Sudha Mishra
Sudha Mishra Nov 27, 2021

Jai Shri Ram Jai hanuman ji🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹

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कामेंट्स

GOVIND CHOUHAN Nov 27, 2021
Jai Shree Ram 🌷 Jai Siyaram 🌷 Jai Jai Jai Bajarang Bali 🌷🙏🙏 Shubh Raatri Vandan Jiii 🙏🙏

U. S. Pandey Nov 27, 2021
‼️🙏‼️🚩🕉हं हनुमते नमः। ‼️🙏‼️🚩🕉🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣हा हा हा हा हा हा,, बडी़ मुश्किल मे पड़ गया रावण।। ‼️🙏‼️🚩🕉जय बजरंग बली। ‼️🙏‼️🚩🕉शुभ रात्रि स्नेहानुराग बंन्दन मेरी प्यारी छोटी, बहन ‼️🙏‼️🚩🕉

Shivsanker Shukla Nov 27, 2021
शुभ रात्रि आदरणीय बहन जय श्री राम

U. S. Pandey Nov 27, 2021
‼️🙏‼️🚩🕉Very nice Post. all the best ‼️🙏‼️🚩🕉G. n. sister.

R.K.SONI (Ganesh Mandir) Nov 27, 2021
Jai Shree Ram Ji🙏 Shubh ratri vandan Ji🌹🌹🌹v. nice post ji👌👌👌🌹🌹🌹🌹🌈🌈🌈🙏🙏

sunita Nov 27, 2021
Jay shree ram Jay Jay hanuman ji suhbratri vandan sister ji 🌹🌹🙏🏻🌹🌹

Kailash Prasad Nov 27, 2021
💮🌼🌸🍀🌺🌼☘️🌼🌺🌸🌼🌺 श्रद्धा ज्ञान देती है, नम्रता मान देती है, और योग्यता स्थान देती है, और ये तीनों मिल जाएं तो व्यक्ति को हर जगह सम्मान देती है!! गुड नाईट 💮🌼🌸🍀🌺🌼☘️🌼🌺🌸🌼🌺

Sudha Mishra Nov 27, 2021
@sunita532 Jai shri radhe krishna ji Shubh Ratri Pyari Bahna ji kanha ji ki kripa sda aap pr aapke pure privar pr bani rahe jai shri krishna ji🙏🏻 🌹

patel Navin Nov 27, 2021
🙏shubh ratri vandan ji 🙏🌹🌹jai bajarangbali 🌹 🌹bajarangbali ki krapa app ke pariwar pe bana rahe 🌹👌👌👌👌👌

प्रेरक गौ सेवक 〰️〰️🌼〰️〰️ घटना 10 जनवरी 2005 की है। उस दिन सोमावती अमावस्या थी। मैं निजी कार्य से पास के ही एक कस्बे 'मंदसौर' गया था। पर्व होने के कारण मैंने व्रत रखा था। दोपहर के लगभग ढाई बजे होंगे, मैं बस-स्टैंड पर एक उपाहार गृह में फलाहार तथा दुग्धाहार ले रहा था। वहाँ मलिन वस्त्र पहने अधेड़ उम्र का एक गड़ेरिया आया। वह सिर पर लाल पगड़ी बाँधे हाथ में लाठी लिये था। शहरी क्षेत्रों में ऐसे लोग अपने आप में अलग दिखायी देते हैं और सहसा सबका ध्यान खींच ही लेते हैं। वह व्यक्ति जब होटल में प्रविष्ट हुआ तो मेरी निगाहें भी उधर गयीं, मैंने सोचा-यह यहाँ से क्या खरीदेगा? उसने तत्काल होटल के स्वामी से कहा- सवा किलो गरम जलेबी दे दो। होटल वाले ने कुछ देर बाद ताजी गरम सवा किलो जलेबी तोलकर थैले में भरकर दे दी। उसने पचास रुपये का एक नोट निकालकर होटल वाले को दे दिया। प्रसन्नमुद्रा में वह जलेबी लेकर चला। मैं सोच रहा था कि अकेला यह सवा किलो जलेबी कैसे खा पायेगा? मेरी निगाहें स्वाभाविक तौर पर उसका पीछा करने लगीं। मुझे और अधिक जानने की तीव्र जिज्ञासा थी। वह लगभग 25-30 कदम आगे सड़क पर चला ही था कि एक गोमाता जो कि सड़क के बीचो बीच खड़ी थी, उस गड़ेरिये ने वह सवा किलो जलेबी की थैली उस गोमाता के सामने रख दी और पास बैठकर वह एक-एक पीस अपने हाथों से उसे खिलाने लगा। मैं भी होटल से बाहर आकर थोड़ा नजदीक से देखने लगा। मुझे इस दृश्य को देखकर इतना आनन्द आ रहा था कि मानो गो सेवा का वास्तविक पुण्य मुझे ही मिल रहा हो। मैं भावपूर्ण एवं रोमांचित भी हो रहा था। मैं उस गड़ेरिये को अतिशय धन्य मान रहा था और वह परमानन्द में मग्न होकर गौ को जलेबी का एक-एक ग्रास दे रहा था। जब गोमाता सब जलेबी खा चुकी तो वह गड़ेरिया उस गोमाता का चरणवन्दन करके चला गया। वह दृश्य देखने के बाद उसी दिन से मैंने यह संकल्प ले लिया कि मैं भी गोग्रास देने के बाद ही सदैव भोजन करूँगा। वास्तव में ऐसे महापुरुष अपने-आपको संसार में छिपाये रखते हैं, अपने को प्रकट नहीं करते। ऐसे जन निःस्वार्थ गोभक्ति करके दूसरों के पथप्रदर्शक बनकर प्रेरक का कार्य करते हैं। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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Deepak Jan 16, 2022

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devilakshmi Jan 16, 2022

.🚩 "स्वर्ग का द्वार",,,, 🚩 🧘एक दिन सुबह का समय था और स्वर्ग के द्वार पर चार आदमी खड़े थे। स्वर्ग का द्वार बन्द था। चारों इस इन्तजार में थे कि स्वर्ग का द्वार खुले और वे स्वर्ग के भीतर प्रवेश कर सकें। थोड़ी देर बाद द्वार का प्रहरी आया। उसने स्वर्ग का द्वार खोल दिया। द्वार खुलते ही सभी ने द्वार के भीतर जाना चाहा, लेकिन प्रहरी ने किसी को भीतर नहीं जाने दिया।🧘 🌹प्रहरी ने उन आदमियों से प्रश्र किया, "तुम लोग यहां क्यों खड़े हो ?" उन चारों आदमियों में से तीन ने उत्तर दिया, "हमने बहुत दान, पुण्य किए हैं। हम स्वर्ग में रहने के लिए आए हैं।" चौथा आदमी मौन खड़ा था। प्रहरी ने उससे भी प्रश्न किया, "तुम यहां क्यों खड़े हो ?" उस आदमी ने कहा, "मैं सिर्फ स्वर्ग को झांक कर एक बार देखना चाहता था। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं स्वर्ग में रहने के काबिल नहीं हूँ क्योंकि मैंने कोई दान, पुण्य नहीं किया।"🌹 🏵️प्रहरी ने चारों आदमियों की ओर ध्यान से देखा। फिर उसने पहले आदमी से प्रश्र किया, "तुम अपना परिचय दो और वह काम बताओ, जिससे तुम्हें स्वर्ग में स्थान मिलना चाहिए।" वह आदमी बोला, "मैं एक राजा हूँ। मैंने तमाम देशों को जीता। मैंने अपनी प्रजा की भलाई के लिए बहुत से मंदिर, मस्जिद, नहर, सड़क, बाग, बगीचे आदि का निर्माण करवाया तथा ब्राह्मणों को दान दिए।" प्रहरी ने प्रश्र किया, "दूसरे देशों पर अधिकार जमाने के लिए तुमने जो लड़ाइयाँ लड़ीं, उनमें तुम्हारा खून बहा कि तुम्हारे सैनिकों का ? उन लड़ाइयों में तुम्हारे परिवार के लोग मरे कि दोनों ओर की प्रजा मरी ?" "दोनों ओर की प्रजा मरी।" उत्तर मिला। "तुमने जो दान किए, प्रजा की भलाई के लिए सड़कें, कुएँ, नहरें आदि बनवाई, वह तुमने अपनी मेहनत की कमाई से किया या जनता पर लगाए गए ‘कर’ से ?" इस प्रश्र पर राजा चुप हो गया। उससे कोई उत्तर न देते बना। प्रहरी ने राजा से कहा, "लौट जाओ। यह स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए नहीं खुल सकता।"🏵️ ♓अब बारी आई दूसरे आदमी की। प्रहरी ने उससे भी अपने बारे में बताने को कहा। दूसरे आदमी ने कहा, "मैं एक व्यापारी हूँ। मैंने व्यापार में अपार धन संग्रह किया। सारे तीर्थ घूमे। खूब दान किए।" "तुमने जो दान किए, जो धन तुमने तीर्थों में जाने में लगाया, वह पाप की कमाई थी। इसलिए स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।" प्रहरी ने व्यापारी से कहा।♓ 🪴अब प्रहरी ने तीसरे आदमी से अपने बारे में बताने को कहा, "तुम भी अपना परिचय दो और वह काम भी बताओ जिससे तुम स्वर्ग में स्थान प्राप्त कर सको।" तीसरे आदमी ने अपने बारे में बताते हुए कहा, "मैं एक धर्म गुरु हूँ। मैंने लोगों को अच्छे,अच्छे उपदेश दिए। मैंने हमेशा दूसरों को ज्ञान की बातें बताई एवं अच्छे मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित किया।"🪴 🌀प्रहरी ने धर्मगुरु से कहा, "तुमने अपनी नेक कमाई के होते हुए उसे पूजा स्थलों के निर्माण में नहीं लगाया बल्कि केवल चंदे के पैसों से पूजा स्थलों का निर्माण करवाया। चंदा केवल आवश्यकता पड़ने पर ही यानि आपके पास नहीं है तो लेना चाहिए ! इस प्रकार तुमने ऋषियों , संतो के बनाये "अपरिग्रह " के सिद्धांत की अवहेलना की थी !तुमने लोगों को ज्ञान और अच्छाई की बातें तो जरूर बताईं मगर तुम स्वयं उपदेशों के अनुरूप अपने आपको न बना सके। क्या तुमने स्वयं उन उपदेशों का पालन किया ? एक बार फिर पृथ्वी पर जन्म लो और अपने आचरण को अपने उपदेशों के अनुरूप बनाओ ! अतः स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।"🌀 ♒अब चौथे आदमी की बारी आई। प्रहरी ने उससे भी उसका परिचय पूछा। उस आदमी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, "मैं एक गरीब किसान हूँ। मैं जीवन भर अपने परिवार के भरण,पोषण हेतु स्वयं पैसों के अभाव में तरसता रहा। मैंने कोई दान,पुण्य नहीं किया। इसलिए मैं जानता हूँ कि स्वर्ग का द्वार मेरे लिए नहीं खुल सकता।"♒ 💢प्रहरी ने कहा, "नहीं तुम भूल रहे हो। एक बार एक भूखे आदमी को तुमने स्वयं भूखे रह कर अपना पूरा खाना खिला दिया था, पक्षियों को दाना डाला और प्यासे लोगों के लिए पानी का इंतजाम किया था।" "हाँ मुझे याद है, लेकिन वे काम तो कोई बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थे। मुझे बस थोड़ा सा स्वर्ग में झांक लेने दीजिए।" किसान ने विनती की।💢 ☀️प्रहरी ने किसान से कहा, "नहीं तुम्हारे ये काम बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये सब कुछ तुमने अपनी थोड़ी सी नेक कमाई से किया था ! यह तुम्हारी देविक प्रवृति के पर्याप्त परिचायक है और देवता ही स्वर्ग में रह सकते है ! अतः आओ ! स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए ही खुला है।’☀️ ‼️अगर मृत्योपरांत परलोक में स्वर्ग / देवलोक/ मोक्ष चाहते है तो अपने महतत्व ( मन ) में देविक प्रवृतियों के निर्माण के लिए सात्विक आहार ही ग्रहण करे ! तामसिक आहार असुरलोक ( नरक ) ही ले जा सकता है स्वर्ग में नहीं ! *** बाकि जैसी इच्छा आपकी **** "जय जय श्री राधे कृष्ण " ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, 🌸💦🌸💦🌸💦🌸💦🙏 🌹🌲🌿🙏👏🌹🌲🌿🌹

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devilakshmi Jan 15, 2022

*आज की अमृत कथा* *लालच की दुनिया* 〰️〰️🌼〰️〰️ एक दिन गाँव की एक बहू सफाई कर रही थी, मुँह में सुपारी थी पीक आया तो उसने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया। उसे आश्चर्य तब हुआ जब उसका थूक स्वर्ण में बदल गया। अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी और उसके पास धीरे-धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा। महिलाओं में बात तेजी से फैलती है, इसलिए कई और महिलाएं भी अपने-अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूक कर सोना उत्पादन करने लगीं। धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह सामान्य चलन हो गया। सिवाय एक महिला के, उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया, समझाया, अरी ! तू क्यों नहीं थूकती ? जी, बात यह है कि मैं अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हर्गिज नहीं करूँगी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है वह अनुमति नहीं देंगे। किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया कि आखिर उसने एक रात डरते-डरते अपने पति को पूछ ही लिया। खबरदार जो ऐसा किया तो, यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज़ है ? पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस वह महिला चुप हो गई पर जैसा वातावरण था और जो चर्चाएँ होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी। खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियाँ अपने नए-नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी। पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते। यह शायद मेरा दुर्भाग्य है, अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ रहा है। शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है, ओह ! इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है ? जिस नियम के पालन से दिल कष्ट पाता रहे उसका पालन क्यों करूँ ? और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी। पतिदेव इस रोग को ताड़ गए और उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया। गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए। सूर्योदय से पहले-पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे। किन्तु ! अरे ! यह क्या ? ज्यों ही वे गाँव की कांकड़ (सीमा) से बाहर निकले ! पीछे भयानक विस्फोट हुआ। पूरा गांव धू-धू कर जल रहा था। सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए। अब उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ आ गया। वास्तव में, इतने दिन गाँव बचा रहा, तो केवल इस कारण कि उसका परिवार गाँव की परिधि में था। शिक्षा:- *धर्मांचरण करते रहें, कुछ पाने के लालच में इंसान बहुत कुछ खो बैठता है। इसलिए लालच से बचें..!!* *🙏🏽🙏🏿🙏जय जय श्री राम*🙏🏼🙏🏻🙏🏾

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एक बुजुर्ग औरत मर गई, यमराज लेने आये। औरत ने यमराज से पूछा, आप मुझे स्वर्ग ले जायेगें या नरक। यमराज बोले दोनों में से कहीं नहीं। तुमनें इस जन्म में बहुत ही अच्छे कर्म किये हैं, इसलिये मैं तुम्हें सीधे प्रभु के धाम ले जा रहा हूं। बुजुर्ग औरत खुश हो गई, बोली धन्यवाद, पर मेरी आपसे एक विनती है। मैनें यहां धरती पर सबसे बहुत स्वर्ग - नरक के बारे में सुना है मैं एक बार इन दोनों जगहो को देखना चाहती हूं। यमराज बोले तुम्हारे कर्म अच्छे हैं, इसलिये मैं तुम्हारी ये इच्छा पूरी करता हूं। चलो हम स्वर्ग और नरक के रासते से होते हुए प्रभु के धाम चलेगें। दोनों चल पडें, सबसे पहले नरक आया। नरक में बुजुर्ग औरत ने जो़र जो़र से लोगो के रोने कि आवाज़ सुनी। वहां नरक में सभी लोग दुबले पतले और बीमार दिखाई दे रहे थे। औरत ने एक आदमी से पूछा यहां आप सब लोगों कि ऐसी हालत क्यों है। आदमी बोला तो और कैसी हालत होगी, मरने के बाद जबसे यहां आये हैं, हमने एक दिन भी खाना नहीं खाया। भूख से हमारी आतमायें तड़प रही हैं बुजुर्ग औरत कि नज़र एक विशाल पतिले पर पडी़, जो कि लोगों के कद से करीब 300 फुट ऊंचा होगा, उस पतिले के ऊपर एक विशाल चम्मच लटका हुआ था। उस पतिले में से बहुत ही शानदार खुशबु आ रही थी। बुजुर्ग औरत ने उस आदमी से पूछा इस पतिले में क्या है। आदमी मायूस होकर बोला ये पतिला बहुत ही स्वादिष्ट खीर से हर समय भरा रहता है। बुजुर्ग औरत ने हैरानी से पूछा, इसमें खीर है तो आप लोग पेट भरके ये खीर खाते क्यों नहीं, भूख से क्यों तड़प रहें हैं। आदमी रो रो कर बोलने लगा, कैसे खायें ये पतिला 300 फीट ऊंचा है हममें से कोई भी उस पतिले तक नहीं पहुँच पाता। बुजुर्ग औरत को उन पर तरस आ गया सोचने लगी बेचारे, खीर का पतिला होते हुए भी भूख से बेहाल हैं। शायद ईश्वर नें इन्हें ये ही दंड दिया होगा यमराज बुजुर्ग औरत से बोले चलो हमें देर हो रही है। दोनों चल पडे़, कुछ दूर चलने पर स्वर्ग आया। वहां पर बुजुर्ग औरत को सबकी हंसने,खिलखिलाने कि आवाज़ सुनाई दी। सब लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। उनको खुश देखकर बुजुर्ग औरत भी बहुत खुश हो गई। पर वहां स्वर्ग में भी बुजुर्ग औरत कि नज़र वैसे ही 300 फुट उचें पतिले पर पडी़ जैसा नरक में था, उसके ऊपर भी वैसा ही चम्मच लटका हुआ था। बुजुर्ग औरत ने वहां लोगो से पूछा इस पतिले में क्या है। स्वर्ग के लोग बोले के इसमें बहुत स्वादिष्ट खीर है। बुजुर्ग औरत हैरान हो गई उनसे बोली पर ये पतिला तो 300 फीट ऊंचा है आप लोग तो इस तक पहुँच ही नहीं पाते होगें उस हिसाब से तो आप लोगों को खाना मिलता ही नहीं होगा, आप लोग भूख से बेहाल होगें पर मुझे तो आप सभी इतने खुश लग रहे हो, ऐसे कैसे लोग बोले हम तो सभी लोग इस पतिले में से पेट भर के खीर खाते हैं औरत बोली पर कैसे,पतिला तो बहुत ऊंचा है। लोग बोले तो क्या हो गया पतिला ऊंचा है तो यहां पर कितने सारे पेड़ हैं, ईश्वर ने ये पेड़ पौधे, नदी, झरने हम मनुष्यों के उपयोग के लिये तो बनाये हैं हमनें इन पेडो़ कि लकडी़ ली, उसको काटा, फिर लकड़ीयों के टुकडो़ को जोड़ के विशाल सिढी़ का निर्माण किया उस लकडी़ की सिढी़ के सहारे हम पतिले तक पहुंचते हैं और सब मिलकर खीर का आंनद लेते हैं बुजुर्ग औरत यमराज कि तरफ देखने लगी यमराज मुसकाये बोले ईशवर ने स्वर्ग और नरक मनुष्यों के हाथों में ही सौंप रखा है,चाहें तो अपने लिये नरक बना लें, चाहे तो अपने लिये स्वर्ग ईशवर ने सबको एक समान हालातो में डाला हैं। उसके लिए उसके सभी बच्चें एक समान हैं, वो किसी से भेदभाव नहीं करता। वहां नरक में भी पेेड़ पौधे सब थे, पर वो लोग खुद ही आलसी हैं, उन्हें खीर हाथ में चाहीये,वो कोई कर्म नहीं करना चाहते, कोई मेहनत नहीं करना चाहते, इसलिये भूख से बेहाल हैं। क्योंकि ये ही तो ईश्वर कि बनाई इस दुनिया का नियम है,जो कर्म करेगा, मेहनत करेगा, उसी को मीठा फल खाने को मिलेगा। ये ही आज का सुविचार है, स्वर्ग और नरक आपके हाथ में है मेहनत करें, अच्छे कर्म करें और अपने जीवन को स्वर्ग बनाएं। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि- ''सब तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।' ' गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं। यहां मेले के दिनों में काफी भीड़-भाड़ व रौनक रहती है। लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकांकीपन छाया रहता है। तीर्थ स्थान-सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है। इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल। मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। खाने-पीने के लिए होटल, पूजा-पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत-सी दुकानें खुल जाती हैं। सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन-कर्म होता है। यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं। कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसके बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। इसके अलावा यहां सांखय योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति-महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं। रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर की दो पत्नियां थीं- केशिनी और सुमति। केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था। अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते-ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये। वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया- 'तुम लोग भस्म हो जाओ। ' शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। अंशुमान खोजते-खोजते पाताल लोक पहुंचा। वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणत देखा तो सारी स्थिति समझ गया। उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हो पाया। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की। लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं जरूर पृथ्वी पर आऊंगी, लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए। भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया। गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा। भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे, अतः उन्हें एक रथ दिया गया। भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा। जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसके बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। जय मांँ गंगे🙏🙏

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