Dr Rajeev Saxena
Dr Rajeev Saxena Mar 8, 2019

श्री रामाष्टकम्‌। भजॆ विशॆष सुंदरं समस्त पापखंडनम्‌ । स्वभक्त चित्त रंजनं सदैव राममध्वयम्‌ ॥१॥ जटाकलापशॊभितं समस्त पापनाशकम्‌ ।कोई स्वभक्तभीति भंजनं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥२॥ निजस्वरूपबॊधकं कृपाकरं भवापहम्‌ । समं शिवं निरंजनम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥३॥ सहप्रपंचकल्पितं ह्यनावरूप वास्तवम्‌ । निराकृतिं निरामयं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥४॥ निष्प्रपंच निर्विकल्प निर्मलं निरामयम्‌ । चिदॆकरूप संततं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥५॥ भवाब्धिपॊतरूपकं ह्यशॆष दॆहकल्पितम्‌ । गुणाकरं कृपाकरं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥६॥ महासुवाक्यबॊधकैर्विराज मानवाक्पदै: । परब्रह्मव्यापकं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥७॥ शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्‌ । विराजमानदैशिकम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥८॥ रामाष्टकं पठति य: सुकरं सुपुण्यम्‌ व्यासॆन भाषितमिदं शृणुतॆ मनुष्य: ॥९॥ विद्यां श्रीयं विपुल सौख्यमनंतकीर्तिम्‌ संप्राप्य दॆहविलयॆ लभतॆ च मॊक्षम्‌ ॥१०॥ ॥इति श्री व्यास विरचित रामाष्टकम संपूर्णम्‌ ॥

श्री रामाष्टकम्‌।

भजॆ विशॆष सुंदरं समस्त पापखंडनम्‌ ।
स्वभक्त चित्त रंजनं सदैव राममध्वयम्‌ ॥१॥

जटाकलापशॊभितं समस्त पापनाशकम्‌ ।कोई
स्वभक्तभीति भंजनं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥२॥

निजस्वरूपबॊधकं कृपाकरं भवापहम्‌ ।
समं शिवं निरंजनम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥३॥

सहप्रपंचकल्पितं ह्यनावरूप वास्तवम्‌ ।
निराकृतिं निरामयं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥४॥

निष्प्रपंच निर्विकल्प निर्मलं निरामयम्‌ ।
चिदॆकरूप संततं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥५॥

भवाब्धिपॊतरूपकं ह्यशॆष दॆहकल्पितम्‌ ।
गुणाकरं कृपाकरं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥६॥

महासुवाक्यबॊधकैर्विराज मानवाक्पदै: ।
परब्रह्मव्यापकं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥७॥

शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्‌ ।
विराजमानदैशिकम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥८॥

रामाष्टकं पठति य: सुकरं सुपुण्यम्‌
व्यासॆन भाषितमिदं शृणुतॆ मनुष्य: ॥९॥

विद्यां श्रीयं विपुल सौख्यमनंतकीर्तिम्‌
संप्राप्य दॆहविलयॆ लभतॆ च मॊक्षम्‌ ॥१०॥

॥इति श्री व्यास विरचित रामाष्टकम संपूर्णम्‌ ॥
श्री रामाष्टकम्‌।

भजॆ विशॆष सुंदरं समस्त पापखंडनम्‌ ।
स्वभक्त चित्त रंजनं सदैव राममध्वयम्‌ ॥१॥

जटाकलापशॊभितं समस्त पापनाशकम्‌ ।कोई
स्वभक्तभीति भंजनं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥२॥

निजस्वरूपबॊधकं कृपाकरं भवापहम्‌ ।
समं शिवं निरंजनम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥३॥

सहप्रपंचकल्पितं ह्यनावरूप वास्तवम्‌ ।
निराकृतिं निरामयं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥४॥

निष्प्रपंच निर्विकल्प निर्मलं निरामयम्‌ ।
चिदॆकरूप संततं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥५॥

भवाब्धिपॊतरूपकं ह्यशॆष दॆहकल्पितम्‌ ।
गुणाकरं कृपाकरं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥६॥

महासुवाक्यबॊधकैर्विराज मानवाक्पदै: ।
परब्रह्मव्यापकं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥७॥

शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्‌ ।
विराजमानदैशिकम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥८॥

रामाष्टकं पठति य: सुकरं सुपुण्यम्‌
व्यासॆन भाषितमिदं शृणुतॆ मनुष्य: ॥९॥

विद्यां श्रीयं विपुल सौख्यमनंतकीर्तिम्‌
संप्राप्य दॆहविलयॆ लभतॆ च मॊक्षम्‌ ॥१०॥

॥इति श्री व्यास विरचित रामाष्टकम संपूर्णम्‌ ॥
श्री रामाष्टकम्‌।

भजॆ विशॆष सुंदरं समस्त पापखंडनम्‌ ।
स्वभक्त चित्त रंजनं सदैव राममध्वयम्‌ ॥१॥

जटाकलापशॊभितं समस्त पापनाशकम्‌ ।कोई
स्वभक्तभीति भंजनं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥२॥

निजस्वरूपबॊधकं कृपाकरं भवापहम्‌ ।
समं शिवं निरंजनम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥३॥

सहप्रपंचकल्पितं ह्यनावरूप वास्तवम्‌ ।
निराकृतिं निरामयं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥४॥

निष्प्रपंच निर्विकल्प निर्मलं निरामयम्‌ ।
चिदॆकरूप संततं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥५॥

भवाब्धिपॊतरूपकं ह्यशॆष दॆहकल्पितम्‌ ।
गुणाकरं कृपाकरं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥६॥

महासुवाक्यबॊधकैर्विराज मानवाक्पदै: ।
परब्रह्मव्यापकं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥७॥

शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्‌ ।
विराजमानदैशिकम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥८॥

रामाष्टकं पठति य: सुकरं सुपुण्यम्‌
व्यासॆन भाषितमिदं शृणुतॆ मनुष्य: ॥९॥

विद्यां श्रीयं विपुल सौख्यमनंतकीर्तिम्‌
संप्राप्य दॆहविलयॆ लभतॆ च मॊक्षम्‌ ॥१०॥

॥इति श्री व्यास विरचित रामाष्टकम संपूर्णम्‌ ॥
श्री रामाष्टकम्‌।

भजॆ विशॆष सुंदरं समस्त पापखंडनम्‌ ।
स्वभक्त चित्त रंजनं सदैव राममध्वयम्‌ ॥१॥

जटाकलापशॊभितं समस्त पापनाशकम्‌ ।कोई
स्वभक्तभीति भंजनं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥२॥

निजस्वरूपबॊधकं कृपाकरं भवापहम्‌ ।
समं शिवं निरंजनम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥३॥

सहप्रपंचकल्पितं ह्यनावरूप वास्तवम्‌ ।
निराकृतिं निरामयं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥४॥

निष्प्रपंच निर्विकल्प निर्मलं निरामयम्‌ ।
चिदॆकरूप संततं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥५॥

भवाब्धिपॊतरूपकं ह्यशॆष दॆहकल्पितम्‌ ।
गुणाकरं कृपाकरं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥६॥

महासुवाक्यबॊधकैर्विराज मानवाक्पदै: ।
परब्रह्मव्यापकं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥७॥

शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्‌ ।
विराजमानदैशिकम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥८॥

रामाष्टकं पठति य: सुकरं सुपुण्यम्‌
व्यासॆन भाषितमिदं शृणुतॆ मनुष्य: ॥९॥

विद्यां श्रीयं विपुल सौख्यमनंतकीर्तिम्‌
संप्राप्य दॆहविलयॆ लभतॆ च मॊक्षम्‌ ॥१०॥

॥इति श्री व्यास विरचित रामाष्टकम संपूर्णम्‌ ॥

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Geeta Devi Apr 21, 2019

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Shiva Gaur Apr 21, 2019

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Shiva Gaur Apr 21, 2019

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anju mishra Apr 21, 2019

क्या रामायण काल में भी होते थे मोबाइल? माना जाता है कि दूरभाष की तरह उस युग में 'दूर नियंत्रण यंत्र' था जिसे 'मधुमक्‍खी' कहा जाता था। जब इससे वार्ता की जाती थी तो वार्ता से पूर्व इससे भिन्न-भिन्न प्रकार की ध्‍वनि प्रकट होती थी। संभवत: इसी ध्‍वनि प्रस्‍फुटन के कारण इस यंत्र का नामकरण 'मधुमक्‍खी' किया गया होगा। ये यंत्र राजपरिवार के लोगों के पास रहते थे और इसके बल पर वे दूर से दूर बैठे लोंगे से बात कर लेते थे। यह बेतार प्रणाली थी शोधानुसार वि‍भीषण को लंका से निष्काषित कर दिया था, तब वह लंका से प्रयाण करते समय मधुमक्‍खी और दर्पण यंत्रों के अलावा अपने 4 विश्‍वसनीय मंत्री अनल, पनस, संपाती और प्रभाती को भी राम की शरण में ले गया था। राम की हित-पूर्ति के लिए रावण के विरुद्ध इन यंत्रों का उपयोग भी किया गया था। लंका के 10,000 सैनिकों के पास 'त्रिशूल' नाम के यंत्र थे, जो दूर-दूर तक संदेश का आदान-प्रदान करते थे। संभवत: ये त्रिशूल वायरलैस ही होंगे। इसके अलावा दर्पण यंत्र भी था, जो अंधकार में प्रकाश का आभास प्रकट करता था। लड़ाकू विमानों को नष्‍ट करने के लिए रावण के पास भस्‍मलोचन जैसा वैज्ञानिक था जिसने एक विशाल 'दर्पण यंत्र' का निर्माण किया था। इससे प्रकाश पुंज वायुयान पर छोड़ने से यान आकाश में ही नष्‍ट हो जाते थे। लंका से निष्‍कासित किए जाते वक्‍त विभीषण भी अपने साथ कुछ दर्पण यंत्र ले आया था। इन्‍हीं 'दर्पण यंत्रों' में सुधार कर अग्‍निवेश ने इन यंत्रों को चौखटों पर कसा और इन यंत्रों से लंका के यानों की ओर प्रकाश पुंज फेंका जिससे लंका की यान शक्‍ति नष्‍ट होती चली गई। एक अन्य प्रकार का भी दर्पण यंत्र था जिसे ग्रंथों में 'त्रिकाल दृष्‍टा' कहा गया है, लेकिन यह यंत्र त्रिकालदृष्‍टा नहीं बल्‍कि दूरदर्शन जैसा कोई यंत्र था। लंका में यांत्रिक सेतु, यांत्रिक कपाट और ऐसे चबूतरे भी थे, जो बटन दबाने से ऊपर-नीचे होते थे। ये चबूतरे संभवत: लिफ्‍ट थे।

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Shiva Gaur Apr 21, 2019

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Prabhakar soni G Apr 21, 2019

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Brij Bhushan NAyyR Apr 21, 2019

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