक्त को एकरूप कर देती है ।

हम कितनी बार जन्म लेते हैं, कितनी बार स्वर्ग और नर्क जाते हैं और फिर लौटकर कितनी बार अलग-अलग योनियों में मृत्युलोक में वापस आते हैं पर अगर हम अपने जीवन में भक्ति करके प्रभु तक पहुँच जाते हैं तो फिर दोबारा आवागमन नहीं होता ।

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GOD, GOD & Only GOD  

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