Udit Sagar
Udit Sagar Sep 4, 2017

अनंत चतुर्दशी: व्रत कथा, विधि और महत्व।

अनंत चतुर्दशी: व्रत कथा, विधि और महत्व।

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को हर साल अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi) के रूप में मनाया जाता है। गणेशोत्सव के तहत घर में विराजे गणपति इसी दिन विदा होते हैं यानी गणपति विसर्जन (Ganpati Visarjan) किया जाता है। इस बार 5 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर्व है। गणपति के पूजन के साथ-साथ इस दिन भगवान विष्णु का पूजन भी किया जाता है, साथ ही पूजन के बाद 14 गांठों वाला अनंत सूत्र बांह में बांधा जाता है।

अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi) पर्व की मान्यता और महत्व :

अनंत चतुर्दशी के दिन शयन कर रहे भगवान विष्णु का भी पूजन किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने से मिलने वाला पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। इस व्रत से सभी संकटों से मुक्ति मिल जाती है। मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हार कर वन में भटक रहे थे तब तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत रखने की सलाह दी थी। उन्होंने पूरे विधि-विधान से ये व्रत किया और अनंत सूत्र बांधा था। इसके बाद उनके संकट समाप्त हुए थे।

अनंत सूत्र का महत्व:

पूजन के बाद इस दिन अनंत सूत्र बांधने का भी रिवाज है। कहा जाता है कि अनंत सूत्र धारण करने से हर तरह की मुसीबतों से रक्षा होती है। साथ ही साधकों का कल्याण होता है। पुरुष इसे दाहिनी बांह में व महिलाएं बायीं बांह में बांधती हैं।

ऐसे करें अनंत चतुर्दशी व्रत :

सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प करें। फिर पूजा के स्थान पर कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्यापर लेटे भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को रखें। उनके समक्ष चौदह गांठों से युक्त अनंत सूत्र रखें। इसके बाद ॐ अनन्ताय नम: मंत्र से भगवान विष्णु और अनंत सूत्र की षोडशोपचार-विधि से पूजा करें। पूजन के बाद अनंत सूत्र को मंत्र पढ़ कर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें।

ये है अनंत की कथा :

पंडित सुनील शर्मा के अनुसार एक दिन कौण्डिन्य मुनि ने अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनंत सूत्र को जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड़ दिया और उसे आग में डालकर जला दिया। इससे भगवान विष्णु नाराज हो गए और उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिन्य ऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनंत भगवान से क्षमा मांगने के लिए वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनंत देव का पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्य मुनि को जब अनंत भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफा में ले जाकर चतुर्भुज अनन्त देव का दर्शन कराया।

भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनन्त सूत्र का तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित के लिए तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनंत व्रत का पालन करो। कौण्डिन्य मुनि ने भगवान के कहे अनुसार चौदह वर्ष तक अनंत व्रत का नियमपूर्वक पालन किया और खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।

+916 प्रतिक्रिया 48 कॉमेंट्स • 672 शेयर

कामेंट्स

Gokul Sahani Sep 5, 2017
ganpati bapa morya Mangal murti morya agale baras tu jaldi aa

AMIT Sep 5, 2017
🕉 अनंताय नमः

Manju Sikarwar Sep 5, 2017
bahut achi jankari di bahut bahut dhanyabad jai shri ganesh

uncle Dec 13, 2017
जय श्री कृष्णा शुभ प्रभात मित्रो

gajrajraj Jan 14, 2018
✨✨✨✨✨✨✨✨✨ हर पतंग जानती है, अंत में कचरे मे जाना है लेकिन उसके पहले हमे, आसमान छूकर दिखाना है । ​" बस ज़िंदगी भी यही चाहती है "​ ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ 🌸 ​इस मकर सक्रान्ति🏵✨🌟🌟 के पावन पर्व पर आपको व् आपके परिवारजनो को हार्दिक मंगल शुभकामनाऍ ... ✨✨💐🙏🏻मकर सक्रांन्ति✨🙏🏻💐✨

Gajrajg Jan 26, 2018
देश भक्तों के बलिदान से , स्वतंत्र हुए है हम .. कोई पूछे कौन हो, तो गर्व से कहेंगे . भारतीय है हम … गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं।

Gajrajg Mar 17, 2018
✍🏻... *अगर किसी परिस्थिति के लिए आपके पास सही शब्द नहीं है तो सिर्फ मुस्कुरा दीजिये।* *क्योंकि शब्द उलझा सकते है पर मुस्कुराहट हमेशा काम करती है।* 😊😊 *मुस्कुराते रहिये* 😊😊 *😄स्वस्थ रहें मस्त रहें?* 🌷 *GOOD DAY*🌷

Gajrajg Mar 23, 2018
*बेटी से कहते है कि कभी घर की इज्ज़त खराब मत करना,,,,,* *बेटे से ये क्यों नही कहते कि कभी किसी के घर की इज्ज़त से खिलवाड नही करना।* सत्य विचार सुप्रभात

Gajrajg Mar 24, 2018
*जीवन में किसी को रुलाकर* *हवन भी करवाओगे तो* *कोई फायदा नहीं* *और अगर रोज किसी एक* *आदमी को भी हँसा दिया तो* *मेरे दोस्त* *आपको अगरबत्ती भी* *जलाने की जरुरत नहीं* *कर्म ही असली भाग्य है* •●‼ *आपका दिन शुभ हो* ‼●• 🌿🌺💐🌺🌿 🙏 *सुप्रभात* 🙏

Gajrajg Apr 12, 2018
🙏जय श्री कृष्ण🙏 शरीर जल से; बुद्धि ज्ञान से; और आत्मा धर्म से; पवित्र होती है। 🌹आपका दिन शुभ हो!🌹 🌷मुस्कुराते रहो🌷

Gajrajg Apr 13, 2018
🙏जय श्री कृष्ण🙏 जीवन में दो ही लोग असफल होते हैं एक वो जो सोचते हैं लेकिन करते नहीं दूसरे वो जो करते हैं पर सोचते नहीं 🌷शुभ दिन🌷 🌹मुस्कुराते रहो🌹

Gajrajg May 4, 2018
*अंतरमन में संघर्ष* *और फिर भी* *मुस्कुराता हुआ चेहरा ,* *यही जीवन का श्रेष्ठ अभिनय है....* 🙏 जय श्री कृष्ण🙏 🌹मुसकुराते रहो🌹 🌷सुप्रभात 🌷

girdharilal Dec 15, 2019

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर

एकादश मुखि हनुमत् कवचम् रुद्रयामलतः ॐ श्रीसमस्तजगन्मङ्गलात्मने नमः । श्रीदेव्युवाच शैवानि गाणपत्यानि शाक्तानि वैष्णवानि च । कवचानि च सौराणि यानि चान्यानि तानि च ॥ १॥ श्रुतानि देवदेवेश त्वद्वक्त्रान्निःसृतानि च । किञ्चिदन्यत्तु देवानां कवचं यदि कथ्यते ॥ २॥ ईश्वर उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सावधानावधारय । हनुमत्कवचं पुण्यं महापातकनाशनम् ॥ ३॥ एतद्गुह्यतमं लोके शीघ्रं सिद्धिकरं परम् । जयो यस्य प्रगानेन लोकत्रयजितो भवेत् ॥ ४॥ ॐ अस्य श्रीएकादशवक्त्रहनुमत्कवचमालामन्त्रस्य वीररामचन्द्र ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीमहावीरहनुमान् रुद्रो देवता । ह्रीं बीजं । ह्रौं शक्तिः । स्फें कीलकम् । सर्वदूतस्तम्भनार्थं जिह्वाकीलनार्थं, मोहनार्थं राजमुखीदेवतावश्यार्थं ब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीभूतप्रेतादिबाधापरिहारार्थं श्रीहनुमद्दिव्यकवचाख्यमालामन्त्रजपे विनियोगः । ॐ ह्रौं आञ्जनेयाय अङ्गुष्ठभ्यां नमः । ॐ स्फें रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः । ॐ स्फें वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ स्फें अञ्जनीगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ स्फें रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रौं आञ्जनेयाय हृदयाय नमः । ॐ स्फें रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा । ॐ स्फें वायुपुत्राय शिखायै वषट् । ॐ ह्रौं अञ्जनीगर्भाय कवचाय हुम् । ॐ स्फें रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय अस्त्राय फट् । इति न्यासः । अथ ध्यानम् । ॐ ध्यायेद्रणे हनुमन्तमेकादशमुखाम्बुजम् । ध्यायेत्तं रावणोपेतं दशबाहुं त्रिलोचनं हाहाकारैः सदर्पैश्च कम्पयन्तं जगत्त्रयम् । ब्रह्मादिवन्दितं देवं कपिकोटिसमन्वितं एवं ध्यात्वा जपेद्देवि कवचं परमाद्भुतम् ॥ दिग्बन्धाः ॐ इन्द्रदिग्भागे गजारूढहनुमते ब्रह्मास्त्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्रपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॐ अग्निदिग्भागे मेषारुढहनुमते अस्त्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र- पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ यमदिग्भागे महिषारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र- पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ निऋर्तिदिग्भागे नरारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र- पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ वरुणदिग्भागे मकरारूढहनुमते प्राणशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ वायुदिग्भागे मृगारूढहनुमते अङ्कुशशक्तिसहिताय चौरव्याघ्रपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ कुबेरदिग्भागे अश्वारूढहनुमते गदाशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ईशानदिग्भागे राक्षसारूढहनुमते पर्वतशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ अन्तरिक्षदिग्भागे वर्तुलहनुमते मुद्गरशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ भूमिदिग्भागे वृश्चिकारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ वज्रमण्डले हंसारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र- पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । मालामन्त्रः। । । ॐ ह्रीं यीं यं प्रचण्डपराक्रमाय एकादशमुखहनुमते हंसयतिबन्ध-मतिबन्ध-वाग्बन्ध-भैरुण्डबन्ध-भूतबन्ध- प्रेतबन्ध-पिशाचबन्ध-ज्वरबन्ध-शूलबन्ध- सर्वदेवताबन्ध-रागबन्ध-मुखबन्ध-राजसभाबन्ध- घोरवीरप्रतापरौद्रभीषणहनुमद्वज्रदंष्ट्राननाय वज्रकुण्डलकौपीनतुलसीवनमालाधराय सर्वग्रहोच्चाटनोच्चाटनाय ब्रह्मराक्षससमूहोच्चाटानाय ज्वरसमूहोच्चाटनाय राजसमूहोच्चाटनाय चौरसमूहोच्चाटनाय शत्रुसमूहोच्चाटनाय दुष्टसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ १ ॥ ॐ वीरहनुमते नमः । ॐ नमो भगवते वीरहनुमते पीताम्बरधराय कर्णकुण्डलाद्या- भरणालङ्कृतभूषणाय किरीटबिल्ववनमालाविभूषिताय कनकयज्ञोपवीतिने कौपीनकटिसूत्रविराजिताय श्रीवीररामचन्द्रमनोभिलषिताय लङ्कादिदहनकारणाय घनकुलगिरिवज्रदण्डाय अक्षकुमारसंहारकारणाय ॐ यं ॐ नमो भगवते रामदूताय फट् स्वाहा ॥ ॐ ऐं ह्रीं ह्रौं हनुमते सीतारामदूताय सहस्रमुखराजविध्वंसकाय अञ्जनीगर्भसम्भूताय शाकिनीडाकिनीविध्वंसनाय किलिकिलिचुचु कारेण विभीषणाय वीरहनुमद्देवाय ॐ ह्रीं श्रीं ह्रौ ह्रां फट् स्वाहा ॥ ॐ श्रीवीरहनुमते हौं ह्रूं फट् स्वाहा । ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं ह्रूं फट् स्वाहा । ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रौं ह्रूं फट् स्वाहा । ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं फट् स्वाहा । ॐ ह्रां श्रीवीरहनुमते ह्रौं हूं फट् स्वाहा । ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रैं हुं फट् स्वाहा । ॐ ह्रां पूर्वमुखे वानरमुखहनुमते लं सकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ आग्नेयमुखे मत्स्यमुखहनुमते रं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ दक्षिणमुखे कूर्ममुखहनुमते मं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ नैऋर्तिमुखे वराहमुखहनुमते क्षं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ पश्चिममुखे नारसिंहमुखहनुमते वं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ वायव्यमुखे गरुडमुखहनुमते यं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ उत्तरमुखे शरभमुखहनुमते सं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ ईशानमुखे वृषभमुखहनुमते हूं आं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ ऊर्ध्वमुखे ज्वालामुखहनुमते आं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ अधोमुखे मार्जारमुखहनुमते ह्रीं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ सर्वत्र जगन्मुखे हनुमते स्फ्रूं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ श्रीसीतारामपादुकाधराय महावीराय वायुपुत्राय कनिष्ठाय ब्रह्मनिष्ठाय एकादशरुद्रमूर्तये महाबलपराक्रमाय भानुमण्डलग्रसनग्रहाय चतुर्मुखवरप्रसादाय महाभयरक्षकाय यं हौं । ॐ हस्फें हस्फें हस्फें श्रीवीरहनुमते नमः एकादशवीरहनुमन् मां रक्ष रक्ष शान्तिं कुरु कुरु तुष्टिं कुरु करु पुष्टिं कुरु कुरु महारोग्यं कुरु कुरु अभयं कुरु कुरु अविघ्नं कुरु कुरु महाविजयं कुरु कुरु सौभाग्यं कुरु कुरु सर्वत्र विजयं कुरु कुरु महालक्ष्मीं देहि हुं फट् स्वाहा ॥ फलश्रुतिः इत्येतत्कवचं दिव्यं शिवेन परिकीर्तितम् । यः पठेत्प्रयतो भूत्वा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ द्विकालमेककालं वा त्रिवारं यः पठेन्नरः । रोगान् पुनः क्षणात् जित्वा स पुमान् लभते श्रियम् ॥ मध्याह्ने च जले स्थित्वा चतुर्वारं पठेद्यदि । क्षयापस्मारकुष्ठादितापत्रयनिवारणम् ॥ यः पठेत्कवचं दिव्यं हनुमद्ध्यानतत्परः । त्रिःसकृद्वा यथाज्ञानं सोऽपि पुण्यवतां वरः ॥ देवमभ्यर्च्य विधिवत्पुरश्चर्यां समारभेत् । एकादशशतं जाप्यं दशांशहवनादिकम् ॥ यः करोति नरो भक्त्या कवचस्य समादरम् । ततः सिद्धिर्भवेत्तस्य परिचर्याविधानतः ॥ गद्यपद्यमया वाणी तस्य वक्त्रे प्रजायते । ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ *Jai Shree Mahakal🙏*

+14 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 19 शेयर
Sajjan Singhal Dec 14, 2019

+26 प्रतिक्रिया 11 कॉमेंट्स • 3 शेयर

*🚩तन्त्रोक्त लक्ष्मी कवच🚩* *💡आज शुक्रवार को केवल गूगल जलाकर इस "तन्त्रोक्त लक्ष्मी कवच" का इक्कीस बार श्रद्धापूर्वक परायण करें* *🌹श्रीगणेशाय नमः ।।🌹*  ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीकवचस्तोत्रस्य, श्री‍ईश्वरो देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीलक्ष्मीप्रीत्यर्थे पाठे विनियोगः ।।  ॐ लक्ष्मी मे चाग्रतः पातु कमला पातु पृष्ठतः । नारायणी शीर्षदेशे सर्वाङ्गे श्रीस्वरूपिणी ॥ १॥ रामपत्‍नी तु प्रत्यङ्गे  सदाऽवतु शमेश्वरी। विशालाक्षी योगमाया कौमारी चक्रिणी तथा ॥ २॥ जयदात्री धनदात्री पाशाक्षमालिनी शुभा । हरिप्रिया हरिरामा जयङ्करी महोदरी ॥ ३॥ कृष्णपरायणा देवी श्रीकृष्णमनमोहिनी । जयङ्करी महारौद्री सिद्धिदात्री शुभङ्करी ॥ ४॥ सुखदा मोक्षदा देवी चित्रकूटनिवासिनी । भयं हरतु भक्‍तानां भवबन्धं विमुच्यतु ॥ ५॥ कवचं तन्महापुण्यं यः पठेद्भक्‍तिसंयुतः । त्रिसन्ध्यमेकसन्ध्यं वा मुच्यते सर्वसङ्कटात् ॥ ६॥ एतत्कवचस्य पठनं धनपुत्रविवर्धनम् । भीतिर्विनाशनञ्‍चैव त्रिषु लोकेषु कीर्तितम् ॥ ७॥ भूर्जपत्रे समालिख्य रोचनाकुङ्कुमेन तु । धारणाद्गलदेशे च सर्वसिद्धिर्भविष्यति ॥ ८॥ अपुत्रो लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम् । मोक्षार्थी मोक्षमाप्नोति कवचस्य प्रसादतः ॥ ९॥ गर्भिणी लभते पुत्रं वन्ध्या च गर्भिणी भवेत् । धारयेद्यपि कण्ठे च अथवा वामबाहुके ॥ १०॥ यः पठेन्नियतं भक्‍त्या स एव विष्णुवद्भवेत् । मृत्युव्याधिभयं तस्य नास्ति किञ्‍चिन्महीतले ॥ ११॥ पठेद्वा पाठयेद्वाऽपि शृणुयाच्छ्रावयेद्यदि । सर्वपापविमुक्‍तस्तु लभते परमां गतिम् ॥ १२॥ सङ्कटे विपदे घोरे तथा च गहने वने । राजद्वारे च नौकायां तथा च रणमध्यतः ॥ १३॥ पठनाद्धारणादस्य जयमाप्नोति निश्चितम् । अपुत्रा च तथा वन्ध्या त्रिपक्षं शृणुयाद्यदि ॥ १४॥ सुपुत्रं लभते सा तु दीर्घायुष्कं यशस्विनम् । शृणुयाद्यः शुद्धबुद्ध्या द्वौ मासौ विप्रवक्‍त्रतः ॥ १५॥ सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वबन्धाद्विमुच्यते । मृतवत्सा जीववत्सा त्रिमासं श्रवणं यदि ॥ १६॥ रोगी रोगाद्विमुच्येत पठनान्मासमध्यतः । लिखित्वा भूर्जपत्रे च अथवा ताडपत्रके ॥ १७॥ स्थापयेन्नियतं गेहे नाग्निचौरभयं क्वचित् । शृणुयाद्धारयेद्वापि पठेद्वा पाठयेदपि ॥ १८॥ यः पुमान्सततं तस्मिन्प्रसन्नाः सर्वदेवताः । बहुना किमिहोक्‍तेन सर्वजीवेश्वरेश्वरी ॥ १९॥ आद्या शक्‍तिर्महालक्ष्मीर्भक्‍तानुग्रहकारिणी । धारके पाठके चैव निश्चला निवसेद् ध्रुवम् ॥ २०॥ *🌞॥ इति तन्‍त्रोक्‍तं लक्ष्मीकवचं सम्पूर्णम् ॥🌞*  *🎂Jai Shree Mahakal🎂*

+7 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 20 शेयर

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Kumdesh Chand Dec 13, 2019

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB