shriram jyotish india
shriram jyotish india Nov 25, 2017

चंद्रमा का प्रभाव

आपकी कुंडली में चन्द्रमा का प्रभाव,महत्त्व और फल तथा उपाय
जानिए आपकी कुंडली में चन्द्रमा का प्रभाव,महत्त्व और फल तथा उपाय

ऋग्वे द में कहा गया है कि ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत:।‘

अर्थात चंद्रमा जातक के मन का स्वामी होता है। मन का स्वा मी होने के कारण यदि जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति ठीक न हो या वह दोषपूर्ण स्थिति में हो तो जातक को मनऔर मस्तिष्क से संबंधी परेशानियां होती हैं। चन्द्रमा मां का सूचक है और मन का कारक है | इसकी राशि कर्क होती हैं |

भारत में प्रत्येक जन्मपत्री में दो लग्न बनाये जाते हैं। एक जन्म लग्न और दूसरा चन्द्र लग्न। जन्म लग्न को देह समझा जाये तो चन्द्र लग्न मन है। बिना मन के देह का कोई अस्तित्व नहीं होता और बिना देह के मन का कोई स्थान नहीं है। देह और मन हर प्राणी के लिए आवश्यक है इसीलिये लग्न और चन्द्र दोनों की स्थिति देखना ज्योतिष शास्त्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। सूर्य लग्न का अपना महत्व है। वह आत्मा की स्थिति को दर्शाता है। मन और देह दोनों का विनाश हो जाता है परन्तु आत्मा अमर है।

चन्द्र ग्रहों में सबसे छोटा ग्रह है। परन्तु इसकी गति ग्रहों में सबसे अधिक है। शनि एक राशि को पार करने के लिए ढ़ाई वर्ष लेता है, बृहस्पति लगभग एक वर्ष, राहू लगभग 14 महीने और चन्द्रमा सवा दो दिन – कितना अंतर है। चन्द्रमा की तीव्र गति और इसके प्रभावशाली होने के कारण किस समय क्या घटना होगी, चन्द्र से ही पता चलता है। विंशोत्तरी दशा, योगिनी दशा, अष्टोतरी दशा आदि यह सभी दशाएं चन्द्र की गति से ही बनती है। चन्द्र जिस नक्षत्र के स्वामी से ही दशा का आरम्भ होता है।

अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक की दशा केतु से आरम्भ होती है क्योंकि अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु है। इस प्रकार जब चन्द्र भरणी नक्षत्र में हो तो व्यक्ति शुक्र दशा से अपना जीवन आरम्भ करता है क्योंकि भरणी नक्षत्र का स्वामी शुक्र है। अशुभ और शुभ समय को देखने के लिए दशा, अन्तर्दशा और प्रत्यंतर दशा देखी जाती है। यह सब चन्द्र से ही निकाली जाती है।

ग्रहों की स्थिति निरंतर हर समय बदलती रहती है। ग्रहों की बदलती स्थिति का प्रभाव विशेषकर चन्द्र कुंडली से ही देखा जाता है। जैसे शनि चलत में चन्द्र से तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में हो तो शुभ फल देता है और दुसरे भावों में हानिकारक होता है। बृहस्पति चलत में चन्द्र लग्न से दूसरे, पाँचवे, सातवें, नौवें और ग्यारहवें भाव में शुभ फल देता है और दूसरे भावों में इसका फल शुभ नहीं होता। इसी प्रकार सब ग्रहों का चलत में शुभ या अशुभ फल देखना के लिए चन्द्र लग्न ही देखा जाता है। कई योग ऐसे होते हैं तो चन्द्र की स्थिति से बनते हैं और उनका फल बहुत प्रभावित होता है।

चन्द्र से अगर शुभ ग्रह छः, सात और आठ राशि में हो तो यह एक बहुत ही शुभ स्थिति है। शुभ ग्रह शुक्र, बुध और बृहस्पति माने जाते हैं। यह योग मनुष्य जीवन सुखी, ऐश्वर्या वस्तुओं से भरपूर, शत्रुओं पर विजयी , स्वास्थ्य, लम्बी आयु कई प्रकार से सुखी बनाता है।

जब चन्द्र से कोई भी शुभ ग्रह जैसे शुक्र, बृहस्पति और बुध दसवें भाव में हो तो व्यक्ति दीर्घायु, धनवान और परिवार सहित हर प्रकार से सुखी होता है।चन्द्र से कोई भी ग्रह जब दूसरे या बारहवें भाव में न हो तो वह अशुभ होता है। अगर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि चन्द्र पर न हो तो वह बहुत ही अशुभ होता है।

इस प्रकार से चन्द्र की स्थिति से 108 योग बनते हैं और वह चन्द्र लग्न से ही बहुत ही आसानी के साथ देखे जा सकते हैं।

चन्द्र का प्रभाव पृथ्वी, उस पर रहने वाले प्राणियों और पृथ्वी के दूसरे पदार्थों पर बहुत ही प्रभावशाली होता है। चन्द्र के कारण ही समुद्र मैं ज्वारभाटा उत्पन्न होता है। समुद्र पर पूर्णिमा और अमावस्या को 24 घंटे में एक बार चन्द्र का प्रभाव देखने को मिलता है। किस प्रकार से चन्द्र सागर के पानी को ऊपर ले जाता है और फिर नीचे ले आता है। तिथि बदलने के साथ-साथ सागर का उतार चढ़ाव भी बदलता रहता है।

प्रत्येक व्यक्ति में 60 प्रतिशत से अधिक पानी होता है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है चन्द्र के बदलने का व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ता होगा। चन्द्र के बदलने के साथ-साथ किसी पागल व्यक्ति की स्थिति को देख कर इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

चन्द्र साँस की नाड़ी और शरीर में खून का कारक है। चन्द्र की अशुभ स्थिति से व्यक्ति को दमा भी हो सकता है। दमे के लिए वास्तव में वायु की तीनों राशियाँ मिथुन, तुला और कुम्भ इन पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि, राहु और केतु का चन्द्र संपर्क, बुध और चन्द्र की स्थिति यह सब देखने के पश्चात ही निर्णय लिया जा सकता है।

चन्द्र माता का कारक है। चन्द्र और सूर्य दोनों राजयोग के कारक होते हैं। इनकी स्थिति शुभ होने से अच्छे पद की प्राप्ति होती है। चन्द्र जब धनी बनाने पर आये तो इसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

चन्द्र खाने-पीने के विषय में बहुत प्रभावशाली है। अगर चन्द्र की स्थिति ख़राब हो जाये तो व्यक्ति कई नशीली वस्तुओं का सेवन करने लगता है।

जातक पारिजात के आठवें अध्याय के 100वे श्लोक में लिखा है चन्द्र उच्च का वृष राशि का हो तो व व्यक्ति मीठे पदार्थ खाने का इच्छुक होता है। जातक पारिजात के अध्याय ६, श्लोक ८१ में लिखा है कि चन्द्र खाने-पीने की आदतों पर प्रभाव डालता है। इसी प्रकार बृहत् पराशर होरा के अध्याय ५७ श्लोक ४८ में लिखा है कि अगर चन्द्र की स्थिति निर्बल हो तो शनि की अंतरदशा में व्यक्ति को समय से खाना नहीं मिलता।

किसी भी कुंडली में चंद्र अशुभ होने पर माता को किसी भी प्रकार का कष्ट या स्वास्थ्य को खतरा होता है, दूध देने वाले पशु की मृत्यु हो जाती है | स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है. घर में पानी की कमी आ जाती है या नलकूप, कुएं आदि सूख जाते हैं | इसके प्रभाव से मानसिक तनाव, मन में घबराहट, मन में तरह तरह की शंका और सर्दी बनी रहती है. व्यक्ति के मन में आत्महत्या करने के विचार भी बार-बार आते रहते हैं ||

अगर मन अच्छा है, मनोबल ऊँचा है तब व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास भी बढ़ता है और वह विपरीत परिस्थितियो में भी डटा रहता है लेकिन यदि किसी व्यक्ति का मन कमजोर है या वह बहुत जल्दी परेशान हो जाता है इसका अर्थ है कि कुण्डली में उसका चंद्रमा कमजोर अवस्था में है || आज हम कमजोर चंद्रमा की बात करेगें. चंद्रमा जब कुंडली के 6,8 या 12वें भाव में अकेला स्थित होता है तब कमजोर हो जाता है. व्यक्ति का मन हमेशा अशांत रहता है ||ग्रहों में चंद्रमा को स्त्री स्वरूप माना गया है। भगवान शिव ने चंद्रमा को मस्तक पर धारण किया हुआ है, इसलिए भगवान शिव को चंद्रमा का देवता कहा गया है। जिस प्रकार सूर्य हमारे व्यक्तित्व को आकर्षक बनाते हैं, उसी प्रकार चंद्रमा हमारे मन को मजबूत करते हैं। चंद्रमा हमारे मन का कारक है। चंद्रमा हमारी माता का भी कारक है। जिनकी कुंडली में चंद्रमा उच्च का होता है, उनको अपनी मां का भरपूर प्यार मिलता है। जिनकी कुंडली में चंद्रमा दूर होता है, उनको मां का प्यार उतना नहीं मिल पाता। जिसकी कुंडली में चंद्रमा अच्छा होता है, उसको बलवान कुंडली माना जाता है। चंद्रमा की उच्च स्थिति मन में सकारात्मक विचारों का प्रवाह करती है। ऐसे जातक जो भी कार्य करने की ठान लेते हैं, उसको सफलतापूर्वक सम्पादित करके ही दम लेते हैं। जिनकी कुंडली का स्वामी चंद्र होता है, उनकी कल्पनाशक्ति गजब की होती है।

जिस प्रकार सूर्य का प्रभाव आत्मा पर पूरा पड़ता है, ठीक उसी प्रकार चन्द्रमा का भी मनुष्य पर प्रभाव पड़ता है. खगोलवेत्ता ज्योतिष काल से यह मानते आ रहे हैं कि ग्रह तथा उपग्रह मानव जीवन पर पल-पल पर प्रभाव डालते हैं. जगत की भौतिक परिस्थिति पर भी चंद्रमा का प्रभाव होता है ||

चंद्रमा का घटता बढ़ता आकार जिस प्रकार पृथ्‍वी पर समुद्र में ज्वार भाटा का कारक बनता है उसी प्रकार इसका प्रभाव मनुष्‍य के तन और मन पर भी पड़ता है | चन्द्रमा जैसे-जैसे कृष्ण पक्ष में छोटा व शुक्ल पक्ष में पूर्ण होता है वैसे-वैसे मनुष्य के मन पर भी चन्द्र का प्रभाव पड़ता है | सूर्य के बाद धरती के उपग्रह चन्द्र का प्रभाव धरती पर पूर्णिमा के दिन सबसे ज्यादा रहता है। जिस तरह मंगल के प्रभाव से समुद्र में मूंगे की पहाड़ियां बन जाती हैं और लोगों का खून दौड़ने लगता है उसी तरह चन्द्र से समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पत्न होने लगता है।

जितने भी दूध वाले वृक्ष हैं सभी चन्द्र के कारण उत्पन्न हैं। चन्द्रमा बीज, औषधि, जल, मोती, दूध, अश्व और मन पर राज करता है। लोगों की बेचैनी और शांति का कारण भी चन्द्रमा है।

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Ravi Pandey Nov 25, 2017
jai shree Krishna radhe Radhe radhe Radhe Je

*यदि स्वयं सुख चाहते हो तो दूसरों को दुख मत दो. क्योंकि दूसरों को दुख दोंगे तो कई गुना लौट कर आएगा. आज नहीं तो कल. यह प्रकृति का सनातन नियम है.* ---------------------------------------------- महाकारुणिक बुद्ध कहते हैं, 'इस जगत में सभी प्राणी सुख से जीना चाहते हैं. सभी दुखों से मुक्ति चाहते हैं. सभी को अपनी जान प्यारी है इसलिए दूसरों को मन, वाणी व शरीर से दुख मत दो. दिलों को चोट मत पहुंचाओ और न ही दुख देने के लिए किसी को प्रेरित करो. यही सबसे बड़ा धम्म है. यही सच्ची मानवता है.' तथागत बुद्ध इस बात पर जोर देते हैं कि यदि तुम स्वयं सुख शांति चाहते हो, स्वयं का भला चाहते हो तो दूसरों का बुरा मत करो, दूसरों को दुख मत दो, दूसरों को मत सताओ. इसका फल इसी जीवन में आज नहीं तो कल, जरूर मिलता है. यह सनातन नियम है, सदियों से चला आ रहा प्रकृति का नियम है. एस धम्मो सनंतनो. मनुष्य, पशु पक्षी तो क्या वृक्ष भी सुख की कामना करता है. वह भी चोट, भूख व प्यास के मारे तड़पता है, कुम्हलाता है इसलिए उसे भी पीड़ा मत पहुंचाओ, वह भी सुख की वर्षा होने पर लहलहाता है. फूलों की खुशबू से प्रकृति को सरोबार करता है. सतरंगी रंगों से उल्लास व आनंद बिखेरता है. इसलिए किसी भी प्राणी या वनस्पति को चोट मत पहुंचाओ, दुख मत दो. और यदि किसी को दुख दोगे तो दुख तुम्ही पर वापस आएगा, वह भी बढ़कर और तुम सुख की नींद नहीं सो पाओंगे. भगवान बुद्ध कहते है, सुख से रहना प्रकृति के सभी जीवों का स्वभाव है दुख तो मनुष्य पहुंचाता है इसलिए दूसरों को अपनी तरह समझो. जो तुम खुद के लिए नहीं चाहते हो, वह दूसरों के लिए मत करो. यही प्रेम है. तुम दूसरों को सुख देने की बात छोड़ो. बस, इतनी मेहरबानी कर लो कि दूसरों को दुख मत दो. दूसरों की राह में कांटे मत बिछाओ क्योंकि फूल तो अपने आप खिल जाएंगे, खिलना तो उनका स्वभाव है. सुख भी मनुष्य का स्वभाव है इसलिए तुम किसी के सुख की राह में रोड़ा मत बनो. उसको आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक व शारीरिक दुख मत दो.किसी को भोजन भले ही मत खिलाओ लेकिन उसके मुंह से निवाला तो मत छीनो, शोषण की पीड़ा की गहरी चोट मत पहुंचाओ. किसी के आंसू नहीं पोंछ सकते हो तो कोई बात नहीं, रुलाओ तो मत. यदि तुमने किसी को दुख नहीं दिया तो उसके जीवन में आनंद की रसधारा जरूर बहेगी. पद, पैसा व प्रतिष्ठा पाने के स्वार्थ व स्वयं के सुख के लिए दूसरों की छाती पर चढ़ कर आगे मत बढ़ो, दूसरों का सुख मत छिनो. अपने अहंकार में किसी को चोट मत पहुंचाओ, शोषण मत करो, बुरा मत करो, दुख मत दो, किसी प्राणी को मत सताओ क्योंकि तुम्हारी तरह सभी सुख शांति से जीना चाहते हैं. सब्बे तसन्नति दण्डस्स सब्बेस जीवितं पियं। अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये।।....धम्मपद *सबका मंगल हो..सभी प्राणी सुखी हो.* जय श्री कृष्णा जय जगन्नाथ..🙏

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Anita Sharma Mar 1, 2021

. "गीता का सच्चा अर्थ" चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे। उन्होंने एक स्थान पर देखा कि सरोवर के किनारे एक ब्राह्मण स्नान करके बैठा है और गीता का पाठ कर रहा है। वह पाठ करने में इतना तल्लीन है कि उसे अपने शरीर का भी पता नहीं है। उसके नेत्रों से आँसू की धारा बह रही है। महाप्रभु चुपचाप जाकर उस ब्राह्मण के पीछे खड़े हो गए। पाठ समाप्त करके जब ब्राह्मण पुस्तक बन्द की तो महाप्रभु सम्मुख आकर पूछा, 'ब्राह्मण देवता ! लगता है कि आप संस्कृत नहीं जानते, क्योंकि श्लोकों का उच्चारण शुद्ध नहीं हो रहा था। परन्तु गीता का ऐसा कौन-सा अर्थ आप समझते हैं जिसके आनन्द में आप इतने विभोर हो रहे थे ?' अपने सम्मुख एक तेजोमय भव्य महापुरुष को देखकर ब्राह्मण ने भूमि में लेटकर दण्डवत किया। वह दोनों हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक बोला, 'भगवन ! में संस्कृत क्या जानूँ और गीता के अर्थ का मुझे क्या पता ? मुझे पाठ करना आता ही नहीं मैं तो जब इस ग्रंथ को पढ़ने बैठता हूँ, तब मुझे लगता है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों और बड़ी भारी सेना सजी खड़ी है। दोनों सेनाओं के बीच में एक रथ खड़ा है। रथ पर अर्जुन दोनों हाथ जोड़े बैठा है, और रथ के आगे घोड़ों की रास पकड़े भगवान श्रीकृष्ण बैठे हैं। भगवान मुख पीछे घुमाकर अर्जुन से कुछ कह रहे हैं, मुझे यह स्पष्ट दिखता है। भगवान और अर्जुन की ओर देख-देखकर मुझे प्रेम से रुलाई आ रही है। गीता और उसके श्लोक तो माध्यम हैं। असल सत्य भाषा नहीं, भक्ति है और इस भक्ति में मैं जितना गहरा उतरता जाता हूँ मेरा आनन्द बढ़ता जाता है।' 'भैया ! तुम्हीं ने गीता का सच्चा अर्थ जाना है और गीता का ठीक पाठ करना तुम्हें ही आता है।' यह कहकर महाप्रभु ने उस ब्राह्मण को अपने हाथों से उठाकर हृदय से लगा लिया।

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Kabir Chaudhary Mar 1, 2021

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Anita Sharma Feb 28, 2021

ज्ञान वाणी। राजस्थान के हाड़ोती क्षेत्र के बूंदी नगर में रामदासजी नाम के एक बनिया थे । वे व्यापार करने के साथ-साथ भगवान की भक्ति-साधना भी करते थे और नित्य संतों की सेवा भी किया करते थे । भगवान ने अपने भक्तों (संतों) की पूजा को अपनी पूजा से श्रेष्ठ माना है क्योंकि संत लोग अपने पवित्र संग से असंतों को भी अपने जैसा संत बना लेते हैं ।भगवान की इसी बात को मानकर भक्तों ने संतों की सेवा को भगवान की सेवा से बढ़कर माना है-‘प्रथम भक्ति संतन कर संगा ।’ रामदासजी सारा दिन नमक-मिर्च, गुड़ आदि की गठरी अपनी पीठ पर बांध कर गांव में फेरी लगाकर सामान बेचते थे जिससे उन्हें कुछ पैसे और अनाज मिल जाता था । एक दिन फेरी में कुछ सामान बेचने के बाद गठरी सिर पर रखकर घर की ओर चले । गठरी का वजन अधिक था पर वह उसे जैसे-तैसे ढो रहे थे । भगवान श्रीराम एक किसान का रूप धारण कर आये और बोले—‘भगतजी ! आपका दु:ख मुझसे देखा नहीं जा रहा है । मुझे भार वहन करने का अभ्यास है, मुझे भी बूंदी जाना है, मैं आपकी गठरी घर पहुंचा दूंगा ।’ गीता (९।१४) में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है—‘संत लोग धैर्य धारण करके प्रयत्न से नित्य कीर्तन और नमन करते हैं, भक्तिभाव से नित्य उपासना करते हैं । ऐसे प्रेमी संत मेरे और मैं उनका हूँ; इस लोक में मैं उनके कार्यों में सदा सहयोग करता हूँ ।’ ऐसा कह कर भगवान ने अपने भक्त के सिर का भार अपने ऊपर ले लिया और तेजी से आगे बढ़कर आंखों से ओझल हो गये । रामदासजी सोचने लगे—‘मैं इसे पहचानता नहीं हूँ और यह भी शायद मेरा घर न जानता होगा । पर जाने दो, राम करे सो होय ।’ यह कहकर वह रामधुन गाते हुए घर की चल दिए । रास्ते में वे मन-ही-मन सोचने लगे—आज थका हुआ हूँ, यदि घर पहुंचने पर गर्म जल मिल जाए तो झट से स्नान कर सेवा-पूजा कर लूं और आज कढ़ी-चपाती का भोग लगे तो अच्छा है । उधर किसान बने भगवान श्रीराम ने रामदासजी के घर जाकर गठरी एक कोने में रख दी और जोर से पुकार कर कहा—‘भगतजी आ रहे हैं, उन्होंने कहा है कि नहाने के लिए पानी गर्म कर देना और भोग के लिए कढ़ी-चपाती बना देना ।’ कुछ देर बाद रामदासजी घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि सामान की गठरी कोने में रखी है । उनकी पत्नी ने कहा—‘पानी गर्म कर दिया है, झट से स्नान कर लो । भोग के लिए गर्म-गर्म कढ़ी और फुलके भी तैयार हैं ।’ रामदासजी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा—‘तुमने मेरे मन की बात कैसे जान ली ।’ पत्नी बोली—‘मुझे क्या पता तुम्हारे मन की बात ? उस गठरी लाने वाले ने कहा था ।’ रामदासजी समझ गए कि आज रामजी ने भक्त-वत्सलतावश बड़ा कष्ट सहा । उनकी आंखों से प्रेमाश्रु झरने लगे और वे अपने इष्ट के ध्यान में बैठ गये । ध्यान में प्रभु श्रीराम ने प्रकट होकर प्रसन्न होते हुए कहा—‘तुम नित्य सन्त-सेवा के लिए इतना परिश्रम करते हो, मैंने तुम्हारी थोड़ी-सी सहायता कर दी तो क्या हुआ ?’ रामदासजी ने अपनी पत्नी से पूछा—‘क्या तूने उस गठरी लाने वाले को देखा था?’ पत्नी बोली—‘मैं तो अंदर थी, पर उस व्यक्ति के शब्द बहुत ही मधुर थे।’ रामदासजी ने पत्नी को बताया कि वे साक्षात् श्रीराम ही थे । तभी उन्होंने मेरे मन की बात जान ली। दोनों पति-पत्नी भगवान की भक्तवत्सलता से भाव-विह्वल होकर रामधुन गाने में लीन हो गये। संदेश -गीता (८।१४) में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है— अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश: । तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: ।। अर्थात्—‘मेरा ही ध्यान मन में रखकर प्रतिदिन जो मुझे भजता है, उस योगी संत को सहज में मेरा दर्शन हो जाता है ।’

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