Shyam Yadav
Shyam Yadav Feb 22, 2021

🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞 🌹👣🌹 || गुरुभक्तियोग कथा अमृत || 🙏 22/02/2021 *◆स्वामी रामतीर्थ जी के जीवन का वह प्रसंग जो आपकी दृष्टि गुरुमय कर देगी◆* ➡ गुरूभक्तियोग के अभ्यास सर्वोच्च शांति के राजमार्ग का प्रारंभ होता है। गुरूभक्तियोग दिव्य सुख के द्वार खोलने के लिए गुरुचाबी है। दो वस्तुएं है – या तो तुम अपने ऊपर भरोसा रखो। लेकिन इसमें खतरा है या तो गुरु की आँखो पर भरोसा रखो। लक्ष्मणजी को जनकपुर देखने के लिए जाना था, तब रामजी ने गुरु विश्वामित्र से कहा कि मैं नगर दिखा लाता हूँ। विश्वामित्र जी ने कहा कि लखन जाकर खुद देख आयेगा…आप क्यों? तो कहा कि नहीं महाराज वह अपनी आँखों से देखेगा तो कहीं गुमराह हो सकता है, कहीं भुलावे में पड़ सकता है। मैं अपनी आँखों से उसे दिखाकर लाता हूँ। कोई महात्मा कहा करते थे कि दूसरों में चित्रानुवेशन यह साधक में बहुत बड़ा दुर्गुण है। फिर से कहता हूँ, बहुत बड़ा दुर्गुण है। इस दुर्गुण से साधक को बचना चाहिए। इसने ऐसा किया, वो ऐसा करता है। इसे दोषदृष्टि कहते हैं। इसे ही सांसारिक तुच्छ दृष्टि कहते हैं। आप यदि किसी भी महान व्यक्तित्व के जीवन को निहारे तो आपको पता चलेगा कि उनकी दृष्टि ओर से भिन्न थी, उनका नजरिया भिन्न था, दृष्टिकोण भिन्न था। महान व्यक्तित्व के पीछे सद्गुरु की दृष्टि होती हैअर्थात व्यक्ति तभी उच्च शिखर को निहार सकता है जब उसके पास सद्गुरु का दृष्टिकोण हो, सद्गुरु की दृष्टि हो। साधक के लिए उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसे अपने गुरु की दृष्टि अर्थात दृष्टिकोण, नजरिया प्राप्त हो जाये। माने साधक साधक ना बचे, उसके द्वारा गुरु ही निहारे। यह बहुत दुर्लभ और सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। सौभाग्य से यदि इस पतित जीव को सद्गुरु मिल भी जाते हैं तो भी यह जीव पुरुषार्थ न करता हुआ अंधा ही बना रहता है। भगवान श्रीराम जी भी अपने भक्तों के परीक्षार्थ की कि किसकी कैसी दृष्टि है? एकबार सबसे पूछ बैठे कि– "कह प्रभु ससि महू मैं चतकाई? कहउँ कह निज निज मति भाई? कि बताओ, "चंद्रमा में यह दाग क्यों है?" सर्वप्रथम सुग्रीव ने कहा कि प्रभु! वास्तव में चंद्रमा में हमारी ही पृथ्वी की छाया देख पड़ती रही है। यह कालिमा उसीका प्रतिबिंब है। किसी दूसरे वानर ने अपना मत रखा। ऐसे सभीने अपना मत रखा। किसीने कहा कि चंद्रमा को राहु ने परास्त कर दिया था, वह घायल हो गया था, उसीका घांव है। किसीने कुछ और कहा। इसतरह कईयों ने चांद के उस धब्बे को तरह-2 के रूपों में देखा। यह दृष्टि-2 का अंतर था। परंतु इन सबके बीच एक दृष्टि और थी, जो सबसे अनोखी थी। यह दृष्टि थी श्री हनुमानजी की। वह चंद्रमा के श्यामलता के बारे में क्या सोच रहे थे। यह जानने की उत्सुकता सभी को थी। जब सबने अपना-अपना मत दे दिया तो अंत में भगवान ने अपना कृपा कटाक्ष श्री हनुमानजी पर डाला। प्रभु की दृष्टि पड़ते ही उनकी रोमावली खिल उठी। प्रभु मंद मुस्कान के साथ कहने लगे– अंजनिपुत्र! क्या तुम अपना कोई मत प्रस्तुत नहीं करोगे? तुम भी कहो, आखिर चांद में यह कालिमा क्यों है?" रामभक्त हनुमानजी ने निमिशमात्र प्रभु को निहारा और फिर चंद्रमा पर अपनी आंखें स्थिर कर दी। दुबारा प्रभु को देखा और फिर चंद्रमा को। इसप्रकार कुछ देर तक यहीं खेल चलता रहा। कुतूहलवश स्वयं रामजी ने प्रश्न कर दिया कि हनुमान! उत्तर क्यों नहीं देते? यह क्या कर रहे हो? अब श्रीहनुमान ने चांद की श्यामलता की सटीक और सुंदर व्याख्या की। कि हे प्रभु!मेरी मंदमति के अनुसार तो मैं इस कालिमा की विषय में यही समझ पाया हूँ कि – *कह हनुमंत सुनत ससि तुम्हार प्रियदास!* *तब मूरति बिधु उर बसति,* *सोई श्याम ता आभास!* हे रघुनंदन! वास्तव में आपके अनेक प्रिय दासों में से चंद्रदेव भी एक है। वे भी आपके एक सेवक, आपके विरही प्रेमी है। इसलिए उन्होंने आपकी प्यारी मूरत को हृदय में बसाया हुआ है। क्योंकि आप श्यामवर्ण के हैं, सो यह श्यामलता आपके रूप की ही छाया है। चंद्र के हृदय में रामचंद्र का निवास है। प्रभु ! कहना होगा कि आपके रूप आकर्षण से चंद्रदेव भी अछूते न रह पाये। देखिए ना कैसे लोभी बन उन्होंने आपको अपने हृदयमंदिर में ही छिपा लिया है। भक्त का उत्तर सुनकर रघुनंदन अत्यंत प्रसन्न हो उठे। सच! यह एक गुरुभक्त का दृष्टिकोण है, एक शिष्य की प्रेममय दृष्टि है। ऐसी भावबगी नजर है जो सृष्टि में प्रकृति के खंड-खंड में अपने गुरुदेव, अपने प्रभु का ही दर्शन करती है। *तेरी मूरत मन में बसी ऐसे* *हर नजारे को तुझसे सरसार देखा!* *जमीं के जर्रो की तो बात ही क्या?* *हमने फ़लक के चांद को तेरा रिझकवार देखा!* स्वामी रामतीर्थ को सूरदास ने पूछा की मुझे पहुंचा दोगे वहां? कही जगह का नाम लेते हुए… स्वामी रामतीर्थ ने कुछ जबाब नहीं दिया। इतने करुणावादी संत थे फिर भी कुछ नहीं बोले। उस सूरदास ने फिर पूछा…तब भी कोई जबाब नहीं। तीसरी बार पूछा… कोई जबाब नहीं। एक व्यक्ति पीछे आ रहा था। उसने यह बात सुनी तो स्वामीजी के पास जाकर कहा– महाराज आप कैसे महात्मा है? महात्मा तो परमार्थी होते हैं। यह अंधा बिचारा कब से पूछ रहा है कि मुझे वहां पहुंचा दोगे…और आप है कि कोई जबाब ही नहीं देते। स्वामी रामतीर्थ ने कहा, मैं अंधे को पहुंचाता नहीं…मेरा काम तो अंधे को दृष्टि देना है, ताकि भविष्य में किसीको रास्ता पूछना ही ना पड़े। स्वामी रामतीर्थ के पास सद्गुरु की दृष्टि थी। गुरु ऐसी आँख दे देते हैं कि किसीके पास फिर झुकना नहीं पड़ता। ऐसी दिव्य दृष्टि दे देते हैं कि पूरा संसार उसके लिए जाना-पहचाना हो जाता हैं। एकबार स्वामी रामतीर्थ बैठे थे। उनके पास गुरु की दृष्टि आ चुकी थी। टेहरी गड़वाल के जंगलों में वह शांत बैठे रहते और कोई उनसे मिलने आता तब रामतीर्थ चट्टान दिखाते और कहते, बादशाह राम आपको तख्त पर बिठाता है, बैठिये। पत्थर के चट्टान को तख्त कहते थे, क्योंकि उनकी दृष्टि गुरुमय हो गई थी। एकबार ब्रिटेन से हिंदुस्तान आ रहे थे। जहाज में बैठे। उस समय देशपर अंग्रेजों का शासन था। कोई व्हाइसरॉय भी उसी जहाज में बम्बई आ रहा था। उसी समय जहाज के कप्तान ने स्वामीजी को कहा कि महाराज! आज बड़ा अच्छा योग बन गया कि हिंदुस्तान का बादशाह भी इसी जहाज से हिंदुस्तान आ रहा है। स्वामीजी ने पूछा– "हिंदुस्तान का बादशाह…?" तो कहा–"हां, व्हाइसरॉय जा रहा है।" स्वामी रामतीर्थ जहाज से उतर गये। कप्तान ने कहा–"महाराज! जहाज जानेवाली है।" सद्गुरु की दृष्टि प्राप्त किया हुआ उस बादशाह ने कहा– "जाने दो।" कप्तान ने पूछा–"क्यों?" तो स्वामी ने कहा कि एक जहाज में दो बादशाह नहीं जा सकते। जाने दो उसको। यह जो मस्ती थी, यह जो फकीरी थी वह गुरु का दृष्टिकोण था। यह गुरु की दृष्टि थी, जो स्वामी रामतीर्थ ने आत्मसात की थी। अपने आप को बादशाह कहते थे। अमेरिका में लोगों ने पत्थर मारे, गालियां दी तो मुस्कुराते हुए बादशाह ने कहा अपने शिष्यों से कि आज स्वामी राम को बहुत मारा, पीटा गया। तो शिष्यों पूछा कि आप… आप वे ही तो है! तो कहा कि नहीं जिसको चोट लगती है वह दूसरा है और मैं दूसरा हूँ। यह गुरु का दृष्टिकोण है। *गोसाईं मारी आँखों ने पहरों जरी।* *तब नजरें निरखु हूं,* *दुनिया ना रंगों ने समता थी आजु खरी।* *गोसाईं मारी आँखों ने पहरों जरी।* 🌿🙏👣🙏🌿🌿🙏👣🙏🌿🙏

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           || गुरुभक्तियोग कथा अमृत ||
                              🙏
22/02/2021

*◆स्वामी रामतीर्थ जी के जीवन का वह प्रसंग जो आपकी दृष्टि गुरुमय कर देगी◆*

➡ गुरूभक्तियोग के अभ्यास सर्वोच्च शांति के राजमार्ग का प्रारंभ होता है। गुरूभक्तियोग दिव्य सुख के द्वार खोलने के लिए गुरुचाबी है। दो वस्तुएं है – या तो तुम अपने ऊपर भरोसा रखो। लेकिन इसमें खतरा है या तो गुरु की आँखो पर भरोसा रखो।

लक्ष्मणजी को जनकपुर देखने के लिए जाना था, तब रामजी ने गुरु विश्वामित्र से कहा कि मैं नगर दिखा लाता हूँ।

 विश्वामित्र जी ने कहा कि लखन जाकर खुद देख आयेगा…आप क्यों?

तो कहा कि नहीं महाराज वह अपनी आँखों से देखेगा तो कहीं गुमराह हो सकता है, कहीं भुलावे में पड़ सकता है। मैं अपनी आँखों से उसे दिखाकर लाता हूँ।

कोई महात्मा कहा करते थे कि दूसरों में चित्रानुवेशन यह साधक में बहुत बड़ा दुर्गुण है। फिर से कहता हूँ, बहुत बड़ा दुर्गुण है। इस दुर्गुण से साधक को बचना चाहिए। इसने ऐसा किया, वो ऐसा करता है। इसे दोषदृष्टि कहते हैं। इसे ही सांसारिक तुच्छ दृष्टि कहते हैं। 

आप यदि किसी भी महान व्यक्तित्व के जीवन को निहारे तो आपको पता चलेगा कि उनकी दृष्टि ओर से भिन्न थी, उनका नजरिया भिन्न था, दृष्टिकोण भिन्न था। महान व्यक्तित्व के पीछे सद्गुरु की दृष्टि होती हैअर्थात व्यक्ति तभी उच्च शिखर को निहार सकता है जब उसके पास सद्गुरु का दृष्टिकोण हो, सद्गुरु की दृष्टि हो। साधक के लिए उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसे अपने गुरु की दृष्टि अर्थात दृष्टिकोण, नजरिया प्राप्त हो जाये। माने साधक साधक ना बचे, उसके द्वारा गुरु ही निहारे। यह बहुत दुर्लभ और सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। सौभाग्य से यदि इस पतित जीव को सद्गुरु मिल भी जाते हैं तो भी यह जीव पुरुषार्थ न करता हुआ अंधा ही बना रहता है।

भगवान श्रीराम जी भी अपने भक्तों के परीक्षार्थ की कि किसकी कैसी दृष्टि है? एकबार सबसे पूछ बैठे कि–
 "कह प्रभु ससि महू मैं चतकाई?
कहउँ कह निज निज मति भाई?

कि बताओ, "चंद्रमा में यह दाग क्यों है?"

सर्वप्रथम सुग्रीव ने कहा कि प्रभु! वास्तव में चंद्रमा में हमारी ही पृथ्वी की छाया देख पड़ती रही है। यह कालिमा उसीका प्रतिबिंब है।

किसी दूसरे वानर ने अपना मत रखा। ऐसे सभीने अपना मत रखा। किसीने कहा कि चंद्रमा को राहु ने परास्त कर दिया था, वह घायल हो गया था, उसीका घांव है। किसीने कुछ और कहा। इसतरह कईयों ने चांद के उस धब्बे को तरह-2 के रूपों में देखा। यह दृष्टि-2 का अंतर था। परंतु इन सबके बीच एक दृष्टि और थी, जो सबसे अनोखी थी। यह दृष्टि थी श्री हनुमानजी की। वह चंद्रमा के श्यामलता के बारे में क्या सोच रहे थे। यह जानने की उत्सुकता सभी को थी। 

जब सबने अपना-अपना मत दे दिया तो अंत में भगवान ने अपना कृपा कटाक्ष श्री हनुमानजी पर डाला। प्रभु की दृष्टि पड़ते ही उनकी रोमावली खिल उठी। प्रभु मंद मुस्कान के साथ कहने लगे– अंजनिपुत्र! क्या तुम अपना कोई मत प्रस्तुत नहीं करोगे? तुम भी कहो, आखिर चांद में यह कालिमा क्यों है?" 

रामभक्त हनुमानजी ने निमिशमात्र प्रभु को निहारा और फिर चंद्रमा पर अपनी आंखें स्थिर कर दी। दुबारा प्रभु को देखा और फिर चंद्रमा को। इसप्रकार कुछ देर तक यहीं खेल चलता रहा। कुतूहलवश स्वयं रामजी ने प्रश्न कर दिया कि हनुमान! उत्तर क्यों नहीं देते? यह क्या कर रहे हो? 

अब श्रीहनुमान ने चांद की श्यामलता की सटीक और सुंदर व्याख्या की। कि हे प्रभु!मेरी मंदमति के अनुसार तो मैं इस कालिमा की विषय में यही समझ पाया हूँ कि –

*कह हनुमंत सुनत ससि तुम्हार प्रियदास!*
*तब मूरति बिधु उर बसति,*
*सोई श्याम ता आभास!*

हे रघुनंदन! वास्तव में आपके अनेक प्रिय दासों में से चंद्रदेव भी एक है। वे भी आपके एक सेवक, आपके विरही प्रेमी है। इसलिए उन्होंने आपकी प्यारी मूरत को हृदय में बसाया हुआ है। क्योंकि आप श्यामवर्ण के हैं, सो यह श्यामलता आपके रूप की ही छाया है। चंद्र के हृदय में रामचंद्र का निवास है। प्रभु ! कहना होगा कि आपके रूप आकर्षण से चंद्रदेव भी अछूते न रह पाये। देखिए ना कैसे लोभी बन उन्होंने आपको अपने हृदयमंदिर में ही छिपा लिया है।

 भक्त का उत्तर सुनकर रघुनंदन अत्यंत प्रसन्न हो उठे। सच! यह एक गुरुभक्त का दृष्टिकोण है, एक शिष्य की प्रेममय दृष्टि है। ऐसी भावबगी नजर है जो सृष्टि में प्रकृति के खंड-खंड में अपने गुरुदेव, अपने प्रभु का ही दर्शन करती है। 

*तेरी मूरत मन में बसी ऐसे*
*हर नजारे को तुझसे सरसार देखा!*
*जमीं के जर्रो की तो बात ही क्या?*
*हमने फ़लक के चांद को तेरा रिझकवार देखा!*
 स्वामी रामतीर्थ को सूरदास ने पूछा की मुझे पहुंचा दोगे वहां? कही जगह का नाम लेते हुए…
स्वामी रामतीर्थ ने कुछ जबाब नहीं दिया। इतने करुणावादी संत थे फिर भी कुछ नहीं बोले। उस सूरदास ने फिर पूछा…तब भी कोई जबाब नहीं। तीसरी बार पूछा… कोई जबाब नहीं। 

एक व्यक्ति पीछे आ रहा था। उसने यह बात सुनी तो स्वामीजी के पास जाकर कहा– महाराज आप कैसे महात्मा है? महात्मा तो परमार्थी होते हैं। यह अंधा बिचारा कब से पूछ रहा है कि मुझे वहां पहुंचा दोगे…और आप है कि कोई जबाब ही नहीं देते। 

स्वामी रामतीर्थ ने कहा, मैं अंधे को पहुंचाता नहीं…मेरा काम तो अंधे को दृष्टि देना है, ताकि भविष्य में किसीको रास्ता पूछना ही ना पड़े। स्वामी रामतीर्थ के पास सद्गुरु की दृष्टि थी। गुरु ऐसी आँख दे देते हैं कि किसीके पास फिर झुकना नहीं पड़ता। ऐसी दिव्य दृष्टि दे देते हैं कि पूरा संसार उसके लिए जाना-पहचाना हो जाता हैं।

एकबार स्वामी रामतीर्थ बैठे थे। उनके पास गुरु की दृष्टि आ चुकी थी। टेहरी गड़वाल के जंगलों में वह शांत बैठे रहते और कोई उनसे मिलने आता तब रामतीर्थ चट्टान दिखाते और कहते, बादशाह राम आपको तख्त पर बिठाता है, बैठिये। पत्थर के चट्टान को तख्त कहते थे, क्योंकि उनकी दृष्टि गुरुमय हो गई थी। 

एकबार ब्रिटेन से हिंदुस्तान आ रहे थे। जहाज में बैठे। उस समय देशपर अंग्रेजों का शासन था। कोई व्हाइसरॉय भी उसी जहाज में बम्बई आ रहा था। उसी समय जहाज के कप्तान ने स्वामीजी को कहा कि महाराज! आज बड़ा अच्छा योग बन गया कि हिंदुस्तान का बादशाह भी इसी जहाज से हिंदुस्तान आ रहा है।

स्वामीजी ने पूछा– "हिंदुस्तान का बादशाह…?"

तो कहा–"हां, व्हाइसरॉय जा रहा है।"

स्वामी रामतीर्थ जहाज से उतर गये। 

कप्तान ने कहा–"महाराज! जहाज जानेवाली है।" 

सद्गुरु की दृष्टि प्राप्त किया हुआ उस बादशाह ने कहा– "जाने दो।"

कप्तान ने पूछा–"क्यों?"

तो स्वामी ने कहा कि एक जहाज में दो बादशाह नहीं जा सकते। जाने दो उसको। 

यह जो मस्ती थी, यह जो फकीरी थी वह गुरु का दृष्टिकोण था। यह गुरु की दृष्टि थी, जो स्वामी रामतीर्थ ने आत्मसात की थी। अपने आप को बादशाह कहते थे। 

अमेरिका में लोगों ने पत्थर मारे, गालियां दी तो मुस्कुराते हुए बादशाह ने कहा अपने शिष्यों से कि आज स्वामी राम को बहुत मारा, पीटा गया। 

तो शिष्यों पूछा कि आप… आप वे ही तो है!

 तो कहा कि नहीं जिसको चोट लगती है वह दूसरा है और मैं दूसरा हूँ।

यह गुरु का दृष्टिकोण है।
*गोसाईं मारी आँखों ने पहरों जरी।*
*तब नजरें निरखु हूं,*
*दुनिया ना रंगों ने समता थी आजु खरी।*
*गोसाईं मारी आँखों ने पहरों जरी।*

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dhruv wadhwani Feb 22, 2021
भगवान श्री राम ओम हनुमते नमः शुभ रात्रि जी

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Vinod Kumar Rana Mar 4, 2021

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Shyam Yadav Mar 5, 2021

*श्री विजय कुमार गोस्वामी की संक्षिप्त जीवन गाथा* *गुरु से मुलाक़ात कैसे?(भाग 3 )* *गुरुभक्तियोग_कथा_अमृत* गुरु कृपा आत्मा का अंतर दर्शन कराती हैं गुरु कृपा से जीवन का मर्म समझ मे आ जाता है सच्चा आराम दैवी गुरु की सेवा मे ही निहित है ऐसा दूसरा कोई सच्चा आराम नहीं है। वेदांत की थोड़ी बहुत पुस्तके स्वतंत्र रीति से पड़ लेने के बाद यू कहना कि न गुरु है न शिष्य है यह सत्य के खोजी के लिए एक महान भूल है। "उप" माने पास "नि" माने नीचे "षद" माने बैठना उपनिषद माने आचार्य के पास नीचे बैठना। शिष्यों का समूह ब्रह्म के सिद्धांत का रहस्य जानने के लिए आचार्य के पास बैठता है पावनकारी गुरु को दंडवत प्रणाम करने के बाद उनकी ओर पीठ करके नहीं जाना चाहिए। विजय कृष्ण गोस्वामी जी के संबंध मे कल सुना कि उनकी मुलाक़ात कई योगी, तपस्वी, सन्यासी और योगसिद्ध महापुरुषों से भी हुई परन्तु उन्हे सभी ने यही कहा कि तुम्हारे गुरु तुम्हारा इंतजार कर रहे है हम तुम्हे दीक्षित नहीं कर सकते। एक बार गोस्वामी जी का गया शहर मे आना हुआ वहां वे गोविंद चन्द्र रक्षित के घर ठहरे इनकी प्रवृत्ति प्रकृति देखकर एक दिन रक्षित महाशय ने कहा कि यहां के आकाश गंगा पहाड़ पर बाबा रघुवर दास रहते है सुनता हू कि बड़े सिद्ध पुरुष है आकाश गंगा पहाड़ सिद्ध योगियों के लिए उपर्युक्त है अंधे को क्या चाहिए दो आंखे। रक्षित जी की बातो ने उन्हें आकर्षित किया गोस्वामी जी ने कहा चलो कल सभी सवेरे वहां चलेंगे सिद्ध योगियों से ज्ञान की प्राप्ति होगी। आकाश गंगा पहाड़ पर आते ही गोस्वामी जी ने देखा बहुत दूर एक बाबा बैठे हाथ के इशारे से इन्हे बुला रहे है बाबा के समीप आते ही गोस्वामी जी उनके चरणों पर गिर पड़े और कहा कि मेरे उपर दया करें। मैं धर्म के बारे मे कुछ नही जानता। बाबा ने कहा निराश होने की आवश्यकता नहीं तुम्हे सिद्धि प्राप्त होगी तुम तो कृपा पात्र हो समय आने दो तुम्हारे गुरु अवश्य तुम्हे दीक्षित करेंगे। मैं तुम्हे दीक्षा नहीं दे सकता इसके बाद दोनों व्यक्ति धर्म चर्चा मे संलग्न हो गए बाबा के पास एक ब्रह्मचारी भी रहते थे सेवक गोस्वामी जी यहां नित्य बाबा से मिलने आते थे एक दिन वे बाहर बैठे ब्रह्मचारी से बाते कर रहे थे तभी कुछ चरवाहे बालक पास आए उन मे से एक बालक ने कहा इस पर्वत पर एक साधु महाराज बैठे है। गोस्वामी जी के मन मे उत्सुकता हुई अपने मित्र को साथ मे लेकर वे पहाड़ पर गए वहां जाने पर गोस्वामी जी ने देखा कि एक संत बैठे है उनके शरीर से दिव्य ज्योति निकल रही है पहाड़ पर गोस्वामी जी के आते ही उन संत ने अपनी आंखे खोली और वो मधुर दृष्टि गोस्वामी जी के ऊपर डाल दी। गोस्वामी जी की स्थति ऐसी थी कि *न पीने का शौक था न पिलाने का शौक था* *हमे तो नजरे मिलाने का शौक था* *पर नजरे भी उनसे मिला बैठे जिन्हें नजरो से पिलाने का शौक था* ये वही दृष्टि है सतगुरु की जो शिष्य ही समझ पाता है। आंख चार होते ही गोस्वामी के अंतर मे भक्ति की ज्वार उमड़ पड़ी आंखो से अश्रुधारा बह पड़ी अब ना पूछना पड़ा कि आप मुझे दीक्षा देंगे और ना ही कहना पड़ा कि आप मेरे गुरु बन जाइए ये मिलन की वो घड़ी थी जो हृदय बयान कर रहा था लेकिन आंखे गवाह थी साथ लाए फल फूल गोस्वामी जी ने उन महापुरुष के चरणों मे रख दिया कुछ देर बातचीत करने के बाद चले आए इसके बाद ऐसा रंग लगा कि वे नित्य वहां जाया करते दर्शन के लिए एक दिन अकेले जाना पड़ा साथ कोई मित्र न आया उस दिन वहां जाते ही गोस्वामी जी की भक्ति और उमड़ पड़ी यहां तक कि वो रो पड़े उन्हे अचानक रोते देखकर महात्मा जी ने पास मे बुलाया और उन्हें अपनी गोद मे बिठाकर दीक्षा दी बीज मंत्र दिया। मंत्र पाते ही गोस्वामी जी को लगा जैसे बिजली का एक झटका सारे शरीर की तंत्रियों को झकझोर गया बाद मे महात्मा जी उन्हे साधना की विभिन्न प्रणाली के बारे मे उन्हे बताने लगे सहसा यह सब करते करते गोस्वामी जी बेहोश हो गए। काफी देर बाद होश आने पर उन्होंने चकित भाव से देखा कि वहां से गुरुदेव अंतर्धान हो गए है इधर उधर काफी देर तक वे गुरुदेव की तलाश मे चक्कर काटने के बाद घर वापस आ गए। आखिर एक दिन इनके हृदय की तृष्णा शांत हुई उस दिन वे राम शीला पहाड़ पर घूमने गए थे सहसा उनके गुरु वहां दिखाई दिए गोस्वामी जी के हाथ को पकड़कर गुरुदेव ने कहा कि मेरे लिए इतना व्याकुल होने की आवश्यकता नहीं, वक्त आने पर तुम्हे सब कुछ मिल जाएगा। साधना करते रहो कठोर साधना से ही साधक को ही इच्छित सामग्री मिलती है। गुरुदेव के दर्शन मात्र से ही वे आनंद से विभोर हो उठे थे गोस्वामी जी के गुरुदेव का नाम था ब्रह्मानंद स्वामी। अधिकतर वे मानसरोवर मे रहते और कभी कभी वे शिष्यों से मिलने चले आया करते थे एक दिन बातचीत के सिलसिले मे गोस्वामी जी ने अपने गुरुदेव से पूछा गुरुदेव शास्त्रों मे जितनी सिद्धि की बाते है क्या वह सब सत्य है? गुरुदेव ने कहा क्या तुम्हे विश्वास नही होता शास्त्रों की बातो पर? जी नहीं होता। गुरुदेव ने कहा शास्त्रों मे जिन सिद्धियों का वर्णन है वह सब तपस्या के जरिए प्राप्त किया जा सकता है परन्तु आत्म सिद्ध केवल गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। मैं तुम्हे इन सिद्धियों को दिखा सकता हूं इसके बाद गोस्वामी जी को अपने साथ लेकर गुरुदेव एक निर्जन स्थान मे आए एक के बाद एक करके उन्होंने सभी सिद्धियां दिखाई। कभी हवा से छोटा बनकर पक्षी की तरह आकाश मे उड़ने लगे कभी अणु बनकर पहाड़ को भेदते हुए दूसरी और निकल गए इस प्रकार अष्ट सिद्धियों का प्रयोग उन्होंने किया। यहां तक कि सूक्ष्म शरीर के रूप मे वे मृत शरीर मे प्रवेश कर गए जब कि उनका शरीर यहां मृतावस्था मे पड़ा रहा यह सारा दृश्य देखकर गोस्वामी रोमांचित हो उठे। गुरुदेव ने मुस्कराते हुए पूछा अब भी विश्वास हुआ या नहीं? गोस्वामी जी ने सिर हिलाकर स्वीकार करते हुए गुरुदेव को प्रणाम किया। उधर दूसरी तरफ उनके मित्रो को यह लगा कि अभी यह गृहस्थी छोड़कर कहीं और चले जाएंगे और उन्होंने गोस्वामी जी की पत्नी को इस विषय मे सूचना दे दी। गुरु अपने शिष्य की दैवी शक्तियों को जाग्रत करते हैं प्रथम तो अपने गुरु को, आध्यात्मिक आचार्य को खोज लो। जो आपको अनंत, शाश्वत, चेतन्य प्रवाह के साथ एकत्व साधन मे सहाय कर सके गुरु महाराज के प्रति सम्पूर्ण आज्ञा पालन का भाव रखना यह शिष्यत्व की नींव है गुरु से मिलने की उत्कठ इच्छा और उनकी सेवा करना सेवा करने की तीव्र आकांक्षा मुमुक्तवा की निशानी है। 🌿🙏👣🙏🌿🌿🙏👣🙏🌿🙏

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Vinod Kumar Rana Mar 4, 2021

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Rajesh Kumar Mar 4, 2021

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Shree Ram Sen Mar 4, 2021

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