Kushal Ghosh
Kushal Ghosh Sep 2, 2017

कल है केरल का प्रमुख त्योंहार ओणम।

कल है केरल का प्रमुख त्योंहार ओणम।

ओणम, केरल का प्रमुख त्यौहार है। मलयालम कैलेण्डर के अनुसार, चिंगम महीने में थिरुवोणम नक्षत्र होने पर यह त्यौहार मनाया जाता है। वर्ष 2017 में ओणम 03- 04 सितंबर को मनाया जाएगा।

ओणम की कहानी:

केरल में ओणम उनके प्रिय राजा महाबलि की याद में मनाया जाता है। ओणम की कहानी भगवान विष्णु और उनके वामन अवतार से जुड़ी है। लोक मान्यताओं और वामन पुराण के अनुसार केरल में एक महाप्रतापी राजा हुआ करता था जिसका नाम था बलि। राक्षस जाति के होने के बावजूद राजा अपनी प्रजा के लिए काफी प्रतिबद्ध थे। राजा बलि के सुशासन से देवता काफी ईष्या करने लगे। राजा बलि से ईर्ष्या कर देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता करने का आग्रह किया।

देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान श्री विष्णु ने वामन अवतार लिया। एक दिन वामन बलि की सभा में पहुंचे। महाबलि ने उनसे स्वागत किया और उनसे मनचाही वस्तु मांगने को कहा।

वामन जी ने राजा से दान में तीन पग भूमि मांग ली। दानवीर राजा महा बलि ने यह स्वीकार कर लिया। किन्तु जैसे ही महाबलि ने यह भेंट श्री वामन को दी, वामन का आकार एकाएक बढ़ता ही चला गया। वामन ने तब एक कदम से पूरी पृथ्वी को ही नाप डाला तथा दूसरे कदम से आकाश को। अब तीसरा कदम तो रखने को स्थान बचा ही नहीं था। तब राजा बलि ने कहा कि आप मेरे सिर पर पैर रखें। ऐसा सुनकर वामन भगवान ने पैर रखकर राजा को पाताल भेज दिया।

चूंकि राजा बलि की प्रजा उससे बहुत ही स्नेह रखती थी, इसीलिए श्रीविष्णु ने बलि को वरदान दिया कि वह अपनी प्रजा को वर्ष में एक बार अवश्य मिल सकेगा। अतः जिस दिन महाबलि केरल आते हैं, वही दिन ओणम के रूप में मनाया जाता है। इस त्यौहार को केरल के सभी धर्मों के लोग मनाते हैं। कई लोग इस त्यौहार को कृषि से जोड़कर भी देखते हैं।

कैसे मनाया जाता है ओणम:

दस दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार में पहला और आखिरी दिन बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस पर्व के दौरान एक विशेष नौका दौड़ का भी आयोजन किया जाता है। ओणम के दौरान महिलाएं घर में फूलों की रंगोली बनाती हैं। ओणम त्यौहार का एक और खास आकर्षण इस दिन बनने वाले विशेष व्यंजन भी होते हैं।

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कामेंट्स

TR. Madhavan Sep 2, 2017
ओणम 4 सितंबर को मनाया जाएगा।

Neha Sharma, Haryana Nov 25, 2020

🌸🙏*कार्तिक की कहानियाँ*🌸🙏🌸*पोस्ट - 26*🙏🌸 🌸🙏*नगर बसेरे की कथा*🙏🌸 *एक जाट का था एक भाट का था। दोनों दोस्त थे। जाट का चला बहन के, भाट का चला सासरे। रास्ते में कुएँ की पाल पर दोनों बैठ गए। जाट का बोला नगर बसेरा कर ले। भाट का बोला कि मैं तो सासरे जा रहा हूँ, खूब खातिर होगी, सो तू कर। *जाट कुएँ की पाल पर बैठकर पानी की घंटी और चावल का दाना लेकर नगर बसेरा करने लगा और बोला "नगर बसेरा जो करे, सो मल धोवे पाँव, ताता मांडा तापसी देगी मेरी माँ, माँ ना देगी माँवसी, देगा द्वारका का वासी, मीठा-मीठा गास, वृंदावन का वास, पाँच कुल्ठी छठी रास। मेरा जिबड़ो श्रीकृष्ण के पास, डालूँ पानी हो जाय घी, झट से निकल जाए मेरा जी। जाट का ठकरा कर के चल पड़ा। *जाट के की बहन ने बूरा चावल जिमाकर खूब बातचीत की। भाट का पहुँचा तो सासरे में आग लगी पाई। बुझाते-बुझाते, राख उठाते-उठाते हाथ भी काला मुँह भी काला, रोटी न पानी। पड़ोसन आई बोली जवांई आया उसकी भी पूछ कर लो। सास बोली क्या करूँ, मेरा तो टापड़ा-भूपता सब चला आया। पड़ोसन ने एक रोटी और छाछ दी, उसने खा ली। *शाम को दोनों फिर मिले, दोनों बोले कह बात। भाट का बोला मेरी ससुराल में आग लगी पाई, बुझाते-बुझाते हाथ भी काला मुहँ भी काला रोटी ना पानी। जाट का बोला मेरी तो खूब खातिर हुई। मैंने कही थी ना नगर बसेरा कर ले। बोला आ अब कर ले। भाट का बोला अब भी ना करूँ। तेरी मांवसी है पता नहीं रोटी दे या ना। मेरी तो माँ है, दही की छुंछली, चूरमा की पेड़ी धरी पवायेगी । भाट ने नहीं किया। *जाट ने नगर बसेरा करा "नगर बसेरा जो करे, सो मल धोवे पाँव, ताता मांडा तापसी देगी मेरी माँ, माँ दे ना मांवसी, देगा द्वारका का वासी, मीठा-मीठा गास, वृंदावन का वास, पाँच कुल्ठी छठी रास। मेरा जिबड़ो श्री कृष्ण के पास, डालू पानी हो जाए घी, झट से निकल जाए मेरा जी।" कर करा के चल पड़ा। *घर पहुँचते ही जाट की मांवरसी ने बहुत लाड़-चाव किया। भाट का घर गया तो उनकी भैंस खो गई, बाप एक लाठी धरे एक उठावे, बोला कि ससुराल गया तो आग लगा दी, यहाँ आया तो भैंस खो दी। पहले भैंस खोजकर ला, तभी रोटी-पानी मिलेगी। *सारा दिन हो गया ढूँढते-ढूँढते पर भैंस नही मिलीं बाजार में फिर दोनों मिले, तो जाट के ने पूछा क्या खबर है। भाट का बोला कि आते ही मेरे बाप की भैंस खो गई, उसी दिन से ही ढूँढ़ रहा हूँ रोटियों का ठिकाना नहीं। *जाट बोला मैंने पहले ही कहा था नगर बसेरा कर ले। भाट बोला कि तेरे नगर बसेरे में इतना गुण है, तो अब कर ले। दोनों नगर बसेरा करने लगे- "नगर बसेरा जो करे, सो मल धोवे पाँव, ताता माँडा तापसी देगी मेरी माँ, माँ दे ना माँवसी, देगा द्वारका का वासी, मीठा-मीठा गास, वृंदावन का वास, पाँच कुल्ठी छठी रास। भरा जिबड़ो श्रीकृष्ण के पास, डालू पानी हो जाए घी, झट से निकल जाए मेरा जी।" *उन्होंने नगर बसेरा किया तो आगे चला तो रास्ते में भैंस मिल गई, लेकर घर गया। माँ बोली लड़के को आते ही निकाल दिया, सारा दिन हो गया भूखा मरता, उसने खूब अच्छी तरह जिमाया। उन्होंने सारी नगरी में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब कोई कार्तिक में और पीहर, सासरे में आते-जाते नगर बसेरा क ----------:::×:::---------- "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 *************************************************

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Neha Sharma, Haryana Nov 25, 2020

🌸🙏*कार्तिक की कहानियाँ*🌸🙏🌸*पोस्ट - 25*🙏🌸 🌸🙏*रविवार की कथा*🙏🌸 *एक बुढ़िया थी। रविवार के व्रत करती थी। उसका गोबर का नेम था। गोबर से चूल्हा लीप के तब रोटी बना के खाती थी। पड़ोसन के गऊ थी। उसके यहाँ से गोबर लाती थी। *एक दिन पड़ोसन ने गऊ अंदर बाँध ली। बुढ़िया का ना गोबर मिला, ना करा, ना खाया। भूखी रह गयी। *सपने में सूर्य नारायण दीखे बोले बुढ़िया भूखी क्यों पड़ी है। बुढ़िया बोली, 'देव मुझे गोबर का नेम है। चूल्हा गोबर से लीप के, रोटी बनाऊँ हूँ। ना गोबर मिला, ना लीपा, ना खाया।' सूर्य नारायण बोले, 'बाहर निकल के देख, तेरे गोरी-गाय, गोरा बछड़ा बंध रहे हैं। *गाय ने एक लड़ी सोने की, एक गोबर की दी। पड़ोसन ने देख लिया। सोने की पड़ोसन ले गई, गोबर की बुढ़िया ले आई। लीप-पोत के खा ले। रोज ऐसे ही करे। *भगवान ने सोचा मैंने बुढ़िया को धन दिया। बुढ़िया को लेना ना आया। अब सूरज भगवान ने आँधी-मेघ बरसा दिया। बुढ़िया ने गऊ अंदर बाँध ली। तब बुढ़िया को पता चला सोने की लड़ी घर में रख ली। गोबर से चूल्हा लीप के रोटी बना ली, और खाली। *पड़ोसन को गुस्सा आया उसने राजा से शिकायत की कि बुढ़िया की गऊ तो सोना हगती है। ऐसी गऊ तो राजा-महाराजा के पास होनी चाहिए। राजा ने नौकर भेजकर गऊ मँगा ली। राजा बोला गलीचे बिछा दो गऊ सोना हगेगी। गऊ ने सारा घर गोबर से भर दिया। *राजा ने बुढ़िया को बुलाया। राजा बोला तेरे घर पर तो सोना हगती है, हमारा महल गोबर से भर दिया। बुढ़िया बोली, 'महाराज मेरे गोबर का नेम है। गोबर से चूल्हा लीपकर खाना बनाकर खाती हूँ। एक दिन मुझे गोबर नहीं मिला, भूखी पड़ी रही, सो गई। सपने में सूर्य नारायण दीखे। उन्होंने कहा, बुढ़िया भूखी क्यों पड़ी है ?' मैंने कहा, 'बेटा मेरे गोबर का नेम है, आज गोबर नहीं मिला।' उसने कहा, 'बाहर जाके देखो।' मैंने जाके देखा गऊ बछड़ा बँधे हैं। गाय एक सोने की करे, एक गोबर की। पड़ोसन सोने की ले जावे, गोबर की मैं ले जाती। एक दिन आँधी-मेघ बरसा, मैंने गऊ अंदर बाँध ली जब देखा एक सोने की लड़ी, एक गोबर की पोथी। पड़ोसन को उस दिन सोना नहीं मिला तो आपसे चुगली कर दी। मुझे तो सूर्य नारायण ने दी थी।' *राजा ने बुढ़िया को गऊ भी दी और धन दिया। पड़ोसन को दंड दिया। जैसे बुढ़िया ने पाई वैसे सब कोई पावें। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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Neha Sharma, Haryana Nov 23, 2020

🌸🙏*कार्तिक की कहानियाँ*🌸🙏🌸*पोस्ट - 24*🙏🌸 🌸🙏*शनिवार की कथा*🙏🌸 *एक ब्राह्मण था। पाठ करने जा रहा धा। रास्ते में शनिचर महाराज मिले। ब्राह्मण बोला, 'कहाँ जा रहे हो ?' शनिचर बोला, 'राजा के लगने जा रहा हूँ।' ब्राह्मण बोला, 'राजा के लगेगा सारी प्रजा दुखी होगी। मेरे लग जा।' शनिचर बोला कितने समय के लिए तो ब्राह्मण बोला, 'सात साल की ना ओटी जाय, पाँच साल की ना ओटी जाय, ढाई साल की ना ओटी जाय, सवा साल की ना ओटी जाय सवा पहर की ओट ली।' *ब्राह्मण नदी के किनारे जाकर बैठ गया। आसन बिछा के पाठ करने लगा - 'ओम नमो भगवते वासदेवाय नमः' पाँच बार कह के माला फेरने लगा। नदी में दो मतीरे बहे जा रहे थे। उसने निकाल के गोडे के नीचे रख लिए। मतीरे राजा के लड़कों के सिर बन गए। एक आदमी ने देखा ब्राह्मण ने राजा के लड़कों के सिर काट के रखे हैं। तो ब्राह्मण ने कहा, 'किसी से कहिये मत, मुझे शनि की दसा लग रही है।' *उसने एक से कही दो से कही सारी नगरी में फैल गई। राजा ने आदेश दिया, 'ब्राह्मण को सूली पे चढा दो।' *ब्राह्मण को लाया गया सूली पर लटकाया, सूली टूट गयी। सोने की घड़वाई वो भी टूट गई, चाँदी की घड़वाई वो भी टूट गयी। जो भी सूली घडवावें वही टूट जाय। *इतनी देर में सवा पहर पूरा हो गया। राजा के लड़के खेलते-खेलते आ गए। रानी बोली महाराज ब्राह्मण सूली पे चढ़ा दिया होगा। हमारा कैसे पाप उतरेगा। राजा बोला जा के देखो। देखा तो ब्राह्मण पाठ कर रहा है। उससे पूछा, 'विप्रवर ऐसा कैसे हो गया ?' *ब्राह्मण बोला, 'मैं तो पाठ करने जा रहा था। रास्ते में शनिचर महाराज से बोला कहाँ जा रहे हो बोला राजा के लगने जा रहा हूँ। मैं बोला राजा के लगेगा सारी प्रजा दुखी होगी। मेरे लग जा।' शनिचर बोला, 'कितने समय की ?' मैंने कहा, 'सात साल की ना ओटी जाय, पाँच साल की ना ओटी जाय, ढाई साल की न ओटी जाय, सवा साल की न ओटी जाय, सवा पहर की ओट ले।' *राजा बोला, 'सवा पहर में ऐसे रंग दिखाए। इसकी दशा कैसे दशा उतरे।' सोने-चाँदी का दान, ताँबे-लोहे का दान पीतल का दान, राजा तो कर दे गरीब कैसे करे।' ब्राह्मण ने कहा, 'गरीब तेल की पाली, गुड़ की डली डकोत को दे दे। सात बार पीपल में जल चढ़ा दे। कह दे 'शनि देव टोटा कभी न आवे, टोटा शनि की घड़ी-घड़ी ले सत्तर बला टले।' सात बार कह दे। सात बार जल चढ़ा दे। सारी बला टल जावे। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 *************************************************

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Neha Sharma, Haryana Nov 23, 2020

🌸*कार्तिक की कहानियाँ*🌸🙏🌸*पोस्ट - 22, 23*🌸 🌸🙏*बृहस्पतिवार की कथा और शुक्रवार की कथा*🙏🌸 *दो भाई बहन थे। बहन बृहस्पतिवार के व्रत करती थी। बृहस्पति महाराज आते चार लड्डू चाँदी का कटोरा दे के चले जाते। बहन लड्डू खा लेती कटोरा कोठरी में धर देती। *एक दिन उसकी भाभी ने कोठरी खोल के देखा, कोठरी में जगमग हो रही है। उसने पड़ोसन से कहा, 'मेरी ननद चाँदी का कटोरा कहाँ से लाई, कोठरी जगमग हो रही है।' पड़ोसन बोली, 'अपने आदमी से पूछना।' भाभी बोली, 'मेरा आदमी तो मेरी बात ही नहीं सुनता।' पडोसन बोली, 'बोली दाल का चमचा भात में और भात का चमचा दाल में डाल देना।' *दूसरे दिन भाभी ने दाल का चमचा भात में और भात का चमचा दाल में डाल दिया। लड़की का भाई बोला, 'तू पागल हो गयी है।' भाभी बोली, 'पागल मैं नहीं हो रही, तुम्हारी बहन हो रही है। पता नहीं कहाँ से चाँदी के कटोरे ला-लाकर कोठरी भर रखी है। पूरी कोठरी जगमग कर रही है। इसे घर से निकाल दो।' *भाई जाकर अपनी बहन से बोला, 'जीजी मामा के घर चलें।' बहन जानती थी कैसे मामा के घर ले जा रहा है। बहन बोली, 'भाई जहाँ केले का पेड़ हो और पास में मन्दिर हो वहीं उतार देना।' भाई ने भी हाँ कर दी। *आगे जंगल में एक मन्दिर और केले के पेड़ के पास उसे उतार दिया। बृहस्पतिवार का दिन था लड़की ने केले के पेड़ की पूजा की बृहस्पति की कहानी कही। बृहस्पति महाराज आये चाँदी के कटोरे में चार लड्डू देकर जाने लगे। भाई छिपकर देख रहा था। उसने दौड़कर बृहस्पति के पैर पकड़ लिये। बृहस्पति बोले, 'छोड़ पापी मेरे पैर। यह तो सत् का व्रत करती है चाँदी का कटोरा मैं देकर जाता हूँ, तू इसे कलंक लगा रहा है।' *भाई बहन को लेकर बापस घर आ गया। भाभी दरवाजे पर खड़ी देख रही थी। बोली, 'इसको फिर लेकर आ गया।' भाई बोला, 'इसे कुछ मत कहना, ये बृहस्पति के व्रत करती है, वो ही इसे चाँदी का कटोरा देकर जाते हैं।' *भाभी ने सोचा, 'मैं भी देखूँगी ये कैसे बृहस्पति के व्रत करती है और वे इसे चाँदी का कटोरा देकर जाते हैं।' वो जाकर सारे पड़ोस में सबको बोल आयी, 'सब अपने-अपने बच्चे लेकर आ जाना, मेरी ननद बृहस्पति का व्रत करती है। सबको चार-चार लड्डू और चाँदी का कटोरा मिलेगा।' *बहन ने यह बात सुनी तो वो एक टाँग पर खड़ी होकर बोली, 'हे बृहस्पति महाराज, आज मेरी लाज रखना।' तीन बार ऐसा कहा। बृहस्पति महाराज आये, सबको चार-चार लड्डू और चाँदी का कटोरा देकर चले गये। *हे बृहस्पति महाराज, जैसे उस लड़की की लाज रखी, सबकी रखना। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ************************************************** 🌸🙏*कार्तिक की कहानियाँ*🌸🙏🌸*पोस्ट - 23*🙏🌸 🌸🙏*शुक्रवार की कथा*🙏🌸 *एक सास बहू थीं। बेटा काम धंधा किया करता। महीने दो महीने में आया करता। सास शुक्रवार को मूर्ति सिंहासन पर बैठाकर पूजा करती थी। एक दिन सास बोली, 'मै तीर्थ करने जाऊँ हूँ। तू मेरे शुक्रवार की पूजा कर लेना।' सास चली गई। *बहू ने नहा-धोकर, काम धंधा करके खा-पी लिया। शुक्र महाराज को गुस्सा आ गया। तरह-तरह की विपत्ति आ गई। बच्चे बहुत बीमार हो गए। लड़के का काम छूट गया। बीमारी में सब पैसा खत्म हो गया। घर में झाड़-पोंछकर शुक्र महाराज की मूर्ति को कूड़े में डाल आई। लड़का भी बीमार हो गया। *सास तीर्थ करके आई तो घर देखकर बहुत दुख हुआ। रात को सपने में शुक्रवार महाराज न कहा तेरी बहू ने मेरी पूजा नहीं करी है। सारा धन नष्ट हो गया है। सुबह उठकर देखी तो शुक्र महाराज की मूर्ति नहीं है। बहू से बोली, 'शुक्रवार की मूर्ति कहाँ है।' बहुू बोली' 'मुझे पता नहीं।' *सास सारा घर बुहारकर कूडा फेंकने गई तो वहाँ शुक्रवार की मूर्ति पड़ी मिली। वहाँ से उठाकर, नहलाकर बड़े प्रेम से पूजा की, आरती की, विनती की। *सास, बहू दोनों शुक्रवार के व्रत करने लगीं। लड़के का काम लग गया। बीमारी ठीक हो गई। बेटा बोला हमारी बुद्धि खराब हो गई थी, कूड़े में शुक्रवार की मूर्ति फेंक आए। *सास बोली-हे शुक्रवार महाराज जैसे बेटा बहू से रूठे हो ऐसे किसी ना रूठे। जैसे सास की आई ऐसी सब की आवे। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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Neha Sharma, Haryana Nov 23, 2020

🌸*कार्तिक की कहानियाँ*🌸🙏🌸*पोस्ट - 20, 21*🌸 🌸🙏*मंगलवार की कथा और बुधवार की कथा*🙏🌸 *हनुमान जी के मंदिर में एक साहूकारनी रोज जाया करती थी। चूरमा की पिंडी और एक रोटी ले जाती। कहती 'कांधे सोटो लाल लंगोटो हनुमान जी खायो चूरमे और रोटी। मैंने तुम्हें दिया जवानी में तुम मुझे देना बुढ़ापे में।' *पूजा करने के बाद घर आई तो बहू बोली, 'सासुजी तुम चूरमा रोटी लेके कहाँ जाया करो हो।' सासुजी बोली, 'बालाजी के मंदिर में जाया करूँ।' बहू बोली, 'मंदिर में तो नहीं जाओ हो।' सास कुछ भी नहीं बोली, ना खाया।जा के सो गई। *सोते-सोते पाँच दिन हो गए। हनुमान जी सपने में आए बोले, 'तूने तो जवानी में दिया मैं तुझे बुढ़ापे में देऊँ हूँ।' बुढ़िया बोली, 'आज तो तुम दे रहे हो रोज कौन देगा।' हनुमान जी बोले, 'मैं रोज दे दूँगा। *बुढ़िया ने चुरमा खा लिया। बहू के घर कुछ भी ना रहा। सब चीज में घाटा हो गया। बहू ने सोचा, सास को सात दिन हो गए मैंने तो खाने को भी नहीं दिया। जा के देखा तो खूब मोटी हो रही है। बहू बोली, 'सासु जी तुम्हें खाने को भी न दिया तुम क्या खाती हो।' *सासु बोली, 'मुझे तो हनुमानजी मीठी-मीठी चूरमा रोटी देके जावे हैं वो खाऊँ हूँ। बहू सास के पैरों में पड़ गई। बोली, 'हम तो तुम्हारे भाग का खाते हैं। हमारे घर में तो कुछ भी ना रहा। अब आप संभालो।' सास रोज चूरमा रोटी चढ़ाने लग गई। फिर खूब धन हो गया। *जैसे सास को हनुमानजी का आशीर्वाद मिला, बैसा सबको मिले। ----------:::×:::---------- "जय जय बजरंगबली" 🌸🌸🚩🙏🚩🌸🌸 ************************************************** 🌸🙏*कार्तिक की कहानियाँ*🌸🙏🌸*पोस्ट - 21*🙏🌸 🌸🙏*बुधवार की कथा*🙏🌸 *बुधवार के दिन एक साहूकार का लड़का बहू लेने जा रहा था। माँ नै बहुत मना किया लेकिन नहीं माना। ससुराल में पहुँच कर बोला, 'मैं तो आज ही लेकर जाऊँगा।' उसकी सास बोली, 'मैं तो बुधवार को नहीं भेजूँगी।' पर वह नहीं माना। बुधवार को विदा करके ले गया। *रास्ते में बहू को प्यास लगी।, बोली, 'मैं तो पानी पिऊँगी।' वो पानी लेने चला गया। बुधवार उसका रूप धरकर पानी लेकर आ गया। बहू ने पानी पी लिया। बुध उसके पास ही बैठ गया। लड़का पानी लेकर आया बोला, 'तू कौन है ? ये मेरी बहू है।' बुध बोला, 'तेरी बहू है, चल भाग यहाँ से ये मेरी बहू है।' बहू भी बोली, 'मेरा पति ये ही है।' *बात बढ़ गयी। पंचायत में बात पहुँची। उनकी बातें सुनकर पंचों ने बहू से पूछा, 'तेरा पति कौन है ?' *बहू बुध का हाथ पकड़कर बोली, 'ये मेरा पति है।' यह सुनकर उसका पति रोने लगा। *पंचों ने एक करवा मँगवाया और कहा, 'जो मच्छर बनकर इस करवे के मुँह से निकल जावेगा वही इसका पति होगा।' बुध मच्छर बनकर करवे के अन्दर घुस गया। करवे का मुँह बन्द कर दिया गया। *पंच बोले, 'तुमने बुध नहीं माना इसलिए बुध ने यह नाटक किया। *लड़के ने सारे शहर में ढ़िढोरा पिटवा दिया, 'बुधवार को बहन के भाई, सासरे जमाई कोई ना जावे। जैसा बुध ने उसे नाटक दिखाया किसी को ना दिखावे। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 *************************************************

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Jayshree Shah Nov 23, 2020

કર્મ ફળની સત્ય ઘટના: ઠોકર જેને વાગે તેને લોહી નીકળે, પછી તે રંક હોય કે રાજા હોય.. કોઈ ભેદ નથી પડતો.અંગારાને અડે તેનો હાથ બળે, પછી ભલે તે Peon હોય કે President, કોઈ ફરક નથી પડતો. ભૂલ કરે તેને સજા મળે પછી તે રાવણ હોય કે રામ! કોઈ ફેર નથી પડતો. કર્મના સિધ્ધાંતમાં ને કુદરતના દરબારમાં ન્યાય સરખો જ તોળાય છે. Courtના ચુકાદામાં.. Judgementમાં ને સરકારના કાયદામાં ને નિયમમાં ક્યાંક કોઈકને છાવરાય, પણ કર્મના Computerમાં ક્યાંય છબરડા નથી થતા.રામાયણ ની એક સત્ય ઘટના આપણને સમજાવશે, સજા એ ભૂલનું પરિણામ છે. એક પિતાના વચનને ખાતર 14 વર્ષ વનવાસ સ્વીકારી અયોધ્યાનો રાજમુગટ ને રાજ્યાભિષેક બધુ જ ત્યજીને શ્રીરામ, લક્ષ્મણ ને સીતાજી 14 વર્ષનો વનવાસ પૂરો કરીને જ્યારે અયોધ્યા પાછા આવ્યા ત્યારે અયોધ્યા નગરી અમરાપુરીને ટપી જાય એવી બની ગઈ હતી. એમના સ્વાગત માટે પ્રજા ને રાજા બધાએ મળીને અયોધ્યાના રૂપ-રંગ ને દેદાર દિવ્ય ને દેદીપ્યમાન બનાવી દીધા હતા. આખું’ય નગર હેલે ચઢ્યું હતું. ઘર-ઘર તોરણ ને આંગણે રંગોળી ને ટોડલે-ટોડલે દીવા મુકાયા હતા. રાજા શ્રીરામનો ભવ્ય નગરપ્રવેશ અદ્‌ભૂત અને ઐતિહાસિક હતો. રાજા શ્રીરામને ચારે તરફથી લોકોએ ઘેરી લીધા હતા. આખા રસ્તે ફૂલોની વૃષ્ટિ શ્રીરામ પર થતી જ રહી. બધાને માત્ર હાથ હલાવી કે ચહેરે સ્મિત લાવી આગળ વધતા શ્રીરામને લોકલાગણીની છાલકો ભીંજવતી રહી. બધાને મળતા-મળતા ને અભિવાદન ઝીલતા-ઝીલતા શ્રીરામ રાજદરબારે પહોંચ્યા ને પછી રાજમહેલે પગ દીધો. ને.. ત્યાં જ શ્રીરામને યાદ આવ્યું કે, *ગુરુદેવના ચરણે જવાનું તો વિસરાઈ ગયું. એ એકદમ ગળગળા બની ગયા. ને બધાની વચ્ચેથી એકદમ ઊભા થઈને ચાલવા લાગ્યા. બધા અવાક્‌ બની ગયા. કોઈને કાંઈ સમજણ પડે ને કોઈ કાંઈ પૂછે એ પહેલા તો શ્રીરામ રાજમાર્ગ પર આવી ગયા. પરિવાર બધો જ એમની પાછળ એમને અનુસરતો રહ્યો. શ્રીરામના નયનોમાં ભીનાશ ઉપસી-જામી. એ સીધ્ધા જ વશિષ્ઠ ઋષિના આશ્રમમાં પહોંચ્યા ને ઉતાવળે ગુરુચરણે જઈ ઢળી પડ્યા. એમની કમલસી આંખોમાંથી આંસુઓ ઢળવા માંડ્યા. સાંજ ઢળે એ પહેલા તો એમણે ગુરુચરણે માથુ મૂકીને કહ્યું, ગુરુદેવ, મારા આ અપરાધને ક્ષમા કરો. મારી ગંભીર ભૂલને આપ ઉદારદિલે માફી આપો. ભીડની અંદર હું ભીડભંજન આપને વીસરી ગયો. क्षमस्व माम् ગુરુ તો દયાના સાગર, ક્ષમાના સાગર ને પ્રેમના સાગર હોય છે." શ્રી વશિષ્ઠ ઋષિએ પોતાનો વરદ ને પ્રેમાળ હસ્ત શ્રીરામને મસ્તકે ફેરવ્યો, મૂક્યો ને કહ્યું, રામ તને ક્ષમા છે, શ્રીરામનું હૃદય ભરાઈ ગયું ને એમણે ગુરુચરણે ફરી મસ્તક મૂકી દીધું ને ભીની આંખોએ વંદના કરી. એ વખતે ઋષિ વશિષ્ઠ બોલ્યા, “રામ, હું તો માફ કરી દઉં છું. પણ કુદરત તો એનું કાર્ય કરશે જ. કુદરતના કાયદામાં કોઈ દખલ દાખલ ન કરી શકે. કુદરત પોતાનો દાખલો પોતે જ કરે.” શ્રીરામે હાથ જોડી ફરી ક્ષમા યાચી. ઋષિ વશિષ્ઠ કહે, "अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् " ને વશિષ્ઠ ઋષિએ શ્રીરામને કહ્યું, શ્રીરામ તારા પશ્ચાતાપથી તારા ઘણાબધા અપરાધો ધોવાઈ ગયા. પણ તારાથી ગુરુની અજાણતા’ય થયેલી ઉપેક્ષા એના ફળ સ્વરુપે કુદરત એનો Part ભજવશે જ. અને હું તને છેલ્લો યાદ આવ્યો એટલે ભવિષ્યમાં લોકો’ય તને છેલ્લે યાદ કરશે. ગુરુને છેલ્લે યાદ કર્યા એટલે કોઈપણ સારા કાર્યમાં તારું નામ નહિ લેવાય. પણ છેલ્લે યાદ કરવામાં આવશે. રામ બોલો ભાઈ રામ, રામ નામ સત્ય હૈ. લગ્નાદિ શુભ કાર્યમાં 'ગણેશાય નમઃ' 'શ્રી કૃષ્ણાય નમઃ' 'નમઃ શિવાય' દુનિયા લખે છે, પણ *'રામાય નમઃ'નથી લખતી. એનું કારણ, ગુરુની અજાણતા’ય થયેલી ઉપેક્ષા પણ જીવનમાં ગુરુની ઉપેક્ષા ક્યારે’ય નહિ કરવી. શ્રીરામ જેવાને જો આટલી મોટી શિક્ષા મળતી હોય તો આપણી જેવાનું તો શું થાય?ગુરુની ઉપેક્ષા નહિ, હોય ઉપાસના, એ જ પ્રભુની આજ્ઞા ને એ જ આરાધના ગુરુને નારાજ કરીને મળતું રાજ અંતે તારાજ કરી જતું હોય છે. પ્રભુ તો દૂર છે, ગુરુ હાજરાહજૂર છે. માટે જ તો ગુરુની જીવનમાં જરૂર છે.

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