BHAKTI Vichar (Number 58)

Chapter - 01,  Serial No  286 –290

एकमात्र भक्ति से ही जीव परमानंद की प्राप्ति कर सकता है ।

मुक्ति के बाद भी भक्त प्रभु की भक्ति करते रहते हैं । भक्ति के रस का रसास्वादन करने के लिए मुक्ति के पश्चात भी भक्त कभी भी भक्ति का त्याग नहीं करते ।

जैसे कोई नदी सागर से मिल चुकी है फिर भी नयी तरंगे लेकर रोजाना सागर से मिलती रहती है वैसे ही भक्त मोक्ष के बाद भी प्रभु से निरंतर मिलते रहते हैं ।

वैसे हम प्रभु के दास हैं और प्रभु हमारे स्वामी है पर भक्ति प्रभु और भक्त को एकरूप कर देती है ।

हम कितनी बार जन्म लेते हैं, कितनी बार स्वर्ग और नर्क जाते हैं और फिर लौटकर कितनी बार अलग-अलग योनियों में मृत्युलोक में वापस आते हैं पर अगर हम अपने जीवन में भक्ति करके प्रभु तक पहुँच जाते हैं तो फिर दोबारा आवागमन नहीं होता ।

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GOD, GOD & Only GOD  

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Swami Lokeshanand Apr 23, 2019

भरतजी कौशल्याजी के महल के दरवाजे पर आ तो पहुँचे, पर भीतर जाने की हिम्मत नहीं हो रही, बाहर ही खड़े रह गए। माँ खिड़की पर बैठी हैं, सामने पेड़ पर एक कौआ काँव काँव कर रहा है, आँसुओं की धारा बह चली। कौन आएगा? क्या पिताजी के जाने का समाचार राम को अयोध्या खींच ला सकता है? मेरा हृदय पत्थर का बना है, तभी तो राम को जाते देखकर भी यह फट नहीं गया, प्रेम तो महाराज ने ही निभाया है, मैं तो क्रुर काल के हाथों ठगी गई । यदि राम एकबार आ गए, तो मैं उनके चरणों से लिपट जाऊँगी, फिर जाने नहीं दूंगी। पर क्या वे आएँगे? अ कौए! अगर राम आ गए, तो तेरी चोंच सोने से मंढवा दूंगी, तुझे रोज मालपुआ बना बनाकर खिलाऊँगी। हाए! हाए! न मालूम वो इस समय कहाँ होंगे, किस हाल में होंगे? वर्षा ऋतु है, भीगने से बचने के लिए तीनों किसी वृक्ष के नीचे खड़े होंगे? क्या विधाता ने ये महल मेरे लिए ही बनाए हैं? वे वन में ठोकरें खा रहे हैं, मैं महलों में ही पड़ी हूँ। सत्य है, मूल के लिए ब्याज छोड़ दिया, पर अब तो मूल भी चला गया, सब कुछ लुट गया! बड़बड़ाना बंद हुआ तो ध्यान दिया, बाहर किसी के सिसकने की आवाज आ रही है। छोटे छोटे कदम धरती हैं, पाँच ही दिन में माँ पर बुढ़ापा उतर आया है। इधर भरतजी ने आहट सुनी, पहचान गए, माँ आ रही हैं। हाथों से चेहरा ढक लिया। राममाता पूछती हैं, कौन हो? चेहरा क्यों नहीं दिखाते? क्या तुम राम हो? भरतलालजी का बाँध टूट गया, ऐसी दहाड़ माँ के कानों में पहली बार पड़ी है। भरभराती आवाज आई "भरत हूँ माँ!" भरत! मेरा भरत बेटा आ गया। मेरा भरत! चेहरा तो दिखा दो बेटा, दिखाते क्यों नहीं? माँ! मेरा चेहरा मत देखो, इतना पाप चढ़ गया है मुझपर, मेरा चेहरा देखनेवाले को भी पाप लग जाएगा। कौशल्याजी भरतजी की छाती से जा लगीं। बस! आज इतना ही!! अब विडियो देखें- कौशल्या https://youtu.be/paC3Z6Pl7no

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Tarlok Apr 21, 2019

शुक्र है मालिक तेरा, शुक्र है,शुक्र है। एक बार एक संत ने अपने दो भक्तों को बुलाया और कहा आप को यहाँ से पचास कोस जाना है एक भक्त को एक बोरी खाने के समान से भर कर दी और कहा जो भी रास्ते मे मिले उसे ये बांटते चलें और एक को ख़ाली बोरी दी उससे कहा रास्ते मे जो उसे अच्छा मिले उसे बोरी मे भर कर ले जाए दोनो निकल पड़े जिसके कंधे पर सामान था वो धीरे चल पा रहा था ख़ाली बोरी वाला भक्त आराम से जा रहा था थोड़ी दूर उसको एक सोने की ईंट मिली उसने उसे बोरी मे डाल लिया थोड़ी दूर चला फिर ईंट मिली उसे भी उठा लिया जैसे जैसे चलता गया उसे सोना मिलता गया और वो बोरी मे भरता हुआ चल रहा था और बोरी का वज़न। बढता गया उसका चलना मुश्किल होता गया और साँस भी चढ़ने लग गई एक एक क़दम मुश्किल होता गया दूसरा भक्त जैसे जैसे चलता गया रास्ते मै जो भी मिलता उसको बोरी मे से खाने का कुछ समान दे देता धीरे धीरे बोरी का वज़न कम होता गया और उसका चलना आसान होता गया। जो बाँटता गया उसका मंज़िल तक पहुँचना आसान होता गया जो इक्ट्ठा करता रहा वो रास्ते मे ही दम तोड़ गया दिल से सोचना हमने जीवन मे क्या बाँटा और क्या इकट्ठा किया हम मंज़िल तक कैसे पहुँच पाएँगे । जिन्दगी का कडवा सच... आप को 60 साल की उम्र के बाद कोई यह नहीं पूछेंगा कि आप का बैंक बैलेन्स कितना है या आप के पास कितनी गाड़ियाँ हैं.... दो ही प्रश्न पूछे जाएंगे ... 1- आप का स्वास्थ्य कैसा है ? और 2-आप के बच्चे क्या करते हैं ? ऐ मेरे मलिक !!! आशीर्वाद की वर्षा करते रहो, खाली झोलियां सबकी भरते रहो। तेरे चरणों में सर को झुका ही दिया है, गुनाहों की माफ़ी ऒर दुःखों को दूर करते रहो।। 🙏शुक्र है मालिक तेरा, शुक्र है,शुक्र है।🙏

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Tarlok Apr 21, 2019

दान केसे करना चाहीये। *रहीम एक बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी नज़रें नीचे झुका लेते थे।* *ये बात सभी को अजीब लगती थी कि ये रहीम कैसे दानवीर हैं। ये दान भी देते हैं और इन्हें शर्म भी आती है।* *ये बात जब तुलसीदासजी तक पहुँची तो उन्होंने रहीम को चार पंक्तियाँ लिख भेजीं जिसमें लिखा था* - *ऐसी देनी देन जु* *कित सीखे हो सेन।* *ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ* *त्यों त्यों नीचे नैन।।* *इसका मतलब था कि रहीम तुम ऐसा दान देना कहाँ से सीखे हो? जैसे जैसे तुम्हारे हाथ ऊपर उठते हैं वैसे वैसे तुम्हारी नज़रें तुम्हारे नैन नीचे क्यूँ झुक जाते हैं?* *रहीम ने इसके बदले में जो जवाब दिया वो जवाब इतना गजब का था कि जिसने भी सुना वो रहीम का कायल हो गया।* *इतना प्यारा जवाब आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया।* *रहीम ने जवाब में लिखा* - *देनहार कोई और है* *भेजत जो दिन रैन।* *लोग भरम हम पर करैं* *तासौं नीचे नैन।।* *मतलब, देने वाला तो कोई और है वो मालिक है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है। परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ रहीम दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती हैं।* 🙏🏻

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Vijay Yadav Apr 23, 2019

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Tarlok Apr 21, 2019

परोपकार की इंटै। एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे ।वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी *”आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं।“* आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया। ऋषिवर बोले , *"प्रिय शिष्यों ,आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है ,मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें। यह एक बाधा दौड़ होगी इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा,तो क्या आप सब तैयार हैं ?”* *”जी हाँ, हम तैयार हैं ”* शिष्य एक स्वर में बोले । दौड़ शुरू हुई ,सभी तेजी से भागने लगे । वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे । वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह – जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था। सभी असमंजस में पड़ गए , जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे वहीँ अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे ; खैर , सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए। *“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों ?”*, ऋषिवर ने प्रश्न किया। यह सुनकर एक शिष्य बोला , *“गुरुजी , हम सभी लगभग साथ –साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी …कोई दूसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था …और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा -उठा कर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े…. इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की ।”* *“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ “*, ऋषिवर ने आदेश दिया । आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे, पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे । सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे । ऋषिवर बोले, *“दरअसल इन्हे मैंने ही उस सुरंग में डाला था , और यह दूसरों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।"* *पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम -भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है । पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागम -भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है।* *अतः यहाँ से जाते -जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना कभी ना भूलें, अंततः वही आपकी सबसे अनमोल जमा-पूँजी होगी। “*

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Shiva Gaur Apr 23, 2019

*मेरे पापा* किसी ने मुझे बोला किया करो देवों का आह्वान, पापा के पैर छूकर मैंने बोला यहीं है मेरे भगवान।। लोग कहते हैं मैं मेरे पापा की छाया हूं, मै ही उनकी धन और दौलत,मै ही उनकी माया हूं।। है उन्हें मुझ पर इतना विश्वास, जान कर होता है एक अनोखा अहसास।। मेरे पापा ने अब तक मेरी सारी बातें मानी है, मेरे पापा से ही मैंने अपनी कीमत जानी है।। जिसकी इच्छा कि है मैंने वो सब पाया है, मेरे पापा ने मुझ पर कभी हाथ नहीं उठाया है।। मेरी खुशी देखकर लोगों ने पूछा इसके पीछे है कौन, मैंने बोला मेरे पापा है मेरी बैक बोन।। कुछ लोगों में है मुझे हराने की होड, पर मेरे पापा है मेरी स्पाइनल कॉर्ड।। मेरे पापा ने दी है मुझे इतनी छूट, नहीं बोलना चाहता मैं उनसे कोई झूठ।। मेरे भाई ने मेरे पापा को मेरी स्पोर्ट करने से रोका है, उसको शाय़द अंदाजा नहीं कि यह प्यार बहुत अनोखा है।। मेरे पापा का प्यार मैं व्यर्थ नहीं बहाऊंगा, वादा है मेरे पापा से कुछ बनकर ज़रूर दिखाऊंगा।।

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