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🌹🌲🙏jai Shri Krishna 🙏🌲🌹

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🌲राजकुमार राठोड🌲 May 24, 2019
🌿शुभ रात्रि वंदन जी 🌿 🌹🌹जय माता दी 🌹🌹 🌿🙏जय श्री हरि 🙏🌿 🌿आपका हर पल शुभ एवं मंगलमय रहे🌿

Sunil upadhyaya Jun 19, 2019

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Swami Lokeshanand Jun 19, 2019

आज एक बड़ी गंभीर बात पर विचार करेंगे। हम सबने हनुमानजी को कपि रूप में ही जाना है। कल की कथा में अंजनि के स्वरूप पर आध्यात्मिक पक्ष रखा गया, यह पोस्ट हनुमानजी के कपि स्वरूप पर। देखें, रामकथा और कृष्णकथा की कथा शैली और कथानक भिन्न है, पर दोनों ही शास्त्र परमात्मा प्राप्ति की एक ही सनातन विधि का प्रतिपादन करते हैं। रामकथा में जो कौशल्या हैं, वहाँ कृष्णलीला में यशोदा हैं। कैकेयी देवकी बनी हैं, सुमित्रा रोहिणी हैं। यहाँ रामजी कौशल्यासुत हुए कैकेयी का दूध पीया, वहाँ श्रीकृष्ण देवकीनन्दन हैं, यशोदा का दूध पीया। यहाँ लक्षमणजी का जन्म कौशल्याजी और कैकेयीजी के फल के भाग से हुआ, तो वहाँ बलरामजी को देवकी के गर्भ से निकाल कर रोहिणी के गर्भ में स्थापित दिखाया गया। प्रमुख चर्चा यह है कि वहाँ जिस अवस्था विशेष को "गोपी" नाम से बताया गया, उसे ही यहाँ "कपि" नाम से कहा जा रहा है। ध्यान दें,"गो" माने इन्द्रियाँ,"पी" माने सुखा डालना, जिसने अपनी इन्द्रियों में बह रहे वासना रस को सुखा डाला वो गोपी। यहाँ कपि में, "क" माने मन (जैसे कपट, क+पट, "क" पर "पट" डाल देना, मन पर पर्दा डाल देना, यही तो कपट है) और "पि" माने वही, सुखा डालना। अर्थ दोनों का एक ही है, जिसने इन्द्रिय समूह सहित मन को सुखा डाला। लाख विषय आँखों के सामने से गुजरते हों, अंत:करण में वासना की रेखा तक नहीं खिंचती, ऐसा महापुरुष कपि है। सनातन धर्म में शास्त्र की रचना ऐतिहासिक घटनाओं के संकलन मात्र के उद्देश्य से नहीं की जाती, उन घटनाओं में आध्यात्मिक संदेश छिपा कर रखे जाते हैं। जिससे प्रारंभ में सामान्य जन को संस्कार पड़ जाए, और कालांतर में उसी कथा का वास्तविक रहस्य जानकर उनका साधन मार्ग प्रशस्त हो जाए। यही हमारा मूल उद्देश्य है। अब विडियो- कपि और गोपी- https://youtu.be/C_omPazCZD4

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KAVYANJALI Jun 19, 2019

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Punam Sharma Jun 19, 2019

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🕉️🕉️🕉️जय श्री सच्चिदानंद स्वरूपाय नमः🕉️🕉️ ********************************************* Soul is immortal. ***†**************************************** न मधवन्मत्यर: वा इंद्रे शरीरमातं मृत्युना तदस्यामृतस्या अशरीरस्यात्मनोअधिष्ठानं मात्तै वै सशरीरः प्रियाप्रियाम्याम न वैसशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरमहतिररसत्यशरीरं वाव संताः न प्रियाप्रिये स्पृशतः।। 🚩छान्दोग्य उपनिषद।। ********************************************* भावार्थ:---- देवराज इंद्र से प्रजापति ने कहा हे परमपूजित धनुषयुक्त पुरुष ! यह स्थूल शरीर मरणधर्मा है और जैसे सिंह के मुख में बकरी होवे वैसे ही यह शरीर मृत्यु के मुख के बीच में है। सो सरीर इस मरण और शरीर रहित जीवात्मा का निवास स्थान है। इसलिए यह जीव सुख और दुःख से सदा ग्रस्त रहता है क्योंकि शरीर सहित जीव की सांसारिक प्रसन्नता की निवृत्ति होती ही है और जो शरीर रहित मुक्त जीवात्मा ब्रम्ह में रहता है उसको सांसारिक सुख दुख का स्पर्श भी नही होता किन्तु सदा आनंद में रहता है। आत्मा में परमात्मा का वास होता है । इसलिए वह सदा सत्य की ही और जाता है।और आनंद भोगता है। 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ जय श्री परमात्मने नमः🕉️🕉️🕉️ 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ जय श्री राम🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 🙏🙏🙏🙏🙏

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Jai Shree Mahakal Jun 19, 2019

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