pradip k Patel
pradip k Patel Aug 25, 2019

सकारात्मक सोच का जाद एक ऋषि के दो शिष्य थे जिनमें से एक शिष्य सकारात्मक सोच वाला था वह हमेशा दूसरों की भलाई का सोचता था और दूसरा बहुत नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी भी था एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उनको जंगल में ले गये जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है शिष्य ने कहा कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए फिर दूसरे शिष्या से पूछा कि तुम क्या देखते हो, उसने क्रोधित होते हुए कहा की ये पेड़ बहुत धूर्त है बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीन लेनी चाहिए गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की बढ़ाई की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं उदाहरण के लिए:- गुलाब के फूल को काँटों से घिरा देखकर नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति सोचता है की “इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फ़ायदा इतना सुंदर होने पर भी ये काँटों से घिरा है ” जबकि उसी फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बोलता है की “वाह! प्रकर्ती का कितना सुंदर कार्य है की इतने काँटों के बीच भी इतना सुंदर फूल खिला दिया” बात एक ही है लेकिन फ़र्क है केवल सोच का

सकारात्मक सोच का जाद
एक ऋषि के दो शिष्य थे जिनमें से एक शिष्य सकारात्मक सोच वाला था वह हमेशा दूसरों की भलाई का सोचता था और दूसरा बहुत नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी भी था एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उनको जंगल में ले गये

जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है

शिष्य ने कहा कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए फिर दूसरे शिष्या से पूछा कि तुम क्या देखते हो, उसने क्रोधित होते हुए कहा की ये पेड़ बहुत धूर्त है बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा

इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीन लेनी चाहिए गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की बढ़ाई की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं

उदाहरण के लिए:- गुलाब के फूल को काँटों से घिरा देखकर नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति सोचता है की “इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फ़ायदा इतना सुंदर होने पर भी ये काँटों से घिरा है ” जबकि उसी फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बोलता है की “वाह! प्रकर्ती का कितना सुंदर कार्य है की इतने काँटों के बीच भी इतना सुंदर फूल खिला दिया” बात एक ही है लेकिन फ़र्क है केवल सोच का
सकारात्मक सोच का जाद
एक ऋषि के दो शिष्य थे जिनमें से एक शिष्य सकारात्मक सोच वाला था वह हमेशा दूसरों की भलाई का सोचता था और दूसरा बहुत नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी भी था एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उनको जंगल में ले गये

जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है

शिष्य ने कहा कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए फिर दूसरे शिष्या से पूछा कि तुम क्या देखते हो, उसने क्रोधित होते हुए कहा की ये पेड़ बहुत धूर्त है बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा

इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीन लेनी चाहिए गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की बढ़ाई की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं

उदाहरण के लिए:- गुलाब के फूल को काँटों से घिरा देखकर नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति सोचता है की “इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फ़ायदा इतना सुंदर होने पर भी ये काँटों से घिरा है ” जबकि उसी फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बोलता है की “वाह! प्रकर्ती का कितना सुंदर कार्य है की इतने काँटों के बीच भी इतना सुंदर फूल खिला दिया” बात एक ही है लेकिन फ़र्क है केवल सोच का
सकारात्मक सोच का जाद
एक ऋषि के दो शिष्य थे जिनमें से एक शिष्य सकारात्मक सोच वाला था वह हमेशा दूसरों की भलाई का सोचता था और दूसरा बहुत नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी भी था एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उनको जंगल में ले गये

जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है

शिष्य ने कहा कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए फिर दूसरे शिष्या से पूछा कि तुम क्या देखते हो, उसने क्रोधित होते हुए कहा की ये पेड़ बहुत धूर्त है बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा

इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीन लेनी चाहिए गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की बढ़ाई की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं

उदाहरण के लिए:- गुलाब के फूल को काँटों से घिरा देखकर नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति सोचता है की “इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फ़ायदा इतना सुंदर होने पर भी ये काँटों से घिरा है ” जबकि उसी फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बोलता है की “वाह! प्रकर्ती का कितना सुंदर कार्य है की इतने काँटों के बीच भी इतना सुंदर फूल खिला दिया” बात एक ही है लेकिन फ़र्क है केवल सोच का
सकारात्मक सोच का जाद
एक ऋषि के दो शिष्य थे जिनमें से एक शिष्य सकारात्मक सोच वाला था वह हमेशा दूसरों की भलाई का सोचता था और दूसरा बहुत नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी भी था एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उनको जंगल में ले गये

जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है

शिष्य ने कहा कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए फिर दूसरे शिष्या से पूछा कि तुम क्या देखते हो, उसने क्रोधित होते हुए कहा की ये पेड़ बहुत धूर्त है बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा

इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीन लेनी चाहिए गुरु जी हँसते हुए पहले शिष्य की बढ़ाई की और दूसरे शिष्य से भी उससे सीख लेने के लिए कहा सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं

उदाहरण के लिए:- गुलाब के फूल को काँटों से घिरा देखकर नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति सोचता है की “इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फ़ायदा इतना सुंदर होने पर भी ये काँटों से घिरा है ” जबकि उसी फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति बोलता है की “वाह! प्रकर्ती का कितना सुंदर कार्य है की इतने काँटों के बीच भी इतना सुंदर फूल खिला दिया” बात एक ही है लेकिन फ़र्क है केवल सोच का

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एक मार्मिक लघुकथा श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ अरे! भाई बुढापे का कोई ईलाज नहीं होता . अस्सी पार चुके हैं*. अब बस सेवा कीजिये ." डाक्टर पिता जी को देखते हुए बोला . "डाक्टर साहब ! कोई तो तरीका होगा . साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है ." "शंकर बाबू ! मैं अपनी तरफ से दुआ ही कर सकता हूँ . बस आप इन्हें खुश रखिये . इस से बेहतर और कोई दवा नहीं है और इन्हें लिक्विड पिलाते रहिये जो इन्हें पसंद है ." डाक्टर अपना बैग सम्हालते हुए मुस्कुराया और बाहर निकल गया . शंकर पिता को लेकर बहुत चिंतित था . उसे लगता ही नहीं था कि पिता के बिना भी कोई जीवन हो सकता है . माँ के जाने के बाद अब एकमात्र आशीर्वाद उन्ही का बचा था . उसे अपने बचपन और जवानी के सारे दिन याद आ रहे थे . कैसे पिता हर रोज कुछ न कुछ लेकर ही घर घुसते थे . बाहर हलकी-हलकी बारिश हो रही थी . ऐसा लगता था जैसे आसमान भी रो रहा हो . शंकर ने खुद को किसी तरह समेटा और पत्नी से बोला - "सुशीला ! आज सबके लिए मूंग दाल के पकौड़े , हरी चटनी बनाओ . मैं बाहर से जलेबी लेकर आता हूँ ." पत्नी ने दाल पहले ही भिगो रखी थी . वह भी अपने काम में लग गई . कुछ ही देर में रसोई से खुशबू आने लगी पकौड़ों की . शंकर भी जलेबियाँ ले आया था . वह जलेबी रसोई में रख पिता के पास बैठ गया . उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें निहारते हुए बोला - "बाबा ! आज आपकी पसंद की चीज लाया हूँ . थोड़ी जलेबी खायेंगे ." पिता ने आँखे झपकाईं और हल्का सा मुस्कुरा दिए . वह अस्फुट आवाज में बोले - "पकौड़े बन रहे हैं क्या ?" "हाँ, बाबा ! आपकी पसंद की हर चीज अब मेरी भी पसंद है . अरे! सुषमा जरा पकौड़े और जलेबी तो लाओ ." शंकर ने आवाज लगाईं . "लीजिये बाबू जी एक और . " उसने पकौड़ा हाथ में देते हुए कहा . "बस ....अब पूरा हो गया . पेट भर गया . जरा सी जलेबी दे ." पिता बोले . शंकर ने जलेबी का एक टुकड़ा हाथ में लेकर मुँह में डाल दिया . पिता उसे प्यार से देखते रहे . "शंकर ! सदा खुश रहो . मेरा दाना पानी अब पूरा हुआ ." पिता बोले . *बाबा ! आपको तो सेंचुरी लगानी है . आप मेरे तेंदुलकर हो .*" आँखों में आंसू बहने लगे थे . वह मुस्कुराए और बोले - "तेरी माँ पेवेलियन में इंतज़ार कर रही है . अगला मैच खेलना है . तेरा पोता बनकर आऊंगा , तब खूब खाऊंगा बेटा ." पिता उसे देखते रहे . शंकर ने प्लेट उठाकर एक तरफ रख दी . मगर पिता उसे लगातार देखे जा रहे थे . आँख भी नहीं झपक रही थी . शंकर समझ गया कि यात्रा पूर्ण हुई . तभी उसे ख्याल आया , पिता कहा करते थे "श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौआ बनकर, जो खिलाना है अभी खिला दे। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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क्षमादान से बडा कोई यज्ञ नहीं... 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 क्षमः यशः क्षमा दानं क्षमः यज्ञः क्षमः दमः । क्षमा हिंसा: क्षमा धर्मः क्षमा चेन्द्रियविग्रहः ॥ अर्थात् :- क्षमा ही यश है क्षमा ही यज्ञ और मनोनिग्रह है ,अहिंसा धर्म है। और इन्द्रियों का संयम क्षमा के ही स्वरूप है क्योंकि क्षमा ही दया है और क्षमा ही पुण्य है क्षमा से ही सारा जगत् टिका है अतः जो मनुष्य क्षमावान है वह देवता कहलाता है। वही सबसे श्रेष्ठ है। वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच श्रेष्ठता का निर्णय इसी गुण ने तो किया था। ब्रह्मा जी विश्वामित्र के घोर तप से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें राजर्षि कहकर संबोधित किया। विश्वामित्र इस वरदान से संतुष्ट न थे। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से जाहिर कर दिया कि ब्रह्मा उन्हें समुचित पुरस्कार नहीं दे रहे। ब्रह्माजी ने कहा- तुम्हें बहुत ज़ल्दी आभास हो जाएगा कि आखिर मैंने ऐसा क्यों कहा। जो चीज़ तुम्हें मैं नहीं दे सकता उसे तुम उससे प्राप्त करो जिससे द्वेष रखते हो। विश्वामित्र के लिए यह जले पर नमक छिड़कने की बात हो गयी। जिस वसिष्ठ से प्रतिशोध के लिए राजा से तपस्वी बने हैं उनसे वरदान लेंगे! ब्रह्मा अपने पुत्र को श्रेष्ठ बताने के लिए भूमिका बांध रहे हैं। विश्वामित्र सामान्य बात को भी आन पर ले लेते थे इसलिए राजर्षि ही रहे जबकि वशिष्ठ क्षमा की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने यह भूला दिया कि विश्वामित्र ही उनके पुत्र शक्ति की हत्या के लिए उत्तरदायी हैं। वह अपनी पत्नी अरुंधति से विश्वामित्र केे तप की प्रशंसा किया करते थे। एकदिन विश्वामित्र हाथ में तलवार लिए वशिष्ठ की हत्या करने चुपके से आश्रम में घुसे थे। उन्होंने वशिष्ठ और अरुंधति को बात करते देखा। वशिष्ठ कह रहे थे- अरुंधति! तपस्वी हो तो विश्वामित्र जैसा। हाथ से तलवार छूट गई। राजर्षि विश्वामित्र वशिष्ठ के चरणों में लोट गए- हा देव! क्षमा! हा देव क्षमा! इसके अलावा कुछ निकलता ही न था मुख से। वशिष्ठ ने कहा- उठिए ब्रह्मर्षि विश्वामित्र! देवो ने पुष्पवर्षा करके वशिष्ठ का अनुमोदन कर दिया। क्षमा गुण धारण करने के कारण वशिष्ठ वह वरदान देने में समर्थ थे जो स्वयं ब्रह्मा न दे सके। बड़े दिल वाला व्यक्ति आरम्भ में मात खा सकता है परंतु अंतिम बाज़ी उसी के हाथ होती है। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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🌹 *||श्री हरि:||* 🌹 दो चींटियों का दृष्टान्त दिया है संतों ने । एक नमक के ढेले पर रहने वाली चींटी की एक मिश्री के ढेलेपर रहने वाली चींटी से मित्रता हो गयी । मित्रता के नाते वह उसे अपने नमक के ढेले पर ले गयी और कहा–‘खाओ !’ वह बोली–‘क्या खायें,यह भी कोई मीठा पदार्थ है क्या ?’ नमक के ढेले पर रहने वाली ने उससे पूछा कि ‘मीठा क्या होता है, इससे भी मीठा कोई पदार्थ है क्या ?’ तब मिश्री पर रहनेवाली चींटी ने कहा–‘यह तो मीठा है ही नहीं । मीठा तो इससे भिन्न ही जाति का होता है ।’ परीक्षा कराने के लिये मिश्री पर रहने वाली चींटी दूसरी चींटी को अपने साथ ले गयी । नमक पर रहने वाली चींटी ने यह सोचकर कि ‘मैं कहीं भूखी न रह जाऊँ’ छोटी-सी नमक की डली अपने मुँह में पकड़ ली । मिश्री पर पहुँचकर मिश्री मुँह में डालने पर भी उसे मीठी नहीं लगी । मिश्री पर रहनेवाली चींटी ने पूछा–‘मीठा लग रहा है न ?’ वह बोली–‘हाँ-में-हाँ तो कैसे मिला दूँ ?बुरा तो नहीं मानोगी ? मुझे तो कोई अन्तर नहीं प्रतीत होता है, वैसा ही स्वाद आ रहा है ।’ उस मिश्री पर रहने वाली चींटी ने विचार किया–‘बात क्या है ? इसे वैसा ही–नमक का स्वाद कैसे आ रहा है !’ उसने मिश्री स्वयं चखकर देखी, मीठी थी । वह सोचने लगी–‘बात क्या है !’ उसने पूछा–‘आते समय तुमने कुछ मुँह में रख तो नहीं लिया था ?’ इस पर वह बोली–‘भूखी न रह जाऊँ,इसलिये छोटा-सा नमक का टुकड़ा मुँह में डाल लिया था ।’ उसने कहा–‘निकालो उसे ।’ जब उसने नमक की डली मुँह में से निकाल दी, तब दूसरी ने कहा–‘अब चखो इसे ।’ अबकी बार उसने चखा तो वह चिपट गयी । पूछा–‘कैसा लगता है ?’ तो वह इशारे से बोली–‘बोलो मत,बस खाने दो ।’ इसी प्रकार सत्संगी भाई-बहन सत्संग की बातें तो सुनते हैं, पर धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदि को पकड़े-पकड़े सुनते हैं । साधन करने वाला, उसमें रस लेने वाला उनसे पूछता है–‘क्यों ! कैसा आनन्द है ?’ तब हाँ-में-हाँ तो मिला देते हैं, पर उन्हें रस कैसे आये ? नमक की डली जो मुँह में पड़ी है । मन में उद्देश्य तो है धन आदि पदार्थों के संग्रह का, भोगों का और मान-पद आदि का । अत: इनका उद्देश्य न रखकर *केवल परमात्मा की प्राप्ति का उद्देश्य बनाना चाहिये। राधे राधे... 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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दुःख ईश्वर का प्रसाद है 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 जब भगवान सृष्टि की रचना कर रहे तो उन्होंने जीव को कहा कि तुम्हे मृतुलोक जाना पड़ेगा,मैं सृष्टि की रचना करने जा रहा हूँ. ये सुन जीव की आँखों मे आंसू आ गए.वो बोला प्रभु कुछ तो ऐसा करो की मे लौटकर आपके पास ही आऊ. भगवान को दया आ गई. उन्होंने दो बाते की जीव के लिए. पहला संसार की हर चीज़ मे अतृप्ति मिला दी, कि तुझे दुनिया मे कुछ भी मिल जाये तू तृप्त नहीं होगा. तृप्ति तुझे तभी मिलेगी जब तू मेरे पास आएगा और दूसरा सभी के हिस्से मे थोडा-थोडा दुःख मिला दिया कि हम लौट कर ईश्वर के पास ही पहुचे. इस तरह हर किसी के जीवन मे थोडा दुःख है. जीवन मे दुःख या विषाद हमें ईश्वर के पास ले जाने के लिए है, लेकिन हम चूक जाते है. हमारी समस्या क्या है कि हर किसी को दुःख आता है, हम भागते है ज्योतिष के पास,अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के पास. कुछ होने वाला नहीं. थोड़ी देर का मानसिक संतोष बस. यदि दुखो से घबराये नहीं और ईश्वर का प्रसाद समझ कर आगे बढे तो बात बन जाती है. यदि हम ईश्वर से विलग होने के दिनों को याद कर ले तो बात बन जाती है और जीव दुखो से भी पार हो जाता है. दुःख तो ईश्वर का प्रसाद है. दुखो का मतलब है, ईश्वर का बुलावा है. वो हमें याद कर रहा है पहले भी ये विषाद और दुःख बहुत से संतो के लिए ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बन चुका है. हमें ये बात अच्छे से समझनी चाहिए कि संसार मे हर चीज़ मे अतृप्ति है और दुःख और विषाद ईश्वर प्राप्ति का साधन है. "जय जय श्री राधे " 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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एक बार अकबर के हाथ की ऊँगली बुरी तरह घायल हो गई । अकबर को व्याकुल देख उन्हें ढांढस बंधाने हेतु बीरबल बोले, ‘भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है ।’ इसे सुनकर अकबर को बड़ा गुस्सा आया । उन्होंने फ़ौरन बीरबल को चार दिन के लिए कारागार में डलवा दिया। दूसरे दिन अकबर शिकार खेलने गए । अकेले होने के कारण उनका शिकार में मन नहीं लगा और रास्ता भटककर वे जंगलियों की बस्ती में जा पहुंचे । जंगलियों ने उन्हें पकड़ लिया और बलि चढ़ाने की तैयारी करने लगे । ऐसे में बादशाह को बीरबल की कमी बहुत खली । वे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करूँ । तभी जंगलियों के पुजारी की नज़र अकबर की घायल ऊँगली पर पड़ी तो वह बोला, 'इसे छोड़ दो, इसकी बलि नहीं दी जा सकती, ये खंडित है ।' अकबर को छोड़ दिया गया । जान बचाकर वे अपने राजमहल आए और सोचने लगे की बीरबल ने सही कहा था । अगर आज यह कटी ऊँगली न होती तो मैं तो बलि चढ़ गया होता । उन्होंने महल में आते ही बीरबल को रिहा करवाया और बोले, 'तुमने ठीक कहा था बीरबल, ईश्वर जो करता है अच्छा ही करता है ।’ बादशाह ने बीरबल को पूरी घटना बताई और उससे एक प्रश्न किया, 'अगर मेरी ऊँगली घायल न हुई होती तो आज मैं मारा जाता, परन्तु मैंने तुम्हें कारागार में डाला, इसमें तुम्हारा क्या भला हुआ ?' बीरबल ने कहा, 'जहाँपनाह ! यदि आप मुझे कारागार में न डलवाते तो मैं भी आपके साथ शिकार पर जाता । जाहिर है हम दोनों ही जंगलियों द्वारा पकड़े जाते । तब, आपको तो वह खंडित कहकर छोड़ देते, मगर मैं सही सलामत था, इसलिए मेरी बलि चढ़ा देते । ईश्वर ने मुझे कारागार में डलवाकर अच्छा ही तो किया ।' मित्रों ईश्वर जो करता है हमारे लिए अच्छा ही होता है लेकिन हम जाने अनजाने में चीज़ों को गलत सोच लेते हैं । अगर आपके साथ कुछ बुरा हुआ है तो भी इसमें कहीं ना कहीं आपका भला ही है । इसलिए सदैव सकारात्मक सोचना चाहिए | जय श्री राधे राधे🙏🙏

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Madan mohan Tiwari Jan 25, 2020

🌹 दृढ़ विश्वास 🌹 अनन्याश्चिनतयन्तोमां,,,,,,,,,,,योगक्षेम् वहाम्यहम् । एक राजा था, वह जब भी मंदिर जाता, सिढीयों के पास दो,भिखारी उसके दाएं और बाएं बैठा करते.. . दाईं तरफ़ वाला कहता: "हे ईश्वर, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे.!" . बाईं तरफ़ वाला कहता: "ऐ राजा.! ईश्वर ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे.!" . दाईं तरफ़ वाला भिखारी बाईं तरफ़ वाले से कहता: ईश्वर से माँग वह सबकी सुनने वाला है.. . बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: "चुप कर मुर्ख.." . एक बार राजा ने अपने मंत्री को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो भिखारी बैठता है वह हमेशा ईश्वर से मांगता है तो अवश्य ईश्वर उसकी ज़रूर सुनेगा.. . लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें स्वर्ण मुद्रा डाल दो और वह उसको दे आओ.! . मंत्री ने ऐसा ही किया.. अब वह भिखारी मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे भिखारी को चिड़ाता हुआ बोला: "हुह... बड़ा आया ईश्वर देगा..', यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना.?" . खाते खाते जब इसका पेट भर गया तो इसने बची हुई खीर का बर्तन उस दूसरे भिखारी को दे दिया और कहा: "ले पकड़... तू भी खाले, मुर्ख.." . अगले दिन जब राजा आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला भिखारी तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है.. . राजा नें चौंक कर उससे पूछा: "क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला.?" . भिखारी: "जी मिला था राजा जी, क्या स्वादिस्ट खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी.!" . राजा: "फिर..?!!?" . भिखारी: "फ़िर जब मेरा पेट भर गया तो वह जो दूसरा भिखारी यहाँ बैठता है मैंने उसको दे दी, मुर्ख हमेशा कहता रहता है: ' ईश्वर देगा, ईश्वर देगा तो मेंने कहा ले बाकी की बची हुई तू खा लेना--- . राजा मुस्कुरा कर बोला: "अवश्य ही, ईश्वर ने उसे दे ही दिया.!" *ईश्वर पर भरोसा रखें*. 🙏🏻जय श्री राधे कृष्णा🙏🏻

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Sahil Grover Jan 25, 2020

🙏बहुत ही सुंदर कथा🙏 एक ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजरा बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया किन्तु किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अऩ्न नहीं दिया आखिर दोपहर हो गयी ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा थाः “कैसा मेरा दुर्भाग्य है इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक न मिला ? रोटी बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक न मिला ? इतने में एक सिद्ध संत की निगाह उस पर पड़ी उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली वे बड़े पहुँचे हुए संत थे उन्होंने कहाः “ब्राह्मण तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना ?” ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् आप क्या कह रहे हैं ? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है” संतः “नहीं ब्राह्मण मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं अभी भी वे पिछले जन्म के हिसाब ही जी रहे हैं कोई शेर की योनी से आया है तो कोई कुत्ते की योनी से आया है, कोई हिरण की से आया है तो कोई गाय या भैंस की योनी से आया है उन की आकृति मानव-शरीर की जरूर है किन्तु अभी तक उन में मनुष्यत्व निखरा नहीं है और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता. ‘दूसरे में भी मेरा ही दिलबर ही है’ यह ज्ञान नहीं होता तुम ने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है” ब्राह्मण का चेहरा दुःख रहा था ब्राह्मण का चेहरा इन्कार की खबरें दे रहा था सिद्धपुरुष तो दूरदृष्टि के धनी होते हैं उन्होंने कहाः “देख ब्राह्मण मैं तुझे यह चश्मा देता हूँ इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उस से भिक्षा माँग फिर देख, क्या होता है” ब्राह्मण जहाँ पहले गया था, वहीं पुनः गया योगसिद्ध कला वाला चश्मा पहनकर गौर से देखाः ‘ओहोऽऽऽऽ…. वाकई कोई कुत्ता है कोई बिल्ली है. तो कोई बघेरा है आकृति तो मनुष्य की है लेकिन संस्कार पशुओं के हैं मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं’ घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गया तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो उस में मनुष्यत्व का निखार पाया ब्राह्मण ने उस के पास जाकर कहाः “भाई तेरा धंधा तो बहुत हल्का है औऱ मैं हूँ ब्राह्मण रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ मुझे बड़ी भूख लगी है लेकिन तेरे हाथ का नहीं खाऊँगा फिर भी मैं तुझसे माँगता हूँ क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है” उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे वह बोलाः “हे प्रभु आप भूखे हैं ? हे मेरे रब आप भूखे हैं ? इतनी देर आप कहाँ थे ?” यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर ( रेज़गारी ) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोलाः “हे हलवाई मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो मैं अभी जाता हूँ” यह कहकर मोची भागा घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था उस दिन भी उस ने कई तरह की जूतियाँ पहनीं किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो मंत्री से क्रुद्ध होकर बोलाः “अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे तेरी खबर ले लूँगा” दैव योग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी जिस में मानवता खिली थी, जिस की आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे, चित्त में दया-करूणा थी, ब्राह्मण के संग का थोड़ा रंग लगा था मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ किस मोची ने बनाई है यह जूती ?” मंत्री बोला “हुजूर यह मोची बाहर ही खड़ा है” मोची को बुलाया गया उस को देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली राजा ने कहाः “जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं, पाँच सौ रूपयों वाली जूती है जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो” मोची बोलाः “राजा साहिब तनिक ठहरिये यह जूती मेरी नहीं है, जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ” मोची जाकर विनयपूर्वक ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा साहब यह जूती इन्हीं की है” राजा को आश्चर्य हुआ वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है इस की जूती कैसे ?” राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहा मैं तो ब्राह्मण हूँ यात्रा करने निकला हूँ” राजाः “मोची जूती तो तुम बेच रहे थे इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची ?” मोची ने कहाः “राजन् मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मणदेव की होगी जब रकम इन की है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा तभी तो यह मोची का चोला मिला है अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो ? इसीलिए राजन् ये रूपये मेरे नहीं हुए मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और असली अधिकारी को ले आया” राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ ?” ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष के चश्मे वाली आप के राज्य में पशुओं के दीदार तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का विकास इस मोची में ही नज़र आया” राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा जरा हम भी देखें” राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारी वगैरह में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ? उस ने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर उस के आश्चर्य की सीमा न रही ‘ ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ ’ राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है वे योगी महाराज कहाँ होंगे ?” ब्राह्मणः “वे तो कहीं चले गये ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं” श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं, बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते ब्राह्मण ने आगे कहाः ‘राजन् अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्प योनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है लेकिन सर्प उस को मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है” अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हम में मनुष्यता खिली है ? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है कैसे ? तुलसीदाज जी ने कहा हैः बिगड़ी जनम अनेक की सुधरे अब और आजु तुलसी होई राम को रामभजि तजि कुसमाजु कुसंस्कारों को छोड़ दें… बस अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा यह भी तब संभव होगा जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा अतः पशुत्व के संस्कारों को आप निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है सत्संग से मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है 🌹श्री राधे राधे🌹

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सुभद्रा हरण ...... सु भद्रा अर्थात् सुन्दर कल्याण करने वाली ब्रह्म विद्या ही सुभद्रा है । अद्वैतदर्शी ही सुभद्रा है जिसके घर में सुभद्रा हो उसका जीवन कल्याणमय हो सुखी होता है । ब्रह्म विद्या प्राप्ति हेतु त्रिदण्डी सन्यासी बनना पड़ता है । मायावादी एक दण्ड लेते हैं जबकि वैष्णव सन्यासी तीन दण्ड लेते हैं । त्रिदण्ड यह संकेत देता है कि वैष्णव सन्यासी अपने तन , मन , तथा वाणी से श्रीभगवान की सेवा करने का प्रण लेता है। त्रिदण्डी सन्यासी प्रणाली का अस्तित्व दीर्घ काल से रहा है , तथा वैष्णव सन्यासी को त्रिदण्डी अथवा त्रिदण्डी स्वामी या त्रिदण्डी गोस्वामी कहा जाता है । अर्जुन ने त्रिदण्डी सन्यास लेकर चार मास तक कठिन तपश्चर्या की तथा प्रतिदिन अठारह घण्टे ऊँ कार का जप किया तभी प्रभु ने उन्हें सुभद्रा अर्थात ब्रह्मविद्या प्रदान की । प्रभु के लिए सर्वस्व त्याग करना ही सन्यास है ।

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Shiva Gaur Jan 25, 2020

दो बूढ्ढे बुढ्ढी की नोंक-झोंक . इन 60-65 साल के अंकल आंटी का झगड़ा ही ख़त्म नहीं होता... एक बार के लिए मैंने सोचा अंकल और आंटी से बात करूं क्यों लड़ते हैं हरवक़्त, आख़िर बात क्या है... . फिर सोचा मुझे क्या, मैं तो यहाँ मात्र दो दिन के लिए ही तो आया हूँ... मगर थोड़ी देर बाद आंटी की जोर-जोर से बड़बड़ाने की आवाज़ें आयीं तो मुझसे रहा नहीं गया... ग्राउंड फ्लोर पर गया मैं, तो देखा अंकल हाथ में वाइपर और पोंछा लिए खड़े थे... मुझे देखकर मुस्कराये और फिर फर्श की सफाई में लग गए... अंदर किचन से आंटी के बड़बड़ाने की आवाज़ें अब भी रही थीं... कितनी बार मना किया है... फर्श की धुलाई मत करो... पर नहीं मानता बुड्ढा... मैंने पूछा "अंकल क्यों करते हैं आप फर्श की धुलाई?, जब आंटी मना करती हैं तो"... अंकल बोले " बेटा! फर्श धोने का शौक मुझे नहीं इसे है। मैं तो इसीलिए करता हूं ताकि इसे न करना पड़े।"... "ये सुबह उठकर ही फर्श धोने लगेगी इसलिए इसके उठने से पहले ही मैं धो देता हूं" . क्या!... मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। अंदर जाकर देखा आंटी किचन में थीं। "अब इस उम्र में बुढ़ऊ की हड्डी पसली कुछ हो गई तो क्या होगा? मुझसे नहीं होगी खिदमत।" आंटी झुंझला रही थीं। परांठे बना कर आंटी सिल-बट्टे से चटनी पीसने लगीं... मैंने पूछा "आंटी मिक्सी है तो फिर..." "तेरे अंकल को बड़ी पसंद है सिल-बट्टे की पिसी चटनी। बड़े शौक से खाते हैं। दिखाते यही हैं कि उन्हें पसंद नहीं।" उधर अंकल भी नहा धो कर फ़्री हो गए थे। उनकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी, "बेटा, इस बुढ़िया से पूछ! रोज़ाना मेरे सैंडल कहां छिपा देती है, मैं ढूंढ़ता हूं और इसको बड़ा मज़ा आता है मुझे ऐसे देखकर।" मैंने आंटी को देखा वो कप में चाय उड़ेलते हुए मुस्कुराईं और बोलीं, "हां! मैं ही छिपाती हूं सैंडल, ताकि सर्दी में ये जूते पहनकर ही बाहर जाएं, देखा नहीं कैसे उंगलियां सूज जाती हैं इनकी। हम तीनों साथ में नाश्ता करने लगे... इस नोक झोंक के पीछे छिपे प्यार को देख कर मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था। नाश्ते के दौरान भी बहस चली दोनों की। अंकल बोले "थैला दे दो मुझे! सब्ज़ी ले आऊं"... "नहीं कोई ज़रूरत नहीं! थैला भर भर कर सड़ी गली सब्ज़ी लाने की।" आंटी गुस्से से बोलीं। अब क्या हुआ आंटी!... मैंने आंटी की ओर सवालिया नज़रों से देखा और उनके पीछे-पीछे किचन में आ गया।... . "दो कदम चलने में सांस फूल जाती है इनकी, थैला भर सब्ज़ी लाने की जान है क्या इनमें"... "बहादुर से कह दिया है वह भेज देगा सब्ज़ी वाले को।"... " मॉर्निंग वॉक का शौक चर्राया है बुढ़‌ऊ को"... "तू पूछ उनसे! क्यों नहीं ले जाते मुझे भी साथ में।"... "चुपके से चोरों की तरह क्यों निकल जाते हैं?"... आंटी ने जोर से मुझसे कहा। "मुझे मज़ा आता है इसीलिए जाता हूं अकेले।"... अंकल ने भी जोर से जवाब दिया। अब मैं ड्राइंग रूम में था, अंकल धीरे से बोले, "रात में नींद नहीं आती तेरी आंटी को, सुबह ही आंख लगतीं हैं, कैसे जगा दूं चैन की गहरी नींद से इसे। इसीलिए चला जाता हूं, गेट बाहर से बंद कर के।" इस नोक-झोंक पर मुस्कराता, में वापिस फर्स्ट फ्लोर पर आ गया... कुछ देर बाद बालकनी से देखा अंकल आंटी के पीछे दौड़ रहे हैं।... "अरे कहां भागी जा रही हो, मेरे स्कूटर की चाबी ले कर... इधर दो चाबी।" "हां! नज़र आता नहीं पर स्कूटर चलाएंगे। कोई ज़रूरत नहीं। ओला कैब कर लेंगे हम।" आंटी चिल्ला रही थीं। "ओला कैब वाला किडनैप कर लेगा तुझे बुढ़िया।" "हां कर ले! तुम्हें तो सुकून हो ही जाएगा।" अंकल और आंटी की ये बेहिसाब नोंक-झोंक तो कभी ख़त्म नहीं होने वाली थी... मगर मैंने आज समझा कि इस तकरार के पीछे छिपी थी इनकी एक दूसरे के लिए बेशुमार मोहब्बत और फ़िक्र... मैंने आज समझा था कि प्यार वो नहीं जो कोई "कर" रहा है..., प्यार वो है जो कोई "निभा" रहा है... दिल छू गयी कहानी।काश बुढापे की यह नोक झोंक हर किसी की किस्मत में लिखी होती ईश्वर ने।

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