मायमंदिर फ़्री कुंडली
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Mamta Sharma
Mamta Sharma Jul 12, 2019

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Mamta Sharma Jul 15, 2019

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Amit Kumar Jul 17, 2019

🌹गीता,अध्याय,18/1,2,3,🌹 🌹मोक्षसंन्यासयोग🌹 (त्याग का विषय)🌹 अर्जुन उवाच🌹 सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌ । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ भावार्थ : अर्जुन बोले- हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्‌! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक्‌-पृथक्‌ जानना चाहता हूँ॥1॥ श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ भावार्थ : श्री भगवान बोले- कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के (स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग-संकटादि की निवृत्ति के लिए जो यज्ञ, दान, तप और उपासना आदि कर्म किए जाते हैं, उनका नाम काम्यकर्म है।) त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को (ईश्वर की भक्ति, देवताओं का पूजन, माता-पितादि गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान और तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ का निर्वाह एवं शरीर संबंधी खान-पान इत्यादि जितने कर्तव्यकर्म हैं, उन सबमें इस लोक और परलोक की सम्पूर्ण कामनाओं के त्याग का नाम सब कर्मों के फल का त्याग है) त्याग कहते हैं॥2॥ त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ भावार्थ : कई एक विद्वान ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिए त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं॥3॥🌹🌹 🌹🌹🌹देखोभाई,अठारवें अध्याय ,मोक्ष सन्यास योग में अर्जुन ने श्री कृष्ण से सन्यास और त्याग जो एक जैसा लगता है उसके मर्म को अलग अलग बताने का आग्रह करते हैं, भगवान श्री कृष्ण ने कहा अर्जुन अब सबसे पहले तो ज्ञानीजनों की मान्यताओं को सुन क्योकि यह समाज जैसा ज्ञानी संत महात्मा लोग कहते हैं वैसा ही चलता है, और सबके अपने अपने अलग अलग मत है, और सब के मत लोगों को ठीक लगते हैं, और इसीलिए समाज में अलग अलग विचारधाराएं प्रवाहित होती रहती हैं और अपनी मति के अनुकूल जो विचार धारा होती है व्यक्ति उसी को पकड़ लेता है, अब जैसे कुछ लोग कामनाओं के त्याग को त्याग कहते हैं , जैसे ज्यादातर लोग भगवान की पूजा उपाशना सन्सारीक कार्यो की पूर्ति के लिए करते अनेकों कामनाये लोगो की होती हैं जैसे विवाह के लिए पुत्र संतान की प्राप्ती के लिए , जीवन के संकटों से मुक्ति के लिए यज्ञ दान तप उपाशना बगैरह करते हैं, उसे काम्य कर्म कहते हैं, और कुछ लोग तो समस्त कर्मफल के त्याग को त्याग कहते हैं, कर्म करना हमारा कर्तव्य है तो कर रहे हैं बाकी पूर्ण निसकाम भाव , और कुछ लोगों का मानना है कि कर्म बन्धन में डालने वाले होते हैं, जो कर्ता हो वह भोक्ता भी होता है, क्योकि कर्मफल के सिद्धांत पर यह संसार चल रहा है, और कौन सा का कर्म कब पाप और कब पुण्य बन जाये कहा नही जा सकता अर्थात कर्म का ही त्याग कर दो,दूसरे कुछ ज्ञानीजनों का मानना है कि सत्कर्मों का त्याग कभी भी नही करना चाहिए जैसे यज्ञ दान और तप ,ये तो मानवोचित धर्म है ही ,यज्ञ से देवताओं को संतुष्ट रखना दान से श्रस्टि को ,और तप से खुद को सुद्ध रखना चाहिए जैसे शरीर को साफ रखने के लिए नित्य स्नान करते हो वैसे ही आत्मा को पवित्र बनाये रखने के लिए तप जरूरी है ,ऐसा तो नही की आज पेट भर भोजन कर लिया तो भोजन छोड़ दिया हमेसा के लिए , ठीक वैसे ही अगर तपसे आत्मज्ञान प्राप्त भी कर लिए तो भ्य जब तक जीवन है तप जरूरी है नही तो धीरे धीरे कर्मासक्ति अज्ञान आवरण के रूप में आत्मा को आच्छादित कर लेती है,🌹 🌹जै श्री कृष्ण🌹 🌹डॉ स्वामी विनेश्वरानंद🌹 🌹🌹

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Mamta Sharma Jul 15, 2019

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Mamta Sharma Jul 15, 2019

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Mamta Sharma Jul 15, 2019

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Aparana Shukla Jul 17, 2019

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aditi Jul 17, 2019

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