आशुतोष
आशुतोष Oct 27, 2020

जब महिला ने गुस्से में मिला दिया, फ़कीर की रोटी में जहर...

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आशुतोष Nov 25, 2020

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जगत की रीत 〰🌼🌼〰 एक बार एक गाँव में पंचायत लगी थी | वहीं थोड़ी दुरी पर एक संत ने अपना बसेरा किया हुआ था|जब पंचायत किसी निर्णय पर नहीं पहुच सकी तो किसी ने कहा कि क्यों न हम महात्मा जी के पास अपनी समस्या को लेकर चलें अतः सभी संत के पास पहुंचे | जब संत ने गांव के लोगों को देखा तो पुछा कि कैसे आना हुआ? तो लोगों ने कहा 'महात्मा जी गाँव भर में एक ही कुआँ हैं और कुँए का पानी हम नहीं पी सकते, बदबू आ रही है । मन भी नहीं होता पानी पीने को। संत ने पुछा--हुआ क्या?पानी क्यों नहीं पी सक रहे हो? लोग बोले--तीन कुत्ते लड़ते लड़ते उसमें गिर गये थे । बाहर नहीं निकले, मर गये उसी में । अब जिसमें कुत्ते मर गए हों, उसका पानी कौन पिये महात्मा जी ? संत ने कहा -- 'एक काम करो ,उसमें गंगाजल डलवाओ, तो कुएं में गंगाजल भी आठ दस बाल्टी छोड़ दिया गया । फिर भी समस्या जस की तस ! लोग फिर से संत के पास पहुंचे,अब संत ने कहा" भगवान की कथा कराओ"। लोगों ने कहा ••••ठीक है । कथा हुई , फिर भी समस्या जस की तस लोग फिर संत के पास पहुंचे ! अब संत ने कहा उसमें सुगंधित द्रव्य डलवाओ। लोगों ने फिर कहा ••••• हाँ, अवश्य । सुगंधित द्रव्य डाला गया| नतीजा फिर वही...ढाक के तीन पात लोग फिर संत के पास अब संत खुद चलकर आये । लोगों ने कहा-- महाराज ! वही हालत है, हमने सब करके देख लिया । गंगाजल भी डलवाया, कथा भी करवायी, प्रसाद भी बाँटा और उसमें सुगन्धित पुष्प और बहुत चीजें डालीं; लेकिन महाराज ! हालत वहीं की वहीं ।अब संत आश्चर्यचकित हुए कि अभी भी इनका मन कैसे नहीं बदला। तो संत ने पुछा-- कि तुमने और सब तो किया, वे तीन कुत्ते मरे पड़े थे, उन्हें निकाला कि नहीं? लोग बोले -- उनके लिए न आपने कहा था न हमने निकाला, बाकी सब किया । वे तो वहीं के वहीं पड़े हैं । संत बोले -- जब तक उन्हें नहीं निकालोगे, इन उपायों का कोई प्रभाव नहीं होगा। 👉सही बात यह है कि हमारे आपके जीवन की यह कहानी है । इस शरीर नामक गाँव के अंतःकरण के कुएँ में ये काम, क्रोध और लोभ के तीन कुत्ते लड़ते झगड़ते गिर गये हैं । इन्हीं की सारी बदबू है । हम उपाय पूछते हैं तो लोग बताते हैं-- तिर्थयात्रा कर लो, थोड़ा यह कर लो, थोड़ा पूजा करो, थोड़ा पाठ। सब करते हैं, पर बदबू उन्हीं दुर्गुणों की आती रहती है । तो पहले इन्हें निकाल कर बाहर करें तभी जीवन उपयोगी होगा । 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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Ravi Kumar Taneja Nov 24, 2020

Dedicated To All Women's of My-Mandir💐💐💐🌷🌷🌷💐💐💐*लोग बुराई करे*... *और आप दुखी हो जाओ* *लोग तारीफ करे*.... *और आप सुखी हो जाओ*🌴🌴🌴✡️🌴🌴🌴🕉️🌴🌴🌴🕉️🌴🌴🌴🕉️🌴🌴 *मतलब* *आपके सुख दुख* *का स्विच लोगो के हाथ मेँ है* ??🍁🍁🍁✡️🍁🍁🍁✡️🍁🍁🍁✡️🍁🍁🍁✡️ *कोशिश करें ये* *स्विच आपके हाथ में हो. तभी आप जीवन का आनंद ले सकते है.*🌹🕉️🌹🕉️🌹🕉️🌹🕉️🌹🕉️🌹🕉️🌹🕉️🌹🕉️🌹🕉️🌹🕉️ *सर्वे भवन्तु सुखिनः - सर्वे सन्तु निरामयाः ।🙏🕉🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️🙏🕉️ 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻 *दुनिया मजाक करे या तिरस्कार, उसकी परवाह किये बिना कर्तव्य पालन में जो लगा रहता हे,.. वही सफल होता है, Aur सब कुछ प्राप्त करता है...🌟🌲🌟🌲🌟🌲🌟🌲🌟🌲🌟🌲🌟🌲🌟🌲 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻 *अपेक्षाएँ जहाँ खत्म होती है,'सुकून" वहीं से शुरू होता है।।*👍🌹👍🌹👍🌹👍🌹👍 राधे राधे...🌹🌹🌹 जय श्री कृष्णा...🙏🙏🙏 शुभ प्रभात...🌷🌷🌷

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ramkumarverma Nov 24, 2020

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Harcharan Pahwa Nov 24, 2020

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भजन और भोजन 〰️〰️🌼〰️〰️ एक भिखारी, एक सेठ के घर के बाहर खड़ा होकर भजन गा रहा था और बदले में खाने को रोटी मांग रहाथा;। सेठानी काफ़ी देर से उसको कह रही थी, आ रहीहूं;। रोटी हाथ मे थी पर फ़िर भी कह रही थी की रुको आ रही हूं;। भिखारी भजन गा रहा था और रोटी मांग रहा था;। सेठ ये सब देख रहा था, पर समझ नही पा रहा था। आखिर सेठानी से बोला - रोटी हाथ में लेकर खडी हो; वो बाहर मांग रहा हैं, उसे कह रही हो आ रही हूं । तो उसे रोटी क्यो नही दे रही हो ? सेठानी बोली, हां रोटी दूंगी, पर क्या हैना की, मुझे उसका भजन बहुत प्यारा लगरहा हैं । अगर उसको रोटी दूंगी तो वो आगे चला जायेगा । मुझे उसका भजन और सुनना है। यदि प्रार्थना के बाद भी भगवान आपकी नही सुन रहा हैं, तो समझना की उस सेठानी की तरह प्रभु को आपकी प्रार्थना प्यारी लग रही हैं। इसलिये इंतज़ार करो, और प्रार्थना करते रहो। जीवन मे कैसाभी दुख और कष्ट आये, पर भक्ति मत छोड़िए। क्या कष्ट आताहै, तो आप भोजन करना छोड देते है ? क्या बीमारी आती है, तो आप सांस लेना छोड देतेहैं;? नही ना ? फिर जरासी तकलीफ़ आने पर आप भक्ति करना क्यों छोड़ देते हो ? कभी भी दो चीज मत छोड़िये, भजन और भोजन। भोजन छोड़दोंगे तो ज़िंदा नहींरहोगे, भजन छोड़ दोंगे तो कहीं के नही रहोगे। सही मायने में भजन ही भोजन है। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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प्रेरक कहानी " अच्छे अच्छे महलों मे भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते है ... सेठ घनश्याम के दो पुत्रों में जायदाद और ज़मीन का बँटवारा चल रहा था और एक चार पट्टी के कमरे को लेकर विवाद गहराता जा रहा था , एकदिन दोनो भाई मरने मारने पर उतारू हो चले , तो पिता जी बहुत जोर से हँसे। पिताजी को हँसता देखकर दोनो भाई लड़ाई को भूल गये, और पिताजी से हँसी का कारण पुछा। तो पिताजी ने कहा-- इस छोटे से ज़मीन के टुकडे के लिये इतना लड़ रहे हो छोड़ो इसे आओ मेरे साथ एक अनमोल खजाना बताता हूँ मैं तुम्हे ! पिता घनश्याम जी और दोनो पुत्र पवन और मदन उनके साथ रवाना हुये पिताजी ने कहा देखो यदि तुम आपस मे लड़े तो फिर मैं तुम्हे उस खजाने तक नही लेकर जाऊँगा और बीच रास्ते से ही लौटकर आ जाऊँगा ! अब दोनो पुत्रों ने खजाने के चक्कर मे एक समझौता किया की चाहे कुछ भी हो जाये पर हम लड़ेंगे नही प्रेम से यात्रा पे चलेंगे ! गाँव जाने के लिये एक बस मिली पर सीट दो की मिली, और वो तीन थे, अब पिताजी के साथ थोड़ी देर पवन बैठे तो थोड़ी देर मदन ऐसे चलते-चलते लगभग दस घण्टे का सफर तय किया फिर गाँव आया। घनश्याम दोनो पुत्रों को लेकर एक बहुत बड़ी हवेली पर गये हवेली चारों तरफ से सुनसान थी। घनश्याम ने जब देखा की हवेली मे जगह जगह कबूतरों ने अपना घोसला बना रखा है, तो घनश्याम वहीं पर बैठकर रोने लगे। दोनो पुत्रों ने पुछा क्या हुआ पिताजी आप रो क्यों रहे है ? तो रोते हुये उस वृद्ध पिता ने कहा जरा ध्यान से देखो इस घर को, जरा याद करो वो बचपन जो तुमने यहाँ बिताया था , तुम्हे याद है पुत्र इस हवेली के लिये मैं ने अपने भाई से बहुत लड़ाई की थी, सो ये हवेली तो मुझे मिल गई पर मैंने उस भाई को हमेशा के लिये खो दिया , क्योंकि वो दूर देश में जाकर बस गया और फिर वक्त्त बदला और एक दिन हमें भी ये हवेली छोड़कर जाना पड़ा ! अच्छा तुम ये बताओ बेटा की जिस सीट पर हम बैठकर आये थे, क्या वो बस की सीट हमें मिल जायेगी ? और यदि मिल भी जाये तो क्या वो सीट हमेशा-हमेशा के लिये हमारी हो सकती है ? मतलब की उस सीट पर हमारे सिवा कोई न बैठे। तो दोनो पुत्रों ने एक साथ कहा की ऐसे कैसे हो सकता है , बस की यात्रा तो चलती रहती है और उस सीट पर सवारियाँ बदलती रहती है। पहले कोई और बैठा था , आज कोई और बैठा होगा और पता नही कल कोई और बैठेगा। और वैसे भी उस सीट में क्या धरा है जो थोड़ी सी देर के लिये हमारी है ! पिताजी फिर हँसे फिर रोये और फिर वो बोले देखो यही तो मैं तुम्हे समझा रहा हूँ ,कि जो थोड़ी देर के लिये तुम्हारा है , तुमसे पहले उसका मालिक कोई और था बस थोड़ी सी देर के लिये तुम हो और थोड़ी देर बाद कोई और हो जायेगा। बस बेटा एक बात ध्यान रखना की इस थोड़ी सी देर के लिये कही अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना, यदि कोई प्रलोभन आये तो इस घर की इस स्थिति को देख लेना की अच्छे अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोसला बना लेते है। बस बेटा मुझे यही कहना था --कि बस की उस सीट को याद कर लेना जिसकी रोज उसकी सवारियां बदलती रहती है उस सीट के खातिर अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना जिस तरह से बस की यात्रा में तालमेल बिठाया था बस वैसे ही जीवन की यात्रा मे भी तालमेल बिठा लेना ! दोनो पुत्र पिताजी का अभिप्राय समझ गये, और पिता के चरणों में गिरकर रोने लगे ! शिक्षा :- मित्रों, जो कुछ भी ऐश्वर्य - सम्पदा हमारे पास है वो सबकुछ बस थोड़ी देर के लिये ही है , थोड़ी-थोड़ी देर मे यात्री भी बदल जाते है और मालिक भी। रिश्तें बड़े अनमोल होते है छोटे से ऐश्वर्य या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना ...राधे कृष्णा,,,

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*दान का पाप* यद् दत्त्वा तप्यते पश्चादपात्रेभ्यस्तथा च यत्। अश्रद्धया च यद्दानं दाननाशास्त्रयः स्वमी॥ अर्थात- देने के बाद पश्चात्ताप होना, अपात्र को देना, और श्रद्धारहित देना; ये तीनों से दान नष्ट हो जाता है। अपात्र को दिया दान हमें किस प्रकार कष्ट दे सकता है, इससे जुड़ी एक कथा है। एक बार एक गरीब आदमी एक सेठ के पास भोजन के लिए सहायता मांगने गया। सेठ बहुत धर्मात्मा था। उसने व्यक्ति को कुछ धन देकर विदा किया। वह व्यक्ति खुशी- खुशी एक भोजनालय में गया और भर पेट भोजन किया। उसके बाद भी कुछ पैसे बच गए, जिससे उसने शराब खरीद कर पी ली। शराब पीकर वह घर पहुंचा और पत्नी के साथ मारपीट की। इससे दुखी होकर उस व्यक्ति की पत्नी ने अपने दो बच्चों के साथ तालाब में कूद कर आत्महत्या कर ली। कुछ समय बाद उस सेठ की भी असाध्य रोग से मृत्यु हो गई। मरने के बाद सेठ यमराज के पास पहुंचा। यमराज ने सेठ को नर्क में फेंकने का आदेश दिया। सेठ यह सुनकर घबरा गया और यमराज से बोला- आपसे गलती हुई है, मैंने तो कभी कोई पाप भी नहीं किया है, बल्कि जब भी कोई मेरे पास आया है उसकी हमेशा मदद ही की है। यमराज बोले, “हमारे यहाँ तो गलती की कोई संभावना नहीं है, गलतियाँ तो तुम लोग ही करते हो।” पर सेठ के अनुनय- विनय करने पर यमराज उसे भगवान के समक्ष ले गए और सेठ की बात बताई। सेठ बोला, “हे प्रभु! मैंने तो कोई पाप नहीं किया, फिर मुझे नर्क क्यों दिया जा रहा है।” तब भगवान ने उसे गरीब व्यक्ति को दिए धन और उसके दुरुपयोग से उसकी पत्नी और दो बच्चों की जीव हत्या की बात बताई और कहा; उन जीव हत्याओं का कारण तुम हो। सेठ बोला- प्रभु! मैंने तो एक गरीब को दान दिया और शास्त्रों में भी दान देने की बात लिखी है। तब भगवान ने कहा- तुमने दान देने से पहले पात्र की योग्यता नहीं परखी। साथ ही तुमने इस ओर भी ध्यान नहीं दिया कि उसे किस प्रकार के सहायता की आवश्यकता है। तुमने धन देकर उसकी मदद क्यों की, तुम उसको भोजन भी करा सकते थे। और रही बात उसकी दरिद्रता की तो उसे देना होता, तो मैं ही दे देता, वो जिस योग्य था उतना मैंने उसे दिया था। अब तुम्हें तीन जीव हत्याओं के पाप का फल भुगतना पड़ेगा।

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