dhiraj jain
dhiraj jain Dec 21, 2017

shri ji ka abhiseak

shri ji  ka  abhiseak

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💐🌹🥀🚩 जय श्री कृष्णा 🚩🥀🌹💐 एक मालन को रोज़ राजा की सेज को फूलों से सजाने का काम दिया गया था . वो अपने काम में बहुत निपुण थी . एक दिन सेज़ सजाने के बाद उसके मन में आया की वो रोज़ तो फूलों की सेज़ सजाती है, पर उसने कभी खुद फूलों के सेज़ पर सोकर नहीं देखा . कौतुहलबस वो दो घड़ी फूल सजे उस बिस्तर पर सो गयी . उसे दिव्य आनंद मिला , ना जाने कैसे उसे नींद आ गयी . कुछ घंटों बाद राजा अपने शयन कक्ष में आये . मालन को अपने बिस्तर पर सोता देखकर राजा बहुत गुस्सा हुआ . उसने मालन को पकड़कर १०० कोड़े लगाने की सजा दी . मालन बहुत रोई विनती की पर राजा ने एक ना सुनी . जब कोड़े लगाने लगे तो शुरू में मालन खूब चीखी चिल्लाई, पर बाद में जोर जोर से हंसने लगी. राजा न कोड़े रोकने का हुक्म दिया और पूछा - अरे तू पागल हो गयी हैं क्या? हंस किस बात पर रही हैं तू ? मालन बोली - राजन , मैं इस आश्चर्य में हंस रही हूँ कि जब दो घड़ी फूलों की सेज़ पर सोने की सजा १०० कोड़े हैं , तो पुरे ज़िन्दगी हर रात ऐसे बिस्तर पर सोने की सजा क्या होगी ? राजा को मालन की बात समझ में आ गयी , वो अपनी कृत्य पर बेहद शर्मिंदा हुआ और जन कल्याण में अपने जीवन को लगा दिया. सीख - याद रखे जो कर्म हम इस लोक में करते हैं , उससे परलोक में हमारी सज़ा या पुरस्कार तय होती हैं .

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जब भी बहुत परेशान हों याद करें श्रीकृष्ण की कही ये 10 बातें, दूर होगा हर दुख हर इसांन के जीवन में कभी न कभी ऐसे समय आता है, जब वह बेहद परेशान हो जाता है। उसे समझ नहीं आता क्या सही है और क्या गलत। ऐसे समय में भगवान श्रीकृष्ण की कहीं कुछ आसान बातें आपका दुख दूर सक सकती है। भगवान कृष्ण के बताए गए कुछ अनमोल वचनों का पालन करके कोई भी मनुष्य जीवन का हर सुख और मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है 1.जो इंसान समय-समय पर दान और तपस्या करता है, हमेशा सच बोलता है और अपनी इंद्रियों को अपने वश में रखता है, ऐसे मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति जरूर होती है। 2.जो मनुष्य माता-पिता की सेवा करते हैं और भाइयों के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना रखते हैं, ऐसे लोगों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। 3.जो मनुष्य हर दिन स्नान, दान, हवन, मंत्रोच्चारण और देवपूजन करता है, उसे निश्चित ही जीवन का हर सुख मिलता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। 4.भगवान विष्णु, एकादशी का व्रत, गंगा नदी, तुलसी, ब्राह्मण और गाय- ये 6 ही इस संसार से मुक्ति पाने का रास्ता बनते हैं, अत: इन सभी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। 5.एक पीपल, एक नीम, एक बड़, दस चिचड़ा, तीन, कैथ, तीन बेल, तीन आंवले और पांच आम के पेड़ लगाने वाले मनुष्य को कभी नर्क का मुंह नहीं देखना पड़ता। 6.गोमूत्र, गोबर, गोदुग्ध, गोधूलि, गोधाना, गोखुर और पकी हुए फसद से भरा खेत देख लेने मात्र से ही पुण्य की प्राप्ति हो जाती है। 7.जो पुरुष अपनी सभी कामनाओं का त्याग करके अहंकाररहित, क्रोधरहित और लालसारहित हो जाता है, वहीं शांति और मोक्ष को प्राप्त करता है। 8.जो मनुष्य हर परिस्थिति में संतुष्ट रहता है, जिसका मन सुख और दुख दोनों में शांत रहता है और लाभ और हानी दोनों ही हालातों में एक समान व्यवहार करता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता है। 9.जो मनुष्य न तो किसी से दुश्मनी करता है, न ही किसी से आशा रखता है, ऐसा मनुष्य परम आनंद को पाता है, क्योंकि राग-द्वेष से रहित मनुष्य हर दुख से मुक्त हो जाता है। 10.जो लोग प्राणियों की हिंसा करते हैं, नास्तिक व्यक्ति के घर जाकर रहते हैं, हमेशा लालच और मोह में फंसे रहते हैं , ऐसे लोग नर्क में जाते हैं। इन सभी कामों से दूर रहने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जय श्रीकृष्ण....

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पापांकुशा एकादशी (27 अक्टूबर 2020 मंगलवार) ~~~~~~~~~~~ एकादशी व्रत कथा ~~~~~~~~~~~~~~~~ युधिष्ठिर ने पूछा : हे मधुसूदन ! अब आप कृपा करके यह बताइये कि आश्विन के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है और उसका माहात्म्य क्या है ? भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आश्विन के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, वह ‘पापांकुशा’ के नाम से विख्यात है । वह सब पापों को हरनेवाली, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाली, शरीर को निरोग बनानेवाली तथा सुन्दर स्त्री, धन तथा मित्र देनेवाली है । यदि अन्य कार्य के प्रसंग से भी मनुष्य इस एकमात्र एकादशी को उपास कर ले तो उसे कभी यम यातना नहीं प्राप्त होती । राजन् ! एकादशी के दिन उपवास और रात्रि में जागरण करनेवाले मनुष्य अनायास ही दिव्यरुपधारी, चतुर्भुज, गरुड़ की ध्वजा से युक्त, हार से सुशोभित और पीताम्बरधारी होकर भगवान विष्णु के धाम को जाते हैं । राजेन्द्र ! ऐसे पुरुष मातृपक्ष की दस, पितृपक्ष की दस तथा पत्नी के पक्ष की भी दस पीढ़ियों का उद्धार कर देते हैं । उस दिन सम्पूर्ण मनोरथ की प्राप्ति के लिए मुझ वासुदेव का पूजन करना चाहिए । जितेन्द्रिय मुनि चिरकाल तक कठोर तपस्या करके जिस फल को प्राप्त करता है, वह फल उस दिन भगवान गरुड़ध्वज को प्रणाम करने से ही मिल जाता है । जो पुरुष सुवर्ण, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, जूते और छाते का दान करता है, वह कभी यमराज को नहीं देखता । नृपश्रेष्ठ ! दरिद्र पुरुष को भी चाहिए कि वह स्नान, जप ध्यान आदि करने के बाद यथाशक्ति होम, यज्ञ तथा दान वगैरह करके अपने प्रत्येक दिन को सफल बनाये । जो होम, स्नान, जप, ध्यान और यज्ञ आदि पुण्यकर्म करनेवाले हैं, उन्हें भयंकर यम यातना नहीं देखनी पड़ती । लोक में जो मानव दीर्घायु, धनाढय, कुलीन और निरोग देखे जाते हैं, वे पहले के पुण्यात्मा हैं । पुण्यकर्त्ता पुरुष ऐसे ही देखे जाते हैं । इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ, मनुष्य पाप से दुर्गति में पड़ते हैं और धर्म से स्वर्ग में जाते हैं । राजन् ! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार ‘पापांकुशा एकादशी’ का माहात्म्य मैंने वर्णन किया । अब और क्या सुनना चाहते हो ? 🚩🚩🚩🙏🙏🙏🌹🌹

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***क्षमा कीजिए पिताश्री*** _एक बार गणेशजी ने भगवान शिवजी से कहा कि पिताजी! आप यह चिताभस्म, लगाकर, मुण्डमाला धारणकर अच्छे नहीं लगते!_ _मेरी माता गौरी अपूर्व सुंदरी और आप उनके साथ इस भयंकर रूप में!_ _पिताजी! आप एक बार कृपा करके अपने सुंदर रूप में माता के सम्मुख आएं, जिससे हम आपका असली स्वरूप देख सकें!_ _भगवान शिवजी मुस्कुराये और गणेशजी की बात मान ली! _कुछ समय बाद जब शिवजी स्नान करके लौटे तो उनके शरीर पर भस्म नहीं थी, बिखरी जटाएं और सँवरी हुई, मुंडमाला उतरी हुई थी!_ _सभी देवता, यक्ष, गंधर्व, शिवगण उन्हें अपलक देखते रह गए, वो ऐसा रूप था कि मोहिनी अवतार रूप भी फीका पड़ जाये!_ _भगवान शिव ने अपना यह रूप कभी भी प्रकट नहीं किया था! शिवजी का ऐसा *अतुलनीय रूप* करोड़ों कामदेवों को भी मलिन कर रहा था!_ _गणेशजी अपने पिता की इस मनमोहक छवि को देखकर स्तब्ध रह गए और मस्तक झुकाकर बोले:-_ _मुझे क्षमा करें पिताजी! परन्तु अब आप अपने पूर्व स्वरूप को धारण कर लीजिए!_ _भगवान शिव मुस्कुराये और पूछा क्यों पुत्र अभी तो तुमने ही मुझे इस रूप में देखने की इच्छा प्रकट की थी, अब पुनः पूर्व स्वरूप में आने की बात क्यों? गणेशजी ने मस्तक झुकाये हुए ही कहा:-_ _*क्षमा करें पिताश्री! मेरी माता से सुंदर कोई और दिखे मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता!*_ _शिवजी हँसे और अपने पुराने स्वरूप में लौट आए! _*🕉️🙏नमः🙏शिवाय🔱*_ _*पौराणिक ऋषि इस प्रसंग का सार स्पष्ट करते हुए कहते हैं......*_ _आज भी ऐसा ही होता है पिता रुद्र रूप में रहता है क्योंकि उसके ऊपर परिवार की जिम्मेदारियों, उसके रक्षण, मान सम्मान का ख्याल रखना होताषहै तो थोड़ा कठोर रहता है..._ _और माँ सौम्य, प्यार लाड़, स्नेह उनसे बातचीत करके प्यार देकर उस कठोरता का बैलेंस बनाती है।। इसलिए सुंदर होता है *माँ का स्वरूप।।*_ _*🙏प्रेम से बोलिए❤हर-हर महादेव🔱*_ *पिता के ऊपर से भी जिम्मेदारियों का बोझ हट जाए तो वो भी बहुत सुंदर दिखता है ।*💐🥭🥭💐🙏🙏🙏🙏🙏🙋‍♀️🙋‍♀️🙋‍♀️☕

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🌻 अनजाने में किये हुये पाप से मुक्ती का उपाय 🌻 🌷 श्रीमद्भागवत जी के षष्ठम स्कन्ध में , महाराज राजा परीक्षित जी ,श्री शुकदेव जी से बोले भगवन - आपने पञ्चम स्कन्ध में जो नरको का वर्णन किया ,उसको सुनकर तो गुरुवर रोंगटे खड़े जाते हैं। प्रभूवर मैं आपसे ये पूछ रहा हूँ की यदि कुछ पाप हमसे अनजाने में हो जाते हैं , जैसे चींटी मर गयी, हम लोग स्वास लेते हैं तो कितने जीव श्वासों के माध्यम से मर जाते हैं। भोजन बनाते समय लकड़ी जलाते हैं , उस लकड़ी में भी कितने जीव मर जाते हैं । और ऐसे कई पाप हैं जो अनजाने हो जाते हैं । तो उस पाप से मुक्ती का क्या उपाय है भगवन । आचार्य शुकदेव जी ने कहा -राजन ऐसे पाप से मुक्ती के लिए रोज प्रतिदिन पाँच प्रकार के यज्ञ करने चाहिए । महाराज परीक्षित जी ने कहा, भगवन एक यज्ञ यदि कभी करना पड़ता है तो सोंचना पड़ता है ।आप पाँच यज्ञ रोज कह रहे हैं । यहां पर आचार्य शुकदेव जी हम सभी मानव के कल्याणार्थ कितनी सुन्दर बात बता रहे हैं । बोले राजन पहली यज्ञ है -जब घर में रोटी बने तो पहली रोटी गऊ ग्रास के लिए निकाल देना चाहिए । दूसरी यज्ञ है राजन -चींटी को दस पाँच ग्राम आटा रोज वृक्षों की जड़ो के पास डालना चाहिए। तीसरी यज्ञ है राजन्-पक्षियों को अन्न रोज डालना चाहिए । चौथी यज्ञ है राजन् -आँटे की गोली बनाकर रोज जलाशय में मछलियो को डालना चाहिए । पांचवीं यज्ञ है राजन्- भोजन बनाकर अग्नि भोजन , रोटी बनाकर उसके टुकड़े करके उसमे घी चीनी मिलाकर अग्नि को भोग लगाओ। राजन् अतिथि सत्कार खूब करें, कोई भिखारी आवे तो उसे जूठा अन्न कभी भी भिक्षा में न दे । राजन् ऐसा करने से अनजाने में किये हुए पाप से मुक्ती मिल जाती है । हमे उसका दोष नहीं लगता । उन पापो का फल हमे नहीं भोगना पड़ता। राजा ने पुनः पूछ लिया ,भगवन यदि गृहस्त में रहकर ऐसी यज्ञ न हो पावे तो और कोई उपाय हो सकता है क्या। तब यहां पर श्री शुकदेव जी कहते हैं राजन् !, नरक से मुक्ती पाने के लिए हम प्रायश्चित करें। कोई ब्यक्ति तपस्या के द्वारा प्रायश्चित करता है। कोई ब्रह्मचर्य पालन करके प्रायश्चित करता है। कोई ब्यक्ति यम, नियम, आसन के द्वारा प्रायश्चित करता है। लेकिन मैं तो ऐसा मानता हूँ राजन्! केवल हरी नाम संकीर्तन से ही जाने और अनजाने में किये हुए पाप को नष्ट करने की सामर्थ्य है । इस लिए हे राजन् !----- सुनिए स्वास स्वास पर कृष्ण भजि बृथा स्वास जनि खोय। न जाने या स्वास की आवन होय न होय। । राजन् किसी को पता नही की जो स्वास अंदर जा रही है वो लौट कर वापस आएगी की नहीं । इस लिए सदैव हरी का जपते रहो । मैं यह निवेदन करता हूँ की, भगवान राम और कृष्ण के नाम को जपने के लिए कोई भी नियम की जरूरत नहीं होती है। कहीं भी कभी भी किसी भी समय सोते जागते उठते बैठते गोविन्द का नाम रटते रहो। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 🙏 Զเधे Զเधे जी , जय श्री कृष्णा🌻प्रेम से बोलो ...राधे राधे 🌷

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