Shraddha Yadav
Shraddha Yadav Apr 10, 2020

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Languages : हिंदी | नेपाली | _____________________________________ QA : Verse no. 2.52 . Bhagavad Gita Multilingual . प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.५२ . प्रश्न १ : वेदों का मुख्य उद्देश्य क्या है ? कृष्णभावनाभावित भक्त क्यों वेदों के विधि विधानों से उदासीन हो जाता है? . उत्तर १ : "वैदिक रस्में तथा अनुष्ठान यथा त्रिकाल संध्या, प्रातःकालीन स्नान, पितृ-तर्पण आदि नवदीक्षितों के लिए अनिवार्य हैं | किन्तु जब कोई पूर्णतया कृष्णभावनाभावित हो और कृष्ण की दिव्य प्रेमभक्ति में लगा हो, तो वह इन विधि-विधानों के प्रति उदासीन हो जाता है, क्योंकि उसे पहले ही सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है | यदि कोई परमेश्र्वर कृष्ण की सेवा करके ज्ञान को प्राप्त होता है तो उसे शास्त्रों में वर्णित विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ तथा यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती | इसी प्रकार जो यह नहीं समझता कि वेदों का उद्देश्य कृष्ण तक पहुँचना है और अपने आपको अनुष्ठानादि में व्यस्त रखता है, वह केवल अपना समय नष्ट करता है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति शब्द-ब्रह्म की सीमा या वेदों तथा उपनिषदों की परिधि को भी लाँघ जाते हैं |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.५२, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ****अब आप ये प्रश्नोत्तर हमारी एंड्राइड एप्प के माध्यम से सीधे अपने फ़ोन में भी पा सकते हैं | कृपया हमारी एप्प सबसे ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड करें | (Bhagavad Gita Multilingual) __________________________________________ प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.५२ . प्रश्न १: वेदको मुख्य उद्देश्य के हो? किन कृष्ण दिमागका भक्तहरू वेदको नियममा बेवास्ता गर्छन्? . उत्तर १ : "वैदिक विधिविधान अन्तर्गत पर्ने सबै किसिमका त्रिकाल सन्ध्याहरु, प्रात:कालीन स्नान, पितृतर्पण, इत्यादिलगायतका कुराहरु नवदीक्षितहरुका लागि मात्र अनिवार्य हुन्छन् तर जो पूर्णरुपले कृष्णभावनामा छ, कृष्णकै दिव्य सेवामा संलग्न छ त्यो व्यक्त्ति यी सारा विधिविधानप्रति उदासीन रहेको हुन्छ, किनभने यसबाट पाइने पूर्णता उसले पहिले नै प्राप्त गरिसकेको हुन्छ | यदि कुनै व्यक्त्ति भगवान् कृष्णको सेवा गरेर ज्ञानका स्तरमा पुगेको छ भने उसले शास्त्रहरुमा भनिएका विविध किसिमका तपस्या र यज्ञहरु सम्पादन गरिरहनु आवश्यक छैन | यसै गरी यदि कसैले वेदको लक्ष्य कृष्णसम्म पुग्नु हो भन्ने कुरा बुझेको छैन र यस्तै यज्ञानुष्ठानमा लागिरहेको छ भने, त्यसले निरर्थक समय नष्ट गरिरहेछ भन्ने बुझ्नु पर्दछ | कृष्णभावनामा रहेको व्यक्त्ति शव्दब्रह्मको सीमाभन्दा पनि पर पुगेको हुन्छ वा वेद र उपनिषदहरुको परिधिभन्दा पनि माथि उठिसकेको हुन्छ |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.५२, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ****अब आप ये प्रश्नोत्तर हमारी एंड्राइड एप्प के माध्यम से सीधे अपने फ़ोन में भी पा सकते हैं | कृपया हमारी एप्प सबसे ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड करें | (Bhagavad Gita Multilingual) ___________________________________________

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PDJOSHI May 10, 2020

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Raj May 10, 2020

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 2.53 अध्याय 2: गीता का सार . . श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्र्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि || ५३ || . . श्रुति – वैदिक ज्ञान के; विप्रतिपन्ना – कर्मफलों से प्रभावित हुए बिना; ते – तुम्हारा; यदा – जब; स्थास्यति – स्थिर हो जाएगा; निश्र्चला – एकनिष्ठ; समाधौ – दिव्य चेतना या कृष्णभावनामृत में; अचला – स्थिर; बुद्धिः – बुद्धि; तदा – तब; योगम् – आत्म-साक्षात्कार; अवाप्स्यसि – तुम प्राप्त करोगे | . . जब तुम्हारा मन वेदों की अलंकारमयी भाषा से विचलित न हो और वह आत्म-साक्षात्कार की समाधि में स्थिर हो जाय, तब तुम्हें दिव्य चेतना प्राप्त हो जायेगी | . . तात्पर्यः ‘कोई समाधि में है’ इस कथन का अर्थ यह होता है कि वह पूर्णतया कृष्णभावनाभावित है अर्थात् उसने पूर्ण समाधि में ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् को प्राप्त कर लिया है | आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च सिद्धि यह जान लेना है कि मनुष्य कृष्ण का शाश्र्वत दास है और उसका एकमात्र कर्तव्य कृष्णभावनामृत में अपने सारे कर्म करना है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति या भगवान् के एकनिष्ट भक्त को न तो वेदों की अलंकारमयी वाणी से विचलित होना चाहिए न ही स्वर्ग जाने के उद्देश्य से सकाम कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए | कृष्णभावनामृत में मनुष्य कृष्ण के सान्निध्य में रहता है और कृष्ण से प्राप्त सारे आदेश उस दिव्य अवस्था में समझे जा सकते हैं | ऐसे कार्यों के परिणामस्वरूप निश्चयात्मक ज्ञान की प्राप्ति निश्चित है | उसे कृष्ण या उनके प्रतिनिधि गुरु की आज्ञाओं का पालन मात्र करना होगा | . प्रश्न १ : आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च सिद्धि क्या है ? इसे प्राप्त करने की क्या विधि है? . अब आप हमारी भगवद्गीता एप्प में माध्यम से भी ये श्लोक(चित्र व प्रश्नोत्तर सहित) सीधे अपने एंड्राइड फ़ोन में पा सकते हैं | कृपया हमारी एंड्राइड एप्प यहाँ से डाउनलोड करें : Bhagavad Gita Multilingual

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Haresh Chanchlani May 10, 2020

*❤️शान्तितुल्यं तपो नास्ति तोषान्न परमं सुखम्।* *नास्ति तृष्णापरो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥* *#भावार्थ* :- शान्ति जैसा कोई तप (यहाँ तप का अर्थ उपलब्धि समझना चाहिए) नहीं है, सन्तोष जैसा कोई सुख नहीं है (कहा भी गया है "संतोषी सदा सुखी), कामना जैसी कोई ब्याधि नहीं है और दया जैसा कोई धर्म नहीं है। 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 *प्रभात दर्शन :-* *तुलसी साथी विपत्ति के* *विद्या विनय विवेक,* *साहस सुकृति सुसत्यव्रत* *राम भरोसे एक...* *भावार्थ:* "तुलसीदास जी कहते हैं, किसी विपत्ति के समय आपको ये सात गुण बचायेंगे: आपका ज्ञान या शिक्षा, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने की आदत और ईश्वर में विश्वास !!" ☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️ 🙏🙏 सुप्रभात 🙏🙏 🚩जय श्री राम🚩 💐 *सुप्रभात*💐 *🌹आपका दिन रविवार मंगलमय हो🌹* *जय जय श्रीराम !!* 🧊⛲🌹☕🌹⛲🧊

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Amit Kumar May 10, 2020

।।माहेश्वर सूत्र की व्याख्या।। अ इ उ ण् । ऋ लृ क् । ए ओं ङ् । ऐ औ च् । ह य व र ट् । ल ण् । ञ म ङ ण न म् । झ भ ञ् । घ ढ ध ष् । ज ब ग ड द श् । ख फ छ ठ थ च ट त व् । क प य् । श ष स र् । ह ल् । उपर्युक्त्त १४ सूत्रों में संस्कृत भाषा के वर्णों (अक्षरसमाम्नाय) को एक विशिष्ट प्रकार से संयोजित किया गया है। फलतः, महर्षि पाणिनि को शब्दों के निर्वचन या नियमों मे जब भी किन्ही विशेष वर्ण समूहों (एक से अधिक) के प्रयोग की आवश्यकता होती है, वे उन वर्णों (अक्षरों) को माहेश्वर सूत्रों से प्रत्याहार बनाकर संक्षेप मे ग्रहण करते हैं। माहेश्वर सूत्रों को इसी कारण ‘प्रत्याहार विधायक’ सूत्र भी कहते हैं। प्रत्याहार बनाने की विधि तथा संस्कृत व्याकरण मे उनके बहुविध प्रयोगों को आगे दर्शाया गया है। इन १४ सूत्रों में संस्कृत भाषा के समस्त वर्णों को समावेश किया गया है। प्रथम ४ सूत्रों (अइउण् – ऐऔच्) में स्वर वर्णों तथा शेष १० सूत्र व्यञ्जन वर्णों की गणना की गयी है। संक्षेप में स्वर वर्णों को अच् एवं व्यञ्जन वर्णों को हल् कहा जाता है। अच् एवं हल् भी प्रत्याहार हैं। “प्रत्याहार” का अर्थ होता है – संक्षिप्त कथन। अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के प्रथम पाद के 71वें सूत्र ‘आदिरन्त्येन सहेता’ (१-१-७१) सूत्र द्वारा प्रत्याहार बनाने की विधि का श्री पाणिनि ने निर्देश किया है। आदिरन्त्येन सहेता (१-१-७१): (आदिः) आदि वर्ण (अन्त्येन इता) अन्तिम इत् वर्ण (सह) के साथ मिलकर प्रत्याहार बनाता है जो आदि वर्ण एवं इत्सञ्ज्ञक अन्तिम वर्ण के पूर्व आए हुए वर्णों का समष्टि रूप में (collectively) बोध कराता है। उदाहरण: = अच् = प्रथम माहेश्वर सूत्र ‘ अइउण् ’ के आदि वर्ण ‘ अ ’ को चतुर्थ सूत्र ‘ ऐऔच् ’ के अन्तिम वर्ण ‘ च् ’ से योग कराने पर ” अच् ” प्रत्याहार बनता है। यह ” अच् ” प्रत्याहार अपने आदि अक्षर ‘ अ ’ से लेकर इत्संज्ञक ‘ च् ‘ के पूर्व आने वाले औ पर्यन्त सभी अक्षरों का बोध कराता है। अतः, अच् = अ इ उ ॠ ॡ ए ऐ ओ औ। इसी तरह ‘ हल् ‘ प्रत्याहार की सिद्धि ५ वें सूत्र ‘ हयवरट् ‘ के आदि अक्षर ‘ ह ’ को अन्तिम १४ वें सूत्र ‘ हल् ‘ के अन्तिम अक्षर ‘ ल् ‘ के साथ मिलाने (अनुबन्ध) से होती है। फलतः, हल् = ह य व र, ल, ञ म ङ ण न, झ भ, घ ढ ध, ज ब ग ड द, ख फ छ ठ थ च ट त, क प, श ष स, ह। उपर्युक्त सभी १४ सूत्रों में अन्तिम वर्ण की ” इत् संज्ञा ” श्री पाणिनि मुनिने की है। ” इत् संज्ञा ” होने से इन अन्तिम वर्णों का उपयोग प्रत्याहार बनाने के लिए केवल अनुबन्ध (Bonding) हेतु किया जाता है, लेकिन व्याकरणीय प्रक्रिया मे इनकी गणना नही की जाती है अर्थात् इनका प्रयोग नही होता है।

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