#दादूदयाल #दादूवाणी #चेतावनीकाअंग #Daduji #महंतबजरंगदासस्वामी *दादू जी महाराज की चेतावनी* १) दादू जे साहिब को भावे नहीं, सो जीव न कीजी रे। परहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजे रे॥चेतावनी का अंग-४॥ To watch on YouTube, click on the link below~ https://youtu.be/kUexqb-jvyQ ——————————————— *अन्य प्रवचन वीडीयो, वाणी के दूसरे अंग को सुनने के लिए हमारे YouTube channel पर जाए- https://www.youtube.com/channel/UCNP3UfP8UfJmn59SVS0ELOQ* ——————————————— *अधिक जानकारी लिए सम्पर्क करें- www.mahantbajrangdasswami.com*

#दादूदयाल #दादूवाणी #चेतावनीकाअंग #Daduji #महंतबजरंगदासस्वामी
*दादू जी महाराज की चेतावनी*
१) दादू जे साहिब को भावे नहीं, सो जीव न कीजी रे।
    परहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजे रे॥चेतावनी का अंग-४॥

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Pawan Saini Mar 8, 2021

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krishna Rawal Mar 6, 2021

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कौन से ऋषि का क्या है महत्व- अंगिरा ऋषि👉 ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी। विश्वामित्र ऋषि👉 गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही। वशिष्ठ ऋषि👉 ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं। कश्यप 👉 मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई। जमदग्नि ऋषि👉 भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे। अत्रि ऋषि👉 सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे। ऋषि👉 अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए। नर और नारायण ऋषि👉 ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे। पराशर ऋषि👉 ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे। भारद्वाज ऋषि👉 बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे। आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय। वेदों के रचयिता ऋषि 👉 ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं। वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- १.वशिष्ठ, २.विश्वामित्र, ३.कण्व, ४.भारद्वाज, ५.अत्रि, ६.वामदेव और ७.शौनक। पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :- वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत। विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।। अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज। इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है। महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय। १. वशिष्ठ👉 राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया। २. विश्वामित्र👉 ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं। माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है। ३. कण्व👉 माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था। ४. भारद्वाज👉 वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी। ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में १० ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के ७६५ मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के २३ मन्त्र मिलते हैं। 'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है। ५. अत्रि👉 ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था। अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी। ६. वामदेव👉 वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं। ७. शौनक👉 शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे। फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है। इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है l 👉C/p

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Pawan Saini Mar 8, 2021

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Rameshanand Guruji Mar 6, 2021

शांता थी राम की बहन, दशरथ ने किसी और को सौंप दी थी 🙏🙏🌹🌹#;;संकलित;; रमेशानंद गुरूजी;;🌹🌹🙏🙏 आज हम आपको बता रहे हैं शांता की कहानी। एक बहन जो हमेशा अपने भाई राम से दूर रही। जानिए राम की बहन कौन थी... शांता अयोध्या के राजा दशरथ और कौशल्या की ही बेटी थीं। वे आयु में चारों भाइयों से काफी बड़ी थीं। उनका विवाह कालांतर में शृंग ऋषि से हुआ था। दशरथ ने अंगदेश के राजा को दे दी थी अपनी बेटी ऐसी मान्यता है कि एक बार अंगदेश के राजा रोमपद और उनकी रानी वर्षिणी अयोध्या आए। उनके कोई संतान नहीं थी जिस वजह से वे बहुत ही दुखी रहते थे। बातचीत के दौरान राजा दशरथ को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा, मैं मेरी बेटी शांता आपको संतान के रूप में दूंगा। रोमपद और वर्षिणी बहुत खुश हुए। उन्हें शांता के रूप में संतान मिल गई। उन्होंने बहुत स्नेह से उसका पालन-पोषण किया और माता-पिता के सभी कर्तव्य निभाए। एक दिन राजा रोमपद अपनी पुत्री से बातें कर रहे थे। तब द्वार पर एक ब्राह्मण आया और उसने राजा से प्रार्थना की कि वर्षा के दिनों में वे खेतों की जुताई में शासन की ओर से मदद प्रदान करें। राजा को यह सुनाई नहीं दिया और वे पुत्री के साथ बातचीत करते रहे। द्वार पर आए नागरिक की याचना न सुनने से ब्राह्मण को दुख हुआ और वे राजा रोमपद का राज्य छोड़कर चले गए। वे इंद्र के भक्त थे। अपने भक्त की ऐसी अनदेखी पर इंद्र देव राजा रोमपद पर क्रुद्ध हुए और उन्होंने पर्याप्त वर्षा नहीं की। अंग देश में नाम मात्र की वर्षा हुई। इससे खेतों में खड़ी फसल मुर्झाने लगी। इस संकट की घड़ी में राजा रोमपद शृंग ऋषि के पास गए और उनसे उपाय पूछा। ऋषि ने बताया कि वे इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करें। ऋषि ने यज्ञ किया और खेत-खलिहान पानी से भर गए। इसके बाद शृंग ऋषि का विवाह शांता से हो गया और वे सुखपूर्वक रहने लगे। कश्यप ऋषि के पौत्र थे शृंग ऋषि पौराणिक कथाओं के अनुसार ऋषि शृंग विभण्डक तथा अप्सरा उर्वशी के पुत्र थे। विभण्डक ने इतना कठोर तप किया कि देवतागण भयभीत हो गये और उनके तप को भंग करने के लिए उर्वशी को भेजा। उर्वशी ने उन्हें मोहित कर उनके साथ संसर्ग किया जिसके फलस्वरूप ऋषि शृंग की उत्पत्ति हुयी। ऋषि शृंग के माथे पर एक सींग (शृंग) था अतः उनका यह नाम पड़ा। ऋषि श्रृंग के यज्ञ के फलस्वरुप ही राम ने लिया था जन्म कालांतर में ऋषि शृंग ने ही दशरथ की पुत्र कामना के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया था। जिस स्थान पर उन्होंने यह यज्ञ करवाये थे वह अयोध्या से लगभग 39 कि.मी. पूर्व में था और वहां आज भी उनका आश्रम है। वहीं पर उनकी और उनकी पत्नी की समाधियां भी हैं। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में शृंग ऋषि का मंदिर भी है। कुल्लू शहर से इसकी दूरी करीब 50 किमी है। इस मंदिर में शृंग ऋषि के साथ देवी शांता की प्रतिमा विराजमान है। यहां दोनों की पूजा होती है और दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। राम की बहन शांता के बारे में अनभिज्ञता का असली कारण तुलसी दास द्वारा लिखी गई रामचरित मानस है, जिसे कथावाचक लोगों को सुनाते रहते हैं। लोग इसी को राम का इतिहास समझ लेते हैं। लोग महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई रामायाण इसलिए नहीं पढ़ते क्योंकि वह संस्कृत में है। जबकि वाल्मीकि रामायण अधिक प्रामाणिक इतिहास माना जाना चाहिए क्योंकि वाल्मीकि राम के समकालीन थे। उन्हीं के आश्रम में ही राम के पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ था। राम के बारे में जो भी जानकारी उनको मिलती थी वह रामायण में लिख लेते थे। रामायण इसलिए भी प्रामाणिक है कि वाल्मीकि रामायण के उत्तर काण्ड के सर्ग 94 श्लोक 1 से 32 के अनुसार राम के दौनों पुत्र लव और कुश ने राम के दरबार में जाकर सबके सामने रामायण सुनाई थी , जिसे राम सहित दरबार में मौजूद सभी लोगों ने सुना था। रामायण में भी हैं शांता के प्रमाण राम की बहन शांता के बारे में जानने के लिए हमें वाल्मीकि रामायण के बालकांड को पढ़ना चाहिए। हम आपके लिए यहां उन श्लोकों को प्रस्तुत कर रहे हैं जिनमें शांता का उल्लेख है। इन्हें ध्यान से पढ़ें, इनका हिंदी अर्थ भी साथ में दिया गया है। इक्ष्वाकूणाम् कुले जातो भविष्यति सुधार्मिकः। नाम्ना दशरथो राजा श्रीमान् सत्य प्रतिश्रवः।। काण्ड 1 सर्ग 11 श्लोक 2 अर्थ - ऋषि सनत कुमार कहते हैं कि इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न दशरथ नाम के धार्मिक और वचन के पक्के राजा थे। अङ्ग राजेन सख्यम् च तस्य राज्ञो भविष्यति। कन्या च अस्य महाभागा शांता नाम भविष्यति।।काण्ड 1 सर्ग 11 श्लोक 3 अर्थ - उनकी शांता नामकी पुत्री पैदा हुई जिसे उन्होंने अपने मित्र अंग देश के राजा रोमपाद को गोद दे दिया, और अपने मंत्री सुमंत के कहने पर उसकी शादी श्रृंगी ऋषि से तय कर दी थी। अनपत्योऽस्मि धर्मात्मन् शांता भर्ता मम क्रतुम्। आहरेत त्वया आज्ञप्तः संतानार्थम् कुलस्य च।।काण्ड 1 सर्ग 11 श्लोक 5 अर्थ - तब राजा ने अंग के राजा से कहा कि मैं पुत्रहीन हूँ, आप शांता और उसके पति श्रृंग ऋषि को बुलवाइए मैं उनसे पुत्र प्राप्ति के लिए वैदिक अनुष्ठान कराना चाहता हूँ। श्रुत्वा राज्ञोऽथ तत् वाक्यम् मनसा स विचिंत्य च। प्रदास्यते पुत्रवन्तम् शांता भर्तारम् आत्मवान्।।काण्ड 1 सर्ग 11 श्लोक 6 अर्थ -दशरथ की यह बात सुन कर अंग के राजा रोमपाद ने हृदय से इसबात को स्वीकार किया, और किसी दूत से श्रृंग ऋषि को पुत्रेष्टि यज्ञ करने के लिए बुलाया। आनाय्य च महीपाल ऋश्यशृङ्गं सुसत्कृतम्। प्रयच्छ कन्यां शान्तां वै विधिना सुसमाहित।। काण्ड 1सर्ग 9 श्लोक 12 अर्थ -श्रृंग ऋषि के आने पर राजा ने उनका यथायोग्य सत्कार किया और पुत्री शांता से कुशलक्षेम पूछ कर रीति के अनुसार सम्मान किया। अन्त:पुरं प्रविश्यास्मै कन्यां दत्त्वा यथाविधि। शान्तां शान्तेन मनसा राजा हर्षमवाप स:।। काण्ड 1 सर्ग10 श्लोक 31 अर्थ -(यज्ञ समाप्ति के बाद) राजा ने शांता को अंतः पुर में बुलाया और रीति के अनुसार उपहार दिए, जिससे शांता का मन हर्षित हो गया।

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Rameshanand Guruji Mar 6, 2021

आखिर भरत ने क्यों मारा था हनुमान को तीर 🙏🙏#;;प्रेषित रमेशानंद गुरुजी;;🙏🙏 "राजा भरत ने राम को तीर मारा था जब वह संजीवनी पर्वत लेकर जा रहते जब श्री राम वनवास पर गए थे उस समय भारत इसी जगह पर तपस्या करने के लिए गया था" पौराणिक कथाओ के अनुसार जब संजीवनी जड़ी बूटी का द्रोण पर्वत लेकर जा रहे तो हनुमान को भरतकोट के राजा भरत ने तीर मार कर निचे उतारा था। वाल्मीकि ने अपने ग्रंथ में इसका वर्णन किया है जिसको कारुपथ नाम दिया है। और अन्य पुराण भी इस बात की पुष्टि करते हैं। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार भगवान श्री राम के वनवास के बाद भरत ने इसी स्थान पर तपस्या की थी। अनेक लोक मान्यता है कि जब पवन पुत्र हनुमान संजीवनी का पर्वत लेकर जा रहे थे, तो भरत ने अपने बाण का प्रयोग से यहीं उतारा था। और फिर पूरी बात जानने के बाद इसी स्थान से लंका भी भेजा। पौराणिक कथा द्वाराहाट व ताकुला में इसका उल्लेख मिलता है की भाटकोट की यह पहाड़ी समुद्र के तल से 9999 फुट उचाई पर स्थित है। रोचक बात यह है कि अत्रि मुनि, गार्गी और ऋषि द्रोण तथा सुखदेव आदि संतों ने यहां कई सालो तक तपस्या की थी। इस जगाय पर उपलब्ध एक से डेढ़ दर्जन त्रिशूल भगवन शिव आराधना का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। पर्वत की मुख्य चोटी पर प्राकृतिक रूप से बना हुआ शिवलिंग भी है, जिसे कलयुग में शिव मंदिर के रूप में स्थापित कर दिया गया। जनश्रुतियों के अनुसार कत्यूर काल में शासकों ने भरतकोट को अपनी तपस्थली के अनुरूप उसके मूल रूप में बरकरार रखा। इसके बाद में चंदवंश के राजाओं ने भी इस सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को उसके अनुरूप ही रहने दिया। यही वजह है की कत्यूर व चंद वंश के वीर खंभ कुमाऊं में नहीं मिलते है। अब इस पौराणिक धरोहर को धार्मिक पर्यटन रूप देने के लिया काम किया जा रहा है। यहाँ के क्षेत्रीय प्रबंधक के अनुसार पर्यटन के नक्शे में इसे सम्मानजनक धार्मिक स्थान देने के लिए बकायदा पर्यटन विभाग का विशेष दल यहाँ का निरीक्षण कर संभावनाएं श्रीरामचरितमानस के लंकाकाण्ड से मेघनाथ के एक दिव्य वार से लक्ष्मण बेहोश होकर धरती पर गिर पड़े और उनके प्राण संकट में आ गये | लंका के ही एक वैद ने लक्ष्मण को प्राण देने वाली संजीवनी बूटी के बारे में बताया । यह कार्य हनुमान को दिया गया पर वहा पहुँच कर हनुमान जी संजीवनी बूटी पहचान न सके और पर्वत ही उखाड़ कर ले जाने लगे। उड़ते उड़ते मार्ग में राम जन्म भूमि अयोध्या आ गयी । आकाश में हनुमान का विशाल रूप देखकर भरत ने उसे राक्षस समझा और उन्हें तीर मार दिया। गिरते समय निकले जब राम का नाम भरत का तीर श्री हनुमान को पैर पर लगा और उनके मुंह से राम राम निकलने लगा | इस तरह महा विशालकाय शरीर से राम का नाम सुनकर भरत को अपने किये पर बहुत ग्लानी हुई | उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया की अनजाने में वे किसी राम भक्त को घायल कर चुके है | वे धरती पर पड़े हुए हनुमान के पास जाकर क्षमा याचना मांगने लगे और उनसे श्री राम के बारे में पूछने लगे | तब हनुमान ने बताया की लक्षमण के प्राण संकट में है और उन्हें जल्दी ही संजीविनी बूटी लेकर उनके पास जाना है | यह सुनकर भरत की आँखे भर आई | भरत के बाण पर चढ़कर पहुंचे राम के पास भरत ने श्री राम का नाम लेकर एक बाण अपने धनुष पर चढ़ाया और हनुमान जी बोले की वे पर्वत सहित इस बाण पर बैठ जाए और शीघ ही लक्ष्मण तक पहुँच जायेंगे |

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