‼️श्रीरामचरित मानस प्रारंभ‼️ ‼️बाल काण्ड ‼️ ‼️प्रथम सोपान ‼️ ‼️भाग-४ ‼️ दोहा: जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान। कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥1॥ भावार्थ:- जैसे सिद्धांजन को नेत्रों में लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अंदर कौतुक से ही बहुत सी खानें देखते हैं॥1॥ चौपाई: गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥ तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥1॥ भावार्थ:- श्री गुरु महाराज के चरणों की रज कोमल और सुंदर नयनामृत अंजन है, जो नेत्रों के दोषों का नाश करने वाला है। उस अंजन से विवेक रूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसाररूपी बंधन से छुड़ाने वाले श्री रामचरित्र का वर्णन करता हूँ॥1॥ चौपाई: बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥ सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥2॥ भावार्थ:- पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो अज्ञान से उत्पन्न सब संदेहों को हरने वाले हैं। फिर सब गुणों की खान संत समाज को प्रेम सहित सुंदर वाणी से प्रणाम करता हूँ॥2॥ चौपाई: साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥ जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥3॥ भावार्थ:- संतों का चरित्र कपास के चरित्र (जीवन) के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। (कपास की डोडी नीरस होती है, संत चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है, कपास उज्ज्वल होता है, संत का हृदय भी अज्ञान और पाप रूपी अन्धकार से रहित होता है, इसलिए वह विशद है और कपास में गुण (तंतु) होते हैं, इसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भंडार होता है, इसलिए वह गुणमय है।) (जैसे कपास का धागा सुई के किए हुए छेद को अपना तन देकर ढँक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढँकता है, उसी प्रकार) संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों) को ढँकता है, जिसके कारण उसने जगत में वंदनीय यश प्राप्त किया है॥3॥ हमारे पेज "सनातन वैदिक धर्म को नीचे दिए लिंक से लाइक करके फेवरेट लिस्ट में रख लीजिए ताकि आपको सत्य सनातन वैदिक हिन्दू हिन्दू धर्म की सम्पूर्ण जानकारियां प्राप्त हो सकें 👇👇👇👇 https://www.facebook.com/sanatanavaidikdharma2020/ सनातन धर्म की समस्त जानकारियों के लिए हमारे फेसबुक ग्रुप " संस्कार संस्कृति और सनातन धर्म" को नीचे दिए लिंक के माध्यम से ज्वॉइन कीजिए👇👇👇 https://www.facebook.com/groups/638083150254281/?ref=share 🚩 जय श्री राम 🚩 🚩 जय सियाराम 🚩 🚩 जय श्री रामचरितमानस 🚩

‼️श्रीरामचरित मानस प्रारंभ‼️
       ‼️बाल काण्ड ‼️
      ‼️प्रथम सोपान ‼️

          ‼️भाग-४ ‼️

दोहा:
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥1॥

भावार्थ:-
जैसे सिद्धांजन को नेत्रों में लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अंदर कौतुक से ही बहुत सी खानें देखते हैं॥1॥

चौपाई:
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥1॥

भावार्थ:-
श्री गुरु महाराज के चरणों की रज कोमल और सुंदर नयनामृत अंजन है, जो नेत्रों के दोषों का नाश करने वाला है। उस अंजन से विवेक रूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसाररूपी बंधन से छुड़ाने वाले श्री रामचरित्र का वर्णन करता हूँ॥1॥

चौपाई:
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥2॥

भावार्थ:-
पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो अज्ञान से उत्पन्न सब संदेहों को हरने वाले हैं। फिर सब गुणों की खान संत समाज को प्रेम सहित सुंदर वाणी से प्रणाम करता हूँ॥2॥

चौपाई:
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥3॥

भावार्थ:-
संतों का चरित्र कपास के चरित्र (जीवन) के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। (कपास की डोडी नीरस होती है, संत चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है, कपास उज्ज्वल होता है, संत का हृदय भी अज्ञान और पाप रूपी अन्धकार से रहित होता है, इसलिए वह विशद है और कपास में गुण (तंतु) होते हैं, इसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भंडार होता है, इसलिए वह गुणमय है।) (जैसे कपास का धागा सुई के किए हुए छेद को अपना तन देकर ढँक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढँकता है, उसी प्रकार) संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों) को ढँकता है, जिसके कारण उसने जगत में वंदनीय यश प्राप्त किया है॥3॥

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🚩 जय श्री राम 🚩
🚩 जय सियाराम 🚩
🚩 जय श्री रामचरितमानस 🚩

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sn.vyas Apr 17, 2021

: ...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने वाले* *भी उसके स्वरूप को लेकर उलझ जाते हैं* *कि ईश्वर निर्गुण है या सगुण !* °"" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" ""° महात्मा तुलसीदास दोनों ही मान्यताओं को स्वीकार करते हैं। *'हिय निर्गुण नैननि सगुण' !* ऐसा कहकर मानस में ईश्वर को बाहर और भीतर सर्वत्र स्वीकार करते हुए इस संघर्ष अथवा विवाद को समाप्त करने की चेष्टा की गई। ईश्वर अन्तर्यामी के रूप में प्रत्येक प्राणी के हृदय में हो, यह तो ठीक है ही, पर भक्त की भावना पूर्ण करने के लिए वह सगुण-साकार रूप भी ग्रहण करता है। प्रातः स्मरणीय गोस्वामीजी का दृष्टिकोण बड़ा उदार और व्यापक है। उनका दृढ़ मत है कि -- *कर्म, उपासन, ज्ञान, वेद-मत सो सब भाँति खरो।* लेकिन भक्ति की महिमा एवं उपादेयता का उद्घोष करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं -- *बिनु बिसवास भगति नहिं,* *तेहि बिनु द्रवहिं न राम।* *रामकृपा बिनु सपनेहुँ,* *जीव न लह बिश्राम।।* सत्, चित् और आनन्द की वास्तविक उपलब्धि के लिए सच्ची आस्था, निश्छल भावना और भक्ति की आवश्यकता है। भक्ति से ही जीवन रससिक्त हो सकता है। भक्ति के बिना तो जीवन शुष्क है। ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास के साथ भक्ति के बिना जीवन में आनन्द रस की सुखानुभूति नहीं हो सकती । भक्ति के मार्ग पर मनुष्य अपनी भावना और ध्यान को सहज अभ्यास से ही केन्द्रित कर सकता है जो अन्यथा दुष्कर है। *'राम ते अधिक राम कर दासा'* -- कितनी उदात्त भावना है कि राम के दास, राम के भक्त, राम के किंकर, राम से भी श्रेष्ठ हैं। ऐसी स्थिति अथवा उपलब्धि तो भक्ति से ही संभव हो सकती है। 👏 🌸 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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sn.vyas Apr 16, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *अगर कोई अहंकार का भार लेकर* *कथा की नाव में बैठेगा तो नाव के* *डूबने की संभावना अधिक रहेगी।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में गोस्वामी जी मानस-रोगों का वर्णन में वहाँ पर वे अत्यन्त सांकेतिक रूप में वर्णन करते हैं कि *जैसे रोग दूर करने के दवा, वैद्य, तथा पथ्य ये तीन साधन हैं। और हमें यह स्पष्ट दिखाई देता है कि रोग की ठीक-ठीक पहचान करने वाला वैद्य अथवा डाक्टर यदि न मिले, तो भी आप ठीक नहीं होंगे। बहुत अच्छी दवा बताने वाला वैद्य भी मिल जाय, पर अगर दवा ही बाजार में नकली मिले, तो नुस्खा किस काम आवेगा ? और असली दवा भी मिल गई, उसे लेकर खाने भी लगे, पर जितनी दवा नहीं खा रहे हों उससे अधिक यदि कुपथ्य कर रहे हों तो फिर दवा फायदा नहीं करेगी।* आगे चलकर कागभुशुण्डि जी मन के रोगों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पहले वैद्य खोजिए। और वह वैद्य है सद्गुरु -- *सदगुरु वैद्य वचन विस्वासा।* रामायण में तो सबसे बड़े सदगुरु भगवान शंकर हैं। और वे शंकर जी सदगुरु के रूप में रावण को प्राप्त हैं । वे ही शंकर जी सती के पति भी हैं, और *'पतिदेव गुरु स्त्रीणाम्'* के रूप में सती जी के भी गुरु हैं। यद्यपि शंकर जी तो त्रिभुवन-गुरु हैं। पर कितनी बड़ी बिडम्बना है ? इसीलिए भगवान राम से शंकर जी ने यही कहा कि प्रभु ! आपने जनकनन्दिनी के वियोग में जो रुदन की लीला की, उसमें तो मुझे बड़ा विचित्र-सा अनुभव हुआ। क्योंकि मैं तो समझे बैठा था कि मैं त्रिभुवन-गुरु हूँ, लेकिन महाराज ! आपके स्वरुप के विषय में भ्रम भी हुआ तो मेरे परिवार में हुआ। या तो सती जी को भ्रम हुआ या रावण को। और एक बात यह बड़ी अनोखी है कि भगवान की भक्ति को सर्वोत्तम औषधि के रुप में स्वीकार करते हुए लिखा गया है कि -- *'रघुपति भगति सजीवनि मूरी।* और ? भक्ति की यही दिव्य दवा सती जी को दी जा रही थी। क्योंकि शंकर जी सती को कथा सुनाने के लिए अगस्त्य जी के पास लेकर गए, और कथा का श्रवण -- *'दूसर रति मम कथा प्रसंगा'* -- के अनुसार भक्ति ही तो है। इसका अभिप्राय है कि यहाँ पर वैद्य भी बहुत बढ़िया हैं, दवा भी सर्वोत्तम है, लेकिन फिर भी बात उल्टी हो गई। क्योंकि सती का रोग बढ़ गया। सती जी भगवान शंकर के साथ कथा में गई। गोस्वामी जी कथा की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि -- *निज संदेह मोह भ्रम हरनी।* *करउँ कथा भव सरिता तरनी।।* १/३० (ख)/४ -- मैं सन्देह, मोह और भ्रम को दूर करने वाली तथा संसाररूपी नदी को पार करने वाली कथा सुना रहा हूँ । ओर आप याद रखिएगा कि *कथा नाव तो है, पर नाव डूबती हुई दिखाई देती है कि नहीं ? इसका सीधा-सा तात्पर्य है कि यद्यपि नाव तो अत्यन्त सुदृढ़ होनी ही चाहिए, पर नाव बहुत बढ़िया होने के बाद भी अगर बैठने वाले व्यक्ति असंतुलित हो जाए, यात्री यदि सम्भल कर न बैठे तो नाव अवश्य डूब जाएगी। क्योंकि बढ़िया नाव में भी जितना बोझ उठाने की सामर्थ्य होगी अगर उससे ज्यादा बोझ लाद दिया जाएगा तो भी नाव डूब जाएगी।* *कथा की नाव में यद्यपि बोझ उठाने की बड़ी सामर्थ्य है लेकिन इतना होते हुए भी कथा की नाव में अहंकार का बोझ उठाने की सामर्थ्य नहीं हैं । अगर कोई अहंकार का भार लेकर कथा की नाव में बैठेगा तो नाव के डूबने की संभावना अधिक रहेगी।* जीवन में लाभ नहीं हो रहा है तो ढूंढ़िये कि कौन-सी कमी रह गई हैं ? कहीं सद्गुरु की कमी तो नहीं रह गई, कहीं कपट-मुनि जैसा नकली गुरु जैसे प्रतापभानु को मिला, वैसे ही हमें भी तो नहीं मिल गया है। कहीं कालनेमि की तरह तो वैद्य नहीं मिल गया ? क्योंकि कालनेमि के समान वैद्य मिलने पर भी समस्या रहेगी। पर अगर भगवान शंकर के समान योग्य वैद्य मिल गया तब तो कोई समस्या ही नहीं है। परन्तु उसके साथ गोस्वामी जी ने यह वाक्य और जोड़ दिया कि -- *सदगुर बैद बचन बिश्वासा।* *संजम यह न विषय के आसा॥* *रघुपति भगति सजीवन मूरी।* *अनूपान श्रद्धामति पूरी॥* *एहि विधि भलेहि सो रोग नसाहीं।* *नाहि त जतन कोटि नहिं जाहीं॥* ७/१२१ (ख)/६-८ -- उन्होंने कहा कि *केवल सद्गुरुरूपी वैद्य के होने से ही काम नहीं चलेगा अपितु उसके वचनों पर विश्वास भी होना चाहिए। भक्ति की दवा हो किन्तु उसके साथ श्रद्धा का अनुपान अवश्य हो। और उसके पश्चात् विषय के कुपथ्य का परित्याग भी हो। जब इतनी वस्तुएँ एकत्रित होती हैं तब कहीं जाकर मन के रोगों का नाश होता है।* यदि हमारे जीवन में लाभ नहीं हो रहा तो आत्मनिरीक्षण करके देखें कि हमसे कोई त्रुटि तो नहीं हो रही है। सती जी का रोग बढ़ गया तो उसके कारण हमें प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। यद्यपि सती जी कथा की नाव में बैठी तो, परन्तु अहंकार लेकर बैठीं कि 'मैं तो दक्ष की पुत्री हूँ।' अगस्त्य जी ने जब पूजन किया तो यह भाव आ गया कि मैं इनकी अपेक्षा श्रेष्ठ हूँ, तो मैं क्या कथा सुनूं, इसलिए कथा का लाभ नहीं हुआ। *वैद्य पर विश्वास होना चाहिए*, किन्तु भगवान् राम के रूप को देखकर जब सती के अन्तःकरण में सन्देह उत्पन्न हुआ, तब भगवान शंकर ने बहुत समझाया किन्तु उनके वचनों पर विश्वास नहीं हुआ इसीलिए सती जी को दुखः उठाना पड़ा। 🔱जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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sn.vyas Apr 15, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *श्रेष्ठता तथा कनिष्ठता का निर्णय* *अपनी मान्यताओं के आधार पर* *करना उचित नहीं है।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° रामायण में ये जो विविध मार्गों का वर्णन किया गया है वे विविध मार्ग हैं क्या ? 'विविध मार्ग' तो यद्यपि कविता की भाषा है किन्तु *विविध मार्ग का अभिप्राय है साधना के विविध रूप।* और इन साधना के विविध रूपों के चुनाव में कैसे भूल होती है इसके एक-दो दृष्टान्त मैं आपके सामने रखूगा। रामायण के जितने पात्र हैं, उनके चरित्र में, उनके जीवन में आपको भिन्नता दिखाई देगी। श्री लक्ष्मण जी, श्री भरतजी, श्री हनुमानजी, ये सब भगवान के महानतम भक्त हैं, पर इनके जीवन में भिन्नता दिखाई देती है कि नहीं ? जैसे -- श्री हनुमानजी महाराज ने अपने जीवन में ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया, कभी विवाह नहीं किया, पर श्री भरतजी तथा लक्ष्मण जी के जीवन में विवाह का वर्णन है। तो बालब्रह्मचारी हनुमानजी श्रेष्ठ हैं या विवाहित भरतजी श्रेष्ठ हैं ? इसका उत्तर क्या हो सकता है ? किन्तु गोस्वामीजी का अभिप्राय है कि यदि आप *श्रेष्ठता तथा कनिष्ठता का निर्णय* अपनी मान्यताओं के आधार पर करेंगे, तो आप उनमें से एक को श्रेष्ठ बता देंगे। यदि आपके मन में यह आग्रह है कि ब्रह्मचर्य एक बहुत ऊँची स्थिति है तो आपको लगेगा कि श्री हनुमानजी में ब्रह्मचर्य है इसलिए वे ही सर्वश्रेष्ठ हैं। पर केवल इसी *मान्यता के आधार पर निर्णय करना ठीक नहीं है।* रामायण में एक ओर तो हनुमानजी जैसे ब्रह्मचारी से लेकर सुग्रीव तक भगवान् राम के सेवक हैं तथा दूसरी ओर अगर चित्रकूट के संदर्भ में विचार करके देखेंगे तो आपको दिखाई देगा कि भगवान् श्री राघवेन्द्र जब चित्रकूट की ओर यात्रा कर रहे हैं तब उनके साथ लक्ष्मणजी और जनकनन्दिनी श्री सीता हैं। उसके पश्चात् जब श्री भरतजी चित्रकूट की ओर यात्रा करते हैं तब अयोध्या के नागरिक श्री भरतजी के साथ चित्रकूट जाते हैं। और उन पात्रों में भरतजी के साथ-साथ कैकेयी जी भी हैं। यद्यपि कैकेयी जी के संदर्भ में बड़ा मतभेद है। कई लोग यदि उन्हें बड़ी प्रशंसा की दृष्टि से देखते हैं तो कई लोग उनकी बड़े कठिन शब्दों में निन्दा करते हैं। रामायण में ही भगवान राम कैकेयी जी की प्रशंसा करते हैं किन्तु श्री भरतजी उनकी निन्दा करते हैं। और यह जो *प्रशंसा अथवा निन्दा है वह व्यक्ति की अलग-अलग दृष्टि पर निर्भर है।* जब भगवान् श्री राम चित्रकूट में कैकेयी जी की प्रशंसा करने लगे तब श्री भरतजी की आँखों में आँसू आ गए प्रभु यह सोचकर बड़े प्रसन्न हुए कि भले ही भरतजी कैकेयी की आलोचना करते रहे हों, परन्तु आज जब मैं प्रशंसा कर रहा हूँ तो गदगद हो रहे हैं। लगता है कि मेरे भाषण का प्रभाव पड़ा, जिससे कि भरत बदल गए। उन्होंने श्री भरत की ओर देखा और पूछा कि भरत ! अभी जो मैंने माँ की कथा सुनाई वह तुम्हें कैसी लगी ? सुनकर तुम्हारी आँखों में आँसू आ गए, लगता है तुम्हें बड़ा सुख मिला। परन्तु भरतजी ने कहा -- महाराज ! आँसू कथा सुनकर नहीं आए, अपितु कथावाचक को देखकर आए। क्योंकि मैं सोचने लगा कि जिन कैकेयी ने आपको इतना कष्ट दिया, जब उनका गुण स्वयं आप गा रहे हैं तो लगा कि *आप कितने उदार हैं जो अपने को कष्ट देने वाले का भी गुण गा सकते हैं। प्रभु ! इससे मुझे उनके गुण की याद नहीं आ रही है, मुझे तो आपके गुण की याद आ रही है।* यही अपनी-अपनी भिन्न दृष्टि है । और यह *भिन्नता प्रत्येक क्षेत्र में है। जैसे मनुष्य की आकृति में भिन्नता है, मनुष्य के स्वभाव में भिन्नता है।* अगर एक ही प्रकार के आचरणयुक्त व्यक्तियों को ईश्वर की प्राप्ति का निर्देश कर दिया जाय तो आपकी मान्यता के आधार पर भले ही वह ठीक हो, लेकिन *ईश्वर तो आपकी मान्यता से बँधा हुआ है नहीं। आपके जीवन की जो मान्यताएं हैं उन्हें आपको मानना चाहिए।* श्री भरत की दृष्टि भी भरत के साथ है और भगवान की दृष्टि भगवान के साथ है। श्री भरत भी चित्रकूट पहुँचते है और साथ में कैकेयी जी भी पहुँचती हैं। गोस्वामीजी कहते हैं कि जब श्री भरतजी चित्रकूट जा रहे थे तो मैं भी उनके साथ चला गया। किसी ने तुलसीदास जी से पूछा कि -- आप भरतजी के साथ क्यों गए ? तो उन्होंने कहा भई ! एक तो मैंने देखा कि यहाँ पर बहुत अधिक भीड़-भाड़ जा रही है, भरतजी अकेले नहीं जा रहे हैं। और जब मैंने यह देखा कि भरतजी के साथ उस भीड़ में प्रभु को वन भेजने वाली कैकेयी भी जा रही हैं तो मुझे लगा कि जब कैकेयी जी जा सकती हैं तो मैं भी जा सकता हूँ। और यही संकेत दुसरे संदर्भ में भी है। 📙 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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Ranveer soni Apr 17, 2021

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Ramesh Agrawal Apr 17, 2021

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NK Jha Apr 17, 2021

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