आशुतोष
आशुतोष Jan 27, 2021

। ॐ नमोः नारायणाय । ।। ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ।। जय श्री हरि शुभ-गुरुवार

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कामेंट्स

आशुतोष Jan 27, 2021
@अर्जुनवर्मा1 प्रेम भक्ति न छोड़िए,,, चाहे निंदा करे संसार... भक्ति में परम सुख है,,, पल पल सुमिरो नन्द कुमार । || हरे कृष्ण || 🌼 शुभरात्रि वंदन 🌼 ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻

RAJ RATHOD Jan 27, 2021
🙏जय श्रीकृष्ण 🙏 🌹🌹शुभ रात्रि वंदन 🌹🌹 🌺🌺Good Night.... sweet dreams 🌺🌺

आशुतोष Jan 27, 2021
@सुविचार1 प्रेम भक्ति न छोड़िए,,, चाहे निंदा करे संसार... भक्ति में परम सुख है,,, पल पल सुमिरो नन्द कुमार । || हरे कृष्ण || 🌼 शुभरात्रि वंदन 🌼 ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻

आशुतोष Jan 27, 2021
@krishnamishra प्रेम भक्ति न छोड़िए,,, चाहे निंदा करे संसार... भक्ति में परम सुख है,,, पल पल सुमिरो नन्द कुमार । || हरे कृष्ण || 🌼 शुभरात्रि वंदन 🌼 ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻

आशुतोष Jan 28, 2021
@varshalohar । ॐ नमोः नारायणाय । ।। ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ।। 🌹मंगल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...🌹 ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻

आशुतोष Jan 28, 2021
@sunilkumar93 । ॐ नमोः नारायणाय । ।। ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ।। 🌹मंगल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...🌹 ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻

आशुतोष Jan 28, 2021
@rajput13 । ॐ नमोः नारायणाय । ।। ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ।। 🌹मंगल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...🌹 ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻

B K PATEL Feb 2, 2021
🕉️ नमो भगवते वासुदेवाय नमः जय माता महालक्ष्मी नमो नमः शुभ संध्या स्नेह वंदन धन्यवाद 🌹🙏🙏

white beauty Mar 4, 2021

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SunitaSharma Mar 5, 2021

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shiva Mar 4, 2021

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‼️💖💖*ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः*💖💖‼️ ‼️ *नारायण मंत्र का प्रभाव* ‼️ *आरुणि नामक प्रसिद्ध एक महान तपस्वी देविका नदी के तट पर आश्रम बनाकर घने वन में उपवास रखकर तपस्या करने लगे. एक दिन वह नदी में नहा रहे थे. . *डुबकी लगाकर जैसे ही ऊपर आये तो उन्हें सामने एक शिकारी दिखा जिसने धनुष पर बाण चढ़ाकर उनकी ओर बाण साध रखा था. वह भयभीत हो गए और घबराहट में नदी से बाहर निकलने की बजाय वहीं खड़े रहे. . *लेकिन अगले ही क्षण जो शिकारी उन्हें मारने को उतारू था उसने धनुष और बाण अपने हाथों से गिरा दिये तथा घुटनों के बल बैठकर आरूणि से कुछ निवेदन करने लगा. . शिकारी बोला- हे ब्राह्मण मैं अपने सामने आने वाले हर जीव को चाहे वह पशु हो या मनुष्य मार देता हूं. आपको भी मारने के विचार से ही आया था. पर आपको देखते ही मेरी हत्या की लालसा चली गई. . मुझे अपने पापों का बोध हो रहा है. मेरा जीवन सदा पाप में बीता है. मैंने हजारों हत्याएं की हैं लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ था कि अपने शिकार को देखकर मेरी यह हालत हो जाये. . आरुणि के मुख से कोई शब्द नहीं निकला. वह अचरज के साथ शिकारी को देखते रहे. शिकारी ने उन्हें चुप देखकर आगे कहा- इतने ब्राह्मणों की हत्या करने का पापी, मैं किस नरक में जाउंगा मुझे नहीं पता. . आप तपस्वी जान पड़ते हैं. मेरे पाप कैसे कटेंगे, कृपया उपदेश दे कर मेरा उद्धार करें. आपके साथ मैं भी तप करना चाहता हूँ. अपने साथ अपनी शरण में लें. उस दिन से शिकारी उनके पास ही ठहर गया. . वह आश्रम के बाहर पेड़ के नीचे रहता और नदी में उसी प्रकार स्नान कर तप जाप करता जैसे कि आरुणि किया करते थे. इस तरह दोनों का धार्मिक कार्य चलने लगा. . कुछ दिन बीत गये, एक दिन की बात है. आरुणि स्नान करने नदी में गये ही थे कि उधर कोई भूखा बाघ आ निकला. उसने शांतस्वरुप मुनि को देखा तो सहज शिकार समझ उन पर झपटा. . उधर शिकारी ने भी बाघ को देख लिया था. उसने झट तीर चलाया और बाघ को मार गिराया. मरने पर उस बाघ के शरीर से एक पुरुष निकला और वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया. . असल में जिस समय बाघ आरुणि पर झपटा था, उस समय आरुणि की निगाह बाघ पर पड़ गई. मारे घबराहट के मुनि के मुख से अनायास ही ऊं नमो नारायणाय का मंत्र निकल गया. . बाघ के प्राण तब तक उसके कंठ में ही थे, उसने यह मंत्र सुन लिया. प्राण निकलते समय केवल इस मंत्र मात्र को सुन लेने से वह बाघ एक दिव्य पुरुष के रूप में बदल गया था. . हाथ जोड़े हुये उस पुरुष ने आरुणि से कहा- हे ब्राह्मण, आपकी कृपा से मेरे सारे पाप धुल गये. अब मैं श्राप से मुक्त हो गया. अब तो मैं वहां चला जहां भगवान विष्णु विराजमान हैं. . आरुणि ने उस पुरुष से कहा- तनिक रुको नर श्रेष्ठ, तुम कौन हो ? तुम बाघ से मनुष्य कैसे बन गये. मेरे इस प्रश्न का उत्तर देने के बाद तुम जहां चाहे जा सकते हो. . वह बोला- महाराज, इससे पहले के जन्म में मैं दीर्घबाहु नाम से प्रसिद्ध एक राजा था. वेद, वेदांग और बहुत से धर्मग्रंथ मैंने कंठस्थ कर लिए थे. इस घमंड में वेदपाठी ब्राह्मणों का मैं खूब अपमान किया करता था. . मेरे इस व्यवहार से सभी ब्राह्मण बहुत नाराज हो गये. एक बार ब्राह्मणों ने मिलकर मुझे श्राप दे दिया कि तू सबका इतनी निर्दयता से अपमान करता है इसलिए जा तू निर्दयी बाघ बनेगा. . हे मूर्ख, तूने बहुत कुछ पढ लिया है. तू सब कुछ भूल जा. अब तो नारायण का नाम मृत्यु के समय ही तेरे कानों में पड़ेगा. श्राप सुनकर मैं उनके पैरों पर गिर पड़ा. मेरे बहुत गिड़गिड़ाने पर वे पसीजे और मेरे उद्धार की बात बताई. . उन्होंने कहा- हर छठे दिन जो कोई भी तुम्हें दोपहर में मिले वही तुम्हारा आहार होगा. शिकार करते समय जब तुम किसी ऋषि पर हमला करेगा और उसके मुंह से ऊं नमो नारायणाय का मंत्र तेरे कानों में पड़ेगा तब मुक्ति मिल जायेगी. . ब्राह्मणों का कहा आज यह सत्य हो गया. यह कहकर वह बाघ बना हुआ दिव्य पुरुष स्वर्ग को चला गया. उधर आरुणि बाघ के पंजे से छूट कर संयत हो चुके थे. . चूंकि शिकारी ने आरुणि के प्राणों की रक्षा की थी इसलिए आरुणि ने उससे कहा – हे शिकारी संकट के समय तुमने मेरी रक्षा की है. वत्स मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, वर मांगो. . शिकारी ने कहा- आप साक्षात चलते-फिरते देवता हैं. मेरे लिए यही वर काफी है कि आप मुझसे प्रेमपूर्वक बात कर रहे हैं मुझे और कुछ नहीं चाहिए. . प्रसन्न होकर आरुणि ने कहा- पहले तुम पापी थे पर अब तुम्हारा मन पवित्र हो गया है. देविका नदी में स्नान करने तथा भगवान विष्णु का नाम सुनने से तुम्हारे पाप नष्ट हो गये हैं. तुम यहीं रह कर तपस्या करो. . शिकारी बोला– मेरी भी यही इच्छा थी. आपने जिन भगवान नारायण की चर्चा की है उन्हें मेरे जैसा मानव कैसे पा सकता है यह बता दें तो यही मेरा वर होगा. . आरुणि ने कहा- झूठ मत बोलना और नारायण में अपना मन लगाये रखना. इस तरह तपस्वी बनकर ऊं नमो नारायणाय का जप करने से भगवान विष्णु को पा सकते हो. यह कह कर वरदाता आरुणी वहां से चले गये **************************** एक कबूतर कबूतरनी का जोड़ा आकाश में विचरण कर रहा था, तभी उनके ऊपर एक बाज उनको खाने के लिए उनके ऊपर उड़ने लगा। तब वह दोनों जेसे-तेसे भागने लगे तब जमीन पर एक शिकारी भी उनको मारने के लिए आ गया । उस समय कबूतर भगवत नाम का स्मरण कर रहा था। और उसे कोई भय नही था, पर उसकी पत्नी को डर लग रहा था। वह सोच रही थी की की मेरा पति तो गुरु का जप कर रहा है इसे कोई डर नही है। और हमारी दोनों और से मृत्यु निश्चित है। या तो हमें बाज मार डालेगा या वो नीचे शिकारी है वो मार देगा, अब हमारा क्या होगा हम तो मरने वाले हैं। तभी भगवान की कृपा से वहाँ जमीन पर एक सांप आ जाता है और वह सांप वहां खड़े शिकारी को ढस लेता है। और उसने जो तीर अपने धनुष पर लगा रखा था वो हाथ से छूट कर उस बाज के लग जाता है। और उनके पास दोनों तरफ से आई हुई मृत्यु टल जाती है। चाहे कितनी भी विपत्ति क्यों ना आ जाए *भगवान का स्मरण नही छोड़ना चाहिए....☺👏🏼* *भगवान हमें सारी विपत्तियों ये निकाल लेते हैं। बस उनका ही आसरा होना चाहिए....🌸👏🏼* 🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 🌸🙏*जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸 *श्रीहरिनाम चिन्तामणि* ~~~~~~~~~~~~~~ *श्रीमन महाप्रभु जी बोले हे हरिदास! आपने इस पृथ्वी पर भक्ति के बल से दिव्य ज्ञान को प्राप्त किया है । चारों वेद आपकी जिव्हा पर नित्य नृत्य करते हैं तथा मैं आपकी कथा में सारे सुसिद्धान्तों को अनुभव करता हूँ। *नाम रस की जिज्ञासा* ~~~~~~~~~~~~~ *महाप्रभु जी बोले हे हरिदास! अब मुझे यह बताइए कि हरिनाम रस कितनी प्रकार के हैं और अधिकार के अनुसार साधकों को किस प्रकार प्राप्त होंगे । हरिनाम के प्रेम में विभोर होकर नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी निवेदन करते हुए श्रीमहाप्रभु जी से कहते हैं कि हे गौरहरि ! आपकी प्रेरणा के बल से ही मैं इसका वर्णन करूंगा। *शुद्ध तत्व तथा पर तत्व के रूप में जो वस्तु सिद्ध है , वो रस के नाम से वेदों में प्रसिद्ध है। वह रस अखंड है , परब्रह्म तत्व है । यह चरम वस्तु असीम आनन्द का समुद्र है। शक्ति तथा शक्तिमान रूप से यह परमतत्व विद्यमान है। शक्ति तथा शक्तिमान रूप से इसमें कोई भेद नहीं है। केवल दर्शन में भेद दिखाई देता है। शक्तिमान अदृश्य से है जबकि शक्ति इसे प्रकाशित करती है। तीनों प्रकार की शक्ति (चित्त, जीव तथा माया शक्ति) ही विश्व को प्रकाशित करती है। *चित्त शक्ति के द्वारा वस्तु का प्रकाश* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ *चित्त शक्ति के रूप में वस्तु का रूप, वस्तु का नाम, वस्तु का धाम, वस्तु की क्रिया तथा वस्तु का स्वरूप आदि प्रकाशित होते हैं। श्रीकृष्ण ही वह परम वस्तु हैं तथा उनका वर्ण श्याम है।गोलोक, मथुरा, वृन्दावन आदि श्रीकृष्ण के धाम हैं जहां वह अपनी लीला प्रकट करते हैं। श्रीकृष्ण के नाम , रूप, लीला, धाम इत्यादि जो भी हैं सबके सब अखण्ड तथा अद्वय ज्ञान के अंतर्गत हैं।श्रीकृष्ण में जितनी भी विचित्रता है ये सब परा शक्ति के द्वारा ही की गई है। श्रीकृष्ण धर्मी हैं जबकि श्रीकृष्ण की परा शक्ति ही उनका नित्य धर्म है। धर्म तथा धर्मी में कोई भेद नहीं है। दोनो ही अखण्ड तथा अद्वय हैं। ये दोनों अभेद होते हुए भी विचित्र विशेषता के द्वारा इनमें भेद दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की विशेषता केवल चिद जगत में दिखाई पड़ती है। *माया शक्ति का स्वरूप* ~~~~~~~~~~~~~ *जो छाया शक्ति श्रीकृष्ण की इच्छा से सारे विश्व का सृजन करती है , उस शक्ति को माया शक्ति के नाम स जाना जाता है। *जीव शक्ति* ~~~~~~~~ *भेदाभेदमयी जीव शक्ति अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण की तटस्था शक्ति श्रीकृष्ण की सेवा के उद्देश्य से जीवों को प्रकाशित करती है। *दो प्रकार की दशा वाले जीव* ~~~~~~~~~~~~~~~~ *जीव दो प्रकार के हैं - नित्य बद्ध तथा नित्य मुक्त। नित्य मुक्त जीवों का नित्य ही श्रीकृष्ण सेवा में अधिकार होता है जबकि नित्य बद्ध जीव माया के द्वारा संसार में फंस जाते हैं।जिनमें भी बहिर्मुखी तथा अंतर्मुखी दो प्रकार के विभाग हैं। *जो अंतर्मुखी जीव हैं , वह साधु सँग के द्वारा श्रीकृष्ण नाम को प्राप्त करते हैं और श्रीकृष्ण नाम के प्रभाव से श्रीकृष्ण के धाम को जाते हैं। *रस और रस का स्वरूप* ~~~~~~~~~~~~~~ *भगवान श्रीहरि ही अखण्ड रस के भंडार हैं और उस रस रूपी फूल की कली हरिनाम थोड़ी सी प्रस्फुटित हुई कली का रूप अति मनोहर होता है । गोलोक वृन्दावन में भी यही रूप श्यामसुंदर के रूप में विद्यमान है। *प्रभु के 64 गुण उस कली की सुंगन्ध हैं , वे गुण ही भगवान के नाम के तत्व को पूरे जगत में प्रकाशित करते हैं। *श्रीकृष्ण की लीला पूरी तरह से खिले हुए फूल के समान है । यह भगवत लीला प्रकृति से परे है , नित्य है तथा आठों पहर चलती है। *भक्ति का स्वरूप* ~~~~~~~~~~~ *जीवों पर हरिनाम की कृपा होने से यह कृपा संचित शक्ति और आह्लादिनी शक्ति के समावेश से भक्ति के रूप में जीव के हृदय में प्रवेश करती है। *भक्ति क्रिया* ~~~~~~~~ *वही सर्वेश्वरी शक्ति अर्थात भक्ति जीवों के हृदय में आविर्भूत होकर श्रीकृष्ण नाम के रसों की सारी सामग्री को प्रकाशित करती है। जीव भक्ति के प्रभाव से अपने चिन्मय स्वरूप को प्राप्त करता है और फिर उसी शक्ति के द्वारा ही उसमें रस प्रकाशित होता है। *रस के विभाव आलम्बन* ~~~~~~~~~~~~~~ *रस के विभिन्न आलम्बन के विषय तो परमधन स्वरूप श्रीकृष्ण हैं एवम आश्रय उनके भक्त हैं । जब भक्त सदा ही हरिनाम लेता है तब हरिनाम की कृपा से वह भगवान के रूप, लीला , गुण आदि का आस्वादन करता है। ।। जय श्री राधेकृष्णा।। 🌸🌸🙏🌸🌸 ~~~~~~~~~~

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Smt Neelam Sharma Mar 4, 2021

*_ll ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ll🏵ll_* *_शुभ वृहस्पतिवारीय सुप्रभातम 💐_* *_🔸💫🌸((🕉))🌸💫🔸_* *_शान्ताकारं भुजग-शयनं पद्मनाभं सुरेशं,_* *_विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।_* _*शान्ताकारं*– जिनकी आकृति अतिशय शांत है, वह जो धीर क्षीर गंभीर हैं,_ _*भुजग-शयनं* – जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं (विराजमान हैं),_ _*पद्मनाभं* – जिनकी नाभि में कमल है,_ _*सुरेशं* – जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और_ _*विश्वाधारं* – जो संपूर्ण जगत के आधार हैं, संपूर्ण विश्व जिनकी रचना है,_ _*गगन-सदृशं* – जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं,_ _*मेघवर्ण* – नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है,_ _*शुभाङ्गम्* – अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो अति मनभावन एवं सुंदर है !_ *_लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्_* *_वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥_* _*लक्ष्मीकान्तं* – ऐसे लक्ष्मीपति,_ _*कमल-नयनं* – कमलनेत्र (जिनके नयन कमल के समान सुंदर हैं !)_ _*योगिभिर्ध्यानगम्यम्* – (योगिभिर – ध्यान – गम्यम्) – जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, (योगी जिनको प्राप्त करने के लिया हमेशा ध्यानमग्न रहते हैं !)_ _*वन्दे विष्णुं* – भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ (ऐसे परमब्रम्ह श्री विष्णु को मेरा नमन है !)_ _*भवभय-हरं* – जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, जो सभी भय को नाश करने वाले हैं !_ _*सर्वलोकैक-नाथम्* – जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, सभी चराचर जगत के ईश्वर हैं !!_ *_जगत के पालनहार प्रभु, श्री विष्णु भगवान हम सबका प्रणाम स्वीकार करें !!🙏!!_* _*🔸💫🌸((🙏))🌸💫🔸*_ _*💐 श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा 💐*_

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raadhe krishna Mar 3, 2021

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