🙏🏼🌹 जय माता रानी की जय माता दी की जय मां🌹🙏🏼🌹 मां जगत जननी जगदंबिका की जय हो..🌹🙏🏼🌹🌹🌹🌹🌹🙏🏼 जय माता जी 🙏🏼🌹🌹🌹🌹 🙏🏼 जय माता दी की जय भोलेनाथ जय महादेव🙏🏼

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कामेंट्स

Mohanmira.nigam Mar 27, 2020
Jay.shri Chandr.Ghanta mata Rani kali.mata ji Santosi mata Rani Sarasvati mata Rani ji hanuman ji Bholay.baba.ki.jay very nice

दिनकर महाराज लटपटे Mar 27, 2020
राम राम जी,🙏🙏 भगवती माता जी की कृपा सदैव आप और आपके परिवारपर बनी रहे🌷 आपका हर पल सभी खुशीयोंसे भरा हो,,🌷शुभ संध्या वंदन जी🙏🌷

🙋🅰️NJ🅰️LI🌹Ⓜ️ISH®️🅰️🙏 Mar 27, 2020
🙏जय माता दी 🚩भाइया जी 🙏माता रानी की कृपा दृष्टि सदा आप और आपके संपूर्ण परिवार पर बनी रहे ,माता रानी आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी करें🙏आप सभी हमेशा स्वस्थ रहें सुखी रहें,इसी शुभकामना के साथ 🙏 शुभ रात्रि वंदन भाइया जी 🌷🌷🌷🌷🙏🙏

anshu Mar 27, 2020
shubh ratri Vandana Radhe Radhe ji

rekha sunny Apr 10, 2020

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geeta nimavat Apr 10, 2020

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Radha Sharma Apr 10, 2020

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आज का श्लोक: श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप अध्याय 16 : दैवी और आसुरी स्वभाव श्लोक--11----12 ❁ *श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप* ❁ *सभी के लिए सनातन शिक्षाएं* *आज* *का* *श्लोक* -- 16.11-12 *अध्याय 16 : दैवी और आसुरी स्वभाव* चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः | कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्र्चिताः || ११ || आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः | ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् || १२ || चिन्ताम् - भय तथा चिन्ताओं का; अपरिमेयाम् - अपार; च - तथा; प्रलय-अन्ताम् - मरणकाल तक; उपाश्रिताः - शरणागत; काम-उपभोग - इन्द्रियतृप्ति; परमाः - जीवन का परम लक्ष्य; एतावत् - इतना; इति - इस प्रकार; निश्र्चिताः - निश्चित करके; आशा-पाश - आशा रूप बन्धन; शतैः - सैकड़ों के द्वारा; बद्धाः - बँधे हुए; काम - काम; क्रोध - तथा क्रोध में; परायणाः - सदैव स्थित; ईहन्ते - इच्छा करते हैं; काम - काम; भोग - इन्द्रियभोग; अर्थम् - के निमित्त; अन्यायेन - अवैध रूप से; अर्थ - धन का; सञ्चयान् - संग्रह | उनका विश्र्वास है कि इन्द्रियों की तुष्टि ही मानव सभ्यता की मूल आवश्यकता है | इस प्रकार मरणकाल तक उनको अपार चिन्ता होती रहती है | वे लाखों इच्छाओं के जाल में बँधकर तथा काम और क्रोध में लीन होकर इन्द्रियतृप्ति के लिए अवैध ढंग से धनसंग्रह करते हैं | तात्पर्य : आसुरी लोग मानते हैं कि इन्द्रियों का भोग ही जीवन का चरमलक्ष्य है और वे आमरण इसी विचारधारा को धारण किये रहते हैं | वे मृत्यु के बाद जीवन में विश्र्वास नहीं करते | वे यह नहीं मानते कि मनुष्य को इस जगत् में अपने कर्म के अनुसार विविध प्रकार के शरीर धारण करने पड़ते हैं | जीवन के लिए उनकी योजनाओं का अन्त नहीं होता और वे एक के बाद एक योजना बनाते रहते हैं जो कभी समाप्त नहीं होती | हमें ऐसे व्यक्ति की ऐसी आसुरी मनोवृत्ति का निजी अनुभव है, जो मरणाकाल तक अपने वैद्य से अनुनय-विनय करता रहा कि वह किसी तरह उसके जीवन की अवधि चार वर्ष बढ़ा दे, क्योंकि उसकी योजनाएँ तब भी अधूरी थीं | ऐसे मुर्ख लोग यह नहीं जानते कि वैद्य क्षणभर भी जीवन को नहीं बढ़ा सकता | जब मृत्यु का बुलावा आ जाता है, तो मनुष्य की इच्छा पर ध्यान नहीं दिया जाता | प्रकृति के नियम किसी को निश्चित अवधि के आगे क्षणभर भी भोग करने की अनुमति प्रदान नहीं करते | आसुरी मनुष्य, जो ईश्र्वर या अपने अन्तर में स्थित परमात्मा में श्रद्धा नहीं रखता, केवल इन्द्रियतृप्ति के लिए सभी प्रकार के पापकर्म करता रहता है | वह नहीं जानता कि उसके हृदय के भीतर एक साक्षी बैठा है | परमात्मा प्रत्येक जीवात्मा के कार्यों को देखता रहता है | जैसा कि उपनिषदों में कहा गया है कि एक वृक्ष में दो पक्षी बैठे हैं, एक पक्षी कर्म करता हुआ टहनियों में लगे सुख-दुख रूपी फलों को भोग रहा है और दूसरा उसका साक्षी है | लेकिन आसुरी मनुष्य को न तो वैदिकशास्त्र का ज्ञान है, न कोई श्रद्धा है | अतएव वह इन्द्रियभोग के लिए कुछ भी करने के लिए अपने को स्वतन्त्र मानता है, उसे परिणाम की परवाह नहीं रहती | ************************************ *प्रतिदिन भगवद्गीता का एक श्लोक* प्राप्त करने हेतु, इस समूह से जुड़े । कृपया एक समूह से ही जुड़े, सभी समूहों में वही श्लोक भेजा जाएगा।🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/HK4iioAJY4QAn4fe6mtZow

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Ratan Verma Apr 10, 2020

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vikash kashyap Apr 10, 2020

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BIJAY PANDAY Apr 10, 2020

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sheela singh Apr 10, 2020

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Renu Sharma Apr 10, 2020

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Renu Sharma Apr 10, 2020

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