vinodkumar mahajan
vinodkumar mahajan Aug 5, 2017

सत्संग का लाभ

#सुविचार
सत्संग का लाभ
तीन साधुओं का एक दल घूमता हुआ किसी गांव में पहुंचा। सर्दी का समय था और शाम हो गई थी। वे ठहरने के लिए कोई जगह ढूंढने लगे।
गांव के एक सेठ ने कहा, महाराज ! मेरे पास दो दुकानें हैं। एक में तो सामान रखा हुआ है, दूसरी अभी खाली है। आप वहां आराम से रह सकेंगे, दुकान गरम भी रहेगी।
संत थके हुए थे, दुकान में पहुंचते ही जा कर सो गए। तीनों में से दो छोटे थे। उनको गहरी नींद आई हुई थी। लेकिन एक मुनि प्रौढ़ थे, नींद जल्दी खुल गई।
सोचा, अब जाग गया हूं तो वापिस सोना नहीं चाहिए। कुछ स्वाध्याय करूं। वे आगम स्वाध्याय में लगे हुए थे।
इसी बीच कुछ खटपट सी आवाज आई। संत ने जोर से पूछा, कौन हो ?
पास वाली दुकान में कुछ लोग आए हुए थे। उनमें से एक ने देखा कि सामने वाली दुकान से कोई महात्मा जी पुकार रहे हैं, तो सोचा, इनसे डरने की जरूरत नहीं है।
संतों की तो वंदना करनी चाहिए। उन्होंने आ कर नमस्कार किया। वे भी तीन थे। प्रौढ़ मुनि ने पूछा, अभी यहां कैसे आना हुआ ?
आगंतुकों में जो लीडर था, वह बोला, महात्मन ! आप स्वयं सोच लीजिए, इतनी रात में किसी की दुकान में कौन आ सकता है ?
संत ने कहा, अच्छा ! तुम चोर हो ?
चोर बोला, हां महाराज ! हम चोर हैं। आपके सामने झूठ नहीं बोलेंगे। हमें जानकारी मिली थी कि सेठ के पास काफी माल आया हुआ है। वही चुराने आए हैं।
संत ने सोचा, मुझे अपनी दुकान अभी खोल देनी चाहिए। संतों की दुकान है उपदेश देना, धर्म की बात बताना। सो उन्हें समझाने लगे,
भाई ! ऐसा गलत काम क्यों करते हो ? तुम गृहस्थ हो, संसार में और भी बहुत धंधे हैं, चोरी करके किसी का धन लेना पाप है।
पता नहीं ये कर्म तुमको कैसे भोगने पड़ेंगे ? यहां तुम चोरियां करते हो, हो सकता है कभी इसी तरह तुम्हारा भी नुकसान हो जाए।
संतों के बोध देने पर चोर बोले, मुनिवर ! आपने हमको बड़ा ज्ञान दे दिया। अंधेरे में उजाला कर दिया। हमारे भीतर दीया जला दिया। इस क्षण के बाद कभी चोरी नहीं करेंगे।
यों करते-करते पांच बज गए। जिस सेठ की दुकान में संत ठहरे थे, उसने सोचा की साधु लोग आए हुए हैं। जल्दी जाऊं तो कुछ सत्संग का लाभ पा लूं।
लेकिन सेठ संतों के पास पहुंचा तो देखा कि वहां पहले से तीन आदमी आए हुए हैं। सेठ ने तीनों से परिचय पूछा।
उनका मुखिया बोला, सेठ साहब ! हमारा परिचय यह है कि पांच घंटे पहले के तो हम चोर हैं और वर्तमान के अच्छे आदमी हैं।
चोर की बात सुनते ही एक बार तो सेठ घबरा गया। लेकिन मुखिया ने समझाया, आज संत लोग यहां थे तो तब आपका माल बच गया, वरना हम तो आपको भी संत बना देते। सारा माल आज साफ हो जाता।
सेठ संतों के चरणों में गिर गया और बोला, मुनिवर ! आप यहां विराजे इसलिए मेरा धन-माल बच गया, अन्यथा मैं तो रंक बन जाता।
संतों ने कहा, सेठ साहब ! हमने तो कोई धन-माल बचाने का प्रयास नहीं किया। हमने तो चोरों की आत्मा को सुधारने का प्रयास किया। इनके भीतर जो अंधकार है उसमें कुछ उजाला करने का प्रयास किया।
वे भव्य आत्माएं हैं। हमारा तत्वज्ञान या बोध इनके दिल को छू गया। इन्होंने आजीवन चोरी का त्याग कर दिया और प्रासंगिक रूप में तुम्हारा धन भी बच गया।
साधु उजाले का जीवन जीते हैं। गृहस्थ प्राय: अंधकार का जीवन जीते हैं। उस अंधकार में प्रकाश करने का काम संत-महात्मा करते हैं।
जैसे रात में बिजली जलाकर प्रकाश किया जा सकता है, वैसे ही जीवन में अज्ञान और पाप आदि के अंधकार को ज्ञान और धर्म के प्रकाश से दूर किया जा सकता है।
हरि ओम🙏🏻

+96 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 35 शेयर
Pawan Antil Sep 29, 2020

Sita Ram Hanuman 🙏🌹 *➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ ‼️🌸🌸गृहस्थ बड़ा या सन्यासी🌸🌸‼️ ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ 🌸प्राचीन समय की बात है । किसी नगर में एक विचित्र राजा रहता था । उस राजा की एक बड़ी ही अजीब आदत थी । जब भी नगर में कोई साधू या सन्यासी आता था तो वह उसे बुलाकर पूछता था कि – “ गृहस्थ बड़ा या सन्यासी ?” 🌸जो भी बताता कि गृहस्थ बड़ा है । वह राजा उससे कहता था कि – “ तो फिर आप सन्यासी क्यों बने ? 🌸चलिए गृहस्थ बनिए !” इस तरह वह उस सन्यासी को भी गृहस्थ बनने का आदेश देता था। 🌸जो बताता कि सन्यासी बड़ा है। वह उससे प्रमाण मांगता था। जो यदि वह प्रमाण न दे सके तो वह उसे भी गृहस्थ बना देता था । इस तरह कई संत आये और उन्हें सन्यासी से गृहस्थ बनना पड़ा । 🌸इसी बीच एक दिन नगर में एक महात्मा का आगमन हुआ। उसे भी राजा ने बुलाया और अपना वही पुराना प्रश्न पूछा – “ गृहस्थ बड़ा या सन्यासी ?” 🌸महात्मा बोले – “ राजन ! न तो गृहस्थ बड़ा है, न ही सन्यासी, जो अपने धर्म का पालन करें । वही बड़ा है ।” 🌸राजा बोला – “ अच्छी बात है । क्या आप अपने कथन को सत्य सिद्ध कर सकते है ?” 🌸महात्मा ने कहा – “ अवश्य ! इसके लिए आपको मेरे साथ चलना होगा ।” राजा महात्मा के साथ चलने के लिए तैयार हो गया । 🌸दुसरे ही दिन दोनों घूमते – घूमते दुसरे राज्य निकल गये। उस राज्य में राजकन्या का स्वयंवर हो रहा था । दूर – दूर के राजा – राजकुमार आये हुए थे । बड़े ही विशाल उत्सव का आयोजन किया हुआ था । राजा और महात्मा दोनों उस उत्सव में शामिल हो गये । 🌸स्वयंवर का शुभारम्भ हुआ । राजकन्या राजदरबार में उपस्थित हुई । वह बड़ी ही रूपवती और सुन्दर थी । सभी राजा और राजकुमार स्तब्ध होकर उसे देख रहे थे और मन ही मन उसे पाने की कामना कर रहे थे । 🌸राजकन्या के पिता का कोई वारिस नहीं था । इसलिए महाराज राजकन्या द्वारा स्वयंवरित राजकुमार को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने वाला था । 🌸राजकुमारी अपनी सखियों के साथ राजाओं के बीच घुमने लगी । वहाँ उपस्थित सभी राजाओं को देखने के पश्चात भी उसे कोई पसंद नहीं आया । राजा निराश होने लगे । राजकुमारी के पिता भी सोचने लगे कि स्वयंवर व्यर्थ ही जायेगा, क्योंकि राजकुमारी को तो कोई वर पसंद ही नहीं आया। 🌸तभी वहाँ एक तेजस्वी सन्यासी का आगमन हुआ । सूर्य के समान उसका चेहरा कांति से चमक रहा था । तभी राजकुमारी की दृष्टि उस युवा सन्यासी पर पड़ी । देखते ही राजकुमारी ने अपनी वरमाला उसके गले में पहना दी । 🌸अचानक हुए इस स्वागत से वह युवा सन्यासी अचंभित हो गया । उसने तुरंत वस्तुस्थिति को समझा और तत्क्षण उस माला को अपने गले से निकालते हुए कहा – “ हे देवी ! क्या तुझे दीखता नहीं ! मैं एक सन्यासी हूँ । मुझसे विवाह के बारे में सोचना तेरी भूल है ।” 🌸तभी राजा ने सोचा – “ लगता है यह कोई भिखारी है जो विवाह करने से डर रहा है ।” उन्होंने अपनी घोषणा दुबारा दोहराई – “ हे युवक ! क्या तुम्हें पता भी है । मेरी पुत्री से विवाह करने के बाद तुम इस सम्पूर्ण राज्य के मालिक हो जाओगे । क्या फिर भी तुम मेरी पुत्री का परित्याग करोगे ?” 🌸सन्यासी बोला – “ राजन ! मैं सन्यासी हूँ और विवाह करना मेरा धर्म नहीं है । आप अपनी पुत्री के लिए कोई अन्य वर देखिये ।” इतना कहकर वह वहाँ से चल दिया । किन्तु वह युवक राजकुमारी के मन में बस चूका था । उसने भी प्रतिज्ञा की कि “ मैं विवाह करूंगी तो उसी से अन्यथा अपने प्राण त्याग दूंगी ।” इतना कहकर वह भी उसके पीछे – पीछे चली गई । 🌸वह राजा और महात्मा जो यह वृतांत देख रहे थे । उनमें से महात्मा ने कहा – “ चलो ! हम भी उनके पीछे चलकर देखते है, क्या परिणाम होता है ?” वह दोनों भी राजकुमारी के पीछे – पीछे चलने लगे । 🌸चलते चलते वह एक घने जंगल में पहुँच गये । तभी वह युवा सन्यासी तो कहीं अदृश्य हो गया और राजकुमारी अकेली रह गई । घने जंगल में किसी को न देख राजकुमारी व्याकुल हो उठी । तभी यह राजा और महात्मा उसके पास पहुँच गये और उन्होंने राजकुमारी को समझाया । यह दोनों उसे उसके पिता के पास छोड़ने के लिए ले जाने लगे । 🌸वह जंगल से बाहर निकले ही थे कि अँधेरा हो गया । सर्दी की काली अंधियारी रात थी । भटकते – भटकते यह तीनो एक गाँव में पहुंचे । यह गाँव के चौपाल पर जाकर बैठ गये । बहुत सारे लोग वहाँ से गुजरे लेकिन किसी ने इन ठण्ड से ठिठुरते मुसाफिरों का हाल तक नहीं पूछा । 🌸तभी वहाँ से एक गाड़ीवान गुजरा । वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खेत से घर आ रहा था । उसने देखा कि वह तीनों ठण्ड से ठिठुर रहे है । वह उनके पास गया और पूछताछ कि तो महात्मा ने भटके हुए मुसाफ़िर बता दिया । 🌸किसान बोला – “ हे अतिथिदेव ! अगर आप चाहे तो आज रात मेरे घर ठहर सकते है ।” वह उनको घर ले गया । भोजन की पूछी और भोजन करवाया । उस दिन उनके घर में ज्यादा अनाज नहीं था । अतः किसान और उसकी पत्नी ने अपने हिस्से का भोजन अतिथियों को करवा दिया और स्वयं भूखे ही सो गये । 🌸सुबह हुई । राजकन्या को उसके पिता के पास छोड़कर राजा और सन्यासी दोनों वापस अपने नगर को चल दिए । 🌸महात्मा ने राजा से कहा – “ देखा राजा ! राजकन्या और राज्य को छोड़ने वाला वह सन्यासी अपनी जगह बड़ा है और हमारे अतिथि सत्कार के लिए स्वयं भूखा सोने वाला वह गृहस्थ किसान अपनी जगह बड़ा है । एक तरफ सन्यासी ने राज, वैभव और रमणी का तनिक भी मोह न करके अपने धर्म का पालन किया है, इसलिए वह निश्चय ही महान है । दूसरी तरह उन दंपति ने अपना व्यक्तिगत स्वार्थ न देखकर अतिथिसेवा को प्रधानता दी, इसलिए वह दोनों भी निश्चय ही महान है ।” 🌸“ किसी भी देश, काल और परिस्थिति में अपने धर्म – कर्तव्य का पालन करने वाला मनुष्य ही बड़ा होता है। फिर चाहे वह गृहस्थ हो या सन्यासी, कोई फर्क नहीं पड़ता ।” 🌸इस तरह महात्मा ने अपनी बात को सत्य सिद्ध किया । 🔸यदि आपको यह कहानी अच्छी लगी हो तो अपने दोस्तों को अवश्य शेयर करें।🔸 🔲🔹🔹🔹🔲 🔲🔹🔹🔹🔲 🔲🔹🔹🔹🔲 ‼️🌹🌹जय जय श्री राधे 🌹🌹‼️ 🔲🔹🔹🔹🔲 🔲🔹🔹🔹🔲 🔲🔹🔹🔹🔲*

+8 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Shanti Pathak Sep 29, 2020

*जय श्री राधे कृष्णा* *शुभरात्रि वंदन* : इक था बचपन पांचवीं तक स्लेट को जीभ से चाटकर कैल्शियम की कमी पूरी करना हमारी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें। *पढ़ाई का तनाव हमने पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था।* "पुस्तक के बीच विद्या, *पौधे की पत्ती* *और मोरपंख रखने* से हम होशियार हो जाएंगे ऐसा हमारा दृढ विश्वास था"। कपड़े के थैले में किताब कॉपियां जमाने का विन्यास हमारा रचनात्मक कौशल था। *हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का वार्षिक उत्सव था।* *माता पिता को हमारी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी, न हमारी पढ़ाई उनकी जेब पर बोझा थी*। सालों साल बीत जाते पर माता पिता के कदम हमारे स्कूल में न पड़ते थे। *एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा* हमने कितने रास्ते नापें हैं, यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं। *स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते हमारा ईगो हमें कभी परेशान नहीं करता था, दरअसल हम जानते ही नही थे कि ईगो होता क्या है ?* पिटाई हमारे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी, "पीटने वाला और पिटने वाला दोनो खुश थे", पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे, पीटने वाला इसलिए खुश कि हाथ साफ़ हुवा। *हम अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाए कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं,क्योंकि हमें "आई लव यू" कहना नहीं आता था*। आज हम गिरते - सम्भलते, संघर्ष करते दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं, कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं। *हम दुनिया में कहीं भी हों लेकिन यह सच है, हमे हकीकतों ने पाला है, हम सच की दुनियां में थे।* *कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया इस मामले में हम सदा मूर्ख ही रहे।* अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं, शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है, वरना जो जीवन हम जीकर आये हैं उसके सामने यह वर्तमान कुछ भी नहीं। *हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक साथ थे, काश वो समय फिर लौट आए।* 👨‍🎨👩🏻‍🚒 "Never forget YOUR CHILDHOOD"।: 👌 *भक्ति पथ पर चलने के लिये वृद्ध होने का इन्तजार मत कीजिये🙏* *क्योंकि* *💐बासी फूल तो प्रतिमा पर भी नहीं चढ़ाये जाते..👌🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏*

+177 प्रतिक्रिया 28 कॉमेंट्स • 263 शेयर
Sarvagya Shukla Sep 29, 2020

माता पिता के बिना घर कैसा होता है इसका अनुभव करना हो तो, एक दिन अपने अँगूठे के बिना अन्गुलियो से काम करके देख लो, माता पिता की किमत पता चल जायेगी!!!!!! छोटी मगर बहुत बड़ बात.... पानी अपना पूरा जीवन देकर पेड़ को बडा करता है, इसलिये शायद पानी लकडी को कभी डूबने नही देता , मा बाप का भी कुछ ऐसा ही सिद्धांत है!!!! भीगने का अगर शौक हो तो आकर अपने माता-पिता के चरणो मे बैठ जाना, ये बादल तो कभी कभी बरसते है मगर माता-पिता की कृपा हरपल बरसती है!!!! कभी ठोकर या चोट लगे तो *ओहह मा* ही मुह से निकलता है, लेकिन सडक पार करते समय कोई कार पास आकर ब्रेक लगाये तो *अरे बाप रे*यही मुह से निकलता है!!!!!!! क्युकी छोटी-छोटी तकलिफो के लिये माँ है और बडे बडे संकट आने पर पिता ही याद आते है!!!!!! माता पिता एक पेड़ है जिनकी शितल छाँव मे पूरा परिवार खुशी से रहता है!!!! बूढे हो जाते है माँ बाप औलाद की फ़िक्र मे, औलाद समझती है असर उनपर उम्र का है!!!!!

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर
Amar jeet mishra Sep 30, 2020

+6 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 52 शेयर
Sarvagya Shukla Sep 29, 2020

👉ट्रेन के इंतजार में एक बुजुर्ग रेलवे स्टेशन पर बैठकर रामायण की छोटी सी पुस्तक पढ़ रहे थे तभी वहां ट्रेन के इंतजार में बैठे एक नव दंपत्ति जोड़े में से उस नवयुवक ने कहा बाबा आप इन सुनी सुनाई कहानी कथाओं को पढ़कर क्यों अपना समय बर्बाद कर रहे हैं इनसे आपको क्या सीखने को मिलेगा अगर पढ़ना ही है तो इंडिया टुडे पढ़ो अखबार पढ़ो और भी बहुत सारी चीजें हैं जो आपको दुनियादारी की बातें सिखाती है व्यवहारिक ज्ञान देती है उन्हें पढ़ो तभी अचानक ट्रेन आ गई युवक अगले गेट से और बाबा पिछले गेट से ट्रेन में चढ़ गए ट्रेन के चलने के थोड़े देर बाद युवक की चीखने चिल्लाने की आवाज आई क्योंकि युवक तो खुद तो ट्रेन में चढ गया था पर उसकी पत्नी नीचे रह गई ट्रेन में नहीं चढ़ सकी तभी बाबा ने कहा बेटा तुमने इंडिया टुडे अखबार व अन्य सैकड़ों पुस्तकें पढ़ने के बजाय अगर रामायण पढ़ी होती तो तुम्हें ज्ञात होता कि राम जी ने वनवास जाते समय पहले सीता जी को रथ पर चढ़ाया था उसके बाद खुद चढ़े थे अतः तुम भी पहले अपनी पत्नी को ट्रेन में चढ़ाते उसके बाद खुद चढ़ते तो आज तुम्हारे साथ यह वाकिया नहीं होता । अतः इस लेख का तात्पर्य यह है कि हमारा सनातन धर्म और हम..😊

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Chandrashekhar Karwa Sep 29, 2020

*(1) प्रभु से भक्ति की पावन भिक्षा मांगनी चाहिए । प्रभु को पाने की आरंभिक और अंतिम कसौटी भक्ति है ।* *(2) प्रभु को विनम्रता बहुत प्रिय लगती है इसलिए भक्तों को सदैव विनम्र होना चाहिए ।* *(3) किसी सेठ ने मंदिर बनवाया और उसने अगर यह कह दिया कि यह मेरा मंदिर है तो उसे पाप लग जाता है । सेठ मंदिर का सेवक हो सकता है मालिक नहीं । ट्रस्ट भी मंदिर का सेवक हो सकता है मालिक नहीं क्योंकि सिद्धांत यह है कि मंदिर का मालिक कोई नहीं हो सकता सिर्फ प्रभु ही देवालय के एकमात्र मालिक होते हैं ।* *(4) अपने सभी इंद्रियों को संसार से निराहार रखना ही सच्ची एकादशी का व्रत है । सभी इंद्रियों को प्रभु में लगाना, ऐसी एकादशी से प्रभु प्रसन्न होते हैं । एकादशी प्राकृतिक चिकित्सा यानी स्वास्‍थ ठीक करने के लिए नहीं अपितु प्रभु को प्रसन्न करने के लिए ही होनी चाहिए ।* www.bhaktivichar.in GOD GOD & only GOD

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 1 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB