Neha Sharma, Haryana
Neha Sharma, Haryana Nov 24, 2020

🌸*श्री मद देवी भागवत महापुराण ( तीसवां अध्याय )*🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 🌸🙏*ओम् गं गणपतये नमः*🙏🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 🌸🙏*हरी ओम् पराशक्ति:देव्यै नम:*🙏🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 *इस अध्याय में देवताओं द्वारा देवी पार्वती की स्तुति, भगवान शंकर के तेज से षण्मुख कार्तिकेय का प्रादुर्भाव, देवताओं के हर्षोल्लास का वर्णन है । *श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! तदनन्तर देवतागण अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर जगत के प्राणियों में लज्जारूप से विराजमान जगदम्बा पार्वती का स्तवन करते हुए इस प्रकार कहने लगे – ।।1।। *ब्रह्मादि देवताओं ने कहा – माता ! शिवसुन्दरी ! आप तीनों लोकों की माता हैं और शिवजी पिता हैं तथा ये सभी देवतागण आपके बालक हैं. अपने को आपका शिशु मानने के कारण देवताओं को आपसे कोई भी भय नहीं है. देवि ! आपकी जय हो. गौरि ! आप तीनों लोकों में लज्जारूप से व्याप्त हैं, अत: पृथ्वी की रक्षा करें और हम लोगों पर प्रसन्न हों।।2।। *विश्वजननी ! आप सर्वात्मा हैं और आप तीनों गुणों से रहित ब्रह्म हैं. अहो, अपने गुणों के वशीभूत होकर आप ही स्त्री तथा पुरुष का स्वरूप धारण करके संसार में इस प्रकार की क्रीडा करती हैं और लोग आप जगज्जननी को कामदेव के विनाशक परमेश्वर शिव की रमणी कहते हैं।।3।। *तीनों लोकों को सम्मोहित करने वाली शिवे ! आप अपनी इच्छा के अनुसार अपने अंश से कभी पुरूषरूप में शिव बन जाती हैं और स्वयं स्त्रीरूप में विद्यमान रहकर उनके साथ विहार करती हैं. अम्बिके ! वे ही आप अपनी लीला से कभी पुरुष रूप में कृष्ण का रूप धारण कर लेती हैं और उनमें शिव की परिभावना कर स्वयं कृष्ण की पटरानी राधा बनकर उनके साथ रमण करती हैं।।4।। "जगत की रक्षा करने वाली देवेश्वरी ! माता ! प्रसन्न होइए और पृथ्वी की रक्षा के लिए अब इस लीला विलास से विरत हो जाइए।।5।। *श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! इस प्रकार देवताओं के स्तुति करने पर भगवती पार्वती उठ खड़ी हुई।।6।। *इसके बाद उनके अपने तेज से भयंकर, महान बल तथा पराक्रमशाली भैरव के रूप में एक परम पुरूष उत्पन्न हुआ. तब भगवती पार्वती ने उत्पन्न हुए उस पुरूष से कहा – पुत्र ! तुम मेरे पुर के दरवाजे पर विराजमान रहो और निरन्तर द्वार की रखवाली करो।।7-8।। *ऎसा कहकर तीनों लोकों की माता पार्वती जी ने रत्नों से निर्मित प्राकार (परकोटे) एवं प्रवेश द्वार वाले एक सुरम्य मन्दिर में प्रवेश किया।।9।। *मुनिश्रेष्ठ ! शम्भु ने भी जगत तथा देवताओं के कल्याण के लिए अपने उत्तम तेज को छोड़ने का मन बनाया।।10।। *तब पद्मयोनि ब्रह्माजी ने उन महेश्वर को अपना तेज छोड़ने की इच्छावाला जानकर देवताओं का कार्य सिद्ध करने के उद्देश्य से वायुदेव से कहा – ।।11।। *ब्रह्माजी बोले – पवनदेव ! तुम तारकासुर के वध के लिए शिव के पुत्र के जन्म के उद्देश्य से एक कार्य सम्पादित करके जगत का परम कल्याण करो. जब भगवान शिव पृथ्वीतल पर अपने रेत का त्याग करेंगे, तब तुम उसे वेगपूर्वक कमलिनी के गर्भ में पहुँचा देना।।12-13।। *श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! उनका (ब्रह्मा का) यह वचन सुनकर वेगशालियों में श्रेष्ठ पवनदेव तेज ध्वनि के साथ अत्यन्त वेगपूर्वक प्रवाहित होने लगे।।14।। *तदनन्तर भगवान शम्भु ने रजताद्रि के समान अपने रेत को अग्नि के सिर पर छोड़ दिया और वह अग्नि के लिये भी असह्य हो गया. तत्पश्चात उन अग्निदेव ने महान ओजस्वी उस तेजोराशि को देवाधिदेव शिव के शरकानन में सहसा छोड़ दिया. उसके आधे भाग को वायुदेव ने बलपूर्वक छ: भागों में विभक्त करके उसे अलग-अलग छ: कृत्तिकाओं में स्थापित कर दिया।।15-17।। *मुनिश्रेष्ठ ! उस तेज ने उन कृत्तिकाओं के शोणित-संसर्ग को प्राप्त किया और उसके बाद उनके गर्भाशय में प्रवेश किया. जो रेत अग्नि में छोड़ा गया था, वह स्वर्ण हो गया और जो शरकानन में पड़ा था, वह आज भी दिखायी देता है. मुनिश्रेष्ठ ! वायु के द्वारा ले जाकर कृत्तिकाओं में स्थापित किये गये रेत को जब वे धारण करने में समर्थ न हो सकीं तब मुनिश्रेष्ठ ! उन सबने उस रेत का त्याग कर दिया. तब उन भयंकर चित्तवाली कृत्तिकाओं ने उस शोणित (रजस) – मिश्रित रेत को एकत्र कर काष्ठकोश में रख करके गंगाजी में छोड़ दिया और उसे प्रजापति ने देखा।।18-22।। *तदनन्तर प्रफुल्लित हृदय तथा प्रसन्न मन वाले पितामह ब्रह्माजी उस काष्ठकोश को लेकर पुन: अपने स्थान को चले गये।।23।। "उस काष्ठकोश के मध्य भाग में बारह भुजाओं, बारह नेत्रों और छ: मुखों से युक्त एक परम पुरूष उत्पन्न हुआ. उस ऎश्वर्य संपन्न परम पुरुष का शरीर स्वर्ण के समान कान्तियुक्त था, मुख विकसित कमल के समान थीं।।24-25।। *मुनिश्रेष्ठ ! उस काष्ठकोश के मध्य से पार्वती पुत्र देवी के उस महान ओजस्वी पुत्र की उत्पत्ति जानकर ब्रह्माजी ने उसका भेदन किया और वहाँ उस पुत्र को देखा. इस प्रकार आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि को ब्रह्मलोक में तारकासुर के शत्रु महाबली शिवपुत्र का जन्म हुआ. उस शिवपुत्र के उत्पन्न होने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने परम प्रसन्न होकर महान उत्सव कराया।।26-28।। "उस समय तारक नामक असुर के मस्तक से उसका उज्जवल मुकुट और कुण्डल पृथ्वीतल पर गिर पड़ा एवं उसका शरीर काँप गया. महान बल तथा पराक्रम वाले पार्वती पुत्र के उत्पन्न होने पर सभी दिशाएँ प्रकाश से भर गयीं और देवता प्रसन्न मन वाले हो गये।।29-30।। *ब्रह्मलोक में पार्वती के पुत्र को उत्पन्न हुआ जानकर भगवान नारायण वहाँ आकर आदरपूर्वक उसे देखा. इसी तरह इन्द्र आदि अन्य प्रधान देवता तथा सभी ऋषिगण भी उमापुत्र का जन्म सुनकर वहाँ आ गये. महामुने ! तब प्रसन्नचित्त ब्रह्माजी ने समस्त देवताओं के साथ मिलकर इस पार्वती पुत्र के नाम रखे।।31-34।। *ब्रह्माजी बोले – शिवजी का यह कृत्तिकाओं के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण तीनों लोकों में “कार्तिकेय” इस नाम से विख्यात होगा. चूँकि वे कृत्तिकाएँ संख्या में छ: कही गई हैं, अत: संसार में इसका नाम “षाण्मातुर” भी होगा. उन कृत्तिकाओं में क्षरित रेत संघ से इसकी उत्पत्ति हुई है. इसलिए यह लोक में “स्कन्द” नाम से भी विख्यात होगा. युद्धक्षेत्र में यह तारकासुर का संहार करेगा, इसलिए लोक में इसका “तारकवैरी” यह नाम प्रसिद्ध होगा।।35-38।। *श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार उन लोकपितामह ब्रह्माजी ने बालक के ये नाम रखकर सभी देवतागणों को साथ लेकर महान उत्सव किया।।39।। मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर तारकासुर के द्वारा पीड़ित सभी देवता अपने-अपने कार्य सिद्ध करने के उद्देश्य से पद्मयोनि ब्रह्माजी से कहने लगे – ।।40।। *देवताओं ने कहा – प्रभो ! तीनों लोकों के नाथ ! ये शिवपुत्र कार्तिकेय जब तक स्वयं संग्राम में तारकासुर का वध नहीं कर देते तब तक आप इनके माता-पिता से इनका परिचय मत कराइये, क्योंकि यदि पुत्र स्नेह के वशीभूत होकर भगवती पार्वती अथवा भगवान सदाशिव अपने पुत्र को रमण वन में भेजना नहीं चाहेंगे तब हम लोग क्या करेंगे? अत: प्रभो ! संग्राम में तारक नामक दैत्य का शीघ्र संहार हो जाने के उपरान्त आप इस पुत्र के जन्म के विषय में उन दोनों से बता दीजिएगा।।41-44।। *श्रीमहादेवजी बोले – [मुने !] इस प्रकार भगवती पार्वती से उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र षडानन ब्रह्मपुर में रहने लगे और सभी देवता अपने-अपने स्थान को चले गये।।45।। *मुनिश्रेष्ठ ! तारकासुर का वध करने वाले महाबाहु भगवती पुत्र कार्तिकेय का जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ – यह सब मैंने आपसे कह दिया।।46।। *जो लोग गिरिजापुत्र के जन्म के प्रसंग से युक्त इस अध्याय को भक्तिपूर्वक पढ़ाते हैं, पढ़ते हैं तथा सुनते हैं, उन्हें पाप से कोई भय नहीं रह जाता है. जिसके पास पुत्र नहीं है, वह गिरिजा पुत्र की उत्पत्ति के प्रसँग वाले इस अध्याय को समाहित चित्त से सुनकर उसी गिरिजापुत्र कार्तिकेय के तुल्य सभी सद्गुणों से युक्त सदाचारी पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होता है।।47-48।। ।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत *श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “कार्तिकेयजन्मवर्णन” नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।30।। ।। जय माता दी ।। 🌸🌸🙏🌸🌸 ~~~~~~~~~

🌸*श्री मद देवी भागवत महापुराण ( तीसवां अध्याय )*🌸
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🌸🙏*ओम् गं गणपतये नमः*🙏🌸
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🌸🙏*हरी ओम् पराशक्ति:देव्यै नम:*🙏🌸
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*इस अध्याय में देवताओं द्वारा देवी पार्वती की स्तुति, भगवान शंकर के तेज से षण्मुख कार्तिकेय का प्रादुर्भाव, देवताओं के हर्षोल्लास का वर्णन है ।

*श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! तदनन्तर देवतागण अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर जगत के प्राणियों में लज्जारूप से विराजमान जगदम्बा पार्वती का स्तवन करते हुए इस प्रकार कहने लगे – ।।1।।

*ब्रह्मादि देवताओं ने कहा – माता ! शिवसुन्दरी ! आप तीनों लोकों की माता हैं और शिवजी पिता हैं तथा ये सभी देवतागण आपके बालक हैं. अपने को आपका शिशु मानने के कारण देवताओं को आपसे कोई भी भय नहीं है. देवि ! आपकी जय हो. गौरि ! आप तीनों लोकों में लज्जारूप से व्याप्त हैं, अत: पृथ्वी की रक्षा करें और हम लोगों पर प्रसन्न हों।।2।।

*विश्वजननी ! आप सर्वात्मा हैं और आप तीनों गुणों से रहित ब्रह्म हैं. अहो, अपने गुणों के वशीभूत होकर आप ही स्त्री तथा पुरुष का स्वरूप धारण करके संसार में इस प्रकार की क्रीडा करती हैं और लोग आप जगज्जननी को कामदेव के विनाशक परमेश्वर शिव की रमणी कहते हैं।।3।।

*तीनों लोकों को सम्मोहित करने वाली शिवे ! आप अपनी इच्छा के अनुसार अपने अंश से कभी पुरूषरूप में शिव बन जाती हैं और स्वयं स्त्रीरूप में विद्यमान रहकर उनके साथ विहार करती हैं. अम्बिके ! वे ही आप अपनी लीला से कभी पुरुष रूप में कृष्ण का रूप धारण कर लेती हैं और उनमें शिव की परिभावना कर स्वयं कृष्ण की पटरानी राधा बनकर उनके साथ रमण करती हैं।।4।।

"जगत की रक्षा करने वाली देवेश्वरी ! माता ! प्रसन्न होइए और पृथ्वी की रक्षा के लिए अब इस लीला विलास से विरत हो जाइए।।5।।

*श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! इस प्रकार देवताओं के स्तुति करने पर भगवती पार्वती उठ खड़ी हुई।।6।।

*इसके बाद उनके अपने तेज से भयंकर, महान बल तथा पराक्रमशाली भैरव के रूप में एक परम पुरूष उत्पन्न हुआ. तब भगवती पार्वती ने उत्पन्न हुए उस पुरूष से कहा – पुत्र ! तुम मेरे पुर के दरवाजे पर विराजमान रहो और निरन्तर द्वार की रखवाली करो।।7-8।।

*ऎसा कहकर तीनों लोकों की माता पार्वती जी ने रत्नों से निर्मित प्राकार (परकोटे) एवं प्रवेश द्वार वाले एक सुरम्य मन्दिर में प्रवेश किया।।9।।

*मुनिश्रेष्ठ ! शम्भु ने भी जगत तथा देवताओं के कल्याण के लिए अपने उत्तम तेज को छोड़ने का मन बनाया।।10।।

*तब पद्मयोनि ब्रह्माजी ने उन महेश्वर को अपना तेज छोड़ने की इच्छावाला जानकर देवताओं का कार्य सिद्ध करने के उद्देश्य से वायुदेव से कहा – ।।11।।

*ब्रह्माजी बोले – पवनदेव ! तुम तारकासुर के वध के लिए शिव के पुत्र के जन्म के उद्देश्य से एक कार्य सम्पादित करके जगत का परम कल्याण करो. जब भगवान शिव पृथ्वीतल पर अपने रेत का त्याग करेंगे, तब तुम उसे वेगपूर्वक कमलिनी के गर्भ में पहुँचा देना।।12-13।।

*श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! उनका (ब्रह्मा का) यह वचन सुनकर वेगशालियों में श्रेष्ठ पवनदेव तेज ध्वनि के साथ अत्यन्त वेगपूर्वक प्रवाहित होने लगे।।14।।

*तदनन्तर भगवान शम्भु ने रजताद्रि के समान अपने रेत को अग्नि के सिर पर छोड़ दिया और वह अग्नि के लिये भी असह्य हो गया. तत्पश्चात उन अग्निदेव ने महान ओजस्वी उस तेजोराशि को देवाधिदेव शिव के शरकानन में सहसा छोड़ दिया. उसके आधे भाग को वायुदेव ने बलपूर्वक छ: भागों में विभक्त करके उसे अलग-अलग छ: कृत्तिकाओं में स्थापित कर दिया।।15-17।।

*मुनिश्रेष्ठ ! उस तेज ने उन कृत्तिकाओं के शोणित-संसर्ग को प्राप्त किया और उसके बाद उनके गर्भाशय में प्रवेश किया. जो रेत अग्नि में छोड़ा गया था, वह स्वर्ण हो गया और जो शरकानन में पड़ा था, वह आज भी दिखायी देता है. मुनिश्रेष्ठ ! वायु के द्वारा ले जाकर कृत्तिकाओं में स्थापित किये गये रेत को जब वे धारण करने में समर्थ न हो सकीं तब मुनिश्रेष्ठ ! उन सबने उस रेत का त्याग कर दिया. तब उन भयंकर चित्तवाली कृत्तिकाओं ने उस शोणित (रजस) – मिश्रित रेत को एकत्र कर काष्ठकोश में रख करके गंगाजी में छोड़ दिया और उसे प्रजापति ने देखा।।18-22।।

*तदनन्तर प्रफुल्लित हृदय तथा प्रसन्न मन वाले पितामह ब्रह्माजी उस काष्ठकोश को लेकर पुन: अपने स्थान को चले गये।।23।।

"उस काष्ठकोश के मध्य भाग में बारह भुजाओं, बारह नेत्रों और छ: मुखों से युक्त एक परम पुरूष उत्पन्न हुआ. उस ऎश्वर्य संपन्न परम पुरुष का शरीर स्वर्ण के समान कान्तियुक्त था, मुख विकसित कमल के समान थीं।।24-25।।

*मुनिश्रेष्ठ ! उस काष्ठकोश के मध्य से पार्वती पुत्र देवी के उस महान ओजस्वी पुत्र की उत्पत्ति जानकर ब्रह्माजी ने उसका भेदन किया और वहाँ उस पुत्र को देखा. इस प्रकार आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि को ब्रह्मलोक में तारकासुर के शत्रु महाबली शिवपुत्र का जन्म हुआ. उस शिवपुत्र के उत्पन्न होने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने परम प्रसन्न होकर महान उत्सव कराया।।26-28।।

"उस समय तारक नामक असुर के मस्तक से उसका उज्जवल मुकुट और कुण्डल पृथ्वीतल पर गिर पड़ा एवं उसका शरीर काँप गया. महान बल तथा पराक्रम वाले पार्वती पुत्र के उत्पन्न होने पर सभी दिशाएँ प्रकाश से भर गयीं और देवता प्रसन्न मन वाले हो गये।।29-30।।

*ब्रह्मलोक में पार्वती के पुत्र को उत्पन्न हुआ जानकर भगवान नारायण वहाँ आकर आदरपूर्वक उसे देखा. इसी तरह इन्द्र आदि अन्य प्रधान देवता तथा सभी ऋषिगण भी उमापुत्र का जन्म सुनकर वहाँ आ गये. महामुने ! तब प्रसन्नचित्त ब्रह्माजी ने समस्त देवताओं के साथ मिलकर इस पार्वती पुत्र के नाम रखे।।31-34।।

*ब्रह्माजी बोले – शिवजी का यह कृत्तिकाओं के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण तीनों लोकों में “कार्तिकेय” इस नाम से विख्यात होगा. चूँकि वे कृत्तिकाएँ संख्या में छ: कही गई हैं, अत: संसार में इसका नाम “षाण्मातुर” भी होगा. उन कृत्तिकाओं में क्षरित रेत संघ से इसकी उत्पत्ति हुई है. इसलिए यह लोक में “स्कन्द” नाम से भी विख्यात होगा. युद्धक्षेत्र में यह तारकासुर का संहार करेगा, इसलिए लोक में इसका “तारकवैरी” यह नाम प्रसिद्ध होगा।।35-38।।

*श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार उन लोकपितामह ब्रह्माजी ने बालक के ये नाम रखकर सभी देवतागणों को साथ लेकर महान उत्सव किया।।39।। मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर तारकासुर के द्वारा पीड़ित सभी देवता अपने-अपने कार्य सिद्ध करने के उद्देश्य से पद्मयोनि ब्रह्माजी से कहने लगे – ।।40।।

*देवताओं ने कहा – प्रभो ! तीनों लोकों के नाथ ! ये शिवपुत्र कार्तिकेय जब तक स्वयं संग्राम में तारकासुर का वध नहीं कर देते तब तक आप इनके माता-पिता से इनका परिचय मत कराइये, क्योंकि यदि पुत्र स्नेह के वशीभूत होकर भगवती पार्वती अथवा भगवान सदाशिव अपने पुत्र को रमण वन में भेजना नहीं चाहेंगे तब हम लोग क्या करेंगे? अत: प्रभो ! संग्राम में तारक नामक दैत्य का शीघ्र संहार हो जाने के उपरान्त आप इस पुत्र के जन्म के विषय में उन दोनों से बता दीजिएगा।।41-44।।

*श्रीमहादेवजी बोले – [मुने !] इस प्रकार भगवती पार्वती से उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र षडानन ब्रह्मपुर में रहने लगे और सभी देवता अपने-अपने स्थान को चले गये।।45।।

*मुनिश्रेष्ठ ! तारकासुर का वध करने वाले महाबाहु भगवती पुत्र कार्तिकेय का जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ – यह सब मैंने आपसे कह दिया।।46।।

*जो लोग गिरिजापुत्र के जन्म के प्रसंग से युक्त इस अध्याय को भक्तिपूर्वक पढ़ाते हैं, पढ़ते हैं तथा सुनते हैं, उन्हें पाप से कोई भय नहीं रह जाता है. जिसके पास पुत्र नहीं है, वह गिरिजा पुत्र की उत्पत्ति के प्रसँग वाले इस अध्याय को समाहित चित्त से सुनकर उसी गिरिजापुत्र कार्तिकेय के तुल्य सभी सद्गुणों से युक्त सदाचारी पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होता है।।47-48।।

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत *श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “कार्तिकेयजन्मवर्णन” नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।30।।

।। जय माता दी ।।
🌸🌸🙏🌸🌸
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कामेंट्स

Ravi Kumar Taneja Nov 24, 2020
*सर्वे भवन्तु सुखिनः - सर्वे सन्तु निरामयाः ।🙏🕉🙏 *अपेक्षाएँ जहाँ खत्म होती है,'सुकून" वहीं से शुरू होता है।।* *राधे राधे...🌹🌹🌹 जय श्री कृष्णा...🙏🌷🙏 शुभ Dopahar Vandana Ji...🌟🌟🌟

madan pal 🌷🙏🏼 Nov 24, 2020
jai mata di shubh sandhya Jiiii Mata Rani Ki karpa AAP v aapka pariwar par bani rahe jiii 🌷🙏🏻🙏🏻🙏🏻🌹🕉️🌹

Neha Sharma, Haryana Jan 16, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 096*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 04*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 28*🙏🌸 *इस अध्याय में पुरंजन को स्त्रीयोनि की प्राप्ति और अविज्ञात के उपदेश से उसका मुक्त होना...... *श्रीनारद जी कहते हैं- राजन्! फिर भय नामक यवनराज के आज्ञाकारी सैनिक प्रज्वार और कालकन्या के साथ इस पृथ्वीतल पर सर्वत्र विचरने लगे। एक बार उन्होंने बड़े वेग से बूढ़े साँप से सुरक्षित और संसार की सब प्रकार की सुख-सामग्री से सम्पन्न पुरंजनपुरी को घेर लिया। तब, जिसके चंगुल में फँसकर पुरुष शीघ्र ही निःसार हो जाता है, वह कालकन्या बलात् उस पुरी की प्रजा को भोगने लगी। उस समय वे यवन भी कालकन्या के द्वारा भोगी जाती हुई उस पुरी में चारों ओर से भिन्न-भिन्न द्वारों से घुसकर उसका विध्वंस करने लगे। पुरी के इस प्रकार पीड़ित किये जाने पर उसके स्वामित्व का अभिमान रखने वाले तथा ममताग्रस्त, बहुकुटुम्बी राजा पुरंजन को भी नाना प्रकार के क्लेश सताने लगे। *कालकन्या के आलिंगन करने से उसकी सारी श्री नष्ट हो गयी तथा अत्यन्त विषयासक्त होने के कारण वह बहुत दीन हो गया, उसकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी। गन्धर्व और यवनों ने बलात् उसका सारा ऐश्वर्य लूट लिया। उसने देखा कि सारा नगर नष्ट-भ्रष्ट हो गया है; पुत्र, पौत्र, भृत्य, और अमात्य वर्ग प्रतिकूल होकर अनादर करने लगे हैं; स्त्री स्नेहशून्य हो गयी है, मेरी देह को कालकन्या ने वश में कर रखा है और पांचाल देश शत्रुओं के हाथ में पड़ कर भ्रष्ट हो गया है। यह सब देखकर राजा पुरंजन अपार चिन्ता में डूब गया और उसे उस विपत्ति से छुटकारा पाने का कोई उपाय न दिखायी दिया। कालकन्या ने जिन्हें निःसार कर दिया था, उन्हीं भोगों की लालसा से वह दीन था। अपनी पारलौकिकी गति और बन्धुजनों के स्नेह से वंचित रहकर उसका चित्त केवल स्त्री और पुत्र के लालन-पालन में ही लगा हुआ था। *ऐसी अवस्था में उनसे बिछुड़ने की इच्छा न होने पर भी उसे उस पुरी को छोड़ने के लिये बाध्य होना पड़ा; क्योंकि उसे गन्धर्व और यवनों ने घेर रखा था तथा कालकन्या ने कुचल दिया था। इतने में ही यवनराज भय के बड़े भाई प्रज्वार ने अपने भाई का प्रिय करने के लिये उस सारी पुरी में आग लगा दी। जब वह नगरी जलने लगी, तब पुरवासी, सेवकवृन्द, सन्तान वर्ग और कुटुम्ब की स्वामिनी के सहित कुटुम्बवत्सल पुरंजन को बड़ा दुःख हुआ। नगर को कालकन्या के हाथ में पड़ा देख उसकी रक्षा करने वाले सर्प को भी बड़ी पीड़ा हुई, क्योंकि उसके निवासस्थान पर भी यवनों ने अधिकार कर लिया था और प्रज्वार उस पर भी आक्रमण कर रहा था। जब उस नगर की रक्षा करने में वह सर्वथा असमर्थ हो गया, तब जिस प्रकार जलते हुए वृक्ष के कोटर में रहने वाला सर्प उससे निकल जाना चाहता है, उसी प्रकार उसने भी महान् कष्ट से काँपते हुए वहाँ से भोगने की इच्छा की। उसके अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ गये थे तथा गन्धर्वों ने उसकी सारी शक्ति नष्ट कर दी थी; अतः जब यवन शत्रुओं ने उसे जाते देखकर रोक दिया, तब वह दुःखी होकर रोने लगा। *गृहासक्त पुरंजन देह-गेहादि में मैं-मेरेपन का भाव रखने से अत्यन्त बुद्धिहीन हो गया था। स्त्री के प्रेमपाश में फँसकर वह बहुत दीन हो गया था। अब जब इनसे बिछुड़ने का समय उपस्थित हुआ, तब वह अपने पुत्री, पुत्र, पौत्र, पुत्रवधू, दामाद, नौकर और घर, खजाना तथा अन्यान्य जिन पदार्थों में उसकी ममता भर शेष थी (उनका भोग तो कभी का छूट गया था), उन सबके लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगा। ‘हाय! मेरी भार्या तो बहुत घर-गृहस्थी वाली है; जब मैं परलोक को चला जाऊँगा, तब यह असहाय होकर किस प्रकार अपना निर्वाह करेगी? इसे इन बाल-बच्चों की चिन्ता ही खा जायगी। यह मेरे भोजन किये बिना भोजन नहीं करती थी और स्नान किये बिना स्नान नहीं करती थी, सदा मेरी ही सेवा में तत्पर रहती थी। मैं कभी रूठ जाता था तो यह बड़ी भयभीत हो जाती थी और झिड़कने लगता तो डर के मारे चुप रह जाती थी। मुझसे कोई भूल हो जाती तो यह मुझे सचेत कर देती थी। मुझमें इतना अधिक स्नेह है कि यदि मैं कभी परदेश चला जाता था तो यह विरहव्यथा से सूखकर काँटा हो जाती थी। यों तो यह वीरमाता है, तो भी मेरे पीछे क्या यह गृहस्थाश्रम का व्यवहार चला सकेगी? मेरे चले जाने पर एकमात्र मेरे ही सहारे रहने वाले ये पुत्र और पुत्री भी कैसे जीवन धारण करेंगे? ये तो बीच समुद्र में नाव टूट जाने से व्याकुल हुए यात्रियों के समान बिलबिलाने लगेंगे’। *यद्यपि ज्ञान दृष्टि से उसे शोक करना उचित न था, फिर भी अज्ञानवश राजा पुरंजन इस प्रकार दीनबुद्धि से अपने स्त्री-पुत्रादि के लिये शोकाकुल हो रहा था। इसी समय उसे पकड़ने के लिये वहाँ भय नामक यवनराज आ धमका। जब यवन लोग उसे पशु के समान बाँधकर अपने स्थान को ले चले, तब उसके अनुचरगण अत्यन्त आतुर और शोकाकुल होकर उसके साथ हो लिये। यवनों द्वारा रोका हुआ सर्प भी उस पुरी को छोड़कर इन सबके साथ ही चल दिया। उसके जाते ही सारा नगर छिन्न-भिन्न होकर अपने कारण में लीन हो गया। इस प्रकार महाबली यवनराज के बलपूर्वक खींचने पर भी राजा पुरंजन ने अज्ञानवश अपने हितैषी एवं पुराने मित्र अविज्ञात का स्मरण नहीं किया। उस निर्दय राजा ने जिन यज्ञपशुओं की बलि दे थी, वे उसकी दी हुई पीड़ा को याद करके उसे क्रोधपूर्वक कुठारों से काटने लगे। वह वर्षों तक विवेकहीन अवस्था में अपार अन्धकार में पड़ा निरन्तर कष्ट भोगता रहा। स्त्री की आसक्ति से उसकी यह दुर्गति हुई थी। *अन्त समय में भी पुरंजन को उसी का चिन्तन बना हुआ था। इसलिये दूसरे जन्म में वह नृपश्रेष्ठ विदर्भराज के यहाँ सुन्दरी कन्या होकर उत्पन्न हुआ। जब यह विदर्भनन्दिनी विवाह योग्य हुई, तब विदर्भराज ने घोषित कर दिया कि इसे सर्वश्रेष्ठ पराक्रमी वीर ही ब्याह सकेगा। तब शत्रुओं के नगरों को जीतने वाले पाण्ड्य नरेश महाराज मलयध्वज ने समरभूमि में समस्त राजाओं को जीतकर उसके साथ विवाह किया। उससे महाराज मलयध्वज ने एक श्यामलोचना कन्या और उससे छोटे सात पुत्र उत्पन्न किये, जो आगे चलकर द्रविड़ देश के सात राजा हुए। *फिर उनमें से प्रत्येक पुत्र के बहुत-बहुत पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके वंशधर इस पृथ्वी को मन्वन्तर के अन्त तक तथा उसके बाद भी भोगेंगे। राजा मलयध्वज की पहली पुत्री बड़ी व्रतशीला थी। उसके साथ अगस्त्य ऋषि का विवाह हुआ। उससे उनके दृढ़च्युत नाम का पुत्र हुआ और दृढ़च्युत के इक्ष्मवाह हुआ। अन्त में राजर्षि मलयध्वज पृथ्वी को पुत्रों में बाँटकर भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करने की इच्छा से मलय पर्वत पर चले गये। उस समय-चन्द्रिका जिस प्रकार चन्द्रदेव का अनुसरण करती है-उसी प्रकार मत्तलोचना वैदर्भी ने अपने घर, पुत्र और समस्त भोगों को तिलांजलि दे पाण्ड्य नरेश का अनुगमन किया। वहाँ चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी और वटोदका नाम की तीन नदियाँ थीं। उनके पवित्र जल में स्नान करके वे प्रतिदिन अपने शरीर और अन्तःकरण को निर्मल करते थे। वहाँ रहकर उन्होंने कन्द, बीज, मूल, फल, पुष्प, पत्ते, तृण और जल से ही निर्वाह करते हुए बड़ा कठोर तप किया। इससे धीरे-धीरे उनका शरीर बहुत सूख गया। महाराज मलयध्वज ने सर्वत्र समदृष्टि रखकर शीत-उष्ण, वर्षा-वायु, भूख-प्यास, प्रिय-अप्रिय और सुख-दुःखादि सभी द्वन्दों को जीत लिया। तप और उपासना से वासनाओं को निर्मूल कर तथा यम-नियमादि के द्वारा इन्द्रिय, प्राण और मन को वश में करके वे आत्मा में ब्रह्म भावना करने लगे। *इस प्रकार सौ दिव्य वर्षों तक स्थाणु के समान निश्चल भाव से एक ही स्थान पर बैठे रहे। भगवान् वासुदेव में सुदृढ़ प्रेम हो जाने के कारण इतने समय तक उन्हें शरीरादि का भी भान न हुआ। राजन्! गुरुस्वरूप साक्षात् श्रीहरि के उपदेश किये हुए तथा अपने अन्तःकरण में सब ओर स्फुरित होने वाले विशुद्ध विज्ञान दीपक से उन्होंने देखा कि अन्तःकरण की वृत्तिका प्रकाशक आत्मा स्वप्नावस्था की भाँति देहादि समस्त उपाधियों में व्याप्त तथा उनसे पृथक् भी है। ऐसा अनुभव करके वे सब ओर से उदासीन हो गये। फिर अपनी आत्मा को परब्रह्म में और परब्रह्म को आत्मा में अभिन्नता रूप से देखा और अन्त में इस अभेद चिन्तन को भी त्यागकर सर्वथा शान्त हो गये। *राजन्! इस समय पतिपरायणा वैदर्भी सब प्रकार के भोगों को त्यागकर अपने परमधर्मज्ञ पति मलयध्वज की सेवा बड़े प्रेम से करती थी। वह चीर-वस्त्र धारण किये रहती, व्रत उपवासादि के कारण उसका शरीर अत्यन्त कृश हो गया था और सिर के बाल आपस में उलझ जाने के कारण उनमें लटें पड़ गयी थीं। उस समय अपने पतिदेव के पास वह अंगारभाव को प्राप्त धूमरहित अग्नि के समीप अग्नि की शान्तशिखा के समान सुशोभित हो रही थी। उसके पति परलोकवासी हो चुके थे, परन्तु पूर्ववत् स्थिर आसन से विराजमान थे। इस रहस्य को न जानने के कारण वह उनके पास जाकर उनकी पूर्ववत् सेवा करने लगी। चरणसेवा करते समय जब उसे अपने पति के चरणों में गरमी बिलकुल नहीं मालूम हुई, तब तो वह झुंडी से बिछुड़ी हुई मृगी के समान चित्त में अत्यन्त व्याकुल हो गयी। उस बीहड़ वन में अपने को अकेली और दीन अवस्था में देखकर वह बड़ी शोककुल हुई और आँसुओं की धारा से स्तनों को भिगोती हुई बड़े जोर-जोर से रोने लगी। वह बोली, ‘राजेर्षे! उठिये, उठिये; समुद्र से घिरी हुई यह वसुन्धरा लुटेरों और अधर्मी राजाओं से भयभीत हो रही है, आप इसकी रक्षा कीजिये’। *पति के साथ वन में गयी हुई वह अबला इस प्रकार विलाप करती पति के चरणों में गिर गयी और रो-रोकर आँसू बहाने लगी। लकड़ियों की चिता बनाकर उसने उस पर पति का शव रखा और अग्नि जलाकर विलाप करते-करते स्वयं सती होने का निश्चय किया। राजन! इसी समय उसका पुराना मित्र एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण वहाँ आया। उसने उस रोती हुई अबला को मधुर वाणी से समझाते हुए कहा। *ब्राह्मण ने कहा- तू कौन है? किसकी पुत्री है? और जिसके लिये तू शोक कर रही है, वह यह सोया हुआ पुरुष कौन है? क्या तुम मुझे नहीं जानती? मैं वही तेरा मित्र हूँ, जिसके साथ तू पहले विचरा करती थी। सखे! क्या तुम्हें अपनी याद आती है, किसी समय मैं तुम्हारा अविज्ञात नाम का सखा था? तुम पृथ्वी के भोग भोगने के लिये निवास-स्थान की खोज में मुझे छोड़कर चले गये थे। आर्य! पहले मैं और तुम एक-दूसरे के मित्र एवं मानस निवासी हंस थे। हम दोनों सहस्रों वर्षों तक बिना किसी निवास-स्थान के ही रहे थे, किन्तु मित्र! तुम विषय भोगों की इच्छा से मुझे छोड़कर यहाँ पृथ्वी पर चले आये। यहाँ घूमते-घूमते तुमने एक स्त्री का रचा हुआ स्थान देखा। उसमें पाँच बगीचे, नौ दरवाजे, एक द्वारपाल, तीन परकोटे, छः वैश्यकुल और पाँच बाजार थे। वह पाँच उपादान-कारणों से बना हुआ था और उसकी स्वामिनी एक स्त्री थी। *महाराज! इन्द्रियों के पाँच विषय उसके बगीचे थे, नौ इन्द्रिय-छिद्र द्वार थे; तेज, जल और अन्न-तीन परकोटे थे; मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ-छः वैश्यकुल थे; क्रियाशक्तिरूप कर्मेन्द्रियाँ ही बाजार थीं; पाँच भूत ही उसके कभी क्षीण न होने वाले उपादान कारण थे और बुद्धि शक्ति ही उसकी स्वामिनी थी। यह ऐसा नगर था, जिसमें प्रवेश करने पर पुरुष ज्ञानशून्य हो जाता है-अपने स्वरूप को भूल जाता है। *भाई! उस नगर में उसकी स्वामिनी के फंदे में पड़कर उसके साथ विहार करते-करते तुम भी अपने स्वरूप को भूल गये और उसी के संग से तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है। देखो, तुम न तो विदर्भराज की पुत्री ही हो और न यह वीर मलयध्वज तुम्हारा पति ही। जिसने तुम्हें नौ द्वारों के नगर में बंद किया था, उस पुरंजनी के पति भी तुम नहीं हो। तुम पहले जन्म में अपने को पुरुष समझते थे और अब सती स्त्री मानते हो-यह सब मेरी ही फैलायी हुई माया है। वास्तव में तुम न पुरुष हो न स्त्री। हम दोनों तो हंस हैं; हमारा जो वास्तविक स्वरूप है, उसका अनुभव करो मित्र! जो मैं (ईश्वर) हूँ, वही तुम (जीव) हो। तुम मुझसे भिन्न नहीं हो और तुम विचारपूर्वक देखो, मैं भी वही हूँ जो तुम हो। ज्ञानी पुरुष हम दोनों में कभी थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं देखते। जैसे एक पुरुष अपने शरीर की परछाई को शीशे में और किसी व्यक्ति के नेत्र में भिन्न-भिन्न रूप से देकता है, वैसे ही-एक ही आत्मा विद्या और अविद्या की उपाधि के भेद से अपने को ईश्वर और जीव के रूप में दो प्रकार से देख रहा है। इस प्रकार जब हंस (ईश्वर) ने उसे सावधान किया, तब वह मानसरोवर का हंस (जीव) अपने स्वरूप में स्थित हो गया और उसे अपने मित्र के विछोह से भूला हुआ आत्मज्ञान फिर प्राप्त हो गया। *प्राचीनबर्हि! मैंने तुम्हें परोक्ष रूप से यह आत्मज्ञान का दिग्दर्शन कराया है; क्योंकि जगत्कर्ता जगदीश्वर को परोक्ष वर्णन ही अधिक प्रिय है। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। "हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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प्रथम स्कन्ध-पहला अध्याय श्रीसूतजीसे शौनकादि ऋषियोंका प्रश्र मङ्गलाचरण जिससे इस जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं—क्योंकि वह सभी सद्रूप पदार्थोंमें अनुगत है और असत् पदार्थोंसे पृथक् है; जड नहीं, चेतन है; परतन्त्र नहीं, स्वयंप्रकाश है; जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं प्रत्युत उन्हें अपने संकल्पसे ही जिसने उस वेदज्ञानका दान किया है; जिसके सम्बन्धमें बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं; जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियोंमें जलका, जलमें स्थलका और स्थलमें जलका भ्रम होता है, वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयी जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिरूपा सृष्टि मिथ्या होनेपर भी अधिष्ठान-सत्तासे सत्यवत् प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयंप्रकाश ज्योतिसे सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्यसे पूर्णत: मुक्त रहनेवाले परम सत्यरूप परमात्माका हम ध्यान करते हैं ॥ १ ॥ महामुनि व्यासदेवके द्वारा निर्मित इस श्रीमद्भागवतमहापुराणमें मोक्षपर्यन्त फलकी कामनासे रहित परम धर्मका निरूपण हुआ है। इसमें शुद्धान्त:करण सत्पुरुषोंके जाननेयोग्य उस वास्तविक वस्तु परमात्माका निरूपण हुआ है, जो तीनों तापोंका जड़से नाश करनेवाली और परम कल्याण देनेवाली है। अब और किसी साधन या शास्त्रसे क्या प्रयोजन। जिस समय भी सुकृती पुरुष इसके श्रवणकी इच्छा करते हैं, ईश्वर उसी समय अविलम्ब उनके हृदयमें आकर बन्दी बन जाता है ॥ २ ॥ रसके मर्मज्ञ भक्तजन ! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका पका हुआ फल है। श्रीशुकदेवरूप तोतेके[1] मुखका सम्बन्ध हो जानेसे यह परमानन्दमयी सुधासे परिपूर्ण हो गया है। इस फलमें छिलका, गुठली आदि त्याज्य अंश तनिक भी नहीं है। यह मूर्तिमान् रस है। जबतक शरीरमें चेतना रहे, तबतक इस दिव्य भगवद्-रसका निरन्तर बार-बार पान करते रहो। यह पृथ्वीपर ही सुलभ है ॥ ३ ॥ कथाप्रारम्भ एक बार भगवान्‌ विष्णु एवं देवताओंके परम पुण्यमय क्षेत्र नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषियोंने भगवत्-प्राप्तिकी इच्छासे सहस्र वर्षोंमें पूरे होनेवाले एक महान् यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ ४ ॥ एक दिन उन लोगोंने प्रात:काल अग्रिहोत्र आदि नित्यकृत्योंसे निवृत्त होकर सूतजीका पूजन किया और उन्हें ऊँचे आसनपर बैठाकर बड़े आदरसे यह प्रश्र किया ॥ ५ ॥ ऋषियोंने कहा—सूतजी ! आप निष्पाप हैं। आपने समस्त इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्रोंका विधिपूर्वक अध्ययन किया है तथा उनकी भलीभाँति व्याख्या भी की है ॥ ६ ॥ वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान्‌ बादरायणने एवं भगवान्‌के सगुण-निर्गुण रूपको जाननेवाले दूसरे मुनियोंने जो कुछ जाना है—उन्हें जिन विषयोंका ज्ञान है, वह सब आप वास्तविक रूपमें जानते हैं। आपका हृदय बड़ा ही सरल और शुद्ध है, इसीसे आप उनकी कृपा और अनुग्रहके पात्र हुए हैं। गुरुजन अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त-से-गुप्त बात भी बता दिया करते हैं ॥ ७-८ ॥ आयुष्मन् ! आप कृपा करके यह बतलाइये कि उन सब शास्त्रों, पुराणों और गुरुजनोंके उपदेशोंमें कलियुगी जीवोंके परम कल्याणका सहज साधन आपने क्या निश्चय किया है ॥ ९ ॥ आप संत समाजके भूषण हैं। इस कलियुगमें प्राय: लोगोंकी आयु कम हो गयी है। साधन करनेमें लोगोंकी रुचि और प्रवृत्ति भी नहीं है। लोग आलसी हो गये हैं। उनका भाग्य तो मन्द है ही, समझ भी थोड़ी है। इसके साथ ही वे नाना प्रकारकी विघ्र- बाधाओंसे घिरे हुए भी रहते हैं ॥ १० ॥ शास्त्र भी बहुत-से हैं। परन्तु उनमें एक निश्चित साधनका नहीं, अनेक प्रकारके कर्मोंका वर्णन है। साथ ही वे इतने बड़े हैं कि उनका एक अंश सुनना भी कठिन है। आप परोपकारी हैं। अपनी बुद्धिसे उनका सार निकालकर प्राणियोंके परम कल्याणके लिये हम श्रद्धालुओंको सुनाइये, जिससे हमारे अन्त:करणकी शुद्धि प्राप्त हो ॥ ११ ॥ प्यारे सूतजी ! आपका कल्याण हो। आप तो जानते ही हैं कि यदुवंशियोंके रक्षक भक्तवत्सल भगवान्‌ श्रीकृष्ण वसुदेवकी धर्मपत्नी देवकीके गर्भसे क्या करनेकी इच्छासे अवतीर्ण हुए थे ॥ १२ ॥ हम उसे सुनना चाहते हैं। आप कृपा करके हमारे लिये उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि भगवान्‌का अवतार जीवोंके परम कल्याण और उनकी भगवत्प्रेममयी समृद्धिके लिये ही होता है ॥ १३ ॥ यह जीव जन्म-मृत्युके घोर चक्रमें पड़ा हुआ है—इस स्थितिमें भी यदि वह कभी भगवान्‌के मङ्गलमय नामका उच्चारण कर ले तो उसी क्षण उससे मुक्त हो जाय; क्योंकि स्वयं भय भी भगवान्‌से डरता रहता है ॥ १४ ॥ सूतजी ! परम विरक्त और परम शान्त मुनिजन भगवान्‌के श्रीचरणोंकी शरणमें ही रहते हैं, अतएव उनके स्पर्शमात्रसे संसारके जीव तुरन्त पवित्र हो जाते हैं। इधर गङ्गाजीके जलका बहुत दिनों- तक सेवन किया जाय, तब कहीं पवित्रता प्राप्त होती है ॥ १५ ॥ ऐसे पुण्यात्मा भक्त जिनकी लीलाओंका गान करते रहते हैं, उन भगवान्‌का कलिमलहारी पवित्र यश भला आत्मशुद्धिकी इच्छा- वाला ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो श्रवण न करे ॥ १६ ॥ वे लीलासे ही अवतार धारण करते हैं। नारदादि महात्माओंने उनके उदार कर्मोंका गान किया है। हम श्रद्धालुओंके प्रति आप उनका वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥ बुद्धिमान् सूतजी ! सर्वसमर्थ प्रभु अपनी योग-मायासे स्वच्छन्द लीला करते हैं। आप उन श्रीहरिकी मङ्गलमयी अवतार-कथाओंका अब वर्णन कीजिये ॥ १८ ॥ पुण्यकीर्ति भगवान्‌की लीला सुननेसे हमें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि रसज्ञ श्रोताओंको पद-पदपर भगवान्‌की लीलाओंमें नये-नये रसका अनुभव होता है ॥ १९ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपनेको छिपाये हुए थे, लोगोंके सामने ऐसी चेष्टा करते थे मानो कोई मनुष्य हों। परन्तु उन्होंने बलरामजीके साथ ऐसी लीलाएँ भी की हैं, ऐसा पराक्रम भी प्रकट किया है, जो मनुष्य नहीं कर सकते ॥ २० ॥ कलियुगको आया जानकर इस वैष्णवक्षेत्रमें हम दीर्घकालीन सत्रका संकल्प करके बैठे हैं। श्रीहरिकी कथा सुननेके लिये हमें अवकाश प्राप्त है ॥ २१ ॥ यह कलियुग अन्त:करणकी पवित्रता और शक्तिका नाश करनेवाला है। इससे पार पाना कठिन है। जैसे समुद्रसे पार जानेवालोंको कर्णधार मिल जाय, उसी प्रकार इससे पार पानेकी इच्छा रखनेवाले हमलोगोंसे ब्रह्माने आपको मिलाया है ॥ २२ ॥ धर्मरक्षक, ब्राह्मणभक्त, योगेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्णके अपने धाममें पधार जानेपर धर्मने अब किसकी शरण ली है—यह बताइये ॥ २३ ॥ जय श्री हरि जय श्री कृष्ण जय श्री राधे

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रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास संस्कृत में रामायण के रचयिता ऋषि वाल्मीकि का ही पुनर्जन्म थे। ये विचार सनाढ्य समाज साहित्य मण्डल के तत्वावधान में हिरण मगरी सेक्टर 4 स्थित ब्राह्मण समाजसेवा समिति भवन में सनाढ्य गौरव राष्ट्र संत गोस्वामी तुलसीदास की 502 वीं जयंती पर विशिष्ट अतिथि पं. गंगाधर शास्त्री ने व्यक्त किए। अध्यक्षता अम्बालाल सनाढ्य ने की। मुख्य अतिथि जिला उद्योग केन्द्र की महानिदेशक अरुणा शर्मा थी। समिति अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद सनाढ्य ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रबंध सम्पादक डॉ. अनिल शर्मा ने बताया कि इस अवसर पर कवि भवानी षंकर गौड़ ने गोस्वामी तुलसीदास का जीवनवृत काव्य रुप में गीत गाकर व्यक्त किया। अरुणा शर्मा ने घर-घर पढे़ जाने वाले तुलसी रचित काव्य में वर्णित संस्कारो को आत्मसात करने व महिलाओं को सामाजिक गतिविधियों में बढ़-चढ़ के भाग लेने का आव्हान किया। प्रत्युष पत्रिका के संपादक पंकज शर्मा ने सनाढ्य समाज के युवाओं में साहित्यिक अभिरुचि के विकास पर बल दिया। आदिगौड़-सनाढ्य समाज के अध्यक्ष सत्यनारायण गौड़ ने दिसम्बर में समाज के परिचय सम्मेलन की घोषणा की । इस अवसर पर योगाचार्य डॉ. नरेन्द्र सनाढ्य, अणुव्रत संस्थान के पूर्व निदेशक बालमुकुन्द सनाढ्य, नाथूलाल सनाढ्य, रमेशचन्द्र सनाढ्य, उषानाथ सनाढ्य, प्रकाश शर्मा, मनीष सनाढ्य, षिक्षक संघ प्रदेश मंत्री मीनाक्षी षर्मा, आशा शर्मा एवं सुषमा शर्मा उपस्थित थे।

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जब हनुमान जी के कोप से बचने के लिए शनि देव को बनना पड़ा स्त्री? 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 गुजरात में भावनगर के सारंगपुर में हनुमान जी का एक अति प्राचीन मंदिर स्तिथ है जो की कष्टभंजन हनुमानजी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है की इस मंदिर में हनुमान जी के पैरों में स्त्री रूप में शनि देव बैठे है। सभी जानते हैं कि हनुमानजी स्त्रियों के प्रति विशेष आदर और सम्मान का भाव रखते हैं। ऐसे में उनके चरणों में किसी स्त्री का होना आश्यर्च की बात है। लेकिन इसका सम्बन्ध एक पौराणिक कथा से है जिसमें बताया गया है की आखिर क्यों शनिदेव को स्त्री का रूप धारण कर हनुमान जी के चरणों में आना पड़ा। आइए पहले पढ़ते है यह कथा फिर जानेंगे कष्टभंजन हनुमान मंदिर के बारे में। हमारे शास्त्रों में हनुमान जी और शनि देव से जुड़े अनेकों प्रसंग है जो बताते है की कैसे समय-समय पर हनुमान जी ने शनिदेव को ठीक किया। इनमे से ही एक प्रसंग यह है – प्राचीन मान्यताओं के अनुसार एक समय शनिदेव का प्रकोप काफी बढ़ गया था। शनि के कोप से आम जनता भयंकर कष्टों का सामना कर रही थी। ऐसे में लोगों ने हनुमानजी से प्रार्थना की कि वे शनिदेव के कोप को शांत करें। बजरंग बली अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं और उस समय श्रद्धालुओं की प्रार्थना सुनकर वे शनि पर क्रोधित हो गए। जब शनिदेव को यह बात मालूम हुई कि हनुमानजी उन पर क्रोधित हैं और युद्ध करने के लिए उनकी ओर ही आ रहे हैं तो वे बहुत भयभीत हो गए। भयभीत शनिदेव ने हनुमानजी से बचने के लिए स्त्री रूप धारण कर लिया। शनिदेव जानते थे कि हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं और वे स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाते हैं। हनुमानजी शनिदेव के सामने पहुंच गए, शनि स्त्री रूप में थे। तब शनि ने हनुमानजी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की और भक्तों पर से शनि का प्रकोप हटा लिया। तभी से हनुमानजी के भक्तों पर शनिदेव की तिरछी नजर का प्रकोप नहीं होता है। शनि दोषों से मुक्ति हेतु कष्टभंजन हनुमानजी के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। कष्टभंजन हनुमान मंदिर – सारंगपुर में कष्टभंजन हनुमानजी के मंदिर का भवन काफी विशाल है। यह किसी किले के समान दिखाई देता है। मंदिर की सुंदरता और भव्यता देखते ही बनती है। कष्टभंजन हनुमानजी सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं और उन्हें महाराजाधिराज के नाम से भी जाना जाता है। हनुमानजी की प्रतिमा के आसपास वानर सेना दिखाई देती है। यह मंदिर बहुत चमत्कारी है और यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। यदि कुंडली में शनि दोष हो तो वह भी कष्टभंजन के दर्शन से दूर हो जाता है। इस मंदिर में हनुमानजी की प्रतिमा बहुत ही आकर्षक है। मंदिर की स्वयं की वेबसाइट पर हनुमान जी के हर दिन के लाइव दर्शन की सुविधा उपलब्ध है। 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

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