Ramji   Lal  Pahadiya
Ramji Lal Pahadiya Jan 21, 2020

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Sheela Sharma Feb 26, 2020

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Anamika jain Feb 26, 2020

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एक मंदिर था। उस मंदिर में सभी लोग तनख्वाह पर काम करते थे। आरती वाला, पूजा कराने वाला और यहां तककि घंटा बजाने वाला भी तनख्वाह पर ही था। घंटा बजाने वाला व्यक्ति आरती के समय भक्ति भाव के साथ इतना मशगुल हो जाता था कि वह होश में ही नहीं रहता था। वह पूरी भक्ति भाव से खुद का काम करता था। मंदिर में आने वाले सभी लोग भगवान के‌ साथ-साथ उस घंटा बजाने वाले व्यक्ति के भक्ति भाव के भी दर्शन करते थे और उसकी भी वाह-वाह होती थी। एक दिन मंदिर का ट्रस्ट बदल गया। नये ट्रस्टी ने एक नया आदेश जारी किया कि अपने मंदिर में काम करने वाले सभी लोग पढ़े-लिखे होने जरूरी हैं। जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, उन्हें निकाल दिया जाएगा। उस घंटा बजाने वाले व्यक्ति को ट्रस्टी ने कहा- आज तक की तनख्वाह ले लो और कल से तुम नौकरी पर मत आना। उस घंटा बजाने वाले व्यक्ति ने कहा- साहब! भले ही मैं पढ़ा-लिखा नही हूँ परन्तु इस कार्य में मेरे भाव भगवान से जुड़े हुए हैं। ट्रस्टी ने कहा- सुन लो भाई, तुम पढ़े-लिखे नहीं हो, इसलिए तुम्हें हम यहां पर रख नहीं पाएंगे। दूसरे दिन मंदिर में नए लोगों को रख लिया गया। परंतु आरती में आए हुए लोगों को अब पहले जैसा‌ मजा नहीं आता था और उस घंटा बजाने वाले व्यक्ति की कमी सभी को बहुत ही महसूस होती थी। फिर कुछ लोग मिलकर उस घंटा बजाने वाले व्यक्ति के घर गए और विनती की कि तुम मंदिर आओ। उस व्यक्ति ने जवाब दिया- अगर मैं आऊंगा तो ट्रस्टी को लगेगा‌ कि नौकरी लेने के लिए आया है इसलिए मैं नहीं आ सकता हूं। फिर वहां आए हुए लोगों ने एक उपाय बताया कि मंदिर के सामने तुम्हारे लिए एक दुकान खोल कर दे देते हैं। तुम वहाँ पर बैठना और आरती के समय घंटा बजाने के लिए मंदिर में आ जाना, फिर कोई भी नहीं कहेगा कि तुम्हें नौकरी की‌ जरूरत है। उस व्यक्ति ने मंदिर के सामने दुकान शुरू कर दी। वह दुकान इतनी चली कि एक दुकान से कई दुकानें और फिर दुकानों के साथ में उसने एक फैक्ट्री भी खोल ली। अब वह व्यक्ति मर्सिडीज कार से घंटा बजाने आता था। समय बीतता गया और यह बात पुरानी सी हो गयी। मंदिर का ट्रस्टी फिर बदल गया। नये ट्रस्टी को मंदिर में कुछ काम करवाने के लिए दान की‌ जरूरत थी। मंदिर के नए ट्रस्टी को विचार आया कि सबसे‌ पहले उस फैक्ट्री के मालिक से ही बात करके देखते हैं। ट्रस्टी उस व्यक्ति के पास गया और बोला- साहब! हमें मंदिर में कुछ नए काम करवाने हैं और उसके लिए दस लाख रुपयों का खर्चा है। उस व्यक्ति ने कोई भी सवाल किये बिना एक खाली चैक ट्रस्टी के हाथ में दे दिया और कहा- आप खुद ही चैक भर लीजिए। ट्रस्टी ने चैक भरकर उस फैक्ट्री मालिक को वापस दिया। उस व्यक्ति ने चैक को देखा और उसे ट्रस्टी को दे दिया। ट्रस्टी ने चैक हाथ में लिया और कहा- आपके सिग्नेचर तो बाकी हैं। वह व्यक्ति बोला- ओह! मुझे सिग्नेचर करना नहीं आता है, लाओ अंगूठा लगा देता हूँ, वही चलेगा। ये सुनकर ट्रस्टी चौंक गया और बोला- साहब! आपने अनपढ़ होकर भी इतनी तरक्की की है। यदि आप पढ़े-लिखे होते तो आज कहाँ से कहाँ होते। तो वह व्यक्ति हंसते हुए बोला- भाई! अगर मैं पढ़ा-लिखा होता तो इस मंदिर में बस घंटा ही बजा रहा होता। ------ *तात्पर्य* ------ चाहे कैसा भी काम हो या कैसी भी परिस्थिति हो, हमारी सफलता सिर्फ और सिर्फ हमारी भावनाओं पर ही निर्भर करती है। भावनाएं शुद्ध होंगी तो गुरुजी, ईश्वर और हमारा सुंदर भविष्य, पक्का हमारा साथ देंगे।

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sushma Feb 26, 2020

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