Sohan Soni
Sohan Soni Oct 13, 2017

Jai Shree Krishna

Jai Shree Krishna

*"श्रीमद्भगवद्गीता" [अध्याय 02 श्लोक 21 ]*
गीता का सार ⬇
वेदा विनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् |
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् || २१ ||

वेद – जानता है; अविनाशिनम् – अविनाशी को;
नित्यम् – शाश्र्वत; यः – जो; एनम् – इस (आत्मा);
अजम् – अजन्मा; अव्ययम् – निर्विकार; कथम् – कैसे;
सः – वह; पुरुषः – पुरुष; पार्थ – हे पार्थ (अर्जुन);
कम् – किसको; घातयति – मरवाता है; हन्ति – मारता है; कम् – किसको |

*भावार्थ* :--
हे पार्थ! जो व्यक्ति यह जानता है कि आत्मा अविनाशी, अजन्मा, शाश्र्वत तथा अव्यय है, वह भला किसी को कैसे मार सकता है या मरवा सकता है ?

*तात्पर्य* :--
प्रत्येक वस्तु की समुचित उपयोगिता होती है और जो ज्ञानी होता है वह जानता है कि किसी वस्तु का कहाँ और कैसे प्रयोग किया जाय | इसी प्रकार हिंसा की भी अपनी उपयोगिता है और इसका उपयोग इसे जानने वाले पर निर्भर करता है | यद्यपि हत्या करने वाले व्यक्ति को न्यायसंहिता के अनुसार प्राणदण्ड दिया जाता है, किन्तु न्यायाधीश को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि वह न्यायसंहिता के अनुसार ही दूसरे व्यक्ति पर हिंसा किये जाने का आदेश देता है | मनुष्यों के विधि-ग्रंथ मनुसंहिता में इसका समर्थन किया गया है कि हत्यारे को प्राणदण्ड देना चाहिए जिससे उसे अगले जीवन में अपना पापकर्म भोगना ना पड़े | अतः राजा द्वारा हत्यारे को फाँसी का दण्ड एक प्रकार से लाभप्रद है | इसी प्रकार जब कृष्ण युद्ध करने का आदेश देते हैं तो यह समझना चाहिए कि यह हिंसा परम न्याय के लिए है और इस तरह अर्जुन को इस आदेश का पालन यह समझकर करना चाहिए कि कृष्ण के लिए किया गया युद्ध हिंसा नहीं है क्योंकि मनुष्य या दूसरे शव्दों में आत्मा को मारा नहीं जा सकता | अतः न्याय के हेतु तथाकथित हिंसा की अनुमति है | शल्यक्रिया का प्रयोजन रोगी को मारना नहीं अपितु उसको स्वस्थ बनाना है | अतः कृष्ण के आदेश पर अर्जुन द्वारा किया जाने वाला युद्ध पूरे ज्ञान के साथ हो रहा है, उससे पापफल की सम्भावना नहीं है |

*जय श्री कृष्ण ....!

*"श्रीमद्भगवद्गीता" [अध्याय 02 श्लोक 22 ]*
गीता का सार ⬇
वांसासि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोSपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा - न्यन्यानि संयाति नवानि देहि || २२ ||

वासांसि – वस्त्रों को; जीर्णानि – पुराने तथा फटे; यथा – जिस प्रकार; विहाय – त्याग कर;
नवानि – नए वस्त्र; गृह्णाति – ग्रहण करता है; नरः – मनुष्य; अपराणि – अन्य; तथा – उसी प्रकार;
शरीराणि – शरीरों को; विहाय – त्याग कर;
जीर्णानि – वृद्ध तथा व्यर्थ; अन्यानि – भिन्न;
संयाति – स्वीकार करता है; नवानि – नये; देही – देहधारी आत्मा |

*भावार्थ* :--
जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरों को त्याग कर नवीन भौतिक शरीर धारण करता है |

*तात्पर्य* :--
अणु-आत्मा द्वारा शरीर का परिवर्तन एक स्वीकृत तथ्य है | आधुनिक विज्ञानीजन तक, जो आत्मा के अस्तित्व पर विश्र्वास नहीं करते, पर साथ ही हृदय से शक्ति-साधन की व्याख्या भी नहीं कर पाते, उन परिवर्तनों को स्वीकार करने को बाध्य हैं, जो बाल्यकाल से कौमारावस्था औए फिर तरुणावस्था तथा वृद्धावस्था में होते रहते हैं | वृद्धावस्था से यही परिवर्तन दूसरे शरीर में स्थानान्तरित हो जाता है | इसकी व्याख्या एक पिछले श्लोक में (२.१३) की जा चुकी है |
अणु-आत्मा का दूसरे शरीर में स्थानान्तरण परमात्मा की कृपा से सम्भव हो पाता है | परमात्मा अणु-आत्मा की इच्छाओं की पूर्ति उसी तरह करते हैं जिस प्रकार एक मित्र दूसरे की इच्छापूर्ति करता है | मुण्डक तथा श्र्वेताश्र्वतर उपनिषदों में आत्मा तथा परमात्मा की उपमा दो मित्र पक्षियों से दी गयी है और जो एक ही वृक्ष पर बैठे हैं | इनमें से एक पक्षी (अणु-आत्मा) वृक्ष के फल खा रहा है और दूसरा पक्षी (कृष्ण) अपने मित्र को देख रहा है | यद्यपि दोनों पक्षी समान गुण वाले हैं, किन्तु इनमें से एक भौतिक वृक्ष के फलों पर मोहित है, किन्तु दूसरा अपने मित्र के कार्यकलापों का साक्षी मात्र है | कृष्ण साक्षी पक्षी हैं, और अर्जुन फल-भोक्ता पक्षी | यद्यपि दोनों मित्र (सखा) हैं, किन्तु फिर भी एक स्वामी है और दूसरा सेवक है | अणु-आत्मा द्वारा इस सम्बन्ध की विस्मृति ही उसके एक वृक्ष से दूसरे पर जाने या एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने का कारण है | जीव आत्मा प्राकृत शरीर रूपी वृक्ष पर अत्याधिक संघर्षशील है, किन्तु ज्योंही वह दूसरे पक्षी को परम गुरु के रूप में स्वीकार करता है – जिस प्रकार अर्जुन कृष्ण का उपदेश ग्रहण करने के लिए स्वेच्छा से उनकी शरण में जाता है – त्योंही परतन्त्र पक्षी तुरन्त सारे शोकों से विमुक्त हो जाता है | मुण्डक-उपनिषद् (३.१.२) तथा श्र्वेताश्र्वतर-उपनिषद् (४.७) समान रूप से इसकी पुष्टि करते हैं –
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोSनीशया शोचति मुह्यमानः |
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ||
“यद्यपि दोनों पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं, किन्तु फल खाने वाला पक्षी वृक्ष के फल के भोक्ता रूप में चिंता तथा विषाद में निमग्न है | यदि किसी तरह वह अपने मित्र भगवान् की ओर अन्मुख होता है और उनकी महिमा को जान लेता है तो वह कष्ट भोगने वाला पक्षी तुरन्त समस्त चिंताओं से मुक्त हो जाता है |” अब अर्जुन ने अपना मुख अपने शाश्र्वत मित्र कृष्ण की ओर फेरा है और उनसे भगवद्गीता समझ रहा है | इस प्रकार वह कृष्ण से श्रवण करके भगवान् की परम महिमा को समझ कर शोक से मुक्त हो जाता है |
यहाँ भगवान् ने अर्जुन को उपदेश दिया है कि वह अपने पितामह तथा गुरु से देहान्तरण पर शोक प्रकट न करे अपितु उसे इस धर्मयुद्ध में उनके शरीरों का वध करने में प्रसन्न होना चाहिए, जिससे वे सब विभिन्न शारीरिक कर्म-फलों से तुरन्त मुक्त हो जायें | बलिवेदी पर या धर्मयुद्ध में प्राणों को अर्पित करने वाला व्यक्ति तुरन्त शारीरिक पापों से मुक्त हो जाता है और उच्च लोक को प्राप्त होता है | अतः अर्जुन का शोक करना युक्तिसंगत नहीं है |

*जय श्री कृष्ण ....!*

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कामेंट्स

vinod Oct 13, 2017
Vinod Shah jai Shri Krishna

Amit Kumar Dec 11, 2019

आज की कहानी अवश्य पढ़े, कि किस प्रकार एक वैश्या ने अनेकों नवयुवकों का जीवन बनाया, और सभी नवयुवकों को संदेश दिया. लेकिन हा प्यारे,,,यह उन सभी तक अवश्य पहुंचना जो इन रास्ते से गुजर रहे। राबिया बसरी एक महशूर फ़क़ीर हुई है! जवानी में वह बहुत खूबसूरत थी। एक बार चोर उसे उठाकर ले गए और एक वेश्या के कोठे पर ले जाकर उसे बेच दिया। अब उसे वही कार्य करना था जो वहाँ की बाक़ी औरते करती थी। इस नए घर में पहली रात को उसके पास एक आदमी लाया गया।उसने फौरन बातचीत शुरू कर दी। आप जैसे भले आदमी को देखकर मेरा दिल बहुत खुश है " वह बोली।" आप सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ जायें , मैं थोड़ी देर परमात्मा की याद में बैठ लूँ। अगर आप चाहें तो आप भी परमात्मा की याद में बैठ जाएँ। यह सुनकर उस नवजवान की हैरानी की कोई हद न रही। वह भी राबिया के साथ ज़मीन पर बैठ गया। फिर राबिया उठी और बोली मुझे विश्वास है कि अगर मैं आपको याद दिला दूँ कि एक दिन हम सबको मरना है तो आप बुरा नहीं मानोगें। आप यह भी भली भाँति समझ लें की जो गुनाह करने की आपके मन में चाह है , वह आपको नर्क की आग में धकेल देगा। आप खुद ही फैसला कर लें कि आप यह गुनाह करके नर्क की आग आग में कूदना चाहते हैं, या इससे बचना चाहते हैं? यह सुनकर नवजवान हक्का बक्का रह गया।उसने संभलकर कहा, ऐ नेक और पाक औरत! तुमने मेरी आँखे खोल दी, जो अभी तक गुनाह के भयंकर नतीजे की और बंद थी मै वादा करता हूँ कि फिर कभी कोठे की तरफ कदम नही बढ़ाऊंगा। हर रोज नए आदमी राबिया के पास भेजे जाते।पहले दिन आये नवजवान की तरह उन सबकी जिंदगी भी पलटती गयी। उस कोठे के मालिक को बहुत हैरानी हुई की इतनी खूबसूरत और नवजवान औरत है और एक बार आया ग्राहक दोबारा उसके पास जाने के लिए नही आता। जबकि लोग ऐसी सुन्दर लड़की इए दीवाने होकर उसके इर्दगिर्द ऐसे घूमते है जैसे परवाने शमा के इर्दगिर्द। यह राज जानने के लिए उसने एक रात अपनी बीवी को ऐसी जगह छुपाकर बिठा दिया, जहां से वह राबिया के कमरे के अंदर सब कुछ देख सकती थी। वह यह जानना चाहता था की जब कोई आदमी राबिया के पास भेजा जाता है तो वह उसके साथ कैसे पेश आती है? उस रात उसने देखा कि जैसे हीं ग्राहक ने अंदर कदम रखा, राबिया उठकर खड़ी हो गई और बोली,आओ भले आदमी, आपका स्वागत है। पाप के इस घर में मुझे हमेशा याद रहता है की परमात्मा हर जगह मौजूद है। वह सब कुछ देखता है और जो चाहे कर सकता है।आपका इस बारे में क्या ख्याल है ? यह सुनकर वह आदमी हक्का बक्का रह गया और उसे कुछ समझ न आया कि क्या करे ? आखिर वह कुछ हिचकिचाते हुए बोला, हाँ पंडित और मौलवी कुछ ऐसा ही कहते हैं। राबिया कहती गई, 'यहाँ गुनाहों से घिरे इस घर में, मैं कभी नही भूलती कि ख़ुदा सब गुनाह देखता है और पूरा न्याय भी करता है। वह हर इंसान को उसके गुनाहो की सजा देता है। जो लोग यहाँ आकर गुनाह करते है, उसकी सजा पाते हैं। उन्हें अनगिनत दुःख और मुसीबत झेलनी पड़ती है। मेरे भाई, हमें मनुष्य जन्म मिला है, भजन, बंदगी करने के लिए दुनिया के दुखों से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिये, ख़ुदा से मुलाकात करने के लिए, न की जानवरों से भी बदतर बनकर उसे बर्बाद करने के लिए। पहले आये लोगों की तरह इस आदमी को भी राबिया की बातों में छुपी सच्चाई का अहसास हो गया। उसे जिंदगी में पहली बार महसूस हुआ की वह कितने घोर पाप करता रहा है और आज फिर करने जा रहा था।वह फूटफूट कर रोने लगा और राबिया के पाव पर गिरकर माफ़ी मांगने लगा। राबिया के शब्द इतने सहज, निष्कपट और दिल को छूलेने वाले थे कि उस कोठे के मालिक की पत्नी भी बाहर आकर अपने पापो का पश्चाताप करने लगी। फिर उसने कहा ऐ नेक पाक लड़की, तुम तो वास्तव में फ़क़ीर हो।हमने कितना बड़ा गुनाह तुम पर लादना चाहा। इसी वक्त इस पाप की दलदल से बहार निकल जाओ।इस घटना ने उसकी अपनी जिंदगी को भी एक नया मोड़ दे दिया और उसने पाप की कमाई हमेशा के लिए छोड़ दी। कुल मलिक के सच्चे भक्त जहां कहीं भी हों, जिस हालात में हो, वे हमेशा मनुष्य जन्म के असली उद्देश्य की ओर इशारा करते हैं और भूले भटके जीवों को नेकी की राह पर चलने की प्रेरणा देते हैं। परमात्मा सब का भला करे। Hi

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👉अध्यात्म के मार्ग के चार पद, जानकर हैरान रह जाएंगे जब कोई व्यक्ति अध्यात्म या ध्यान के मार्ग पर चलने लगता है और वह निरंतर उसी मार्ग पर चलता रहता है तो उसे उस मार्ग में जो उपलब्धियां मिलती है उसे विद्वानों ने सांसारिक भाषा में पद और आध्यात्म की भाषा में मोक्ष, मुक्ति या समाधि की स्थितियां या ज्ञान कहा है। आखिर यह पद कितने और क्या होते हैं आओ इसे जानते हैं।   # ब्रह्मवैवर्त पुराण अनुसार चार तरह के पद होते हैं- 1.ब्रह्मपद, 2.रुद्रपद, 3.विष्णुपद और 4.परमपद (सिद्धपद)   1.ब्रह्मपद : यह सबसे बड़ा पद होता है। इस यह अनिर्वचनीय और अव्यक्त कहा गया है। इस अवस्था में व्यक्ति ब्रह्मलीन हो जाता है।   2.रुद्रपद : विष्णुपद से बड़कर रुद्रपद को माना जाता है, जबकि व्यक्ति अखंड समाधी में लीन हो जाता है।   3.विष्णुपद : सिद्धपद से बड़कर है विष्णुपद, जबकि सिद्धियों से बड़कर व्यक्ति मोक्ष की दशा में स्थित होकर स्थिरप्रज्ञ हो जाता है।   4.परमपद : जब कोई साधना प्रारंभ करता है तो सबसे पहले वह सिद्ध बनता है। इस सिद्धपद को ही परमपद कहते हैं।   # भक्ति सागर में समाधि के 3 प्रकार बताए गए है- 1.भक्ति समाधि, 2.योग समाधि, 3.ज्ञान समाधि।   1.भक्ति समाधि : भक्त के द्वारा व्यक्ति परमपद प्राप्त कर लेता है। 2.योग समाधि : अष्टांग योग का पालन करके भी व्यक्ति परमपद प्राप्त कर सकता है। 3.ज्ञान समाधि : ज्ञान अर्थात निर्विचार या साक्षी भाव में रहकर भी व्यक्ति परमपद प्राप्त कर सकता है।     # शैव मार्ग में समाधि के 6 प्रकार बताए गए हैं जिन्हें छह मुक्ति कहा गया है:- 1.साष्ट्रि, (ऐश्वर्य), 2.सालोक्य (लोक की प्राप्ति), 3.सारूप (ब्रह्मस्वरूप), 4.सामीप्य, (ब्रह्म के पास), 5.साम्य (ब्रह्म जैसी समानता), 6.लीनता या सायुज्य (ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्म हो जाना)।   #है महर्षि पतंजलि ने समाधि, मुक्ति या पद को मुख्यत: दो प्रकार में बांटा है:- 1.सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात।   1.सम्प्रज्ञात समाधि:- वैराग्य द्वारा योगी सांसारिक वस्तुओं (भौतिक वस्तु) के विषयों में दोष निकालकर उनसे अपने आप को अलग कर लेता है और चित्त या मन से उसकी इच्छा को त्याग देता है, जिससे मन एकाग्र होता है और समाधि को धारण करता है। यह सम्प्रज्ञात समाधि कहलाता है।    2.असम्प्रज्ञात समाधि:- इसमें व्यक्ति को कुछ भान या ज्ञान नहीं रहता। मन जिसका ध्यान कर रहा होता है उसी में उसका मन लीन रहता है। उसके अतिरिक्त किसी दूसरी ओर उसका मन नहीं जाता। दरअसल यह अमनी दशा है।   संप्रज्ञात समाधि को 4 भागों में बांटा गया है:- 1.वितर्कानुगत समाधि:- सूर्य, चन्द्र, ग्रह या राम, कृष्ण आदि मूर्तियों को, किसी स्थूल वस्तु या प्राकृतिक पंचभूतों की अर्चना करते-करते मन को उसी में लीन कर लेना वितर्क समाधि कहलाता है।   2.विचारानुगत समाधि:- स्थूल पदार्थों पर मन को एकाग्र करने के बाद छोटे पदार्थ, छोटे रूप, रस, गन्ध, शब्द आदि भावनात्मक विचारों के मध्य से जो समाधि होती है, वह विचारानुगत अथवा सविचार समाधि कहलाती है।     3.आनन्दानुगत समाधि:-आनन्दानुगत समाधि में विचार भी शून्य हो जाते हैं और केवल आनन्द का ही अनुभव रह जाता है।   4.अस्मितानुगत समाधि:- अस्मित अहंकार को कहते हैं। इस प्रकार की समाधि में आनन्द भी नष्ट हो जाता है। इसमें अपनेपन की ही भावनाएं रह जाती है और सब भाव मिट जाते है। इसे अस्मित समाधि कहते हैं। इसमें केवल अहंकार ही रहता है। पतांजलि इस समाधि को सबसे उच्च समाधि मानते हैं।

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Jyoti Pandey Dec 9, 2019

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