मायमंदिर फ़्री कुंडली
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🌸 उज्जैन के महाकाल बाबा की कुछ विशेष बातें🌸1. उज्जैन में कोई भी बड़ा आदमी या औरत रात नहीं रुक सकते हैं , यदि उज्जैन में रुके तो उनकी मृत्यु निश्चित है, क्योंकि उज्जैन के राजा हैं महाकाल ! उज्जैन के राजा विक्रमादित्य भी कभी उज्जैन में रात नहीं रुके ! 2. महाकाल मंदिर के सामने से कोई बारात नहीं निकलती क्योंकि बाबा के सामने कोई घोड़े पर सवारी नहीं कर सकता ! 3. कई लोगों ने मंदिर पर हमला करने की सोची, वो दूसरे दिन फुटपाथ पर मरे पड़े मिले ! 4. बाबा की सुबह होने वाली भस्म आरती शमशान कि चिता की राख से की जाती ?यह SMS आप 3 लोगों को भेजकर देखो, SMS आपका भाग्य बदल देगा ! हर हर महादेव 💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌💌इस संदेश को 3 ग्रुपों में भेजकर देखें -- सारे अक्षर खुल जाएंगे और आप पाएंगे कि आप का नाम लिखा है यह कोई मजाक नहीं, इसकी महिमा आपको अचम्भित कर देगी .....

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कामेंट्स

🔴🌲🔴MAMTA KAPOOR🔴🌲🔴 Jul 9, 2019
@rajkumarsharma68 RAM RAM JI 🙏🏻🤲🏻🙏🏻 🤲🏻 *भगवान को भेंट* 🤲🏻 🙇🏻‍♀🙇🏻‍♀ पुरानी बात है एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था l वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था। एक दिन उस ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- भाई ! "मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।" भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया। कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा। फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे भी प्रतीत हो रहे हैं। उसने सोचा क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ। उसने उन सभी को उन सौ रुपए में से भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने में उसे कुल 98 रुपए खर्च करने पड़े। उसके पास दो रुपए बच गए उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा l जब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा पैसे चढ़ा दिए। सेठ यह तो नहीं कहेगा 100 रुपए चढ़ाए। सेठ पूछेगा पैसे चढ़ा दिए मैं बोल दूंगा कि, पैसे चढ़ा दिए। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा। भक्त ने श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए अपने हृदय में उनको विराजमान कराया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी के चरणो में चढ़ा दिए। और बोला यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं। उसी रात सेठ के पास स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी आए आशीर्वाद दिया और बोले सेठ तुम्हारे 98 रुपए मुझे मिल गए हैं यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतर्ध्यान हो गए। सेठ जाग गया सोचने लगा मेरा नौकर तौ बड़ा ईमानदार है, पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी उसने दो रुपए भगवान को कम चढ़ाए ? उसने दो रुपए का क्या खा लिया ? उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी ? ऐसा विचार सेठ करता रहा। काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा कि मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दिए थे ? भक्त बोला हां मैंने पैसे चढ़ा दिए। सेठ ने कहा पर तुमने 98 रुपए क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में प्रयोग किए। तब भक्त ने सारी बात बताई की उसने 98 रुपए से संतो को भोजन करा दिया था। और ठाकुरजी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे। सेठ सारी बात समझ गया व बड़ा खुश हुआ तथा भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला- "आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन यहीं बैठे-बैठे हो गए l सन्तमत विचार- भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह 98 रुपए स्वीकार है जो जीव मात्र की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए का कोई महत्व नहीं जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए...I इस कहानी का सार ये है कि......... भगवान को चढ़ावे की जरूरत नही होती जी🙏 सच्चे मन से किसी जरूरतमंद की जरूरत को पूरा कर देना भी ..... भगवान को भेंट चढ़ाने से भी कहीं ज्यादा अच्छा होता है जी..!!! हम उस परमात्मा को क्या दे सकते हैं.....जिसके दर पर हम ही भिखारी हैं...🙏🙏

lala Jul 9, 2019
जय महाकाल बाबा की जय

Raj Kumar Sharma Jul 10, 2019
आप कि कहानी बहुत ही सुन्दर लगीं।मैं चाहता हूँ कि हरेक यूजर्स अपनी विचार शेयर करें।मायमंदिर एक धार्मिक ऐप्स है।इसे मनूरंजन कि साधन नही मानना चाहिए।एक हिन्दूत्व कि पहचान दिलाती है।इससे कितने भक्तगण मेरे भाई, बहाने जुड़े हुए हैं।मैं तो अपनी सभी यूजर को अपनी परिवार सा मानकर जुड़ा हुआ हूँ।और मैं ऐसा उल्लेख करते रहता हूँ।मैं अपनी विचार अरपन करता रहता हूँ।अच्छी लगती है।और इसी तरह बुराइयों को छोड़कर अच्छाई की ओर बढते रहना चाहिए।विचार ठीक रहना चाहिए।मैं तो दूर हो कर भी अपनी पास महसूस करता हूँ।शुप्रभात राधे राधे जी, राम राम जी बहुत बहुत धन्यवाद जी।जय श्री हरि।

MAHESH BHARGAVA Jul 20, 2019

मैं शिव हूँ 🙏मैं शिव हूँ🙏मैं शिव हूँ ✍️✍️✍️✍️✍️कृष्ण कहते हैं भक्त की प्रार्थना में इतनी शक्ति है कि मुझे भक्त की पुकार सुननी ही पड़ती है। पढिये कथा। यह घटना जयपुर के एक वरिष्ठ डॉक्टर की आपबीती है, जिसने उनका जीवन बदल दिया। वह ह्रदय रोग विशेषज्ञ हैं। उनके अनुसार -- एक दिन मेरे पास एक दंपत्ति अपनी छः साल की बच्ची को लेकर आए। निरीक्षण के बाद पता चला कि उसके ह्रदय में रक्त संचार बहुत कम हो चुका है !मैंने अपने साथी डाक्टर से विचार करने के बाद उस दंपत्ति से कहा -- 30% संभावना है बचने की ! दिल को खोलकर ओपन हार्ट सर्जरी के बाद, नहीं तो बच्ची के पास सिर्फ तीन महीने का समय है ! माता पिता भावुक हो कर बोले- डाक्टर साहब, इकलौती बिटिया है- ऑपरेशन के अलावा और कोई चारा ही नहीं है, आप ऑपरेशन की तैयारी किजिए !सर्जरी के पांच दिन पहले बच्ची को भर्ती कर लिया गया ! बच्ची मुझ से बहुत घुलमिल चुकी थी, बहुत प्यारी बातें करती थी ! _उसकी माँ को प्रार्थना में अटूट विश्वास था। वह सुबह शाम बच्ची को यही कहती, बेटी घबराना नहीं। भगवान बच्चों के ह्रदय में रहते हैं ! वह तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे ! सर्जरी के दिन मैंने उस बच्ची से कहा, बेटी चिन्ता न करना, ऑपरेशन के बाद आप बिल्कुल ठीक हो जाओगे ! बच्ची ने कहा -- _*डाक्टर अंकल मैं बिलकुल नहीं डर रही क्योंकि मेरे ह्रदय में भगवान रहते हैं, पर आप जब मेरा हार्ट ओपन करोगे तो देखकर बताना भगवान कैसे दिखते हैं !*_मै उसकी बात पर मुस्कुरा उठा ! ऑपरेशन के दौरान पता चल गया कि कुछ नहीं हो सकता, बच्ची को बचाना असंभव है, दिल में खून का एक कतरा भी नहीं आ रहा था ! निराश होकर मैंने अपनी साथी डाक्टर से वापिस दिल को स्टिच करने का आदेश दिया ! _*तभी मुझे बच्ची की आखिरी बात याद आई और मैं अपने रक्त भरे हाथों को जोड़ कर प्रार्थना करने लगा- हे ईश्वर! मेरा सारा अनुभव तो इस बच्ची को बचाने में असमर्थ है, पर यदि आप इसके हृदय में विराजमान हो तो आप ही कुछ कीजिए ! मेरी आंखों से आंसू टपक पड़े। यह मेरी पहली अश्रु पूर्ण प्रार्थना थी। इसी बीच मेरे जूनियर डॉक्टर ने मुझे कोहनी मारी। मैं चमत्कार में विश्वास नहीं करता था पर मैं स्तब्ध हो गया यह देखकर कि दिल में रक्त संचार पुनः शुरू हो गया !*_ _मेरे 60 साल के जीवन काल में ऐसा पहली बार हुआ था ! आपरेशन सफल तो हो गया पर मेरा जीवन बदल गया!_ _*मैंने बच्ची से कहा। बेटा हृदय में भगवान दिखे तो नहीं पर यह अनुभव हो गया कि वे हृदय में मौजूद हर पल रहते है !*_*इस घटना के बाद मैंने अपने आपरेशन थियेटर में प्रार्थना का नियम निभाना शुरू किया। मैं यह अनुरोध करता हूं कि सभी को अपने बच्चों में प्रार्थना का संस्कार डालना ही चाहिए ... !! 🙏🙏🙏जय जय श्री राधेकृष्ण जी🙏🙏🙏

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MAHESH BHARGAVA Jul 18, 2019

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SUNIL KUMAR SHARMA Jul 20, 2019

मथुरा में एक संत रहते थे। उनके बहुत से शिष्य थे। उन्हीं में से एक सेठ जगतराम भी थे। जगतराम का लंबा चौड़ा कारोबार था। वे कारोबार के सिलसिले में दूर दूर की यात्राएं किया करते थे। एक बार वे कारोबार के सिलसिले में कन्नौज गये। कन्नौज अपने खुश्बूदार इत्रों के लिये प्रसिद्ध है। उन्होंने इत्र की एक मंहगी शीशी संत को भेंट करने के लिये खरीदी।सेठ जगतराम कुछ दिनों बाद काम खत्म होने पर वापस मथुरा लौटे। अगले दिन वे संत की कुटिया पर उनसे मिलने गये। संत कुटिया में नहीं थे। पूछा तो जवाब मिला कि यमुना किनारे गये हैं, स्नान-ध्यान के लिये। जगतराम घाट की तरफ चल दिये। देखा कि संत घुटने भर पानी में खड़े यमुना नदी में कुछ देख रहे हैं और मुस्कुरा रहे हैं। तेज चाल से वे संत के नजदीक पहुंचे। प्रणाम करके बोले आपके लिये कन्नौज से इत्र की शीशी लाया हूँ। संत ने कहा लाओ दो। सेठ जगतराम ने इत्र की शीशी संत के हाथ में दे दी। संत ने तुरंत वह शीशी खोली और सारा इत्र यमुना में डाल दिया और मुस्कुराने लगे।जगतराम यह दृश्य देख कर उदास हो गये और सोचा एक बार भी इत्र इस्तेमाल नहीं किया , सूंघा भी नहीं और पूरा इत्र यमुना में डाल दिया। वे कुछ न बोले और उदास मन घर वापस लौट गये। कई दिनों बाद जब उनकी उदासी कुछ कम हुई तो वे संत की कुटिया में उनके दर्शन के लिये गये। संत कुटिया में अकेले आंखे मूंदे बैठे थे और भजन गुनगुना रहे थे। आहट हुई तो सेठ को द्वार पर देखा। प्रसन्न होकर उन्हें पास बुलाया और कहा – ”उस दिन तुम्हारा इत्र बड़ा काम कर गया। सेठ ने आश्चर्य से संत की तरफ देखा और पूछा “मैं कुछ समझा नहीं। संत ने कहा- उस दिन यमुना में राधा जी और श्री कृष्ण की होली हो रही थी। श्रीराधा जी ने श्रीकृष्ण के ऊपर रंग डालने के लिये जैसे ही बर्तन में पिचकारी डाली उसी समय मैंने तुम्हारा लाया इत्र बर्तन में डाल दिया। सारा इत्र पिचकारी से रंग के साथ श्रीकृष्ण के शरीर पर चला गया और भगवान श्रीकृष्ण इत्र की महक से महकने लगे। तुम्हारे लाये इत्र ने श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी की होली में एक नया रंग भर दिया। तुम्हारी वजह से मुझे भी श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी की कृपा प्राप्त हुई।सेठ जगतराम आंखे फाड़े संत को देखते रहे। उनकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। संत ने सेठ की आंखों में अविश्वास की झलक देखी तो कहा शायद तुम्हें मेरी कही बात पर विश्वास नहीं हो रहा। जाओ मथुरा के सभी श्रीकृष्ण राधा के मंदिरों के दर्शन कर आओ, फिर कुछ कहना। सेठ जगतराम मथुरा में स्थित सभी श्रीकृष्ण राधा के मंदिरों में गये। उन्हें सभी मंदिरों में श्रीकृष्णराधा की मूर्ति से अपने इत्र की महक आती प्रतीत हुयी। सेठ जगतराम का इत्र श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी ने स्वीकार कर लिया था। वे संत की कुटिया में वापस लौटे और संत के चरणों में गिर पड़े। सेठ की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। और उसे संत जी का अधिकार मालूम हुआ। संत की आंखें भी प्रभु श्रीकृष्ण की याद में गीली हो गयीं। इसलिए सदैव ध्यान रहे कि संत महात्मा भले ही हमारे जैसे दिखते हों, रहते हों लेकिन वे हर वक्त ईश्वर में मन लगाये रहते हैं। हम जैसों के लिये यह अधिकार तब प्राप्त होगा जब हमारी भक्ति बढ़े, नाम सिमरन बढ़े। जय श्री राधे कृष्णा 🙏🙏🙏

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उत्तम वार्तालाप की कला -कैसे बनाएँ वार्तालाप को रोचक और प्रभावशाली !!  6 वार्तालाप की कला ऐसी कला है जिससे आप किसी व्यक्ति की बातचीत सुनकर आप उसके विचारों तथा भावनाओं का ही नहीं, नैतिक अवस्था का भी अनुमान लगा सकते हैं। जैसे हम वर्षा-मापक यन्त्र से वर्षा को माप सकते है, उसी प्रकार बातचीत के मापदण्ड से व्यक्तित्व भी मापा सकते है। वार्तालाप को एक कला माना गया हैं। जो लोग इस कला से अनजान हैं, वे न तो अपने व्यक्तित्व को निखार सकते हैं, और न ही अपने व्यापार में सफल हो सकते हैं। अच्छे अध्यापक, अच्छे माता-पिता, अच्छे मित्र, अच्छे दुकानदार, अच्छे सेवक और अच्छे एजेण्ट वही हैं जो उत्तम ढंग से वार्तालाप कर सकते हैं।  बहुत से लोगों की एक बहुत बड़ी आकांक्षा यह होती है कि वह दूसरों के ह्दय पर अपना सिक्का जमाए। प्रत्येक व्यक्ति अपने करोबार और नौकरी में सफलता का इच्छुक होता है। इस महत्वाकांक्षा ने बहुत से साधु, फकीर, तांत्रिक और ज्योजिषी पैदा कर दिए हैं। अनेक लोग हाथ देखनेवालों के पीछे-पीछे फिरते हैं, भेंट चढ़ाते हैं और ज्योतिषियों से परामर्श लेते हैं। व्यापारी व्यापार की वृद्धि के लिए, नौकर अपने मालिकों को प्रसन्न रखने के लिए चमत्कार की खोज में धन और समय का अपव्यय करते हैं। काश! ये लोग जान सकते कि चमत्कारी शक्तियां स्वयं उनके अन्दर हैं और उनकी सभी शक्तियों में प्रधान बातचीत करने की शक्ति है।   उत्तम वार्तालाप के नियम निस्सन्देह संसार में बुद्धिमत्ता का भी आदर होता है। धन की चमत्कार-शक्ति से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है परन्तु जिस व्यक्ति को बात करने का ढंग नहीं आता- जिसके पास कोमल, मधुर एवं सुसंस्कृत शब्दों का भण्डार नहीं, वह अनेक गुणों का स्वामी होते हुए भी दिलों का स्वामी नहीं बन सकता। लोग उसको पंसंद करते हैं, जिसके शब्दों में मधुरस हो, जिसकी बोली समय और स्थिती की पहचान कर सके और जिसकी बातचीत में दूसरों के लिए आदर भी हो, प्रशंसा भी, नम्रता भी हो और प्रोत्साहन भी, वही व्यक्ति वस्तुतः जादूगर है। उत्तम वार्तालाप का मुख्य नियम यह है कि अनावश्यक बातों से हमेंशा बचा जाए। उतनी ही बात की जाए, जितनी आपकी उद्देश्य-पूर्ति के लिए र्प्याप्त हो। कुछ लोग ऐसे होते हैं कि युद्ध की बातें करते-करते घर की बातें करने लगते हैं। घर की बातों में किसी यात्रा का जिक्र छेड़ देते हैं। एक व्यक्ति के विषय में बात प्रारम्भ होगी और वे चार व्यक्तियों की कहानियां ले बैठेंगे। इस प्रकार के व्यर्थ वार्तालाप का स्वभाव अधिक बातें करने से बनता है। [ads-post] वार्तालाप जितना लम्बा होगा, उसका प्रभाव उतना ही कम होगा। शेक्सपीयर का कहना है कि ‘संक्षिप्तता बुद्धिमत्ता की आत्मा है।‘ पोप का यह कथन भी सदा ध्यान रखना चाहिए - ‘शब्द पत्तियों के समान हैं और भाव फल के समान......जिस वृक्ष पर पत्तियां अधिक हों फल कमजोर होते हैं।‘ आवश्यकता से अधिक बातें करनेवालों को यह गुमान होने लगता है कि लोग उनकी बातों में दिलचस्पी लेते हैं। वास्तव में यह दिलचस्पी नहीं होती, दिखावा ही होता है। कोई उन्हें टोकना उचित नहीं समझता, हो सकता है लोग मन-ही-मन उन्हें मूर्ख समझते हों! वार्तालाप को रोचक और प्रभावशाली बनाने के लिए यहां 5 नियम दिये जा रहे है। जिसको आप अपने जीवन में उतार कर वार्तालाप की कला में निपुण हो सकते है- 1.  दूसरों की भी सुनें  बातचीत के दो पहलू हैं - हां-हूं करना और सुनना। अच्छे बोलनेवालों की भांति हमारे समाज में अच्छे सुननेवाले भी बहुत कम पाए जाते हैं। सुननेवालों के लिए आवश्यक है कि वे शान्ति और धैर्य के साथ अपने साथियों की बात सुन सकें और खामोश रहकर उनकी ओर ध्यान भी दे सकें। अपने व्यवहार से बोलनेवाले को यह अनुभव करा सकें कि वे पूरी दिलचस्पी के साथ उसकी बात सुन रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति बोल रहा हो तो उस समय तक कोई प्रश्न नहीं करना चाहिए, जब तक वह अपनी बात समाप्त न कर ले। कई बार लोग किसी से कुछ प्रश्न करते हैं और वह उसका उत्तर दे ही रहा होता हैं कि दूसरा प्रश्न दे मारते हैं या बीच में ही बात काटकर अपनी रामकहानी शुरू कर देते हैं। इससे बात करने वाला यह समझता है कि उसकी बात को महत्व न देकर उसका अपमान किया जा रहा है। 2.  निजी बातों से परहेज रखें कोई भी व्यक्ति बातचीत के दौरान अनावश्यक एवं अवांछित प्रश्न करने वालों को पंसंद नहीं करता। रेल-यात्रा के दौरान ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं, जो व्यर्थ प्रश्नों से अपने साथियों की शान्ति भंग करने में कोई झिझक नहीं मानते। वे केवल नाम और जाने का स्थान पूछकर ही सन्तूष्ट नहीं होते- प्रायः परिवार, निवास-स्थान तथा कारोबार के बारे में भी प्रश्नों की बौछार कर देते हैं। वे इस बात की ओर तनिक ध्यान नहीं देते कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो वे सर्वसाधारण के सामने बताना पसन्द नहीं करता। इसका फल यह होता है कि ऐसे लोग जहां भी जाते हैं, अपने विरूद्ध घृणा का प्रभाव उत्पन्न कर लेते हैं। यदि आप अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बनाना चाहते हैं तो यह नियम बना लें कि किसी व्यक्ति के निजी विषय में कोई प्रश्न न करें। 3.  एक ही बात को दोहराएं नहीं वार्तालाप करते समय किसी शब्द या वाक्य को बार-बार दोहराने का स्वभाव भी ठीक नहीं। कुछ लोग प्रत्येक वाक्य ‘क्या नाम‘ से प्रारम्भ करते हैं। कई लोग ‘मानो‘ और ‘मेरा मतलब यह है कि‘ कहने के आदि होते हैं। कुछ पांच मिनट की बातचीत में दस बार शपथ या कसम उठाते हैं। वार्तालाप कला की दृष्टि से इन सभी बातों से बचना चाहिए। एक शब्द को बार-बार दोहराने का भाषण पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। श्रोताओं का ध्यान वास्तविक बात से हटकर इसमें लग जाता है, वे बात नहीं समझ पाते। 4.  वार्तालाप को रोचक बनाएं वार्तालाप को रोचक बनाने के लिए इस नियम को भी ध्यान में रखना चाहिए कि आपकी बातचीत अन्य व्यक्ति के पंसंद, उसकी शिक्षा और उसके स्वभाव के अनुसार हो। काव्य से प्रेम करनेवाले व्यक्ति के सामने दर्शन की बातें करना भारी भूल है। अमरीका में एक व्यक्ति बहुत सर्वप्रिय था। उसका यह नियम था कि जब कभी उसके घर कोई अतिथि आनेवाला होता तो वह एक दिन पहले उस विषय का अध्ययन करता, जिसमें उस अतिथि को दिलचस्पी हो। यदि आपका साथी आपकी बातचीत में दिलचस्पी प्रकट नहीं करता और वह बेदिली से हूं-हां किए जा रहा है तो आपको समझना चाहिए कि आप उसके मन की रूचि से अपरिचित हैं। 5.  अपना ज्ञान बढ़ाएं लॉर्ड चेस्टरफील्ड ने अपने पुत्र के नाम एक पत्र में लिखा था- ‘अशिक्षित लोगों का वार्तालाप कोई वार्तालाप नहीं। बातचीत जारी रखने के लिए उनके पास न तो सामग्री होती है न ही शब्द। अच्छा वार्तालाप उतना ही रोचक हो सकता है, जितना कोई स्वादिष्ट व्यंजन, और यह गुण बिना ज्ञान और अनुभव के प्राप्त नहीं किया जा सकता।‘ उत्तम वार्तालाप करने के इच्छुक व्यक्ति को लॉर्ड के ये शब्द सदा ध्यान में रखने चाहिए। अच्छी-अच्छी पुस्तकों व पत्र-पत्रिकाओं के अध्ययन से हम अपने ज्ञान, विचार और शब्द-भण्डार में बहुत वृद्धि कर सकते हैं। जो व्यक्ति अध्ययन नहीं करता, वह वार्तालाप-कला से भी अनभिज्ञ है। प्रत्येक नवयुवक के पास एक नोटबुक होनी चाहिए। अध्ययन करते समय यदि कोई अच्छा सा वाक्य-पद अथवा कोई सुन्दर उक्ति दिखाई दे तो तुरन्त नोट कर लें। यही एक ढंग है जिससे आपका वार्तालाप समृद्ध हो सकता है। और अंत में लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘पहले तोलो और फिर बोलो।‘ यह कथन आज भी वैसा ही अनुसरणीय है, जैसा पूर्व समय में था।

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R.K.Soni Jul 19, 2019

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