जय जवान जय किसान का नारा देने से काम नहीं चलेगा अन्नदाता की आर्थिक स्थिति मजबूत करनी होगी,

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Anilkumar Tailor Oct 30, 2020

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RANJAN ADHIKARI Oct 28, 2020

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संकल्प Oct 27, 2020

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हिन्दू १६ संस्कारो के मुहूर्त 〰〰〰〰〰〰〰〰〰 अन्न प्राशन्न मुहूर्त 🔸🔸🔸🔸🔸🔸 अन्न प्राशन्न संस्कार के बाद माँ बच्चे को दूध के साथ खाना देना आरम्भ कर देती है। यह संस्कार लड़के लिए 6, 8 व 10 वें महीने में किया जाता है। और लड़की के के लिए 5 ,7 ,9 व 11वें महीने में किया जाता है। सभी स्थिर नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी उत्तराषाढ़ा एवं रोहणी इसके अतिरिक्त सभी चर नक्षत्र स्वाति पुनर्वसु श्रवण शतभिषा धनिष्ठा इन नक्षत्रो में अन्न प्रशन्न संस्कार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त निम्न 1,2,3,5,7,10,11,13 व 15 तिथि में एवं शुभ वार भी इस संस्कार के लिए अच्छे है। कर्ण भेदन मुहूर्त 🔸🔸🔸🔸🔸 पुराने जमानो में बच्चों को महामारी होने की अधिक आशंका हुआ करती थी इन सबसे निजात पाने के लिए कान छेदन का विधान था। कान छेदन से आँख और अंडकोषों की बीमारी से बचाव हो जाता है। इस संस्कार के लिए मुहूर्त 3, 5, 7 व 8 वें वर्ष में किया जाता है। मृगशिरा रेवती चित्रा या अनुराधा अथवा हस्त अश्विनी पुष्य नक्षत्र में भी कान छेदन कर सकते है। इसके लिए निम्न तिथियाँ 1, 2, 3, 5, 7, 10, 13 व 15 एवं शुभ वार भी अच्छे होते है। चूड़ाकरण अर्थात मुण्डन मुहूर्त 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸 इस मुहूर्त में बच्चे के बाल उतारे जाते है तथा चोला पहनाया जाता है और बीच में छोटी सी चोटी भी छोड़ दी जाती है। इसे मुण्डन संस्कार भी कहा जाता है। यह संस्कार पहले तीसरे या पाँचवे वर्ष में किया जाता है। दूसरे चौथे छठें वर्ष में नही करना चाहिए। स्वाति पुनर्वसु पुष्य श्रवण धनिष्ठा शतभिषा हस्त चित्रा अश्विनी मृगशिरा ज्येष्ठा नक्षत्र शुभ होते है। इस संस्कार के लिए जन्म राशि का लग्न और इसकी 8 वीं राशि का लग्न छोड़ दें। विद्यारम्भ करने का मुहूर्त 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸 जब बच्चा पैदल चलने लगता है तो उसके पढ़ाई करने का समय शुरू हो जाता है। बच्चे को सूर्य उत्तरायण के समय पर ही विद्यालय में प्रवेश करवाना चाहिए। बच्चे को विद्यालय में प्रवेश के लिए द्वितीय तृतीय व पञ्चमी तिथि छठी दसवी एकादशी द्वादशी सोमवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शुभ होते है। 3 से 5 वर्ष के बीच बच्चों का स्कूल में प्रवेश कराना चाहिए। अश्विनी रोहणी मृगशिरा आर्द्रा पुनर्वसु चित्र हस्त अनुराधा व् रेवती नक्षत्रों में प्रवेश करवा सकते है। इसके लिए शुभ तिथि 2, 3, 5, 6,10,11 व 12 होती है । 🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸

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Anita Sharma Oct 29, 2020

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आशुतोष Oct 29, 2020

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Neha Sharma, Haryana Oct 28, 2020

🌸🙏*(मीरा चरित -)..... (25, 26)*🙏🌸 🌸🙏*क्रमशः से आगे........................🌿👣🌿 *मेड़ता से गये पुरोहित जी के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित *और उनकी पत्नी मीरा को देखने आये *राजमहल में उनका आतिथ्य सत्कार हो रहा है *पर मीरा को तो जैसे वह सब दीखकर भी दिखाई नहीं दे रहा *है *उसे न तो कोई रूचि है न ही कोई आकर्षण, *दूसरे दिन माँ सुन्दर वस्त्राभूषण लेकर एक दासी के साथ मीरा के पास आई आग्रह से स्थिति समझाते हुये मीरा को सब पहनने को कहा, मीरा ने बेमन से कहा- आज जी ठीक नहीं है भाबू रहने दीजिये.. किसी और दिन पहन लूँगी माँ खिन्न हो कर उठकर चली गई तो मीरा ने उदास मन से तानपुरा उठाया और गाने लगी....... *राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊँ ए माय* *मीरा के प्रभु गिरधर नागर, रज चरणन की पाऊँ ए माय* भजन विश्राम कर वह उठी ही थी कि माँ और काकीसा के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित जी की पत्नी ने श्याम कुन्ज में प्रवेश किया मीरा उनको यथायोग्य प्रणाम कर बड़े संकोच के साथ एक ओर हटकर ठाकुर जी को निहारती हुईं खड़ी हो गई, पुरोहितानी जी ने तो ऐसे रूप की कल्पना भी न की थी वह, लज्जा से सकुचाई मीरा के सौंदर्य से विमोहित सी हो गई और उनसे प्रणाम का उत्तर, आशीर्वाद भी स्पष्ट रूप से देते न बना वे कुछ देर मीरा को एकटक निहारते ही बैठी रही दासियों ने आगे बढ़कर चरणामृत प्रसाद दिया कुछ समय और यूँ ही मन्त्रमुग्ध बैठी फिर काकीसा के साथ चली गई, माँ ने सबके जाने के बाद फिर मीरा से कहा- तेरा क्या होगा, यह आशंका ही मुझे मारे डालती है अरे विनोद में कहे हुये भगवान से विवाह करने की बात से क्या जगत का व्यवहार चलेगा...? साधु-संग ने तो मेरी कोमलांगी बेटी को बैरागन ही बना दिया है मैं अब किससे जा कर बेटी के सुख की भिक्षा माँगू...???? मीरा - माँ आप क्यों दुःखी होती है....? सब अपने भाग्य का लिखा ही पाते है यदि मेरे भाग्य में दुःख लिखा है तो क्या आप रो -रो कर उसे सुख में पलट सकती है....? तब जो हो रहा है उसी में संतोष मानिये मुझे एक बात समझ में नहीं आती माँ जो जन्मा है वह मरेगा ही, यह बात तो आप अच्छी तरह जानती है फिर जब आपकी पुत्री को अविनाशी पति मिला है तो आप क्यों दुःख मना रही है...???? आपकी बेटी जैसी भाग्यशालिनी और कौन है जिसका सुहाग अमर है....????? मीरा ने भाबू को बताया - ऐसे वर को क्या करूँ जो जन्मे अौर मर जाय... *वर बरिए गोपाल जी..म्हारो चूड़लो अमर होय जाये* वीरकुवंरी जी एक बार फिर मीरा के तर्क के आगे चुप हो चली गई मीरा श्याम कुन्ज में अकेली रह गई आजकल दासियों को भी कामों की शिक्षा दी जा रही है क्योंकि उन्हें भी मीरा के साथ चितौड़ जाना है मीरा ने एकान्त पा फिर आर्त मन से प्रार्थना आरम्भ की........ *तुम सुनो दयाल म्हाँरी अरजी* *भवसागर में बही जात हूँ..काढ़ो तो थाँरी मरजी* *या संसार सगो नहीं कोई...साँचा सगा रघुबर जी* *मात पिता अर कुटुम कबीलो...सब मतलब के गरजी* *मीरा की प्रभु अरजी सुण लो..चरण लगावो थाँरी मरजी* क्रमशः ................ (मीरा चरित - )......(26) क्रमशः से आगे..............🌿👣🌿 मीरा श्याम कुन्ज में एकान्त में गिरधर के समक्ष बैठी है आजकल दो ही भाव उस पर प्रबल होते है - या तो ठाकुर जी की करूणा का स्मरण कर उनसे वह कृपा की याचना करती है और या फिर अपने ही भाव- राज्य में खो अपने श्यामसुन्दर से बैठे बातें करती रहती है, इस समय दूसरा भाव अधिक प्रबल है- मीरा गोपाल से बैठे निहोरा (प्रार्थना) कर रही है--- *थाँने काँई काँई कह समझाऊँ...म्हाँरा सांवरा गिरधारी* *पूरब जनम की प्रीति म्हाँरी...अब नहीं जात निवारी* *सुन्दर बदन जोवताँ सजनी..प्रीति भई छे भारी* *म्हाँरे घराँ पधारो गिरधर...मंगल गावें नारी* *मोती चौक पूराऊँ व्हाला...तन मन तोपर वारी* *म्हाँरो सगपण तो थांसूं साँवरिया...जग सूँ नहीं विचारी* *मीरा कहे गोपिन को व्हालो...हम सूँ भयो ब्रह्मचारी* *चरण शरण है दासी थाँरी...पलक न कीजे न्यारी* मीरा गाते गाते अपने भाव जगत में खो गई----वह सिर पर छोटी सी कलशी लिए यमुना जल लेकर लौट रही है उसके तृषित नेत्र इधर-उधर निहार कर अपना धन खोज रहे है वो यहीं कहीं होंगे -आयेंगे -नहीं आयेंगे....बस इसी ऊहापोह में धीरे-धीरे चल रही थी कि पीछे से किसी ने मटकी उठा ली उसने अचकचाकर ऊपर देखा तो - कदम्ब पर एक हाथ से डाल पकड़े और एक हाथ में कलशी लटकाये मनमोहन बैठे हँस रहे है लाज के मारे उसकी दृष्टि ठहर नहीं रही लज्जा नीचे और प्रेम उत्सुकता ऊपर देखने को विवश कर रही है वे एकदम वृक्ष से उसके सम्मुख कूद पड़े वह चौंककर चीख पड़ी....और साथ ही उन्हें देख लजा गई, *डर गई न....? श्यामसुंदर ने हँसते हुए पूछा और हाथ पकड़ कर कहा -चल आ, थोड़ी देर बैठकर बातें करें" सघन वृक्ष तले एक शिला पर दोनों बैठ गये मुस्कुरा कर बोले- तोको का लगो - कोई वानर कूद पड़ो है क्या..? अभी पानी भरने को समय है का....??? दोपहर में पता नहीं घाट नितान्त सूने रहते है जो कोई सचमुच वानर आ जातो तो.....??? मीरा - तुम हो न उसके मुख से निकला श्यामसुंदर -मैं का यहाँ ही बैठो रहूँ हूँ....? गईयाँ नहीं चरानी मोकू.....? मीरा -एक बात कहूँ.....??? मैने सिर नीचा किए हुये कहा श्यामसुंदर -एक नहीं सौ कह...पर माथा तो ऊँचा कर तेरो मुख ही नाय दिख रहो मोकू....उन्होंने मुख ऊँचा किया तो फिर लाज ने आ घेरा, श्यामसुंदर अच्छा अच्छा मुख नीचो ही रहने दे कह का बात है......? मीरा -तुम्हें कैसे प्रसन्न किया जा सकता है...? बहुत कठिनाई से मैंने कहा श्यामसुंदर -तो सखी....तोहे मैं अप्रसन्न दीख रह्यो हूँ का मीरा -नहीं मेरा वो मतलब नहीं था..सुना है...तुम प्रेम से वश में होते हो श्यामसुंदर- मोको वश में करके क्या करेगी सखी नाथ डालेगी कि पगहा बाँधेगी.....??? मेरे वश हुये बिना तेरो कहा काज अटक्यो है भला....??? मीरा - सो नहीं श्यामसुन्दर श्यामसुंदर - तो फिर क्या.....??? कब से पूछ रहो हूँ....तेरो मोहढों (मुख) तो पूरो खुले हु नायक एकहु बात पूरी नाय निकसै...अब मैं भोरो-भारो कैसे समझूँगो? मीरा -सुनो श्यामसुन्दर...मैंने आँख मूँदकर पूरा ज़ोर लगाकर कह दिया -मुझे तुम्हारे चरणों में अनुराग चाहिए" श्यामसुंदर - सो कहा होय सखी.....? उन्होंने अन्जान बनते हुये पूछा, अपनी विवशता पर मेरी आँखों में आँसू भर आये घुटनों में सिर दे मैं रो पड़ी....😥 श्यामसुंदर - सखी रोवै मति....उन्होंने मेरे आँसू पौंछते हुये पूछा और ऐसो अनुराग कैसो होवे री....??? मीरा - सब कहते हैं..उसमें अपने सुख की आशा - इच्छा नहीं होती तो और कहा होय....?.....श्यामसुन्दर ने पूछा, मीरा - बस तुम्हारे सुख की इच्छा" श्यामसुंदर -और कहा अब तू मोकू दुःख दे रही है....? ऐसा कह हँसते हुये मेरी मटकी लौटाते हुये बोले, ले अपनी कलशी.....बावरी कहीं की..... और वह वन की ओर दौड़ गये...मैं वहीं सिर पर मटकी ले ठगी सी बैठी रही....... क्रमशः ................

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Deepak Oct 29, 2020

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