Narendra Singh Rao
Narendra Singh Rao Jun 10, 2018

👉👇👌शायद हर धर्मों मे मजहब यह एक ही आवाज सुनाई देती दिल मे रब बस्ता हर व्यक्ति के दुआ करते हुए इस उर्दू गालिब कि दास्तान आप सुनिए 👍🌹🌷

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M.S.Chauhan Feb 26, 2021

*शुभ रात्रि वंदन* *जय श्रीकृष्ण गोविंद* *जय श्री राधे राधे* *आपका हर पल शुभ हो* *बहुत सुन्दर पोस्ट है* *एक बार जरूर पढ़ें जी* *भागवत रहस्य- गोपी* *गोपियों के दो मुख्य भेद बताये हैं* - *(१) नित्यसिध्धा गोपियाँ और (२) साधनसिध्धा गोपियाँ।* 👉 *(१) नित्यसिध्धा गोपियाँ* वह हैं, जो श्रीकृष्ण के साथ गोलोक से आईं हैं... ललिता, विशाखा,चंपकलता,चित्रा,रंगदेवी, सुदेवी, इंदुलेखा, तुंगविद्या इत्यादि... 👉 *(२) साधनसिध्धा गोपियाँ* के कई भेद हैं - 💞 *(१) श्रुतिरूपा गोपियाँ -* वेद के मन्त्र गोपी बनकर आये हैं। वेदों ने ईश्वर का वर्णन तो बहुत किया है फिर भी उन्हें अनुभव नहीं हो पाया। ईश्वर केवल वाणी का नहीं... स्मरण,चिंतन का विषय है... संसार का विस्मरण हुए बिना ईश्वर से साक्षात्कार नहीं हो पाता । तभी तो वेदभिमानी रुचायें गोकुल में गोपी बनकर आईं हैं। 💞 *(२)ऋषिरूपा गोपियाँ -* जीव का सबसे बड़ा शत्रु काम है। काम से लोभ या क्रोध उत्पन्न होता है। ऋषियों ने वर्षो तक तपश्चर्या की - फिर भी मन में से काम नहीं गया। इस काम को श्रीकृष्ण को अर्पण करने के पश्चात गोपियों का रूप लेकर आये हैं। दंडकारण्य के ऋषियों ने गोपी बनकर आये... भगवान श्रीराम जी ने दंडकारण्य के ऋषियों को ये वरदान दिया था कि- त्रेतायुग में मैं एक पत्नीव्रत धारी हुं...द्वापर युग में हम सब मिलेंगें... तब मैं सबको प्रेमदान दुंगा... 💞 *(३)संकीर्णरूपा गोपियाँ -* ईश्वर के मनोहर स्वरुप को निहारने और उन्हें पाने की इच्छा वाली स्त्रियाँ गोपियाँ बनकर आई हैं। ये भी बहुत बडे भक्त हैं...जनकपुर के नारीयां जो श्रीराम जी को देखते ही सुधबुध खो बैठे...मन ही मन पाने की इच्छा रखने वाली नारीयां गोपी बनकर आयीं...कुछ देवकन्याएं भी गोपी बन कर आयीं... जो श्रीकृष्ण भक्ति किये थे... 💞 *(४)अन्यपूर्वा गोपियाँ -* संसार के सुख भुगतने के बाद जब संसार सुख से विरक्त हो गये और प्रभु को पाने की इच्छा जाग्रत हुआ,और श्रीकृष्ण का भक्ति निष्काम भाव से करने वाले भक्तगण गोपियाँ बनकर आई हैं। 💞 *(५) अनन्यपूर्वा गोपियाँ -* जन्म से ही प्रभु से प्रेम,पूर्ण वैरागी भक्त गोपियाँ बनकर आये हैं। अनेक भोग भुगतने के पश्चात भी श्रीकृष्ण निष्काम हैं - उन्हें भोगो में तनिक भी आसक्ति नहीं है। वो तो आसक्ति मिटाने वाले हैं। श्रीकृष्ण का ध्यान करने वाला व्यक्ति स्वयं निष्काम हो जाता है। कामभाव से भी जो श्रीकृष्ण का चिंतन करता है... भक्ति करता है... परिणाम स्वरूप वह भी निष्कामी बनता है। *चीरहरण लीला के समय श्रीकृष्ण ने गोपियों से प्रतिज्ञा किया था कि योग्य समय आने पर वे रासलीला में मिलेंगे*। *जिसे भगवान अपनाते हैं, अंगीकार करते हैं उसे ही रासलीला में प्रवेश मिलता है*। *गोकुल की सभी गोपियाँ रासलीला में गई नहीं हैं। जो अधिकारी थे, उनको रासलीला में प्रवेश मिला... शरदपूर्णिमा ही वो रात्रि थी,जब गोपीयों को महारास रस मिला...प्रेमदान मिला... इसमें भगवान शंकर जी... माता पार्वती जी भी गोपी बनकर महारास रस प्राप्त किये..*. *राधे राधे*🙏🚩 🌷💐🌿🙏🌿💐🌷

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RAJ RATHOD Feb 26, 2021

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श्री विष्णु चालीसा* दोहा* विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय। कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय। चौपाई* नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥ प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥ सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥ तन पर पीतांबर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥ शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥ सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥ संतभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥ सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥ पाप काट भव सिंधु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥ करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥ धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥ भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥ आप वराह रूप बनाया। हरण्याक्ष को मार गिराया॥ धर मत्स्य तन सिंधु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥ अमिलख असुरन द्वंद मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥ देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छवि से बहलाया॥ कूर्म रूप धर सिंधु मझाया। मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥ शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥ वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया॥ मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥ असुर जलंधर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लडाई॥ हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥ सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥ तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥ देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥ हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥ तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥ गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥ हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥ देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥ चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥ जानूं नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥ शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥ करहुं आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥ करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण। कौन भांति मैं करहु समर्पण॥ सुर मुनि करत सदा सेवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥ दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥ पाप दोष संताप नशाओ। भव-बंधन से मुक्त कराओ॥ सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥ निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥ ॐ गं गणपतये नमः ॐ नमः शिवाय श्री हरी ॐ जय श्री हरी विष्णू जी जय श्री राम जय श्री कृष्ण जय श्री हरी ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏 शुभ 🌅 शुभ बुधवार राम राम 👏 🚩 🐚 🌹 नमस्कार जय श्री जिनेंद्र 🌹🙏 🚩

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Ajay Verma Feb 26, 2021

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