रमाशंकर
रमाशंकर Aug 28, 2017

हिंदुत्व से जुड़े कुछ प्रश्न जो हर भारतीय को जानना चाहिए।

हिंदुत्व से जुड़े कुछ प्रश्न जो हर भारतीय को जानना चाहिए।

#ज्ञानवर्षा
⭕1:- सभी देवी देवताओ ने भारत मे हि जन्म क्यो लिया? क्यो किसी भी देवी देवता को भारत के बाहर कोइ नही जानता ?

उत्तर- जम्बूद्विप के अतिरिक्त सभी स्थान निर्जन थे, मेसोपोटामिया(इराक),मिश्र बाद में लोग जाकर बसे, यही से। अमेरीका, अरब इत्यादि स्थानो पर बंदर और जाहिल तब आदमी बनने की तैयारी कर रहे थे। जम्बूद्विप पुरे विश्व की सभ्यता सबसे पुरानी है।

⭕2:- जितने भी देवी देवता देवताओ की सवारीया है उनमे सिर्फ वही जानवर क्यो है जो कि भारत मे ही पाये जाते है? एसे जानवर क्यो नही जो कि सिर्फ कुछ हि देशो मे पाये जाते है, जैसे कि कंगारु, जिराफ आदी !!

उत्तर-पशुओ की उपयोगीता बताने के लिए
जिराफ़, कंगारु तो डार्विन के सिद्धांत से बने।

⭕3:- सभी देवी देवता हमेशा राज घरानो मे ही जन्म क्यो लेते थे ? क्यो किसी भी देवी देवता ने किसी गरीब या शुद्र के यहा जन्म नही लिया?

उत्तर- प्रश्न गलत है, आज भी सभी के इष्ट देव-देवी है। भगवान शिव का कोई कुल गोत्र नहीं है, जबकि उनका रुद्रावतार अंजनि के घर हनुमान जी के रुप में हुआ। वेद अनुसार वर्ण व्यवस्थता कर्मानुसार थी न की जन्मनुसार जैसा आपकी अल्पबुद्धि समझती है। शास्त्रो और शस्त्रो की विद्या लेने वाला मनुष्य ब्राह्मण या क्षत्रिय ही कहलायेगा, ईश्वर जब अवतरित होते हैं तो उन्हें भी अपने बनाये यम-नियम और भौतिक सिद्धांतो का पालन करना होता है, और यही कारण है की श्रीराम और श्री कृष्ण को भी माँ के गर्भ से ही जन्म लेना पड़ा था, अन्यथा परब्रह्म के लिए क्या यह असंभव है की वह किसी कार्य को करने के लिए जन्मबाध्य हो। यह बात शायाद तुम्हारे सर के ऊपर से निकल जाये।

⭕4:- पोराणीक कथाओ मे सभी देवी देवताओ की दिनचर्या का वर्णन है जैसे कि कब पार्वती ने चंदन से स्नान किया, कब गणेश के लिये लड्डु बनाये, गणेश ने कैसे लड्डु खाये.. आदी  लेकीन जैसे हि ग्रंथो कि स्क्रीप्ट खत्म हो गयी भगवानो कि दिनचर्या भी खत्म.. तो क्या बाद में सभी देवीदेवताऔ का देहांत हो गया ?? अब वो कहाँ है? उनकी औलादे कहाँ है?

उत्तर-ब्रम्हा जी के 100 वर्ष के जीवन काल से सुस्पष्ट है, हमारी आयु अल्प है। यहाँ ब्रह्मा के 100 वर्ष मनुष्य के celestial 100 वर्षो से अलग हैं। अगर तुमने कभी साइंस पढ़ी होगी तो तुमने Quantum Physics में time dilation theory पढ़ी होगी, जिसे खुद आयन्सटॉयन ने भी माना है। पुराणों में और शास्त्रो में ऐसे अनेको ऐसे उदहारण भरे पड़े हैं जिनसे स्पष्ठ होता है की मनुष्य का एक वर्ष देवताओ के कुछ पलो के बराबर है और देवताओ के कई वर्ष ब्रह्मा के कुछ पलो के बराबर। श्रीकृष्ण के सखाओ का इंद्रदेवता द्वारा अपहरण कर देव-लोक लेजाना और उस दौरान पृथ्वी पे कई वर्ष बीत जाना इसका एक उदहारण है। ज्यादा जानकारी के लिए कृपया खुद थोड़ी महनत करे और रेफरेंस मटेरियल पढ़े।

⭕5:- ग्रंथो के अनुसार पुराने समय मे सभी देवी देवताओ का पृथ्वी पर आना-जाना लगा रहता था।
जैसे कि किसी को वरदान देने या किसी पापी का सर्वनाश करने.. लेकीन अब एसा क्या हुआ जो देवी देवताओ ने पृथ्वी पर आना बंद
हि कर दिया??

उत्तर- ब्रह्मा और देवतत्व के समक्ष हमारी अल्पायु के कारण, जैसा की मैंने अभी ऊपर समझाया।

⭕6:- जब भी कोइ पापी पाप फैलाता था तो उसका नाश करने के लिये खुद भागवान किसी राजा के यहा जन्म लेते थे फिर 30-35 की उम्र तक जवान होने के बाद वो पापी का नाश करते थे, ऐसा क्यों?  पापी का नाश जब भगवान खुद हि कर रहे है तो 30-35 साल का इतना ज्यादा वक्त क्यो???  भगवान सिधे कुछ क्यो नही करते?? जीस प्रकार उन्होने अपने खुद के ही भक्तो का उत्तराखण्ड मे नाश किया ?

उत्तर- मर्यादापुरुषोत्म विधान के कारण पाप का घड़ा भरने का इंतजार। सभी जीव प्राणी मनुष्य उस परमपिता की ही संतान हैं, उसी परब्रह्म का अंग हैं।  ईश्वर पापो के प्राश्चित का अवसर सबको देते हैं, न की किसी मजहबी खुदा की तरह काफिरो और नॉन बिलिवर इंफीडल को मारने और उनकी बहु बेटियो का बलात्कार कर कष्ट पहुंचाने का फरमान।

⭕(7) अगर हिन्दू धर्म कई हज़ार साल पुराना है, तो फिर भारत के बाहर इसका प्रचार-प्रसार क्यों नहीं हुआ और एक भारत से बाहर के धर्म “इस्लाम-ईसाई” को इतनी मान्यता कैसे हासिल हुई? वो आपके अपने पुरातन हिन्दू धर्म से ज़्यादा अनुयायी कैसे बना सका? हिन्दू देवी-देवता उन्हें नहीं रोक रहें??

उत्तर-हिन्दू धर्म सम्पूर्ण मानव के लिए है। हिन्दू धर्म के अतिरिक्त सभी ज्ञात पंथ मानव ने ही बनाया। हिन्दू धर्म ही सर्वव्याप्त है, आज ज्यादातर हिन्दू पूजास्थलों पे मलेछो ने कब्ज़ा कर अपने अपने धर्मस्थल बना रखे हैं। इसका सबसे बड़ा सबूत मदीन (शाब्दिक अर्थ: मरुस्थल; आज का मदीना) है जहाँ राजा भोज के पश्चात मलेछो का राज हो गया और आज भी वहाँ मुसलमान हिन्दू रीति रिवाजो तहत ब्राह्मणों की तरह बाल मुण्डवा के श्वेत वस्त्र धारण कर सात चक्कर लगाते हैं जो की हिन्दू रिवाज है। अगर हिन्दू धर्म सर्वव्याप्त नहीं होता तो दुनिया के आधे देशो के नाम में "स्थान" न आता; उदहारण के लिए पाकिस्थान, अफ़ग़ानिस्थान (असली नाम: उपगणस्थान~ a place inhabited by allied tribes, उपगण इसलिए क्योंकि यहाँ अनेको जातियाँ थी जिसकी वजह से इस क्षेत्र का नाम उपगणस्थान पड़ा; गण यानी जातियाँ), तुर्कमेंइस्थान इत्यादियो के नाम संस्कृत में न होते। जापान से लेकर मक्का मदीना तक, रूस से लेकर मलेशिया तक गणेश मूर्तियाँ और भगवान् शिव के शिवलिंग मिलना और आज भी होना हिन्दू धर्म के सर्वव्यापी होने का सबसे बड़ा सबूत है। कंबोडिया में सूर्यबरमण द्वारा निर्मित अंगकोरवट मंदिर भी इसी कड़ी का पात्र है। हिन्दुकुश की पहाड़ियां जो आज भी हिन्दुओ की निर्मम हत्या में बहाये खून की दास्तान सुनाती है इसका एक बहुत बड़ा सबूत है।

⭕(8) अगर हिन्दू धर्म के अनुसार एक
जीवित पत्नी के रहते, दूसरा विवाह अनुचित है, तो फिर राम के पिता दशरथ ने चार विवाह किस नीति अनुसार किये थे?

उत्तर- राजा दशरथ ने अन्य रानियों की सहमति से राजगद्दी के उत्तरदायी हेतु पुत्र मोह में अन्य विवाह किये थे। प्रजापत्य विवाह अनुसार राजा दशरथ ने आने वाले समय अनुसार अपना राजधर्म निभाते हुए
अपनी प्रजा को एक राजा देने के लिए सभी विवाह धर्मानुसार किये थे। मुहम्मद और आज के मुसलमान एवं इसाइयो की तरह पैशाचिक और राक्षसी विवाह नहीं किये थे जिनका मकसद केवल बच्चे पैदा कर अपनी जनसँख्या बढ़ाना था।

⭕(9) अगर शिव के पुत्र गनेश की गर्दन शिव ने काट दी, तो फिर यह कैसा भगवान है?? जो उस कटी गर्दन को उसी जगह पर क्यों नहीं जोड़ सका??क्यों एक पिरपराध जानवर (हाथी) की हत्या करके उसकी गर्दन गणेश की धढ पर लगाई?  एक इंसान के बच्चे के धढ़ पर हाथी की गर्दन कैसे फिट आ गयी?

उत्तर- गणेश जन्म की कहानी और गज को मिले वरदान की कहानी दुबारा पढ़ें, सब सुस्पष्ट हो जायेगा।

⭕(10) अगर हिन्दू धर्म में मांसाहार वर्जित है, तो फिर राम स्वर्णमृग (हिरन) को मारने क्यों गए थे? क्या मृग हत्या जीव हत्या नहीं है?

उत्तर- आखेट खेलना क्षत्रियों का मनोरंजन होता है। मांस भक्षण चाण्डालों का जो आज के मुसलमान और इसाई हैं।

⭕(11) राम अगर भगवान है, तो फिर उसको यह क्यों नहीं पता था कि रावण की नाभि में अमृत है?
अगर उसको घर का भेदी ना बताता कि रावण की नाभि में अमृत है, तो उस युद्ध में रावण कभी नहीं मारा जाता। क्या भगवन ऐसा होता है?

उत्तर-मर्यादापुरुषोत्म होने के कारण, ईश्वर स्वम अपने बनाये नियम भी नहीं तोड़ते और यह बात रावण को भी पता थी, नियमों का पालन यदि अनिवार्य नहीं होता तो ईश्वर को श्री कौशलया देवी जी के गर्भ से जन्म लेकर अवतरित होने की भी जरुरत नहीं पड़ती।

⭕(12) तुम कहते हो कि कृष्ण तुम्हारे भगवन हैं, तो क्या नहाती हुई निर्वस्त्र गोपीयों को छुपकर देखने वाला व्यक्ति, भगवान हो सकता है? अगर ऐसा काम कोई व्यक्ति आज के दौर में करे, तो हम उसे छिछोरा-नालायक कहते हैं।  तो आप कृष्ण को भगवान क्यों कहते हो?

उत्तर-''प्रेम-योग'' को विस्तार से पढ़े। उद्धव द्वारा वर्णित-जो कंस के बुलावे पर श्री कृष्ण को लेने गये थे।

⭕(13) हिन्दूओ में बलात्कारीयों का प्रमाण अधिक क्यों होते हैं?

उत्तर- बलात्कार जैसे घिनोने कुकर्म इस्लाम, यहूद और ईसाइयत की देन है। कृपया google पर सर्च करके पढ़े, इतिहास भरा पड़ा है सैंकड़ो उदाहरणों से। इसका सबसे अच्छा स्रोत्र Megasthenes द्वारा लिखी इंडिका या रानी पद्मावती की कहानी है, कृपया इन्हें पढ़ने का कष्ठ उठायें। भारत में अब्राहम के अनुयायियों (यहूदी, इसाई, मुसलमान) की जनसंख्या अब पहले से कही अधिक बढ़ चुकी है, इसिलिए आये दिन ऐसी घटनाएं होती है, न यकीन आये तो मुजफ्फरनगर के दंगो की जड़ का पता लगाएं और आज तक लंबित बलात्कारियो के नाम पता कर लीजिये सच्चाई स्वम सामने आ जायेगी।

⭕(14) शिव के लिंग (पेनिस) की पूजा क्यों करते हैं? क्या उनके शरीर में कोई और चीज़ पूजा के क़ाबिल नहीं?

उत्तर- लिंग शब्द अर्थ penis नही अपितु प्रतीक (symbol) होता है संस्कृत अनुसार। परन्तु आप को आपके माता पिता ने न तो इतनी शिक्षा दी की आप इसका अर्थ समझ सकें और न ही आपके आतंकवादी मदरस्सो में यह सब पढ़ाया जाता होगा।

⭕(15) खुजराहो के मंदिरों में काम-क्रीड़ा और उत्तेजक चित्र हैं, फिर ऐसे स्थान को मंदिर क्यों कहा जाता है? क्या काम-क्रीडा, हिन्दू धर्मानुसार पूजनीय है?

उत्तर- मन्दिर और देवालय में अन्तर समझे, जिसे आप जैसे मन्दबुद्धि केवल वासना का साधन समझते हैं वही इस जगत का सत्य है जिससे जीवनक्रिया निरन्तर काल दर काल, पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। आपके दिमाग में कामवासना को लेकर गंदगी भरी पड़ी है, इसीलिए आप रति क्रिया को गन्दी नजरो से देखते हैं। पर आप जैसे यह भूल जाते हैं की आपके माँ-बाप ने रति क्रिया नहीं की होती तो न आप इस दुनिया में आ पाते न आपके अब्बूजान।

जय श्री राम #जय_शिव_शम्भु #हर_हर_महादेव 🙏

Pranam Water Jyot +150 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 230 शेयर

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Binod Mahato Aug 28, 2017
मुझे गय्त्री मन्त्र का अर्थ जानना है कृपया करे

रमाशंकर Aug 29, 2017
वेदों का एक महत्त्वपूर्ण मंत्र है जिसकी महत्ता ॐ के लगभग बराबर मानी जाती है। यह यजुर्वेद के मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः और ऋग्वेद के छंद 3.62.10 के मेल से बना है। इस मंत्र में सवित्र देव की उपासना है इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के उच्चारण और इसे समझने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। गायत्री गायत्री मन्त्र गायत्री मन्त्र संबंधित हिन्दू देवी आवास सत्य लोक मंत्र ॐ भू: भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् अस्त्र-शस्त्र वेद और कमंडल जीवनसाथी ब्रह्मा वाहन हंस द वा ब 'गायत्री' एक छन्द भी है जो ऋग्वेद के सात प्रसिद्ध छंदों में एक है। इन सात छंदों के नाम हैं- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, विराट, त्रिष्टुप् और जगती। गायत्री छन्द में आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण होते हैं। ऋग्वेद के मंत्रों में त्रिष्टुप् को छोड़कर सबसे अधिक संख्या गायत्री छंदों की है। गायत्री के तीन पद होते हैं (त्रिपदा वै गायत्री)। अतएव जब छंद या वाक के रूप में सृष्टि के प्रतीक की कल्पना की जाने लगी तब इस विश्व को त्रिपदा गायत्री का स्वरूप माना गया। जब गायत्री के रूप में जीवन की प्रतीकात्मक व्याख्या होने लगी तब गायत्री छंद की बढ़ती हुई महिता के अनुरूप विशेष मंत्र की रचना हुई, जो इस प्रकार है: तत् सवितुर्वरेण्यंभर्गोदेवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात् (ऋग्वेद ४,६२,१०) गायत्री महामंत्र संपादित करें ॐ भूर्भुव स्वः। तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ हिन्दी में भावार्थ उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे। परिचय संपादित करें यह मंत्र सर्वप्रथम ऋग्वेद में उद्धृत हुआ है। इसके ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सविता हैं। वैसे तो यह मंत्र विश्वामित्र के इस सूक्त के १८ मंत्रों में केवल एक है, किंतु अर्थ की दृष्टि से इसकी महिमा का अनुभव आरंभ में ही ऋषियों ने कर लिया था और संपूर्ण ऋग्वेद के १० सहस्र मंत्रों में इस मंत्र के अर्थ की गंभीर व्यंजना सबसे अधिक की गई। इस मंत्र में २४ अक्षर हैं। उनमें आठ आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। किंतु ब्राह्मण ग्रंथों में और कालांतर के समस्त साहित्य में इन अक्षरों से पहले तीन व्याहृतियाँ और उनसे पूर्व प्रणव या ओंकार को जोड़कर मंत्र का पूरा स्वरूप इस प्रकार स्थिर हुआ: (१) ॐ (२) भूर्भव: स्व: (३) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। मंत्र के इस रूप को मनु ने सप्रणवा, सव्याहृतिका गायत्री कहा है और जप में इसी का विधान किया है। गायत्री तत्व क्या है और क्यों इस मंत्र की इतनी महिमा है, इस प्रश्न का समाधान आवश्यक है। आर्ष मान्यता के अनुसार गायत्री एक ओर विराट् विश्व और दूसरी ओर मानव जीवन, एक ओर देवतत्व और दूसरी ओर भूततत्त्व, एक ओर मन और दूसरी ओर प्राण, एक ओर ज्ञान और दूसरी ओर कर्म के पारस्परिक संबंधों की पूरी व्याख्या कर देती है। इस मंत्र के देवता सविता हैं, सविता सूर्य की संज्ञा है, सूर्य के नाना रूप हैं, उनमें सविता वह रूप है जो समस्त देवों को प्रेरित करता है। जाग्रत् में सवितारूपी मन ही मानव की महती शक्ति है। जैसे सविता देव है वैसे मन भी देव है (देवं मन: ऋग्वेद, १,१६४,१८)। मन ही प्राण का प्रेरक है। मन और प्राण के इस संबंध की व्याख्या गायत्री मंत्र को इष्ट है। सविता मन प्राणों के रूप में सब कर्मों का अधिष्ठाता है, यह सत्य प्रत्यक्षसिद्ध है। इसे ही गायत्री के तीसरे चरण में कहा गया है। ब्राह्मण ग्रंथों की व्याख्या है-कर्माणि धिय:, अर्थातृ जिसे हम धी या बुद्धि तत्त्व कहते हैं वह केवल मन के द्वारा होनेवाले विचार या कल्पना सविता नहीं किंतु उन विचारों का कर्मरूप में मूर्त होना है। यही उसकी चरितार्थता है। किंतु मन की इस कर्मक्षमशक्ति के लिए मन का सशक्त या बलिष्ठ होना आवश्यक है। उस मन का जो तेज कर्म की प्रेरण के लिए आवश्यक है वही वरेण्य भर्ग है। मन की शक्तियों का तो पारवार नहीं है। उनमें से जितना अंश मनुष्य अपने लिए सक्षम बना पाता है, वहीं उसके लिए उस तेज का वरणीय अंश है। अतएव सविता के भर्ग की प्रार्थना में विशेष ध्वनि यह भी है कि सविता या मन का जो दिव्य अंश है वह पार्थिव या भूतों के धरातल पर अवतीर्ण होकर पार्थिव शरीर में प्रकाशित हो। इस गायत्री मंत्र में अन्य किसी प्रकार की कामना नहीं पाई जाती। यहाँ एक मात्र अभिलाषा यही है कि मानव को ईश्वर की ओर से मन के रूप में जो दिव्य शक्ति प्राप्त हुई है उसके द्वारा वह उसी सविता का ज्ञान करे और कर्मों के द्वारा उसे इस जीवन में सार्थक करे। गायत्री के पूर्व में जो तीन व्याहृतियाँ हैं, वे भी सहेतुक हैं। भू पृथ्वीलोक, ऋग्वेद, अग्नि, पार्थिव जगत् और जाग्रत् अवस्था का सूचक है। भुव: अंतरिक्षलोक, यजुर्वेद, वायु देवता, प्राणात्मक जगत् और स्वप्नावस्था का सूचक है। स्व: द्युलोक, सामवेद, आदित्यदेवता, मनोमय जगत् और सुषुप्ति अवस्था का सूचक है। इस त्रिक के अन्य अनेक प्रतीक ब्राह्मण, उपनिषद् और पुराणों में कहे गए हैं, किंतु यदि त्रिक के विस्तार में व्याप्त निखिल विश्व को वाक के अक्षरों के संक्षिप्त संकेत में समझना चाहें तो उसके लिए ही यह ॐ संक्षिप्त संकेत गायत्री के आरंभ में रखा गया है। अ, उ, म इन तीनों मात्राओं से ॐ का स्वरूप बना है। अ अग्नि, उ वायु और म आदित्य का प्रतीक है। यह विश्व प्रजापति की वाक है। वाक का अनंत विस्तार है किंतु यदि उसका एक संक्षिप्त नमूना लेकर सारे विश्व का स्वरूप बताना चाहें तो अ, उ, म या ॐ कहने से उस त्रिक का परिचय प्राप्त होगा जिसका स्फुट प्रतीक त्रिपदा गायत्री है। विविध धर्म-सम्प्रदायों मे गायत्री महामंत्र का भाव संपादित करें हिन्दू - ईश्वर प्राणाधार, दुःखनाशक तथा सुख स्वरूप है। हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें। जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर बढ़ाने के लिए पवित्र प्रेरणा दें। यहूदी - हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ-प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा। शिंतो - हे परमेश्वर, हमारे नेत्र भले ही अभद्र वस्तु देखें परन्तु हमारे हृदय में अभद्र भाव उत्पन्न न हों। हमारे कान चाहे अपवित्र बातें सुनें, तो भी हमारे में अभद्र बातों का अनुभव न हो। पारसी - वह परमगुरु (अहुरमज्द-परमेश्वर) अपने ऋत तथा सत्य के भंडार के कारण, राजा के समान महान है। ईश्वर के नाम पर किये गये परोपकारों से मनुष्य प्रभु प्रेम का पात्र बनता है। दाओ (ताओ) - दाओ (ब्रह्म) चिन्तन तथा पकड़ से परे है। केवल उसी के अनुसार आचरण ही उ8ाम धर्म है। जैन - अर्हन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार तथा सब साधुओं को नमस्कार। बौद्ध धर्म - मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, मैं संघ की शरण में जाता हूँ। कनफ्यूशस - दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार न करो, जैसा कि तुम उनसे अपने प्रति नहीं चाहते। ईसाई - हे पिता, हमें परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा क्योंकि राज्य, पराक्रम तथा महिमा सदा तेरी ही है। इस्लाम - हे अल्लाह, हम तेरी ही वन्दना करते तथा तुझी से सहायता चाहते हैं। हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपापात्र बने, न कि उनका, जो तेरे कोपभाजन बने तथा पथभ्रष्ट हुए। सिख - ओंकार (ईश्वर) एक है। उसका नाम सत्य है। वह सृष्टिकर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भय, र्निवैर, जन्मरहित तथा स्वयंभू है। वह गुरु की कृपा से जाना जाता है। बहाई - हे मेरे ईश्वर, मैं साक्षी देता हूँ कि तुझे पहचानने तथा तेरी ही पूजा करने के लिए तूने मुझे उत्पन्न किया है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई परमात्मा नहीं है। तू ही है भयानक संकटों से तारनहार तथा स्व निर्भर। गायत्री उपासना का विधि-विधान संपादित करें गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है। हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकाण्डों के साथ की गयी उपासना अति फलदायी मानी गयी है। तीन माला गायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है। शौच-स्नान से निवृत्त होकर नियत स्थान, नियत समय पर, सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहिए। उपासना का विधि-विधान इस प्रकार है - (१) ब्रह्म सन्ध्या - जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिए की जाती है। इसके अंतर्गत पाँच कृत्य करने होते हैं। (अ) पवित्रीकरण - बाएँ हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढँक लें एवं मंत्रोच्चारण के बाद जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें। ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु। (ब) आचमन - वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें। हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए। ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा। ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा। ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा। (स) शिखा स्पर्श एवं वंदन - शिखा के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे। निम्न मंत्र का उच्चारण करें। ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते। तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥ (द) प्राणायाम - श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है। श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए। ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ। (य) न्यास - इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके। बाएँ हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों को उनमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें। ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु। (मुख को) ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु। (नासिका के दोनों छिद्रों को) ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु। (दोनों नेत्रों को) ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु। (दोनों कानों को) ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु। (दोनों भुजाओं को) ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु। (दोनों जंघाओं को) ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु। (समस्त शरीर पर) आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि सााधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो। पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं। (२) देवपूजन - गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतम्भरा गायत्री है। उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें। भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापित हो रही है। ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि। गायत्रिच्छन्दसां मातः! ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते॥ ॐ श्री गायत्र्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, ततो नमस्कारं करोमि। (ख) गुरु - गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है। सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन निम्न मंत्रोच्चारण के साथ करें। ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः। गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। (ग) माँ गायत्री व गुरु सत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने हेतु पंचोपचार द्वारा पूजन किया जाता है। इन्हें विधिवत् संपन्न करें। जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं। एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें। जल का अर्थ है - नम्रता-सहृदयता। अक्षत का अर्थ है - समयदान अंशदान। पुष्प का अर्थ है - प्रसन्नता-आंतरिक उल्लास। धूप-दीप का अर्थ है - सुगंध व प्रकाश का वितरण, पुण्य-परमार्थ तथा नैवेद्य का अर्थ है - स्वभाव व व्यवहार में मधुरता-शालीनता का समावेश। ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किये जाते हैं। कर्मकाण्ड के पीछे भावना महत्त्वपूर्ण है। (३) जप - गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पंद्रह मिनट नियमित रूप से किया जाए। अधिक बन पड़े, तो अधिक उत्तम। होठ हिलते रहें, किन्तु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें। जप प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए माला की जाय एवं भावना की जाय कि हम निरन्तर पवित्र हो रहे हैं। दुर्बुद्धि की जगह सद्बुद्धि की स्थापना हो रही है। (४) ध्यान - जप तो अंग-अवयव करते हैं, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है। साकार ध्यान में गायत्री माता के अंचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है। निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है, जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है। (५) सूर्यार्घ्यदान - विसर्जन-जप समाप्ति के पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में र्अघ्य रूप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है। ॐ सूर्यदेव! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥ ॐ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः॥ भावना यह करें कि जल आत्म सत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट् ब्रह्म का तथा हमारी सत्ता-सम्पदा समष्टि के लिए समर्पित-विसर्जित हो रही है। इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर देवताओं को करबद्ध नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख दिया जाए। जप के लिए माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिए। सूर्योदय से दो घण्टे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है।[1] मौन-मानसिक जप चौबीस घण्टे किया जा सकता है। माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें

Pooja Sharma Oct 19, 2018

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Pooja Ji Oct 19, 2018

*आंखे कितनी भी छोटी क्यो ना हो !!*
*ताकत तो उसमे सारा*
*आसमान देखने*
*की होती है*
*ज़िन्दगी एक हसीन*
*ख़्वाब है ,, ,, जिसमें जीने*
*की चाहत होनी चाहिये*
*ग़म खुद ही ख़ुशी*
...

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PAPPU RAJ Oct 19, 2018

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shivani Oct 19, 2018

वीडियो के लिय यहाँ क्लिक करे 👇👇
https://youtu.be/rVkEkpNCAII

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sudhir singh gaur Oct 19, 2018


आप सब लोग दर्शन जरूर करना
अच्छा ।

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Ram Bilas Verma Oct 19, 2018

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meena pathak Oct 19, 2018

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राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🙏🙏🙏🙏🙏...

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Sangeeta yadav Oct 19, 2018

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