MANOJKUMAR SRIVASTAVA
MANOJKUMAR SRIVASTAVA Aug 13, 2020

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R.K.SONI(Ganesh Mandir) Aug 13, 2020
good evening ji🌹 jai hind,jai bharat🇦🇪 v.nice ji👌👌🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏

आशुतोष Sep 21, 2020

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M.S.Chauhan Sep 21, 2020

राजा हरिश्चन्द्रकी कथा राजा हरिश्चंद्र का नाम सच बोलने के लिए जगत में प्रसिद्ध है। उनकी प्रसिद्धि चारों तरफ फैली थी। इनका जन्म इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नामक राजा तथा उनकी पत्नी सत्यवती के पुत्र के रूप में हुआ। राजा हरिश्चंद्र सच बोलने और वचन. पालन के लिए मशहूर थे। ये बहुत बड़े दानी भी थे। । वे जो वचन देते, उसे अवश्य पूरा करते। उनके बारे में कहा जाता, चाँद और सूरज भले ही अपनी जगह से हट जाएँ, पर राजा अपने वचन से कभी पीछे नहीं हट सकते। सत्यवादी हरिशचन्द्र के विषय में कहा जाता है कि - "चन्द्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवाहर । पै दृढ़ श्री हरिशचन्द्र को , टरे न सत्य विचार ॥ इनकी पत्नी का नाम तारामती (शैव्या) तथा पुत्र का नाम रोहिताश्व था। इनके गुरुदेव गुरु वशिष्ठ जी थे। एक बार ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की प्रसिद्धि सुनी। वे स्वयं इसकी परीक्षा करना चाहते थे। क्या हरिश्चंद्र हर कठिनाई झेलकर भी वचन का पालन करेंगे? लेकिन डर वसिष्ठ जी का था। वसिष्ठ जी ने कह दिया आपको यदि मेरे शिष्य और राजा पर शक है तो आप ख़ुशी-ख़ुशी परीक्षा ले सकते हैं और मैं भी बीच में नही आऊंगा। लेकिन यदि आप हार गए तो आपको अपना सारा तपस्या का फल राजा को देना होगा। ये सभी बातें इंद्र के स्वर्ग में हो रही हैं। इन्द्रादि देवता सभी वहां पर मौजूद हैं। नारद जी भी आ गए। अंत में फैसला हुआ की विश्वामित्र जी हरिश्चंद्र राजा की परीक्षा लेंगे। विश्वामित्र द्वारा हरिश्चंद्र की परीक्षा राजा हरिश्चंद्र को स्वप्न आया की एक सुंदर स्त्री उनके दरबार में नृत्य और गायन करने के लिए आई है। उसने सुंदर गायन और नृत्य किया। राजा ने उसे उपहार देना चाहा लेकिन उसने मना कर दिया। और वह देखती है यदि आपको कुछ देना है तो मुझे अपनी पत्नी रूप में स्वीकार कीजिये। तभी हरिश्चंद्र ने कहा- देवी आप कैसी बात करती हैं। मैं शादीशुदा हूँ और ये दान में आपको नही कर सकता हूँ। आप और कुछ मांग लीजिये। वो कहती है अच्छा तो आप मुझे अपना राज्य दान में कर दीजिये। राजा हरिश्चंद्र जी कहते हैं दान सुपात्र को दिया जाता है कुपात्र को नही। तुम अपनी हद में रह कर मांगो। इसी बीच विश्वामित्र जी आ गए हरिश्चंद्र ने कहा- नही ऋषि जी , ऐसी बात नही है। दान तो सुपात्र को ही दिया जाता है ना फिर विश्वामित्र जी कहते हैं तो तुम सारा राज्य मुझे दान में दे दो। राजा ने एक क्षण नही लगाया और सारा राज्य विश्वामित्र को दान में दे दिया। जब इनकी आँख खुली तो देखा कुछ भी नही था वहां पर। तुरंत उठ गए और अपनी पत्नी से कहते हैं तुम रोहितश्व को लेकर अपने मायके चली जाओ। मैंने सब राज्य स्वप्न में विश्वामित्र जी को दान में दे दिया है। उनकी पत्नी कहती है लेकिन आपने स्वप्न में दान दिया है।राजा कहते हैं दान तो दान होता है। चाहे स्वप्न में दें या हकीकत में। और ये जगत भी एक स्वप्न की तरह है। फर्क सिर्फ इतना है नींद में आँख बंद करके स्वप्न देखा जाता है और दिन में खुली आँखों से। जब राजा की पत्नी ने ऐसा सुना तो बोली की मैं भी आपके साथ वन को जाउंगी। इसी बीच पुत्र भी आ गया। वो भी कहता है पिताजी हम भी साथ में वन को चलेंगे। इस तरह से तीनों वन में जाने के लिए तैयार हो गए। विश्वामित्र जी वहीं पर आ गए। और कहते हैं वाह राजा ! इतना मोह अपने राज पाठ से । अब तक तुम वन को गए भी नही। जल्दी जाओ। और ये सारे वस्त्र आभूषण उतार के जाना। राजा ने सब वस्त्र आभूषण उतार के साधारण वस्त्र आभूषण धारण कर लिए। और वन को जाने लगे। विश्वामित्र जी ने हरिश्चंद्र की पत्नी का मंगल सूत्र तक उतरवा लिया। फिर विश्वामित्र जी कहते हैं तुमने मुझे दान तो दे दिया लेकिन दक्षिणा कौन देगा। तब हरिश्चंद्र जी राजकोष अधिकारी को दक्षिणा देने की कहते हैं। लेकिन विश्वामित्र जी कहते हैं ये तो सब मेरा ही है। मुझे एक हजार स्वर्ण मुद्रा दान में दो। हरिश्चंद्र जी कहते हैं की मुझे एक महीना का समय दीजिये। आपको में दान भी दे दूंगा। विश्वामित्र जी कहते हैं। एक महीने से एक दिन भी ऊपर हो गया तो तुम झूठे राजा कहलाओगे। अब तीनों वन को निकल गए हैं। एक एक पैसे के मोहताज हो गए हैं। जो राजा हजारों स्वर्ण मुद्राएं दान में दे देते है वो आज एक एक मुद्र एकत्र करते हुए घूम रहे हैं। समय पर रोटी तक नही मिल रही है। फिर भी जैसे तैसे पैसे जुटाने में लगे हैं। जैसे तैसे करके तीनों ने स्वर्ण मुद्राओं का इंतजाम कर लिया। 29 दिन हो गए। हरिश्चंद्र जी ने सारी मुद्राएं एकत्र करके एक पोटली में रख दी। लेकिन रात को घर में चोर घुस आया और सारी मुद्राएं लेकर चला गया। उसकी जगह एक पोटली रख गया। जिसमे मिट्ठी और छोटे छोटे पत्थर थे।अगले दिन जब सुबह विश्वामित्र जी आये और उन्होंने दक्षिणा मांगी। तो हरिश्चंद्र जी ने पोटली लेकर ऋषि के हाथ पर रख दी। लेकिन देखते हैं की उसमे तो मुद्राएं है ही नही। केवल पत्थर और मिटटी है। विश्वामित्र जी को क्रोध आ गया। और कहते हैं। वाह राजा | अधिक जानकारी के लिए अवश्य पढ़ें।।  यही दक्षिणा देकर अपमान करना था मेरा तो पहले ही बता देते। हरिश्चंद्र जी कहते हैं- मुनिवर, हमे क्षमा कीजिये। मैंने एक एक पाई एकत्र की थी लेकिन पता नही ये क्या हो गया तब हरिश्चंद्र जी अपने पुत्र और पत्नी के साथ कहते हैं। यदि हम आज संध्या तक आपके दक्षिणा के पैसे नही चूका पाये तो जगत से मेरा नाम मिट जायेगा। और ये कहकर काशी के बाजार में बिकने के लिए चल दिए हैं। काशी के बाजार में बोली लगाई गई। सबसे पहली हरिश्चंद्र की पत्नी बिकी है। पांच सौ मुद्राओं में। फिर हरिश्चंद्र का बेटा बिक है दो सौ मुद्राओं में। जब एक हजार मुद्राएं नही हुई। तो हरिश्चंद्र ने खुद को भी बेच डाला। और इस तरह से एक हजार मुद्राएं एकत्र करके विश्वामित्र जी को दक्षिणा देकर अपना वचन निभाया हरिश्चंद्र की पत्नी और उसका बच्चा एक सेठ के यहाँ नौकर रख लिए गए। दिन रात वो उनसे काम करवाते थे। खाना भी समय पर नही देते हैं। और मार पिटाई अलग से करते थे। लेकिन उनके खिलाफ एक शब्द भी नही बोलते थे। क्योंकि बिक चुके थे। इसी तरह से हरिश्चंद्र जी को एक चांडाल के यहाँ काम करना पड़ा। राजा होकर भी हरिश्चंद्र ने एक डोम के यहाँ काम करना स्वीकार किया। वह उसकी हर तरह से सेवा करते। छोटे-से-छोटे काम करने में भी न हिचकते। हरिश्चंद्र का कार्य शवों के वस्त्र आदि एकत्र करना था। उसे श्मशान भूमि में ही रहना भी पड़ता था। शमशान घाट की रखवाली करते थे और बिना शुल्क दिए शव को जलाने नही देते थे। ये इनके मालिक का हुक्म था। एक बार हरिश्चंद्र का लड़का सेठानी की आज्ञा से फूल तोड़ने के लिए गया। वहां पर एक सांप ने उसे डस लिया। हरिश्चंद्र का लड़का मर गया। माँ को जब पता चला तो खूब रोइ और रोती-रोती अपने बेटे का शव शमशान घाट में लाइ। शव शमशान घाट में रख दिया। तभी हरिश्चंद्र जी वहां आये और कहते हैं देवी! आप कौन है? और इस बच्चे का अंतिम संस्कार करना चाहते है तो कुछ शुल्क दीजिये। उसकी पत्नी कहती है की ये मेरा इकलौता बेटा है। और सांप ने उसे काट लिया है लेकिन मेरे पास देने के लिए कुछ भी नही है। हरिश्चंद्र को पता चला की ये मेरी पत्नी है और आज मेरा ही बेटा मर गया है। लेकिन हरिश्चंद्र जी कहते हैं- देवी! बिना शुल्क लिए मैं आपके बेटे को अग्नि नही देने दूंगा। तब हरिश्चंद्र की पत्नी अपनी साडी फाड़कर शुल्क के रूप में देती है। उसी समय काशी नरेश अपने सैनिकों के साथ वहां पर आ जाता है। और कहता है की इस स्त्री को पकड़ लो। ये ही बच्चो की हत्या करती है। इतना कहकर हरिश्चंद्र की पत्नी को मृत्यु दंड दे दिया जाता है। हरिश्चंद्र को बुलाते है। और कहते है की इस स्त्री की हत्या कर दो। क्योंकि ये निर्दोष बालकों को मारती है। हरिश्चंद्र जी इसे विधि का विधान समझ लेते हैं और अपनी पत्नी की हत्या करने लगते हैं। उसी समय भगवान नारायण, लक्ष्मी , नारद और विश्वामित्र जी प्रकट हो जाते हैं। हरिश्चंद्र का पुत्र रोहिताश्व भी जीवित हो कर वहां आ जाता है। भगवान विष्णु कहते हैं। हरिश्चंद्र तुम्हारी जय हो। तुमने सत्य के लिए सब कुछ त्याग दिया। धर्म और कर्तव्य भी तुम्हे सच के मार्ग पर चलने से रोक नही पाये। रोहिताश्व भी जीवित हो कर वहां आ जाता है। फिर विश्वामित्र जी ने कहा की ये सब परीक्षा मैंने ही ली। और आज मैं तुम्हे अपनी 60 हजार वर्षों की तपस्या का फल देता हूँ। और जब तक सूरज चाँद रहेगा तब तक तुम्हारा नाम रहेगा। जब जब सच की बात चलेगी तुम्हारा नाम सबसे ऊपर आएगा। 🌷🌷🛕🙏🛕🌷🌷

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*🚩🙏गीताजी उच्चारण का तरीका* श्रीमद्‍भगवद्‍गीता एक अलौकिक एवं प्रासादिक ग्रन्थ है। हमारे समाज में ऐसे लाखों लोग हैं जो गीताजी के श्लोकों का पाठ ठीक से नहीं कर पाते हैं। हमारी भावना और प्रयास उन सभी महानुभावों के लिये है जो गीता ‍पढ़ना चाहते हैं। सामान्य शिक्षित व्यक्ति भी कम-से-कम श्रीमद्‍भगवद्‍गीता ठीक ढंग से पाठ करके अपना कल्याण कर ले। इस गीता पदच्छेद का एकमात्र उद्देश्य सर्व-सामान्य को गीता के श्लोकों को पढ़ने का अभ्यास कराना है। श्रीमद्भगवद्‍गीता में कुल सात सौ श्लोक हैं। उनमें छःसौ पैंतालीस श्लोक ‘अनुष्टुप्’ छन्द के और पचपन श्लोक ‘त्रिष्टुप्’ छन्द के हैं। प्रत्येक श्लोक में चार चरण होते हैं। अनुष्टुप छन्द के प्रत्येक चरण में आठ अक्षर होते हैं और पूरा श्लोक बत्तीस अक्षरों का होता है तथा त्रिष्टुप छन्द के प्रत्येक चर‍ण में ग्यारह अक्षर होते हैं और पूरा श्लोक चौवालीस अक्षरों का होता है। अनुष्टुप छंद श्लोकों को पढ़ते समय उसे आठ-आठ अक्षर का चार भाग बना लें अर्थात् आठ अक्षर गिनकर एक साथ पढ़ने से एक चरण पूरा होगा। इसी त्रिष्टुप छन्द वाले श्लोको के चौवालीस अक्षरोंवाले श्लोकों के एक चरण में ग्यारह अक्षर गिनकर पढ़ना चाहिये। गीता के कुछ श्लोकों में अक्षर गणना करते समय कहीं-कहीं एक चरण में नौ तथा बारह अक्षर भी मिलते है, उसका उच्चारण दिये गये रंगों के अनुसार ही करना चाहिये। श्लोकाक्षरों की गणना में आधा अक्षर अर्थात् हलन्त अक्षरकी गणना नहीं करनी चाहिये। आठ अक्षर और ग्यारह अक्षर की गिनती करते समय पूर्णाक्षर को ही गिनना चाहिये। गीताजी का सही उच्चारण सीखनेवाले सामान्य पाठकों की सुविधा के लिये प्रत्येक चरण को अलग-अलग विभिन्न रंगों में किया गया है। इससे श्लोक के प्रत्येक चरण को समझने में सहायता मिलेगी। प्रत्येक श्लोक के नीचे उसका चरणबद्ध ढंग से पदच्छेद भी किया गया है ताकि पाठकों को श्लोकों के पढ़ने और समझने में ज्यादा सरलता हो। वाराहपुराण में आया है कि नित्य गीताजी का पाठ करनेवाले मनुष्य का पतन नहीं होता है। इसलिए गीताजी का नित्य पाठ यथा सम्भव अवश्य करना चाहिए। आशा है, जो पाठक गीता पढ़ना चाहते हैं, उनके लिये यह विधि और प्रयास उपयोगी होगा। 🚩👏🌺🌷💐🌺🌷💐🙏

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🥀🥀 Sep 20, 2020

Heart touching post...Speechless 😔 *कुछ रह तो नहीं गया ?* *तीन* महीने के बच्चे को दाई के पास रखकर जॉब पर जाने वाली माँ को दाई ने पूछा... "कुछ रह तो नहीं गया...? पर्स, चाबी सब ले लिया ना...?" अब वो कैसे हाँ कहे... पैसे के पीछे भागते भागते... सब कुछ पाने की ख्वाईश में वो जिसके लिये सब कुछ कर रही है, *वह ही रह गया है...!* 😑 *शादी* में दुल्हन को बिदा करते ही शादी का हॉल खाली करते हुए दुल्हन की बुआ ने पूछा... "भैया, कुछ रह तो नहीं गया ना...? चेक करो ठीक से...!" बाप चेक करने गया तो दुल्हन के रूम में कुछ फूल सूखे पड़े थे। सब कुछ तो पीछे रह गया... 25 साल जो नाम लेकर जिसको आवाज देता था लाड़ से... वो नाम पीछे रह गया और उस नाम के आगे गर्व से जो नाम लगाता था, वो नाम भी पीछे रह गया अब... "भैया, देखा...? कुछ पीछे तो नहीं रह गया ?" बुआ के इस सवाल पर आँखों में आये आंसू छुपाते बाप जुबाँ से तो नहीं बोला.... पर दिल में एक ही आवाज थी... *सब कुछ तो यहीं रह गया...!* 😑 *बड़ी* तमन्नाओं के साथ बेटे को पढ़ाई के लिए विदेश भेजा था और वह पढ़कर वहीं सैटल हो गया... पौत्र जन्म पर बमुश्किल 3 माह का वीजा मिला था और चलते वक्त बेटे ने प्रश्न किया... "सब कुछ चेक कर लिया ना...? कुछ रह तो नहीं गया...?" क्या जबाब देते कि... *अब छूटने को* *बचा ही क्या है...!* 😑 *सेवानिवृत्ति* की शाम पी.ए. ने याद दिलाया... "चेक कर लें सर...! कुछ रह तो नहीं गया...? " थोड़ा रूका और सोचा कि पूरी जिन्दगी तो यहीं आने-जाने में बीत गई... *अब और क्या रह गया होगा...?* 😑 *श्मशान* से लौटते वक्त बेटे ने एक बार फिर से गर्दन घुमाई एक बार पीछे देखने के लिए... पिता की चिता की सुलगती आग देखकर मन भर आया... भागते हुए गया पिता के चेहरे की झलक तलाशने की असफल कोशिश की और वापिस लौट आया। दोस्त ने पूछा... "कुछ रह गया था क्या...?" भरी आँखों से बोला... *नहीं कुछ भी नहीं रहा अब...* *और जो कुछ भी रह गया है...* *वह सदा मेरे साथ रहेगा...!* 😑 *एक* बार समय निकालकर सोचें, शायद... पुराना समय याद आ जाए, आंखें भर आएं और... *आज को जी भर जीने का* *मकसद मिल जाए...!* सभी दोस्तों से ये ही बोलना चाहता हूँ... *यारों क्या पता कब* *इस जीवन की शाम हो जाये...!* इससे पहले कि ऐसा हो सब को गले लगा लो, दो प्यार भरी बातें कर लो... *ताकि कुछ छूट न जाये...!!!* 🙏 🙏

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