Aryan
Aryan Jul 27, 2017

Aryan Phulwani ने यह पोस्ट की।

#प्रवचन #सुधांशूजी

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namrta chhbra Mar 3, 2021

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RANJAN ADHIKARI Mar 2, 2021

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ऐसा हुआ कि स्वामी विवेकानंद अमरीका से वापिस लौटे। जब वे वापिस आए तो बंगाल में अकाल पड़ा था। तो वे तत्‍क्षण आकर अकालग्रस्त क्षेत्र में सेवा करने चले गए। ढाका की बात है। ढाका के कुछ वेदांती पंडित उनका दर्शन करने आए। स्वामी जी अमरीका से लौटे, भारत की पताका फहरा कर लौटे! तो पंडित दर्शन करने आए थे, सत्संग करने आए थे। लेकिन जब पंडित आए तो स्वामी विवेकानंद ने न तो वेदांत की कोई बात की, न ब्रह्म की कोई चर्चा की, कोई अध्यात्म, अद्वैत की बात ही न उठाई, वे तो अकाल की बात करने लगे और वे तो जो दुख फैला था चारों तरफ उससे ऐसे दुखी हो गए कि खुद ही रोने लगे, आंख से आंसू झरझर बहने लगे। पंडित एक—दूसरे की तरफ देख कर मुस्कुराने लगे कि यह असार संसार के लिए रो रहा है। यह शरीर तो मिट्टी है और यह रो रहा है, यह कैसा ज्ञानी! उनको एक—दूसरे की तरफ व्यंग्य से मुस्कुराते देख कर विवेकानंद को कुछ समझ न आया। उन्होंने कहा, मामला क्या है, आप हंसते हैँ? तो उनके प्रधान ने कहा कि हंसने की बात है। हम तो सोचते थे आप परमज्ञानी हैं। आप रो रहे हैं? शास्त्रों में साफ कहा है कि देह तो हैं ही नहीं हम, हम तो आत्मा हैं! शास्त्रों में साफ कहा है कि हम तो स्वयं ब्रह्म हैं, न जिसकी कोई मृत्यु होती, न कोई जन्म होता। और आप ज्ञानी हो कर रो रहे हैं? हम तो सोचते थे, हम परमज्ञानी का दर्शन करने आए हैं, आप अज्ञान में डूब रहे हैं! विवेकानंद का सोटा पास पड़ा था, उन्होंने सोटा उठा लिया, टूट पड़े उस आदमी पर। उसके सिर पर डंडा रख कर बोले कि अगर तू सचमुच ज्ञानी है तो अब बैठ, तू बैठा रह, मुझे मारने दे। तू इतना ही स्मरण रखना कि तू शरीर नहीं है। विवेकानंद का वैसा रूप—मजबूत तो आदमी थे ही, वे हट्टे—कट्टे आदमी थे—और हाथ में उनके बड़ा डंडा! उस पंडित की तो रूह निकल गई। वह तो गिड़गिड़ाने लगा कि महाराज, रुको, यह क्या करते हो? अरे, यह कोई ज्ञान की बात है? हम तो सत्संग करने आए हैं। यह कोई उचित मालूम होता है? वह तो भागा। उसने देखा कि यह आदमी तो जान से मार डाल दे सकता है। उसके पीछे बाकी पंडित भी खिसक गए। विवेकानंद ने कहा : शास्त्र को दोहरा देने से कुछ ज्ञान नहीं हो जाता। पांडित्य ज्ञान नहीं है। पर—उपदेश कुशल बहुतेरे! वह जो पंडित ज्ञान की बात कर रहा था, तोतारटत थी। उस तोतारटंत में कहीं भी कोई आत्मानुभव नहीं है। शास्त्र की थी, स्वयं की नहीं थी। और जो स्वयं की न हो, वह दो कौड़ी की है। 🌹🌹ओशो🌹🌹 अष्टावक्र महागीता

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.73 : नाद से बढ़कर कोई मंत्र नहीं* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 73)* बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।। धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! संतों की वाणी चाहे संस्कृत, चाहे पाली, चाहे भारती, चाहे किसी भी भाषा में हो, उसमें यही बात है कि *मनुष्य को बहुत पवित्रता से रहना चाहिए। पवित्रता शरीर की और हृदय की भी होनी चाहिए।* पवित्रता में रहते हुए अपने को ऊपर उठाओ। ऊपर उठाने का अर्थ अपने अंदर सूक्ष्मता में प्रवेश करो। यह जैसे-जैसे अधिक होता जाएगा, वैसे-वैसे उधर बढ़ते जाओगे, जिधर ईश्वर का ज्ञान होगा। जैसे-जैसे कोई स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर जाता है, उधर वह अपने को और परमात्मा को पहचानता है। संसार को पहचानते हुए जो भोग भोगते हैं, सबको प्रत्यक्ष है। उसमें कभी कोई सुखी नहीं, कोई तृप्त नहीं। संतों के ख्याल में है कि बारंबार जन्म लेना और मरना पड़ता है। यह शरीर है, कभी-न-कभी अवश्य छूटेगा। फिर दूसरा शरीर होगा। जैसे एक शरीर में सुख-दुःख भोगना होता है, उसी तरह दूसरे-दूसरे शरीरों में भी दुःख-सुख भोगना पड़ेगा। संतों ने कहा - ईश्वर-दर्शन करो। उसको पहचानो, तब कल्याण होगा। संतों की वाणी में इसी का उपदेश है, प्रेरण है। हृदय की शुद्धि यानी हृदय की पवित्रता के लिए उन्होंने कहा - हृदय में राग, द्वेष, काम, क्रोध आदि विकार नहीं रखो। किसी से वैर भाव के कारण जो उसका अनिष्ट सोचता है, वह कभी ऊर्ध्वगति को प्राप्त नहीं कर सकता। संतों में सबसे बड़ी शक्ति सहनशक्ति है। उसको अपनाओ। अंदर में प्रवेश करने के लिए, स्थूल से सूक्ष्म में जाने के लिए ऐसा ध्यान हो कि एकविन्दुता प्राप्त कर लो। विन्दु इतना सूक्ष्म होता है कि जिसको कोई बाहर में बना नहीं सकता। विन्दु उसको कहते हैं, जिसका स्थान है, परिमाण नहीं अर्थात् परिमाण रहित चिह्न को विन्दु कहते हैं। बाहर में परिभाषा के अनुकूल विन्दु नहीं बन सकता। अपनी दृष्टि को खूब समेटो। दृष्टि को समेटकर एक स्थान पर रखो, अपने अंदर में। एक स्थान पर कहने का मतलब यह कि दृष्टि को वहाँ रखो जहाँ मांस, हाड़, चाम, खून नहीं है। शून्य में ध्यान करो। जब कोई अपने अंदर देखना चाहे, तो देखने के लिए नेत्र बंद करे। तब उसको अंधकारमय आकाश दीखता है। उसमें हाड़, मांस, खून, चाम नहीं है। जो अपनी दृष्टि को ऐसा बनाता है, जैसे सूई में धागा पिरोने में या शिकार में निशाना करने में करते हैं, तब जैसे मन और दृष्टि एक जगह होती है, उसी तरह मन और दृष्टि को अपने अंदर एक जगह रखो। तब जो उदय होगा, वह परम विन्दु है। उस परम विन्दु पर जो ठहरकर रह सकता है, वह सूक्ष्म में प्रवेश कर जाता है। ऐसा प्रवेश कर जाने से बाह्य पदार्थों की आसक्ति छूट जाती है। या यों भी कहिए कि आरंभ में मन की आसक्ति को छोड़कर ध्यान करता है, तब ऐसा होता है। उसके लिए ध्यान करने में कोई तकलीफ नहीं होती। फेफड़े में चोट नहीं लगती। हाँ, ध्यान करने में मस्तिष्क में कुछ भारीपन अवश्य लगता है। तो जब ऐसा लगे, तब ध्यान करना छोड़ दीजिए। फिर पीछे कीजिए। जैसे कमजोर शरीरवाले का शरीर व्यायाम करते-करते मजबूत होता है, उसी प्रकार ध्यान करते-करते उसका ध्यानबल बढ़ जाता है। सूक्ष्म में प्रवेश करने पर नाद को प्राप्त करता है। योगशिखोपनिषद् में कहा गया है - नास्ति नादात्परो मंत्रः न देवः स्वात्मनः परः। नानुसंधेः परा पूजा न हि तृप्तेः परं सुखम्।। नाद से बढ़कर कोई मंत्र नहीं, अपनी आत्मा से बढ़कर कोई देवता नहीं है, (नाद वा ब्रह्म की) अनुसन्धि (अन्वेषण वा खोज) से बढ़कर कोई पूजा नहीं है और तृप्ति से बढ़कर कोई सुख नहीं है। इसी को ध्यानविन्दूपनिषद् में कहा गया है - बीजाक्षरं परम विन्दुं नादं तस्योपरि स्थितम्। सशब्दं चाक्षरे क्षीणे नि:शब्दं परमं पदम्।। परम विन्दु ही बीजाक्षर है, उसके ऊपर नाद है। नाद जब अक्षर (अनाश ब्रह्म) में लय हो जाता है, तो नि:शब्द परम पद है। अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम्। तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः।। अनाहत के बाद जो नि:शब्द परमपद है, योगी उसे सबसे बढ़कर समझते हैं, जहाँ सब संशय दूर हो जाते हैं। यह ज्ञान किसी भाषा में हो, ग्रहण करना चाहिए। संतों की वाणी में श्रद्धा होनी चाहिए। जो कोई संतों की वाणी में अश्रद्धा करता है, वह गलत करता है। यदि संतवाणी में हो और उसको करके देखने में लाभ हो, तो उससे बढ़कर और क्या बात हो सकती है। संतों की वाणी में स्थूल ध्यान भी बतलाया गया है। कबीर साहब ने कहा है - गुरु साहब करि जानिये, रहिये शब्द समाय। मिले तो दंडवत बन्दगी, पल पल ध्यान लगाय।। स्थूल ध्यान के बाद सूक्ष्म ध्यान बतलाया गया है। सूक्ष्म ध्यान में विन्दु और नाद का ध्यान है। स्थूल ध्यान में भी दो बातें हैं - स्थूल जप और स्थूल ध्यान। इससे स्थूल ध्यान में दृढ़ होकर सूक्ष्म ध्यान में बढ़े। हृदय की शुद्धता के कारण वह संसार में अच्छी तरह रह सकता है। जो राग- द्वेष रहित है, वह संसार में आसानी से प्रतिष्ठा से रह सकता है। इस प्रकार वह संसार में भी अच्छी तरह रहेगा और परलोक में भी उसका भला होगा। यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत मिरजानहाट में श्रीमान तिलक मोदीजी के आवास पर दिनांक 16.4.1954 ई० को प्रातः कालीन सत्संग में हुआ था। श्री सद्गुरु महाराज की जय

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